बुंदेलखंड में केन-बेतवा लिंक प्रोजेक्ट के खिलाफ भड़का आक्रोश, किसानों का 17 दिन चला 'चिता सत्याग्रह' पुलिस ने किया खत्म मध्य प्रदेश के छतरपुर और पन्ना जिलों में केन-बेतवा नदी जोड़ो परियोजना के कारण विस्थापित हो रहे किसानों का 17 दिवसीय उग्र प्रदर्शन पुलिस कार्रवाई के बाद समाप्त हो गया है। उचित मुआवजे और पुनर्वास की मांग को लेकर नदी तट पर प्रतीकात्मक चिताओं पर लेटे आदिवासियों को भारी पुलिस बल ने हटा दिया है। मध्य प्रदेश के बुंदेलखंड क्षेत्र में पानी की किल्लत दूर करने के उद्देश्य से लाई गई देश की पहली और सबसे बड़ी नदी जोड़ो परियोजना अब स्थानीय लोगों के लिए एक बड़े संकट का कारण बन गई है। केन-बेतवा लिंक प्रोजेक्ट को भले ही एक बड़ी उपलब्धि के तौर पर देखा जा रहा हो, लेकिन हकीकत यह है कि यह योजना हजारों परिवारों के लिए विस्थापन और आजीविका छिनने का डर लेकर आई है। इसी भय और अन्याय के खिलाफ छतरपुर और पन्ना जिले के ग्रामीणों ने एक अभूतपूर्व आंदोलन छेड़ रखा था। अपने घरों, सिंचित जमीनों और पीढ़ियों से चले आ रहे रहन-सहन को बचाने के लिए सैकड़ों आदिवासी किसान न्याय की गुहार लगाते हुए मौत के मुहाने तक पहुंच गए। प्रशासन की अनदेखी और मुआवजे में हो रही कथित धांधली से नाराज इन लोगों ने 17 दिनों तक वराना नदी के तट पर प्रतीकात्मक चिताओं पर लेटकर अपना विरोध दर्ज कराया। यह उग्र प्रदर्शन बताता है कि विकास की जिस कीमत को चुकाने की बात कही जा रही है, उसका सीधा असर उन गरीबों पर पड़ रहा है जिनकी आवाज कोई नहीं सुन रहा है। 'चिता सत्याग्रह' का उग्र रूप और पुलिस की कार्रवाई छतरपुर जिले की बिजावर तहसील के अंतर्गत आने वाले कुपी गांव के पास वराना (जिसे बरना भी कहा जाता है) नदी के किनारे यह ऐतिहासिक 'चिता आंदोलन' 3 जुलाई से शुरू हुआ था। इस प्रदर्शन में पन्ना और छतरपुर जिले के लगभग 24 से अधिक उन गांवों के लोग शामिल हुए, जिन्हें इस परियोजना के कारण अपनी जमीन खाली करनी पड़ रही है। इस उग्र आंदोलन में आदिवासी महिलाओं से लेकर बुजुर्ग और युवा किसान तक भारी संख्या में मौजूद थे। लेकिन 19 जुलाई की सुबह करीब 5 बजे भारी पुलिस बल और प्रशासनिक अमले ने अचानक धरना स्थल पर धावा बोल दिया। अधिकारियों ने बलपूर्वक वहां मौजूद ग्रामीणों को खदेड़ दिया और इस 17 दिन पुराने प्रदर्शन को समाप्त करा दिया। पुलिस और प्रशासन का तर्क था कि वराना नदी का जलस्तर लगातार और तेजी से बढ़ रहा था। चूंकि यह प्रदर्शन एक निर्माणाधीन पुल के ठीक नीचे चल रहा था, इसलिए किसी भी संभावित बाढ़ या जलभराव की स्थिति में ग्रामीणों की जान को गंभीर खतरा हो सकता था। इसी सुरक्षा कारणों का हवाला देते हुए पुलिस ने उन्हें वहां से हटाया। हालांकि, आंदोलनकारियों का सीधा आरोप है कि पुलिस ने उन्हें हटाने के लिए बर्बरता का प्रयोग किया और यहां तक कि उन्हें मीडिया से बात करने या अपनी पीड़ा साझा करने से भी रोक दिया गया। प्रदर्शनकारियों को जबरन बसों में भरा गया और उनके पैतृक गांवों की ओर रवाना कर दिया गया। अमित भटनागर का आमरण अनशन और ग्रामीणों की जिद इस पूरे 'चिता सत्याग्रह' का नेतृत्व प्रमुख सामाजिक कार्यकर्ता अमित भटनागर कर रहे थे। उन्होंने विस्थापित होने वाले आदिवासियों की आवाज को बुलंद करने के लिए एक बेहद कठिन रास्ता चुना। अमित भटनागर पिछले 14 दिनों से बिना कुछ खाए-पिए आमरण अनशन पर बैठे थे। उनका और ग्रामीणों का विरोध करने का तरीका इतना दर्दनाक था कि उन्होंने नदी के ठंडे पानी में लकड़ियों की प्रतीकात्मक चिताएं बनाई थीं। वे इन्हीं चिताओं पर लेटकर अपना विरोध जता रहे थे। इसके अलावा कई लोगों ने अपने गले में फांसी का फंदा भी डाल रखा था। इसे उन्होंने 'फांसी सत्याग्रह' और 'जल सत्याग्रह' का नाम दिया था। इन सैकड़ों प्रदर्शनकारियों का सिर्फ एक ही नारा था कि या तो उन्हें उनकी जमीन का उचित मुआवजा और कानूनी न्याय दिया जाए, या फिर उन्हें वहीं उन चिताओं पर जिंदा जला दिया जाए। यह जिद इस बात का प्रमाण थी कि ग्रामीण अपनी मांग मनवाने के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार थे। पुलिस कार्रवाई के समय तक लगातार 14 दिनों के अनशन के कारण अमित भटनागर की शारीरिक हालत बेहद नाजुक हो चुकी थी। इसलिए उन्हें धरना स्थल से हटाते ही तत्काल एक एंबुलेंस के जरिए जिला अस्पताल में भर्ती कराया गया, ताकि उनकी जान बचाई जा सके। क्या है केन-बेतवा नदी जोड़ो परियोजना? केन-बेतवा लिंक परियोजना भारत सरकार की सबसे महत्वाकांक्षी और देश की पहली अंतर-नदीय जल हस्तांतरण योजना है। इसका मुख्य उद्देश्य मध्य प्रदेश की केन नदी के अतिरिक्त पानी को एक लंबी नहर के जरिए उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश के सूखे से जूझ रहे बुंदेलखंड क्षेत्र की बेतवा नदी में पहुंचाना है। इस पूरी परियोजना की अनुमानित लागत लगभग 44,605 करोड़ रुपये आंकी गई है। सरकार का दावा है कि इस भारी-भरकम बजट वाली योजना के पूरा होने से बुंदेलखंड के लाखों हेक्टेयर कृषि भूमि को सिंचाई के लिए पर्याप्त पानी मिलेगा और बड़े पैमाने पर पेयजल की आपूर्ति सुनिश्चित होगी। लेकिन इस विकास के सिक्के का दूसरा पहलू पर्यावरण और वन्यजीवों के लिए बेहद भयानक है। इस प्रोजेक्ट के कारण पन्ना टाइगर रिजर्व का एक बहुत बड़ा हिस्सा हमेशा के लिए पानी में डूब जाएगा। इसके साथ ही, अनुमान है कि करीब 46 लाख हरे-भरे पेड़ों को काटा जाएगा, जिससे स्थानीय पारिस्थितिकी तंत्र को भारी नुकसान पहुंचेगा। इसी जंगल और जमीन पर आश्रित रहने वाले हजारों आदिवासी अब विस्थापन का दंश झेलने को मजबूर हैं। मुआवजे में धांधली और भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप किसानों और ग्रामीणों के इस भारी आक्रोश की सबसे बड़ी वजह यह है कि उन्हें उनकी जमीन से बेदखल करने की प्रक्रिया में भारी धांधली की जा रही है। विस्थापित परिवारों का स्पष्ट रूप से कहना है कि छतरपुर के दौधन और डोंगरिया सहित कई अन्य गांवों में प्रशासन ने बिना कोई पूर्व सूचना दिए और बिना पूरा मुआवजा सौंपे उनके पक्के मकानों पर बुलडोजर चला दिया। ग्रामीणों का यह भी आरोप है कि सरकार भू-अर्जन कानून 2013 के नियमों का खुलेआम उल्लंघन कर रही है। इस कानून के तहत किसानों को उनकी उपजाऊ और सिंचित जमीन के हिसाब से एक बड़ी राशि मिलनी चाहिए थी, लेकिन अधिकारियों ने कागजों में हेरफेर करके उनकी सिंचित जमीनों को असिंचित और बंजर बता दिया। ऐसा केवल इसलिए किया गया ताकि उन्हें मामूली सा मुआवजा देकर उनकी बहुमूल्य जमीनें छीनी जा सकें। किसानों का यह भी दावा है कि केन-बेतवा लिंक प्रोजेक्ट के मुआवजे और पुनर्वास के नाम पर करीब 400 करोड़ रुपये का भारी घोटाला हुआ है, जिसमें कई स्तरों पर भ्रष्टाचार किया गया है। इन आदिवासियों की मांग है कि प्रत्येक पात्र विस्थापित परिवार के लिए तय किए गए पुनर्वास पैकेज को 5 लाख रुपये से बढ़ाकर 12.5 लाख रुपये किया जाए। इसके साथ ही, डूब क्षेत्र में आने वाले सभी प्रभावितों को बसाने के लिए एक नया और सर्वसुविधायुक्त बसाहट गांव उपलब्ध कराया जाए। प्रशासन का आश्वासन और आगे की राह लगातार 17 दिनों तक चले इस उग्र और जानलेवा प्रदर्शन ने आखिरकार राज्य शासन को बैकफुट पर आने के लिए मजबूर किया। आदिवासियों और विस्थापितों के बढ़ते आक्रोश और आंदोलन के व्यापक प्रभाव को देखते हुए सरकार ने अपने राहत पैकेज में कुछ संशोधन करने का मौखिक आश्वासन दिया है। प्रशासन की तरफ से कहा गया है कि पात्र परिवारों को अब 12.50 लाख रुपये नकद एकमुश्त दिए जाएंगे, या फिर उन्हें एक प्लॉट के साथ मकान बनाने के लिए निर्माण अनुदान की राशि दी जाएगी। हालांकि, ग्रामीण अब केवल खोखले आश्वासनों पर भरोसा करने को तैयार नहीं हैं। भले ही भारी पुलिस बल ने 19 जुलाई को वराना नदी के तट पर चल रहे 'चिता सत्याग्रह' को कुचलने में सफलता हासिल कर ली हो, लेकिन यह आंदोलन पूरी तरह से खत्म नहीं हुआ है। विस्थापित किसानों और आदिवासियों ने साफ चेतावनी दी है कि जब तक उनकी सभी मांगों का स्थायी और लिखित समाधान नहीं हो जाता, तब तक उनके जल, जंगल, जमीन और जीवन को बचाने की यह लड़ाई अनवरत जारी रहेगी। इसका आप पर असर • भारत भर में: यह घटना देश भर में चल रही बड़ी बुनियादी ढांचा परियोजनाओं में विस्थापन और मुआवजे के दावों की जमीनी हकीकत पर सवाल उठाती है। • मध्य प्रदेश में: छतरपुर और पन्ना के स्थानीय निवासियों के लिए, यह उनके जल, जंगल और आजीविका के अधिकारों को लेकर सरकार के साथ सीधे टकराव का संकेत है। सवाल-जवाब 1. केन-बेतवा लिंक प्रोजेक्ट क्या है? यह भारत की पहली नदी जोड़ो परियोजना है, जिसमें मध्य प्रदेश की केन नदी का पानी नहरों के जरिए बुंदेलखंड की बेतवा नदी में लाया जाएगा। 2. किसान 'चिता सत्याग्रह' क्यों कर रहे थे? डूब क्षेत्र में आने वाले गांवों के किसान अपनी जमीनों का उचित मुआवजा और नया बसाहट गांव मांग रहे थे, जिसके लिए वे 17 दिनों तक प्रतीकात्मक चिताओं पर लेटे रहे। 3. प्रदर्शनकारियों की मुख्य मांगें क्या हैं? ग्रामीण मांग कर रहे हैं कि पुनर्वास पैकेज को 5 लाख रुपये से बढ़ाकर 12.5 लाख रुपये किया जाए और सभी प्रभावितों को नई जगह बसाया जाए। 4. पुलिस ने आंदोलन को क्यों हटाया? पुलिस का कहना था कि वराना नदी का जलस्तर बढ़ने के कारण निर्माणाधीन पुल के नीचे चल रहे धरने से ग्रामीणों की जान को खतरा हो सकता था। https://trendkia.com/madhya-pradesh/bundelkhand-men-ken-betwa-link-project-ke-khilapha-bharaka-akrosha-kisanon-ka-17-dina-chala-chita-satyagraha-pulisa-ne-kiya-khatma-9355 TrendKia — Har trend, sabse pehle.