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  "type": "article",
  "title": "हिंद महासागर में 3500 किमी तक अचूक निशाना, डीआरडीओ तैयार कर रहा हाइपरसोनिक एंटी-शिप मिसाइल",
  "summary": "भारतीय रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन 3,500 किलोमीटर की मारक क्षमता वाली लॉन्ग रेंज एंटी-शिप मिसाइल के नए वेरिएंट पर शोध कर रहा है, जो हिंद महासागर क्षेत्र में भारत की नौसैनिक ताकत को कई गुना बढ़ा देगा।",
  "content": "भारत अपनी तीनों सेनाओं—थल सेना, वायु सेना और नौसेना—को अत्याधुनिक तकनीक से लैस करने के लिए रक्षा प्रणालियों के व्यापक आधुनिकीकरण में जुटा है। भविष्य के युद्धों की जरूरतों को देखते हुए लड़ाकू विमानों, ड्रोन और मिसाइल प्रौद्योगिकियों में हजारों करोड़ रुपये का निवेश किया जा रहा है। अगली पीढ़ी के एएमसीए (AMCA) प्रोजेक्ट के जरिए पांचवीं, छठी और उससे आगे की पीढ़ी के स्टील्थ लड़ाकू विमान तैयार करने की दिशा में कदम बढ़ाए जा रहे हैं। इसी कड़ी में भारत के रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (डीआरडीओ) ने हाल ही में हिंद महासागर में लगभग 3,000 किलोमीटर के क्षेत्र के लिए एक नोटम (NOTAM) जारी किया है। रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि यह क्षेत्र मध्यम से लंबी दूरी की मिसाइल के परीक्षण के लिए निर्धारित किया गया है। इसके साथ ही भारतीय रक्षा वैज्ञानिक एक महत्वाकांक्षी योजना पर काम कर रहे हैं, जिसका उद्देश्य देश की एंटी-शिप मिसाइल क्षमता को अभूतपूर्व सीमा तक विस्तार देना है।\n\nहिंद महासागर में रणनीतिक सुरक्षा का नया दौर\nभारत अपने तटीय क्षेत्रों की सुरक्षा को केवल सीमाओं तक सीमित न रखकर दूरस्थ समुद्री क्षेत्रों में रणनीतिक दबदबा कायम करने की तैयारी में है। इसके लिए डीआरडीओ लॉन्ग रेंज एंटी-शिप मिसाइल (LR-AShM) के एक विस्तारित दूरी (एक्स्टेंडेड रेंज) वाले वेरिएंट की व्यवहार्यता का अध्ययन कर रहा है। शोधकर्ताओं का लक्ष्य इस मिसाइल की मारक क्षमता को 3,500 किलोमीटर तक पहुंचाना है। यद्यपि इस संबंध में अभी कोई आधिकारिक सैन्य घोषणा नहीं की गई है, परंतु वर्तमान में उपलब्ध LR-AShM की रेंज 1,500 किलोमीटर है। यदि इसकी क्षमता को बढ़ाकर 3,500 किलोमीटर कर दिया जाता है, तो यह मिसाइल भारत की तटवर्ती सुरक्षा को केवल तटीय पहरेदारी से आगे बढ़ाकर पूरे हिंद महासागर क्षेत्र में दुश्मन के युद्धपोतों और नौसैनिक संपत्तियों को निशाना बनाने की असाधारण ताकत प्रदान करेगी। इस हथियार को जमीन पर तैनात मोबाइल लॉन्चरों से लॉन्च कर समुद्र में बहुत दूर स्थित दुश्मन के बेड़ों को तबाह किया जा सकेगा।\n\nहाइपरसोनिक बूस्ट-ग्लाइड तकनीक की कार्यप्रणाली\nइस प्रस्तावित दीर्घकालिक मिसाइल प्रणाली का मुख्य आधार अत्याधुनिक हाइपरसोनिक बूस्ट-ग्लाइड तकनीक होगी। यह प्रक्रिया पारंपरिक क्रूज या बैलिस्टिक मिसाइलों से काफी भिन्न है। इसमें शुरुआत में एक शक्तिशाली रॉकेट मोटर मिसाइल को अत्यधिक ऊंचाई और तीव्र गति पर वायुमंडल की ऊपरी परतों में पहुंचाती है। इसके बाद, हाइपरसोनिक ग्लाइड वाहन मुख्य रॉकेट से अलग हो जाता है और वायुमंडलीय लिफ्ट का उपयोग करते हुए अत्यधिक उच्च वेग से लक्ष्य की ओर ग्लाइड करता है। इस मिसाइल को मैक 10 की रफ्तार—जो लगभग 12,348 किलोमीटर प्रति घंटा होती है—तक पहुंचाने के लिए कई तकनीकी बदलावों की आवश्यकता होगी। केवल मिसाइल में अतिरिक्त ईंधन भर देने मात्र से 3,500 किलोमीटर की दूरी तय नहीं की जा सकती; इसके लिए रॉकेट मोटर, प्रोपल्शन सिस्टम, एयरोडायनामिक डिजाइन और मल्टी-स्टेज पृथक्करण प्रक्रिया को पूरी तरह से नए सिरे से विकसित करना होगा।\n\n2,000 डिग्री सेल्सियस तापमान और प्रणोदन की चुनौती\nअत्यधिक तेज गति से इतनी लंबी दूरी तय करने के मार्ग में सबसे बड़ी बाधा वायुमंडलीय घर्षण से उत्पन्न अत्यधिक तापमान है। जब कोई वस्तु मैक 10 जैसी हाइपरसोनिक गति पर उड़ान भरती है, तो उसकी बाहरी सतह पर तापमान 2,000 डिग्री सेल्सियस से भी ऊपर चला जाता है। इतने भीषण ताप में मिसाइल के इलेक्ट्रॉनिक घटकों और बाहरी आवरण को पिघलने से बचाने के लिए डीआरडीओ को अत्यंत आधुनिक हीट शील्डिंग, उन्नत कंपोजिट सामग्रियों और वायुगतिकीय (एयरोडायनामिक) संतुलन पर काम करना पड़ रहा है। इसके अतिरिक्त, इतनी लंबी दूरी पर सटीक हमले के लिए मार्गदर्शन प्रणाली का पूरी तरह से त्रुटिरहित होना अनिवार्य है। इसके लिए मिसाइल में भारत की स्वदेशी नाविक (NavIC) सैटेलाइट नेविगेशन प्रणाली को मुख्य गाइडेंस के रूप में शामिल किए जाने की पूरी संभावना है।\n\nसटीक नेविगेशन और इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर से मुकाबला\nभविष्य के युद्धक्षेत्र में इलेक्ट्रॉनिक युद्ध प्रणाली का व्यापक असर रहेगा, जहां दुश्मन सैटेलाइट संकेतों को जाम करने या उन्हें भटकाने का प्रयास कर सकता है। ऐसे चुनौतीपूर्ण माहौल में भी 3,500 किलोमीटर की दूरी पर सटीक निशाना साधने के लिए मिसाइल को बैकअप नेविगेशन सेंसरों से लैस किया जाएगा। इसमें फाइबर ऑप्टिक या रिंग-लेजर जाइरोस्कोप आधारित इनर्शियल नेविगेशन सिस्टम का उपयोग होगा, जो जीपीएस या सैटेलाइट सिग्नल बाधित होने की स्थिति में भी मिसाइल को उसके तय मार्ग पर बनाए रखेगा। यह आत्मनिर्भर नेविगेशन तकनीक मिसाइल को दुश्मन के इलेक्ट्रॉनिक हमलों से पूरी तरह सुरक्षित रखेगी।\n\nब्रह्मोस के साथ मिलकर बनेगी भारत की अभेद्य ढाल\nलंबी दूरी की यह हाइपरसोनिक एंटी-शिप मिसाइल भारत की मौजूदा मिसाइल प्रणालियों जैसे ब्रह्मोस का स्थान नहीं लेगी, बल्कि उसकी पूरक बनेगी। ब्रह्मोस मिसाइल कम से मध्यम दूरी पर त्वरित और विनाशकारी प्रहार करने में माहिर है, जबकि 3,500 किलोमीटर क्षमता वाली यह नई मिसाइल सुदूर समुद्र में रणनीतिक निवारक के रूप में कार्य करेगी। जमीन से संचालित होने वाली इतनी लंबी दूरी की मारक क्षमता भारत को एक मजबूत एंटी-एक्सेस/एरिया-डिनायल (A2/AD) सुरक्षा कवच प्रदान करेगी। इससे भारतीय मुख्य भूमि और अंडमान-निकोबार जैसे द्वीप क्षेत्रों के आसपास दुश्मन के युद्धपोतों का आना अत्यंत जोखिम भरा हो जाएगा। यद्यपि 3,500 किलोमीटर के इस वेरिएंट को पूरी तरह से विकसित, परीक्षण और सेना में शामिल करने में कई वर्षों का समय लगेगा, लेकिन यह सफलता भारत को वैश्विक मिसाइल तकनीक में अग्रिम पंक्ति में खड़ा कर देगी।\n\nइसका आप पर असर\nभारत द्वारा 3,500 किलोमीटर की मारक क्षमता वाली हाइपरसोनिक मिसाइल विकसित करने से देश की सुरक्षा और नौसैनिक शक्ति अत्यधिक मजबूत होगी।\n\n• राष्ट्रीय सुरक्षा पर प्रभाव: यह मिसाइल भारत को हिंद महासागर में दूर-दराज़ के क्षेत्रों तक अपनी समुद्री सीमाओं की रक्षा करने का एक अभेद्य सुरक्षा कवच प्रदान करेगी।\n• तकनीकी आत्मनिर्भरता: स्वदेशी नाविक सिस्टम और एडवांस्ड एयरोडायनामिक्स के उपयोग से भारत रक्षा तकनीक के क्षेत्र में विदेशी निर्भरता को समाप्त करने की ओर अग्रसर है।\n• सामरिक संतुलन: इतनी लंबी दूरी की ए2/एडी (A2/AD) क्षमता मिलने से दुश्मन के युद्धपोत भारतीय जलक्षेत्र और द्वीपों के करीब आने का दुस्साहस नहीं करेंगे।\n• आर्थिक सुरक्षा: हिंद महासागर क्षेत्र में भारत के समुद्री व्यापारिक मार्गों की सुरक्षा सुनिश्चित होगी, जिससे वैश्विक व्यापार सुचारू रूप से चलता रहेगा।\n\nसवाल-जवाब\n\n1. प्रस्तावित नई मिसाइल की मारक क्षमता कितनी होगी?\nइस विस्तारित वेरिएंट की लक्षित मारक क्षमता लगभग 3,500 किलोमीटर होगी, जो मौजूदा 1,500 किलोमीटर की रेंज से दोगुने से भी अधिक है।\n\n2. इस मिसाइल की अधिकतम गति कितनी होगी?\nयह मिसाइल हाइपरसोनिक गति यानी लगभग मैक 10 (करीब 12,348 किलोमीटर प्रति घंटा) की रफ्तार से उड़ान भरने में सक्षम होगी।\n\n3. हाइपरसोनिक बूस्ट-ग्लाइड तकनीक कैसे काम करती है?\nप्रारंभिक रॉकेट चरण मिसाइल को अत्यधिक ऊंचाई पर ले जाता है, जिसके बाद ग्लाइड व्हीकल अलग होकर वायुमंडल की ऊपरी परतों में तैरते हुए लक्ष्य तक पहुंचता है।\n\n4. क्या यह मिसाइल ब्रह्मोस की जगह लेगी?\nनहीं, यह ब्रह्मोस का स्थान लेने के बजाय उसकी पूरक बनेगी; ब्रह्मोस कम दूरी के तेज हमलों के लिए है, जबकि यह सुदूर समुद्र के खतरों से निपटेगी।\n\n5. सटीक निशाने के लिए इसमें किस नेविगेशन प्रणाली का प्रयोग होगा?\nइसमें भारत की स्वदेशी नाविक (NavIC) सैटेलाइट प्रणाली के साथ-साथ रिंग-लेजर या फाइबर-ऑप्टिक जाइरोस्कोप इनर्शियल सेंसर का उपयोग किया जाएगा।",
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  "category": "मध्य प्रदेश",
  "publishedAt": "2026-08-30",
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    "हाइपरसोनिक मिसाइल",
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