# मौसम का कहर और युद्ध की आग: दुनिया पर मंडराया व्यापक खाद्यान्न संकट

> यूक्रेन और पश्चिम एशिया में जारी अशांति के बीच प्रशांत महासागर में गहराते अल नीनो ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अनाज और उर्वरक की आपूर्ति श्रृंखला को चरमरा दिया है। कमजोर मानसूनी वर्षा, गिरते जलाशय स्तर और सूखे के चलते भारत समेत कई एशियाई तथा अफ्रीकी देशों में कृषि उत्पादन पर गंभीर दबाव बन रहा है।

**Type:** article · **Category:** मध्य प्रदेश · **Published:** 2026-10-02 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/madhya-pradesh/mausama-ka-kahara-aura-yuddha-ki-aga-duniya-para-mndaraya-vyapaka-khadyanna-snkata-42078 · **Language:** Hindi
**Tags:** खाद्य सुरक्षा, अल नीनो, एस जयशंकर, मानसून, चावल की कीमतें, ग्लोबल साउथ

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कृषि पैदावार और खाद्य वितरण तंत्र पर एक साथ कई गंभीर संकट गहराते जा रहे हैं। न्यूयॉर्क में स्थित एशिया सोसाइटी के एक मंच से बोलते हुए एस जयशंकर ने स्पष्ट किया कि आने वाले कुछ महीनों के भीतर पूरी दुनिया को अत्यंत गंभीर खाद्यान्न संकट का सामना करना पड़ सकता है। भू-राजनीतिक तनाव और पर्यावरणीय असंतुलन के मेल ने विकासशील अर्थव्यवस्थाओं की चिंताओं को कई गुना बढ़ा दिया है।

## वैश्विक खाद्य तंत्र पर चौतरफा मार
मौजूदा समय में दुनिया तीन बेहद तीव्र झटकों से जूझ रही है। एक तरफ यूक्रेन में लंबे समय से जारी सैन्य टकराव ने यूरोप और उसके सीमावर्ती क्षेत्रों से अनाज की आवाजाही को बाधित किया है, तो दूसरी तरफ पश्चिम एशिया का निरंतर गहराता तनाव व्यापारिक मार्गों पर जोखिम पैदा कर रहा है। इसके साथ ही प्रशांत महासागर से उठने वाला प्रचंड अल नीनो मौसमी चक्र को अस्त-व्यस्त कर रहा है। इन तीनों रुकावटों ने मिलकर उर्वरक और अनाज की अंतरराष्ट्रीय आपूर्ति व्यवस्था की रीढ़ तोड़ दी है।

इन प्रत्यक्ष संकटों के अतिरिक्त एक मूक वित्तीय दबाव भी उभर रहा है। जब भी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर युद्ध और अस्थिरता का दायरा बढ़ता है, वैश्विक निवेशक अपनी पूंजी को विकासशील और उभरती अर्थव्यवस्थाओं से सुरक्षित बाजारों की ओर स्थानांतरित कर लेते हैं। इस पूंजी पलायन के कारण ग्लोबल साउथ के देशों को एक साथ ऊर्जा, भोजन, उर्वरक और पूंजी की विकट कमी का सामना करना पड़ रहा है, जिसे समग्र आर्थिक सुरक्षा के लिए सबसे चुनौतीपूर्ण दौर माना जा रहा है।

## प्रशांत महासागर का रिकॉर्ड तोड़ मौसमी चक्र
जलवायु आकलन तंत्र के ताजा आंकड़े बेहद चिंताजनक रुझानों की ओर इशारा कर रहे हैं। अमेरिका के क्लाइमेट प्रेडिक्शन सेंटर द्वारा जुटाए गए ब्योरे के अनुसार अल नीनो का प्रभाव लगातार आक्रामक रुख अख्तियार कर रहा है। उत्तरी गोलार्ध के भीतर साल 2026-27 के शीतकालीन महीनों के दौरान इसके बेहद भयावह स्वरूप में तब्दील होने की 90 प्रतिशत से अधिक संभावना आंकी गई है। समुद्र के तापमान में होने वाली यह असामान्य वृद्धि वैश्विक वायुमंडलीय परिसंचरण को उलट-पुलट करने में सक्षम है।

पूर्वी प्रशांत महासागरीय क्षेत्र में सतह का तापमान सामान्य मानकों की तुलना में 3.0 डिग्री सेल्सियस अधिक दर्ज होने का अनुमान लगाया गया है। वैज्ञानिक विश्लेषणों के अनुसार अक्टूबर से दिसंबर के दौरान एक असाधारण मौसमी घटना घटने की 75 प्रतिशत संभावना है, जो संभवतः वर्ष 1950 के बाद के सभी ऐतिहासिक रिकॉर्ड ध्वस्त कर सकती है। यह असंतुलित परिस्थिति मार्च-मई 2027 तक खिंच सकती है, जिसका सबसे घातक प्रभाव खेती के पारंपरिक कैलेंडर पर पड़ेगा। यह मौसमी उथल-पुथल ठीक उस चरण में चरम पर होगी जब एशियाई इलाकों में शुष्क मौसम की फसलें पक रही होंगी, ऑस्ट्रेलिया में कटाई का दौर होगा और दक्षिणी अफ्रीकी क्षेत्रों में मक्के की बुवाई का चक्र प्रारंभ हो रहा होगा।

## भारतीय कृषि और कमजोर मानसूनी बारिश की मार
घरेलू मोर्चे पर भारत पहले ही इस जलवायु परिवर्तन का सीधा प्रभाव अनुभव कर चुका है। हालिया मानसूनी दौर में देश भर में कुल मिलाकर केवल 759.4 मिलीमीटर वर्षा दर्ज की गई, जो दीर्घावधि औसत का मात्र 87 प्रतिशत बैठती है। ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में यह आंकड़ा साल 1901 के बाद से 13वीं सबसे कम मानसूनी बारिश के रूप में सामने आया है, जबकि साल 2001 के बाद के कालखंड पर नजर डालें तो यह चौथा सबसे दुर्बल मानसून सिद्ध हुआ है।

बुवाई के महत्वपूर्ण चरण यानी जून के अकेले महीने में पूरे देश में केवल 99.5 मिमी पानी बरसा, जो सामान्य औसत के मुकाबले करीब 40 प्रतिशत की भारी गिरावट दर्शाता है। इस वर्षा का वितरण भी बेहद असंतुलित रहा। देश के पूर्वी और पूर्वोत्तर राज्यों में सामान्य की तुलना में 26 प्रतिशत कम मेघ बरसे, जबकि दक्षिणी प्रायद्वीपीय भूभाग में वर्षा की कमी 24 प्रतिशत दर्ज की गई। मौसम विभाग द्वारा निर्धारित 36 उप-मंडलों में से 17 सब-डिवीजन में बारिश का गंभीर अभाव देखा गया है। इन विपरीत परिस्थितियों के मद्देनजर सरकार ने साल 2026-27 के वास्ते खाद्यान्न उत्पादन के आधिकारिक लक्ष्य को संशोधित कर घटा दिया है। अब पूरी दारोमदार रबी फसलों पर आ गई है, जिनकी सिंचाई काफी हद तक बड़े जलाशयों के बचे हुए जल स्तर पर आश्रित रहेगी।

## अनाज भंडारों की स्थिति और चावल के दाम
एक सकारात्मक पहलू यह है कि देश की सार्वजनिक वितरण प्रणाली के पास अनाजों का एक ठोस सुरक्षा कवच तैयार है। पहली जुलाई की स्थिति के अनुसार फूड कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया के गोदामों में 40.31 मिलियन टन चावल का मजबूत स्टॉक मौजूद था। इसके अलावा धान का इतना विशाल भंडार उपलब्ध है जिससे अतिरिक्त 38.74 मिलियन टन चावल का उत्पादन आसानी से किया जा सकता है। फिर भी खुले बाजार का गणित सरकारी भंडारों से अलग व्यवहार कर रहा है।

सरकारी भंडारों में विपुल मात्रा होने के बावजूद खुदरा और थोक मंडियों में प्रीमियम चावल की कीमतों में लगातार तेजी देखी जा रही है। इसका मुख्य कारण यह है कि केंद्रीय पूल में रखा गया अधिकांश भंडार सामान्य किस्मों का है, जो प्राथमिक रूप से जन कल्याणकारी योजनाओं और रियायती राशन वितरण के लिए आरक्षित रहता है। वाणिज्यिक खुले बाजार में उच्च गुणवत्ता वाले चावल की सीमित आवक के कारण कीमतों पर दबाव बना हुआ है।

## दक्षिण-पूर्व एशिया और अफ्रीकी महाद्वीप पर असर
अंतरराष्ट्रीय बाजार में दक्षिण-पूर्व एशिया के प्रमुख उत्पादक देश इस मौसमी आघात से बुरी तरह झुलस रहे हैं। व्यापारिक विश्लेषकों का आकलन है कि इस भूभाग में चावल का कुल उत्पादन 2 से 8 प्रतिशत तक नीचे लुढ़क सकता है। यदि यह गिरावट औसतन 5 प्रतिशत भी रहती है, तो यह घाटा थाईलैंड के पूरे वार्षिक निर्यात के समतुल्य होगा। थाईलैंड में जनवरी से अप्रैल के बीच सामान्य से 60 प्रतिशत कम वर्षा दर्ज की गई, जबकि कंबोडिया में एक लाख हेक्टेयर से अधिक धान के रकबे सूखे की चपेट में आ चुके हैं। दूसरी ओर, फिलीपींस इस पूरे परिदृश्य में सबसे संवेदनशील आयातक बनकर उभरा है, जहां स्थानीय उत्पादन में कमी के कारण विदेशी खरीद पर निर्भरता अभूतपूर्व स्तर पर पहुंच सकती है।

## इसका आप पर असर
कमजोर मानसूनी बारिश और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अनाज आपूर्ति में व्यवधान से आने वाले महीनों में घरेलू और वैश्विक स्तर पर खाद्य वस्तुओं की महंगाई बढ़ सकती है।

- **भारत में:** सामान्य राशन वितरण प्रणाली मजबूत बफर स्टॉक के कारण सुरक्षित रहेगी, लेकिन खुले बाजार में गैर-बासमती और प्रीमियम चावल की खुदरा कीमतों में बढ़ोतरी देखने को मिल सकती है। उपभोक्ताओं को अपनी मासिक रसोई बजट योजना में अनाज खर्च को लेकर सतर्क रहना होगा क्योंकि जलाशयों में कम पानी के चलते रबी उत्पादन पर असर पड़ सकता है।
- **किसानों और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर:** खरीफ सीजन में वर्षा की भारी कमी के कारण कृषि आय प्रभावित हो सकती है और आगामी रबी बुवाई के लिए सिंचाई लागत बढ़ेगी। जिन 17 उप-मंडलों में बारिश कम रही है, वहां के किसानों को भूजल और सीमित नहर आपूर्ति पर अधिक निर्भर रहना पड़ेगा।
- **वैश्विक स्तर पर:** दक्षिण-पूर्व एशिया में चावल उत्पादन में संभावित गिरावट से अंतरराष्ट्रीय बाजारों में आयात महंगा हो जाएगा। फिलीपींस जैसे निर्बल आयातक देशों में खाद्यान्न उपलब्धता बनाए रखने के लिए सरकारी सब्सिडी पर अतिरिक्त भार पड़ेगा।
- **निवेश और व्यापार पर:** युद्ध और मौसमी संकट के कारण विकासशील देशों से पूंजी पलायन जारी रह सकता है, जिससे खाद्य व उर्वरक आयात पर विदेशी मुद्रा का दबाव बढ़ेगा। खाद्य प्रसंस्करण इकाइयों और कृषि आधारित व्यवसायों को कच्चे माल की खरीद लागत में उतार-चढ़ाव झेलना पड़ेगा।

## ऐसा क्यों हुआ
यह संकट जलवायु विसंगतियों, लंबे भू-राजनीतिक संघर्षों और वित्तीय असुरक्षा के एक साथ टकराने की वजह से पैदा हुआ है। कई परस्पर जुड़े कारकों ने वैश्विक कृषि चक्र और आपूर्ति तंत्र को एक साथ कमजोर कर दिया है।

- **जलवायु चक्र में अल नीनो का उभार:** पूर्वी प्रशांत महासागर में समुद्र की सतह का तापमान सामान्य से 3.0 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ने के संकेत मिले हैं, जिससे वैश्विक वर्षा प्रतिरूप पूरी तरह बिखर गया है। यह मौसमी उलटफेर ठीक उस समय चरम पर पहुंच रहा है जब प्रमुख उत्पादक क्षेत्रों में बुवाई और कटाई का अहम दौर होता है।
- **अंतरराष्ट्रीय युद्ध और आपूर्ति श्रृंखला में रुकावट:** यूक्रेन संघर्ष के लंबा खिंचने और पश्चिम एशिया में सैन्य तनाव बढ़ने से दुनिया भर में खाद्यान्न और उर्वरक की सहज आवाजाही बाधित हुई है। समुद्री मार्गों पर बढ़ते जोखिम ने वैश्विक परिवहन लागत को अत्यधिक बढ़ा दिया है।
- **पूंजी का सुरक्षित ठिकानों की ओर पलायन:** अंतरराष्ट्रीय संघर्षों के माहौल में निवेशकों ने विकासशील अर्थव्यवस्थाओं से अपनी पूंजी निकालकर सुरक्षित बाजारों में स्थानांतरित की है। इसके चलते ऊर्जा, खाद्य, उर्वरक और वित्त के चार मोर्चों पर विकासशील देशों के सामने गंभीर आर्थिक तनाव खड़ा हो गया है।
- **मानसून का कमजोर ऐतिहासिक प्रदर्शन:** भारत में मानसूनी सीजन के दौरान केवल 759.4 मिमी वर्षा दर्ज हुई, जो दीर्घावधि औसत का 87 प्रतिशत है और साल 1901 के बाद से 13वां सबसे दुर्बल स्तर है। जून में 40 प्रतिशत की भारी वर्षा कमी ने मिट्टी की नमी और जलाशयों के भंडारण को सीधे तौर पर प्रभावित किया।

## सवाल-जवाब

### 1. एस जयशंकर ने किस अंतरराष्ट्रीय मंच पर वैश्विक खाद्य संकट की चेतावनी दी?
उन्होंने न्यूयॉर्क स्थित प्रतिष्ठित एशिया सोसाइटी के एक कार्यक्रम में संबोधित करते हुए आने वाले महीनों में गंभीर वैश्विक खाद्य संकट उत्पन्न होने की चेतावनी दी।

### 2. दुनिया इस समय किन तीन मुख्य झटकों का सामना कर रही है?
यूक्रेन का लंबा खिंचता सैन्य संघर्ष, पश्चिम एशिया का गहराता तनाव और प्रशांत महासागर में तेजी से मजबूत होता अल नीनो प्रभाव वे तीन प्रमुख झटके हैं।

### 3. अल नीनो के प्रभाव को लेकर मौसम वैज्ञानिकों ने क्या अनुमान लगाया है?
वैज्ञानिकों के अनुसार 2026-27 की सर्दियों में 90 प्रतिशत संभावना के साथ अल नीनो विकराल रूप ले सकता है, जिससे प्रशांत महासागर का तापमान सामान्य से 3.0 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ सकता है।

### 4. हालिया मानसून के दौरान भारत में कितनी बारिश दर्ज की गई?
भारत में पूरे सीजन के दौरान 759.4 मिलीमीटर वर्षा दर्ज की गई, जो दीर्घावधि औसत का केवल 87 प्रतिशत है और 1901 के बाद से 13वां सबसे कमजोर मानसून है।

### 5. क्या भारत के पास वर्तमान में पर्याप्त चावल का बफर स्टॉक है?
हां, पहली जुलाई तक फूड कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया के पास 40.31 मिलियन टन चावल और इतना धान मौजूद था जिससे 38.74 मिलियन टन अतिरिक्त चावल तैयार हो सके।

### 6. बफर स्टॉक होने के बावजूद बाजार में प्रीमियम चावल के दाम क्यों बढ़ रहे हैं?
सरकारी गोदामों में मौजूद अधिकांश भंडार सामान्य किस्मों का है जो राशन और कल्याणकारी योजनाओं के लिए सुरक्षित है, इसलिए खुले बाजार में प्रीमियम किस्मों की कीमतें बढ़ रही हैं।

### 7. दक्षिण-पूर्व एशिया में चावल उत्पादन में कितनी गिरावट की आशंका है?
मार्केट एनालिस्ट्स के अनुसार दक्षिण-पूर्व एशिया में चावल उत्पादन में 2 से 8 प्रतिशत तक की गिरावट आ सकती है, जिसका औसत 5 प्रतिशत थाईलैंड के पूरे वार्षिक निर्यात के बराबर है।

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