प्रशांत महासागर में अल नीनो के उभार से कमजोर पड़ा मानसून, 2001 के बाद दर्ज हुई चौथी सबसे सूखी स्थिति जून से सितंबर के दौरान देश भर में सामान्य से 13 फीसदी कम बरसात हुई, जिसमें अल नीनो प्रभाव और शुरुआती सूखे ने पूरे सीजन के वर्षा आंकड़ों को बुरी तरह प्रभावित किया। देश भर में चार महीने तक चलने वाले दक्षिण-पश्चिम मानसूनी दौर के समाप्त होने के बाद मौसम के आधिकारिक आंकड़े सामने आ चुके हैं। जून से सितंबर के दौरान भारत में दीर्घावधि औसत के मुकाबले केवल 87.4 फीसदी वर्षा दर्ज की गई। वर्ष 2001 के बाद के कालखंड पर नजर डालें तो मानसूनी सीजन में यह चौथी बार है जब देश ने इतनी गंभीर वर्षा की कमी का सामना किया है। उष्णकटिबंधीय प्रशांत महासागरीय क्षेत्र में जून के महीने में पैदा हुई अल नीनो मौसमी प्रणाली इस सूखे मिजाज की सबसे बड़ी वजह बनकर उभरी, जो समय बीतने के साथ लगातार मजबूत होती चली गई। प्रशांत महासागर का बढ़ता तापमान और अल नीनो का असर मौसम वैज्ञानिकों के अनुसार मौजूदा समय में अल नीनो चक्र काफी ताकतवर स्थिति में मौजूद है और इसके मार्च 2027 तक इसी प्रकार सक्रिय रहने के आसार हैं। इस वर्ष के पूरे सीजन में देश के भीतर 759.4 मिलीमीटर कुल वर्षा दर्ज की गई, जबकि सामान्य स्तर का पैमाना 868.6 मिलीमीटर माना जाता है। इस तरह वास्तविक आंकड़ा सामान्य मानक से 13 फीसदी कम साबित हुआ। इससे पहले 13 अप्रैल को जारी प्रारंभिक अनुमान में दीर्घावधि औसत की 92 फीसदी वर्षा का आकलन पेश किया गया था। बाद में 29 मई को संशोधित अनुमान पेश करते हुए चार फीसदी की संभावित मॉडल त्रुटि के साथ 90 फीसदी बारिश की उम्मीद जताई गई थी। जलवायु विज्ञान के नजरिए से देखें तो अल नीनो दरअसल ईएनएसओ यानी अल नीनो-दक्षिणी दोलन चक्र के तीन प्रमुख चरणों का एक हिस्सा है। यह प्रणाली धरती के तापमान को बढ़ाने का काम करती है और भारतीय उपमहाद्वीप में इसका सीधा संबंध मानसूनी घटाओं के कमजोर पड़ने से देखा जाता है। इसके उलट ला-नीना की स्थिति वातावरण को ठंडक देती है, जबकि तीसरी स्थिति पूरी तरह तटस्थ मानी जाती है। महीने-दर-महीने वर्षा का उतार-चढ़ाव अगर पूरे सीजन की महीनेवार स्थिति देखें तो बादलों की बेरुखी सबसे तीखी जून के दौरान रही, जहां बारिश का टोटा 35.4 फीसदी तक पहुंच गया था। इसके बाद अगस्त में 16.3 फीसदी की कमी देखी गई और सितंबर आते-आते यह घाटा सिमटकर 7.6 फीसदी रह गया। चार महीनों के इस चक्र में केवल जुलाई ही ऐसा इकलौता दौर साबित हुआ जब खेतों और कस्बों को सामान्य से एक फीसदी अधिक वर्षा का लाभ मिला। कम दबाव के क्षेत्रों ने बचाई स्थिति मौसम विज्ञान के महानिदेशक डॉ. मृत्युंजय महापात्र ने स्थिति स्पष्ट करते हुए कहा कि यदि मौसमी विक्षोभ सक्रिय न होते तो वर्षा की कमी का यह अंतर कहीं अधिक गहरा हो सकता था। उन्होंने जानकारी साझा की कि इस पूरे दौर में कुल 14 कम दबाव वाली प्रणालियां तैयार हुईं। इन प्रणालियों ने कुल 77 दिनों तक वातावरण में अपनी सक्रियता बनाए रखी, जबकि आमतौर पर यह गतिविधि मात्र 57 दिनों तक ही सीमित रहती है। उत्तरी और पश्चिमी राज्यों से मानसूनी हवाओं की रवानगी हवाओं के बदलते रुख के बीच मानसूनी तंत्र की वापसी की प्रक्रिया भी तेजी से आगे बढ़ रही है। डॉ. मृत्युंजय महापात्र के मुताबिक पंजाब, हरियाणा, राजस्थान के साथ-साथ पूरी दिल्ली से बादलों की विदाई पूरी हो चुकी है। इसके अलावा उत्तर प्रदेश और गुजरात के कई भूभागों से भी मानसूनी हवाएं अब लौट चुकी हैं। इसका आप पर असर मानसून में सामान्य से 13 फीसदी कम बारिश होने से ग्रामीण अर्थव्यवस्था और खरीफ फसलों के उत्पादन पर सीधा दबाव बन सकता है। • भारत में: कम मानसूनी बारिश के कारण जलाशयों के जलस्तर और आगामी रबी सीजन की बुवाई पर प्रतिकूल असर पड़ सकता है। इससे खाद्य पदार्थों की कीमतों पर असर पड़ने की संभावना बनी रहेगी। • पंजाब, हरियाणा और राजस्थान में: मानसून की त्वरित वापसी के कारण खेतों में मिट्टी की नमी तेजी से घट सकती है। किसानों को अगली फसलों की तैयारी के लिए ट्यूबवेल और अतिरिक्त सिंचाई संसाधनों पर अधिक निर्भर रहना पड़ेगा। • उपभोक्ताओं पर असर: अनाज और दलहन की आपूर्ति सीमित रहने से खुदरा महंगाई दर पर दबाव आ सकता है। आम परिवारों को आने वाले महीनों में दैनिक बजट का प्रबंधन अधिक सावधानी से करना पड़ सकता है। • शहरी जल आपूर्ति: कम वर्षा वाले क्षेत्रों के नगर निगमों को गर्मियों से पहले ही जल संरक्षण उपायों को कड़ा करना पड़ सकता है। नागरिकों को दैनिक उपयोग में पानी की बर्बादी रोकने के लिए पहले से सतर्क होना होगा। ऐसा क्यों हुआ उष्णकटिबंधीय प्रशांत महासागर के जल का तापमान असामान्य रूप से बढ़ने के कारण अल नीनो का निर्माण हुआ, जिसने भारतीय मानसूनी परिसंचरण को कमजोर कर दिया। • प्रशांत महासागर का गर्म होना: जून में उभरे अल नीनो के प्रभाव से हवाओं का स्वाभाविक पैटर्न बाधित हो गया। इसके चलते मानसूनी बादलों को भारतीय प्रायद्वीप की ओर धकेलने वाली प्रणाली काफी कमजोर पड़ गई। • जून में गंभीर सूखा: शुरुआती महीने में ही बारिश 35.4 फीसदी कम दर्ज की गई जिससे पूरे सीजन का औसत बिगड़ गया। हालांकि जुलाई में अतिरिक्त बारिश हुई, लेकिन वह शुरुआती नुकसान की भरपाई के लिए नाकाफी साबित हुई। • कम दबाव के क्षेत्रों की भूमिका: यदि सीजन में 14 कम दबाव की प्रणालियां 77 दिनों तक सक्रिय न रहतीं तो स्थिति और विकट हो जाती। इन प्रणालियों ने मानसूनी धाराओं को पूरी तरह बिखरने से रोके रखा। सवाल-जवाब 1. इस वर्ष मानसूनी सीजन में कितनी बारिश दर्ज की गई? इस मानसून देश में कुल 759.4 मिलीमीटर बारिश दर्ज हुई, जो सामान्य वर्षा 868.6 मिलीमीटर की तुलना में 13 फीसदी कम है। 2. दीर्घावधि औसत के लिहाज से बारिश का प्रतिशत कितना रहा? पूरे सीजन में दीर्घावधि औसत की 87.4 फीसदी बारिश दर्ज की गई, जो वर्ष 2001 के बाद से चौथी सबसे कम वर्षा है। 3. बारिश में कमी की मुख्य वजह क्या रही? उष्णकटिबंधीय प्रशांत क्षेत्र में जून से लगातार मजबूत हो रही अल नीनो की स्थिति मानसूनी कमी का मुख्य कारण रही। 4. अल नीनो का प्रभाव कब तक बने रहने की संभावना है? मौसम विभाग के मुताबिक अल नीनो की वर्तमान स्थिति के मार्च 2027 तक सक्रिय बने रहने की संभावना जताई गई है। 5. किस महीने में बारिश की सबसे भारी कमी दर्ज की गई? जून के महीने में सबसे अधिक 35.4 फीसदी की कमी रही, जबकि जुलाई एकमात्र ऐसा महीना रहा जहां सामान्य से एक फीसदी अधिक पानी बरसा। 6. किन-किन क्षेत्रों से मानसूनी हवाओं की विदाई हो चुकी है? पंजाब, हरियाणा, राजस्थान, पूरी दिल्ली तथा उत्तर प्रदेश और गुजरात के कुछ हिस्सों से मानसूनी हवाओं की वापसी हो चुकी है। https://trendkia.com/madhya-pradesh/pacific-ocean-el-nino-ke-ubhara-se-kamajora-para-manasuna-2001-ke-bada-darja-hui-chauthi-sabase-sukhi-sthiti-40879 TrendKia — Har trend, sabse pehle.