समुद्री लुटेरों पर करारी चोट से स्वदेशी युद्धपोतों तक, हिंद महासागर में बढ़ा भारतीय नौसेना का पराक्रम सोमालिया तट पर ईरानी नौका आजिनी के सफल बचाव अभियान और स्वदेशी युद्धपोतों के दम पर भारतीय नौसेना ने वैश्विक समुद्री सुरक्षा में अपनी मजबूत धमक स्थापित की है. हिंद महासागर के गहरे पानी में अड़तालीस घंटे से भी लंबे समय तक चला एक साहसिक अभियान भारतीय समुद्री सुरक्षा बल की बढ़ती मारक क्षमता और तकनीकी दक्षता का नया प्रमाण बन गया है. सोमालिया के उत्तर पूर्वी तट के पास समुद्री लुटेरों के चंगुल में फंसी ईरान की एक मछली पकड़ने वाली नौका आजिनी को छुड़ाने के लिए चलाया गया यह मिशन केवल बंधकों को मुक्त कराने तक सीमित नहीं था, बल्कि यह उस व्यापक सैन्य रूपांतरण को दर्शाता है जो पिछले एक दशक के दौरान भारत के रक्षा ढांचे में उभरा है. दूसरे देशों से हथियार और पोत खरीदने वाली पारंपरिक व्यवस्था से निकलकर खुद अपने जंगी जहाज तैयार करने की दिशा में नौसेना ने जो लंबी छलांग लगाई है, उसने न केवल औपनिवेशिक प्रतीकों के बोझ को उतारा है बल्कि पूरे क्षेत्र में सुरक्षा की एक मजबूत गारंटी भी पेश की है. सोमालिया तट पर आजिनी को मुक्त कराने का साहसिक मिशन नवंबर 2026 की शुरुआत में भारतीय नौसेना को सूचना मिली कि सोमालियाई तट के पास हथियारबंद लुटेरों ने एक ईरानी मछली पकड़ने वाले जहाज आजिनी पर कब्जा कर लिया है. समुद्री डकैत इस नौका को एक बेस या मदर शिप बनाकर अंतरराष्ट्रीय व्यापारिक जहाजों को निशाना बनाने की योजना बना रहे थे. संकट की गंभीरता को देखते हुए मुंबई से तीन हजार किलोमीटर से भी ज्यादा की दूरी पर मौजूद एक मिशन-रेडी युद्धपोत, जिसमें आईएनएस कोलकाता भी शामिल था, को समुद्री निगरानी विमान के साथ तुरंत तैनात किया गया. लंबी दूरी के निगरानी नेटवर्क ने विशाल समंदर में उस नौका की सटीक लोकेशन ट्रेस की. समुद्र में लगातार पीछा करने और घेराबंदी करने के बाद सुरक्षा बलों ने गैर-घातक उपायों का इस्तेमाल करते हुए अपहृत नौका की गति को रोक दिया. इसके तुरंत बाद भारतीय वायु सेना के सी-17 सैन्य परिवहन विमान की मदद से समुद्र के ऊपर मरीन कमांडो का सटीक एयरड्रॉप कराया गया. कमांडो दस्ते ने बिजली की तेजी से सामरिक कार्रवाई करते हुए जहाज पर धावा बोला, समुद्री डाकुओं के मंसूबों को पूरी तरह नाकाम किया और नौका पर मौजूद सभी बीस चालकों को सुरक्षित बचा लिया. पूरे अभियान के दौरान किसी भी नाविक को कोई चोट नहीं आई और न ही कोई हताहत हुआ, जिसने तीनों सेनाओं के बीच सटीक समन्वय और त्वरित कार्रवाई की क्षमता को साबित किया. ब्रिटिश पहचान से मुक्ति और मराठा नौसेना की विरासत का सम्मान भारतीय समुद्री बल ने अपनी रणनीतिक शक्ति बढ़ाने के साथ-साथ औपनिवेशिक दौर की मानसिक और दृश्य पहचान से भी खुद को अलग किया है. साल 2022 में पहले स्वदेशी विमानवाहक युद्धपोत आईएनएस विक्रांत के जलावतरण के ऐतिहासिक मौके पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नौसेना के नए आधिकारिक ध्वज का अनावरण किया था. पुराने झंडे से ब्रिटिश शासन के प्रतीक सेंट जॉर्ज क्रॉस को हमेशा के लिए हटा दिया गया और उसकी जगह महान मराठा शासक छत्रपति शिवाजी महाराज की ऐतिहासिक राजमुद्रा से प्रेरित नीले अष्टकोणीय कवच को स्थापित किया गया. यह नया प्रतीक चिन्ह सदियों पुराने भारतीय समुद्री पराक्रम और स्वाभिमान का प्रतिनिधित्व करता है. इस सांस्कृतिक और ऐतिहासिक पुनर्जागरण की कड़ी को आगे बढ़ाते हुए दिसंबर 2023 में नौसैनिक अधिकारियों के कंधों पर लगने वाले रैंक बैज यानी एपॉलेट्स के डिजाइन में भी बदलाव किया गया, जिन्हें छत्रपति शिवाजी महाराज की शाही मुहर के प्रतीकों से सुसज्जित किया गया. इस बदलाव का मुख्य संदेश यह था कि भारत का नौसैनिक बल अब किसी विदेशी साम्राज्य की छाया में नहीं, बल्कि अपने गौरवशाली समुद्री इतिहास की प्रेरणा से लैस होकर जल और नभ में अपना परचम लहराएगा. खरीदार से निर्माता बनने की दिशा में ऐतिहासिक बदलाव आत्मनिर्भर भारत मिशन ने नौसैनिक बेड़े की रूपरेखा को बुनियादी स्तर पर बदल दिया है. वर्तमान समय में भारतीय नौसेना के विभिन्न साजो-सामान और प्लेटफॉर्म में स्वदेशी सामग्री का अनुपात लगभग छिहत्तर प्रतिशत तक पहुंच चुका है, जिसे साल 2030 तक पंचानवे प्रतिशत करने का कड़ा लक्ष्य तय किया गया है. बीते दस वर्षों के दौरान चालीस से अधिक भारत में निर्मित युद्धपोत और अत्याधुनिक पनडुब्बियां नौसेना के बेड़े का हिस्सा बन चुकी हैं. निर्माण की इस तेज रफ्तार का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि जनवरी 2025 में आईएनएस सूरत, आईएनएस नीलगिरी और आईएनएस वागशीर को एक ही साथ सेवा में शामिल किया गया था. स्वदेशी जहाजों के निर्माण का यह सिलसिला आगे भी निरंतर जारी रहा. जून 2026 में कोलकाता के दौरे पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आईएनएस दूनागिरी, आईएनएस संशोधक और आईएनएस अग्रय को देश की सेवा में समर्पित किया. इन सभी आधुनिक युद्धपोतों का डिजाइन भारतीय नौसेना के अपने वॉरशिप डिजाइन ब्यूरो द्वारा तैयार किया गया है, जबकि इनका निर्माण कोलकाता स्थित गार्डन रीच शिपबिल्डर्स एंड इंजीनियर्स जैसी घरेलू शिपयार्ड कंपनियों में पूरा हुआ है. इसके अलावा अक्टूबर 2026 में सुरक्षा मामलों की मंत्रिमंडलीय समिति ने चालीस हजार करोड़ रुपये से अधिक की लागत से आठ नेक्स्ट जेनरेशन कोरवेट के निर्माण को अंतिम मंजूरी दी, जिनका निर्माण पूरी तरह से भारतीय शिपयार्डों में स्वदेशी ब्लूप्रिंट पर किया जाएगा. सामरिक मोर्चे पर अक्टूबर 2026 में देश के पहले स्वदेशी विमानवाहक पोत आईएनएस विक्रांत पर राफेल मरीन लड़ाकू विमान ने अपनी पहली ही कोशिश में सुरक्षित लैंडिंग करके एक नया इतिहास दर्ज किया, जो आईएनएस विक्रमादित्य के साथ मिलकर हिंद महासागर में तैरते हुए एयरबेस के रूप में देश की सुरक्षा को अभेद्य बनाते हैं. सागर सिद्धांत, कानूनी अधिकार और राहत अभियानों का दायरा भारत ने पूरे क्षेत्र की सुरक्षा और विकास के लिए सागर दृष्टि को अपनी समुद्री नीति का मुख्य आधार बनाया है. साल 2022 में संसद द्वारा पारित मैरीटाइम एंटी-पायरेसी एक्ट ने नौसेना को खुले समुद्र में समुद्री डाकुओं और डकैती की घटनाओं से निपटने के लिए मजबूत कानूनी आधार प्रदान किया, जिसे नौसेना प्रमुख ने एक बड़ा कानूनी संबल करार दिया था. इस विधायी शक्ति का उपयोग करते हुए ऑपरेशन संकल्प के अंतर्गत अरब सागर और अदन की खाड़ी में आने-जाने वाले अनगिनत व्यापारिक जहाजों को सुरक्षित गलियारा उपलब्ध कराया गया है. भारतीय नौसेना ने सैन्य अभियानों के साथ-साथ मानवीय सहायता पहुंचाने में भी सबसे आगे रहकर अपनी विश्वसनीयता सिद्ध की है. यमन संकट के दौरान चलाए गए ऑपरेशन राहत में भारतीय युद्धपोतों ने जोखिम भरे हालात से तीन हजार से अधिक भारतीय और विदेशी नागरिकों को सुरक्षित निकाला था. इसी तरह साल 2025 में म्यांमार में आए विनाशकारी भूकंप के तुरंत बाद ऑपरेशन ब्रह्मा चलाकर आईएनएस सतपुरा और आईएनएस सावित्री जैसे युद्धपोतों के जरिए आपातकालीन राहत सामग्री पहुंचाई गई थी. ईरानी नौका आजिनी का हालिया बचाव अभियान भी इसी नीति का विस्तार है, जो साबित करता है कि भारत केवल अपनी सीमाओं की हिफाजत नहीं कर रहा, बल्कि वैश्विक व्यापारिक मार्गों की खुली और निर्बाध सुरक्षा सुनिश्चित करने वाला सबसे भरोसेमंद भागीदार बनकर उभरा है. इसका आप पर असर हिंद महासागर में भारतीय नौसेना की मजबूत उपस्थिति से अंतरराष्ट्रीय जलमार्गों पर चलने वाले व्यापारिक जहाजों और भारतीय नाविकों की सुरक्षा को सीधा लाभ मिला है. • वैश्विक समुद्री व्यापार पर असर: समुद्री डाकुओं पर सख्त नियंत्रण से अदन की खाड़ी और अरब सागर से गुजरने वाले मालवाहक जहाजों की आवाजाही सुरक्षित बनी रहती है. इससे माल ढुलाई के बीमा खर्च और समुद्री परिवहन लागत में होने वाली अचानक वृद्धि पर रोक लगती है. • भारतीय नाविकों की सुरक्षा: विदेशी और घरेलू व्यापारिक जहाजों पर काम करने वाले हजारों नाविकों को समुद्री डकैतों के बंधक बनाए जाने के जोखिम से सीधी सुरक्षा मिलती है. संकट के समय नौसेना की तत्काल मदद उपलब्ध होने से समुद्र में काम करने वाले कर्मचारियों का भरोसा बढ़ता है. • घरेलू रक्षा उद्योग में अवसर: नौसेना के जहाजों में स्वदेशी उपकरणों की हिस्सेदारी छिहत्तर प्रतिशत तक पहुंचने से भारतीय शिपयार्डों और कल-पुर्जे बनाने वाली घरेलू कंपनियों को बड़े ठेके मिल रहे हैं. यह कदम देश में उच्च कौशल वाले विनिर्माण रोजगार और औद्योगिक निवेश को लगातार बढ़ावा दे रहा है. • आपदा राहत और नागरिक सुरक्षा: हिंद महासागर क्षेत्र में मौजूद नौसैनिक जहाजों की त्वरित तैनाती से चक्रवात, भूकंप या क्षेत्रीय युद्ध जैसी आपात स्थितियों में त्वरित सहायता मिलती है. यमन संकट और म्यांमार आपदा की तरह विदेशों में फंसे भारतीय नागरिकों को तुरंत सुरक्षित निकालने की विश्वसनीय व्यवस्था बनी रहती है. ऐसा क्यों हुआ हिंद महासागर में समुद्री डकैती की बढ़ती वारदातों और सामरिक व्यापार मार्गों पर बढ़ते खतरों के बीच भारत ने अपनी नौसैनिक नीति को अधिक रक्षात्मक से सक्रिय सुरक्षा प्रदाता के रूप में विकसित किया है. • व्यापारिक नौकाओं पर खतरे की रोकथाम: सोमालियाई तट पर सक्रिय समुद्री लुटेरे छोटी मछली पकड़ने वाली नौकाओं का अपहरण कर उन्हें विशाल समुद्र में मदर शिप की तरह इस्तेमाल करते हैं. इस तरह के बेस जहाजों से अंतरराष्ट्रीय मालवाहक पोतों पर दूर तक हमले करने की क्षमता बढ़ जाती है, जिसे रोकने के लिए तत्काल सैन्य कार्रवाई जरूरी थी. • सख्त कानून और अंतर-सेना तालमेल: संसद द्वारा 2022 में बनाए गए मैरीटाइम एंटी-पायरेसी कानून ने खुले समुद्र में लुटेरों को पकड़ने और कानूनी कार्रवाई करने का स्पष्ट अधिकार दिया. इसके साथ ही भारतीय वायु सेना के बड़े परिवहन विमानों और मरीन कमांडो के सटीक तालमेल ने हजारों किलोमीटर दूर त्वरित कार्रवाई को संभव बनाया. • रक्षा आयात पर निर्भरता घटाने की रणनीति: विदेशी हथियारों और विदेशी शिपयार्डों पर अत्यधिक निर्भरता से बचने के लिए स्वदेशी युद्धपोत निर्माण को प्राथमिकता दी गई. घरेलू वॉरशिप डिजाइन ब्यूरो और भारतीय शिपयार्डों के मजबूत समन्वय ने नौसेना को लगातार नए और आधुनिक पोत उपलब्ध कराए हैं. सवाल-जवाब 1. सोमालियाई तट पर आजिनी बचाव अभियान में क्या हुआ था? भारतीय नौसेना ने मरीन कमांडो और युद्धपोत की मदद से सोमालिया तट के पास अपहृत ईरानी नौका आजिनी को समुद्री डाकुओं से मुक्त कराया और सभी बीस चालकों को सुरक्षित बचा लिया. 2. भारतीय नौसेना के नए ध्वज में क्या बदलाव किया गया है? साल 2022 में ब्रिटिश काल के सेंट जॉर्ज क्रॉस को हटाकर छत्रपति शिवाजी महाराज की ऐतिहासिक राजमुद्रा से प्रेरित अष्टकोणीय शाही मुहर को नए नौसैनिक ध्वज में शामिल किया गया. 3. भारतीय नौसेना में स्वदेशी उपकरणों का वर्तमान अनुपात कितना है? नौसेना के उपकरणों में वर्तमान में लगभग छिहत्तर प्रतिशत तक स्वदेशीकरण हो चुका है, जिसे साल 2030 तक पंचानवे प्रतिशत तक ले जाने का लक्ष्य रखा गया है. 4. मैरीटाइम एंटी-पायरेसी एक्ट 2022 से नौसेना को क्या ताकत मिली? इस कानून ने भारतीय नौसेना को गहरे अंतरराष्ट्रीय समुद्र में समुद्री डकैतों को रोकने, गिरफ्तार करने और उनके जहाजों को जब्त करने का स्पष्ट कानूनी अधिकार दिया है. 5. अक्टूबर 2026 में नौसेना के लिए किस बड़े रक्षा प्रोजेक्ट को मंजूरी मिली? सुरक्षा मामलों की मंत्रिमंडलीय समिति ने चालीस हजार करोड़ रुपये से अधिक की लागत से आठ नेक्स्ट जेनरेशन कोरवेट के स्वदेशी निर्माण को मंजूरी दी. https://trendkia.com/madhya-pradesh/samudri-luteron-para-karari-chota-se-svadeshi-yuddhapoton-taka-indian-ocean-men-barha-indian-navy-ka-parakrama-56619 TrendKia — Har trend, sabse pehle.