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  "title": "16 साल कोमा में रहने वाली बेटी खोने के बाद पिता को बॉम्बे हाईकोर्ट से मिला न्याय, 37 लाख रुपये का मुआवजा",
  "summary": "महाराष्ट्र के नासिक में एक पिता को 23 साल के लंबे संघर्ष के बाद न्याय मिला है। बॉम्बे हाईकोर्ट ने दुर्घटना का शिकार हुई बेटी के पिता को बीमा कंपनी से 37 लाख रुपये का मुआवजा दिलाने का आदेश दिया है।",
  "content": "बॉम्बे हाईकोर्ट ने एक पिता को लंबी कानूनी लड़ाई के बाद आखिरकार न्याय प्रदान किया है। यह जीत एक ऐसे व्यक्ति के लिए है जिसने अपनी जिंदगी के 23 साल बेहद कठिन परिस्थितियों और अपार पीड़ा में बिताए हैं। साल 2003 में हुई एक दर्दनाक सड़क दुर्घटना के बाद उनकी 12 वर्षीय बेटी 16 साल तक लगातार कोमा में रही, जिसके दौरान पिता ने निरंतर उनकी सेवा की। इस मामले में अब अदालत ने बीमा कंपनी को 37 लाख रुपये का मुआवजा चुकाने का कड़ा निर्देश जारी किया है।\n\nनासिक की सड़क दुर्घटना और उसके बाद की त्रासदी\nयह मामला महाराष्ट्र के नासिक शहर से जुड़ा है। साल 2003 में जब बच्ची ट्यूशन से साइकिल पर अपने घर लौट रही थी, तभी एक तेज रफ्तार वैन ने उसे जोरदार टक्कर मार दी। इस दुर्घटना ने बच्ची के जीवन को पूरी तरह बदल दिया और उसे गंभीर चोटें आईं, जिसके परिणामस्वरूप वह कोमा की स्थिति में चली गई। पिता ने अगले 16 वर्षों तक अपनी बेटी को बेड पर मरणासन्न स्थिति में देखा और उसकी देखभाल में अपना सबकुछ झोंक दिया। शुरुआत में, उन्होंने मोटर एक्सीडेंट क्लेम ट्रिब्यूनल के समक्ष 4 लाख रुपये के मुआवजे का दावा किया था, लेकिन ट्रिब्यूनल ने उन्हें मात्र 50,000 रुपये देने का निर्णय सुनाया था, जो परिवार की जरूरतों के हिसाब से बेहद कम था।\n\nसंघर्षों का लंबा सफर और न्याय की राह\nपीड़ित पिता के लिए मुश्किलें केवल यहीं खत्म नहीं हुईं। इन 16 कठिन वर्षों के दौरान उन्होंने अपनी पत्नी को भी खो दिया, जिससे घर की पूरी जिम्मेदारी और बेटी की देखभाल का भार पूरी तरह उनके कंधों पर आ गया। वर्ष 2019 में बेटी का निधन हो गया, लेकिन पिता ने न्याय के लिए हार नहीं मानी और बॉम्बे हाईकोर्ट में अपील की। घटना के 16 साल बाद हाईकोर्ट ने उनकी याचिका को स्वीकार किया और मामले की गंभीरता से सुनवाई शुरू की।\n\nकोर्ट ने बीमा कंपनी पर लगाया जुर्माना\nन्यायमूर्ति जितेंद्र जैन ने इस पूरे प्रकरण को “बेहद दुखद और दुर्भाग्यपूर्ण” करार देते हुए अपना फैसला सुनाया। पिता के कानूनी प्रतिनिधि ने अदालत को बताया कि बच्ची की घर पर देखभाल करने में प्रतिदिन 1,500 रुपये का खर्च आता था। इसमें मुंबई के बड़े अस्पतालों के चक्कर, दवाइयों का भारी खर्च और पिता की नौकरी पर पड़ा नकारात्मक प्रभाव शामिल था। न्यू इंडिया एश्योरेंस कंपनी ने मुआवजा राशि को अत्यधिक बताते हुए चुनौती दी थी, लेकिन अदालत ने पिता के दर्द और उनके द्वारा झेली गई 16 वर्षों की त्रासदी को प्राथमिकता दी। अदालत ने टिप्पणी की कि 12 साल की इकलौती बेटी को खोने की भरपाई किसी भी कीमत पर नहीं की जा सकती। ट्रिब्यूनल द्वारा तय की गई 50,000 रुपये की राशि को अपर्याप्त मानते हुए, बॉम्बे हाईकोर्ट ने कुल मुआवजे को बढ़ाकर 37 लाख रुपये कर दिया है।\n\nइसका आप पर असर\nभारत में: सड़क दुर्घटनाओं के मामलों में मुआवजे की राशि तय करते समय अब कोर्ट देखभाल करने वाले परिवार के वर्षों के संघर्ष को भी आधार मान रहे हैं।\n\nनासिक में: इस फैसले से स्थानीय पीड़ितों के लिए कानूनी लड़ाई में देरी होने पर भी मुआवजे की मांग का आधार मजबूत हुआ है।\n\nसवाल-जवाब\n\n1. बॉम्बे हाईकोर्ट ने पिता को कितनी मुआवजा राशि देने का आदेश दिया है?\nहाईकोर्ट ने बीमा कंपनी को कुल 37 लाख रुपये का मुआवजा देने का आदेश दिया है।\n\n2. यह घटना कब और कहां हुई थी?\nयह दुर्घटना साल 2003 में महाराष्ट्र के नासिक में हुई थी।\n\n3. बेटी कितने समय तक कोमा में रही?\nदुर्घटना के बाद बेटी 16 साल तक कोमा में रही और वर्ष 2019 में उसका निधन हो गया।\n\n4. मोटर एक्सीडेंट क्लेम ट्रिब्यूनल ने शुरुआत में कितना मुआवजा दिया था?\nट्रिब्यूनल ने शुरुआत में केवल 50,000 रुपये का मुआवजा तय किया था, जिसे हाईकोर्ट ने बेहद कम माना।\n\nप्रेरणा और सबक\n• अडिग धैर्य: 16 साल तक कोमा में रही बेटी की सेवा करना और फिर 23 साल तक न्याय के लिए लड़ना साहस का प्रतीक है।\n• कानूनी जागरूकता: उचित मुआवजा न मिलने पर उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाना आपके अधिकारों की रक्षा के लिए जरूरी है।\n• दृढ़ संकल्प: व्यक्तिगत दुख और आर्थिक तंगी के बावजूद अपने लक्ष्य पर टिके रहने से अंततः न्याय प्राप्त किया जा सकता है।",
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  "category": "महाराष्ट्र",
  "publishedAt": "2026-07-13",
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    "बॉम्बे हाईकोर्ट",
    "नासिक दुर्घटना",
    "मुआवजा",
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