भोंसला मिलिट्री स्कूल में नागपुर पुलिस प्रमुख का जेन-जी को संदेश, स्क्रीन की लत से उबरकर राष्ट्र सेवा का आह्वान कारगिल विजय दिवस के अवसर पर नागपुर के भोंसला मिलिट्री स्कूल में पुलिस कमिश्नर विश्वास नांगरे पाटिल ने युवाओं को मोबाइल की लत छोड़कर एडवर्सिटी कोशिएंट (AQ) विकसित करने और राष्ट्र सेवा के प्रति समर्पित होने की सीख दी। नागपुर के भोंसला मिलिट्री स्कूल में आयोजित कारगिल विजय दिवस समारोह के दौरान नागपुर के पुलिस कमिश्नर विश्वास नांगरे पाटिल ने युवाओं, विशेषकर जेन-जी को संबोधित करते हुए एक अत्यंत विचारोत्तेजक भाषण दिया। उन्होंने स्पष्ट किया कि यदि युवा पीढ़ी अपनी असीम ऊर्जा को सही दिशा में मोड़ने में सफल रहती है, तो वह न केवल अपने व्यक्तिगत जीवन को नई ऊंचाइयों पर ले जा सकती है, बल्कि राष्ट्र निर्माण में भी निर्णायक भूमिका निभा सकती है। उनके संबोधन का मुख्य केंद्र बिंदु आधुनिक समय में मोबाइल फोन की बढ़ती लत और युवाओं के मानसिक स्वास्थ्य पर पड़ता इसका विपरीत प्रभाव था। डिजिटल भटकाव और घटता फोकस: 5 सेकंड का केमिकल लोचा पुलिस कमिश्नर ने दैनिक जीवन में तकनीक के अत्यधिक और अनियंत्रित उपयोग पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि आजकल युवाओं से संवाद स्थापित करना एक बड़ी चुनौती बनता जा रहा है। अधिकांश युवाओं का स्क्रीन टाइम प्रतिदिन 6 से 7 घंटे तक पहुंच चुका है, जहां वे घंटों लगातार सोशल मीडिया और डिजिटल कंटेंट को स्क्रॉल करते रहते हैं। उन्होंने समझाया कि मस्तिष्क के लिए जीवन का सीधा और सरल नियम यह है कि ध्यान केंद्रित करने से सीख मिलती है, सीखने से प्रगति होती है और प्रगति ही जीवन में सच्चे आनंद का मार्ग प्रशस्त करती है। हालांकि, लगातार स्क्रीन बदलने के कारण इंसानी दिमाग हर 5 से 7 सेकंड में एक विचार से दूसरे विचार पर छलांग लगाता रहता है। इस तीव्र भटकाव के कारण मस्तिष्क के भीतर होने वाले रासायनिक बदलावों (केमिकल लोचा) को समझ पाना बेहद जटिल हो जाता है। हितोपदेश का श्लोक और 16 की उम्र का ऐतिहासिक संदर्भ डिजिटल दुनिया के दुष्प्रभावों को समझाने के साथ-साथ विश्वास नांगरे पाटिल ने प्राचीन भारतीय ज्ञान का संदर्भ भी दिया। उन्होंने भोंसला मिलिट्री स्कूल के विद्यार्थियों के समक्ष आचार्य नारायण द्वारा रचित ग्रंथ 'हितोपदेश' का एक प्रसिद्ध श्लोक प्रस्तुत किया "यौवनं धनसंपत्तिः प्रभुत्वमविवेकिता। एकैकमप्यनर्थाय किमु यत्र चतुष्टयम्॥" इस श्लोक का विशद विश्लेषण करते हुए उन्होंने समझाया कि यौवन (जवानी), धन-संपत्ति, प्रभुत्व (सत्ता या अधिकार) और अविवेक (बुद्धिहीनता) में से एक भी दुर्गुण किसी व्यक्ति के जीवन को अंधकार में धकेलने के लिए पर्याप्त है। यदि ये चारों परिस्थितियां एक साथ किसी इंसान के जीवन में आ जाएं, तो उसके विनाश की तीव्रता की कल्पना करना भी कठिन हो जाता है। उन्होंने विशेष रूप से 16 से 18 वर्ष की आयु सीमा को जीवन का सबसे नाजुक और महत्वपूर्ण पड़ाव बताया, क्योंकि इसी दौरान मानव मस्तिष्क का प्रीफ्रंटल कॉर्टेक्स हिस्सा विकसित होता है। इतिहास का उदाहरण देते हुए उन्होंने रेखांकित किया कि छत्रपति शिवाजी महाराज ने महज 16 वर्ष की अल्प आयु में स्वराज्य की स्थापना का महान संकल्प सिद्ध कर दिखाया था। इसलिए युवाओं को अपनी इस बहुमूल्य उम्र को केवल डिजिटल स्क्रॉलिंग में व्यर्थ गंवाने के बजाय महान लक्ष्यों के प्रति समर्पित करना चाहिए। IQ और EQ से आगे: जिंदगी में क्यों सबसे जरूरी है AQ? जीवन में सफलता के मापदंडों की चर्चा करते हुए पुलिस कमिश्नर ने स्पष्ट किया कि केवल बुद्धिमत्ता सूचकांक यानी आईक्यू (IQ) का उच्च होना किसी व्यक्ति की संपूर्ण क्षमता को सिद्ध नहीं करता। इसके साथ भावनात्मक सूचकांक यानी ईक्यू (EQ) और सामाजिक सूचकांक यानी एसक्यू (SQ) का होना भी उतना ही आवश्यक है। हालांकि, इन सबसे ऊपर जिस क्षमता की सर्वाधिक आवश्यकता होती है, वह है एडवर्सिटी कोशिएंट यानी एक्यू (AQ) अर्थात प्रतिकूलता सूचकांक। कठिन और विपरीत परिस्थितियों में कोई व्यक्ति किस मजबूती और धैर्य के साथ मुकाबला करता है, वही उसकी असली परीक्षा होती है। इस विचार को समझाने के लिए उन्होंने भारतीय सेना के अमर नायकों के अदम्य साहस को याद किया। उन्होंने 1999 के कारगिल युद्ध के नायक कैप्टन विक्रम बत्रा का स्मरण करते हुए बताया कि एक कठिन सैन्य चोटी पर तिरंगा फहराने के बाद भी उनका उत्साह कम नहीं हुआ और उन्होंने 'ये दिल मांगे मोर' का अमर नारा देकर अगली चोटी को फतह करने का संकल्प लिया था। इसके अलावा उन्होंने परमवीर चक्र विजेता लेफ्टिनेंट मनोज कुमार पांडे सहित अन्य जांबाज सैनिकों के सर्वोच्च बलिदान को भी याद किया। उन्होंने प्रसिद्ध काव्यात्मक पंक्तियां उद्धृत कीं "शहीदों की चिताओं पर हर बरस लगेंगे मेले, वतन पे मर मिटने वालों का बाकी यही निशां होगा।" उन्होंने जोर देकर कहा कि विजय दिवस जैसे राष्ट्रीय पर्वों का मुख्य उद्देश्य इन महान शहीदों के उच्च आदर्शों को भावी पीढ़ियों के दिलों में सदा जीवित रखना है। कलम से राइफल और मां से भारत माता: सैनिक के जीवन का रूपक संबोधन के अगले चरण में विश्वास नांगरे पाटिल ने पुलिस और सैन्य बल के चुनौतीपूर्ण जीवन का यथार्थ चित्र प्रस्तुत किया। उन्होंने स्वीकार किया कि कानून-व्यवस्था बनाए रखने और सीमा की सुरक्षा करने वाले जवानों को कई बार अत्यधिक लाचारी और मानसिक दबाव का सामना करना पड़ता है। एक साधारण नागरिक के सैनिक बनने की भावुक और अनुशासित यात्रा का वर्णन करते हुए उन्होंने कहा कि जब एक छात्र की कलम राइफल में बदल जाती है, उसका साधारण शर्ट वर्दी का रूप ले लेता है, उसके जूते भारी बूट बन जाते हैं, उसका शिक्षक एक कठोर प्रशिक्षक में परिवर्तित हो जाता है, उसका स्कूल प्रिंसिपल कमांडेंट बन जाता है और प्रार्थना का मैदान परेड ग्राउंड का रूप ले लेता है, तब एक सैनिक का निर्माण होता है। उन्होंने आगे कहा कि जब किसी युवा की अपनी मां केवल उसकी व्यक्तिगत मां न रहकर 'भारत माता' का रूप ले लेती है, उस क्षण देशभक्ति केवल एक मौखिक भावना नहीं रहती, बल्कि इंसान के रक्त और त्वचा में रच-बस जाती है। उन्होंने अत्यंत आत्मीयता से कहा कि उनके लिए पुलिस की वर्दी केवल कपड़े का एक टुकड़ा नहीं है, बल्कि वह उनकी अपनी त्वचा का ही अभिन्न अंग बन चुकी है। आलोचनाओं का जवाब और 'मैं खाकी हूं' कविता का संदेश सार्वजनिक सेवा में मिलने वाली चुनौतियों और आलोचनाओं पर प्रकाश डालते हुए पुलिस कमिश्नर ने साझा किया कि पुलिस की नौकरी अक्सर एक कृतघ्न (थैंकलेस) कार्य बन जाती है। समाज की सुरक्षा में दिन-रात मुस्तैद रहने के बावजूद पुलिसकर्मियों को अक्सर जनता और असामाजिक तत्वों से गालियां तथा अपमान सहन करना पड़ता है। उन्होंने उल्लेख किया कि बीते 7 से 8 दिनों के दौरान उन्हें और उनके विभाग को भारी आलोचनाओं और कटु शब्दों का सामना करना पड़ा है। हालांकि, इन विपरीत परिस्थितियों के बावजूद एक सच्चे पुलिस अधिकारी का धर्म बिना विचलित हुए देश और समाज की सेवा में डटे रहना है। इसी प्रतिबद्धता को व्यक्त करने के लिए उन्होंने अपनी स्वरचित भावुक कविता 'मैं खाकी हूं' का पाठ किया "दिन हो, रात हो, सांझ हो, वाली बाती हूं, मैं खाकी हूं।आंधी में, तूफान में, होली में, रमजान में,देश के सम्मान में अडिग कर्तव्यों की अविचल परिपाटी हूं, मैं खाकी हूं।तैयार हूं हमेशा ही तेज धूप और बारिश को हंसकर सहने को,सारे त्योहार भीड़ के साथ मनाने को।कभी पत्थर और कभी गाली भी खाने को,मैं बनी दूजी माटी हूं, मैं खाकी हूं।विघ्न-विकट सहकर भी सुशोभित, सज्जित भाती हूं।वर्दी में गौरव पाती हूं, मैं खाकी हूं।तम में प्रकाश हूं, कठिन वक्त में आस हूं।बुलाओ तो दौड़ी चली आती हूं, मैं खाकी हूं।मैं एक तिरंगे में लिपटी रोती-सिसकती छाती हूं..." उनकी इन पंक्तियों ने भोंसला मिलिट्री स्कूल के प्रांगण में उपस्थित युवाओं को देश सेवा, अनुशासन और कर्तव्यनिष्ठा के प्रति गहराई से प्रेरित किया। इसका आप पर असर • भारत में: यह संदेश देश भर के युवाओं को अत्यधिक स्मार्टफोन उपयोग के दुष्परिणामों से सतर्क करता है और कठिन परिस्थितियों में मानसिक मजबूती (AQ) बनाने की प्रेरणा देता है। • नागपुर में: नागपुर पुलिस की कार्यप्रणाली, जनसेवा और युवाओं के मार्गदर्शन को लेकर स्थानीय नागरिकों और छात्रों में सकारात्मक जागरूकता बढ़ती है। सवाल-जवाब 1. विश्वास नांगरे पाटिल ने भोंसला मिलिट्री स्कूल में क्या संदेश दिया? उन्होंने युवाओं को मोबाइल फोन की लत छोड़कर ध्यान केंद्रित करने, एडवर्सिटी कोशिएंट (AQ) बढ़ाने और शहीदों के आदर्शों पर चलकर राष्ट्र सेवा करने का संदेश दिया। 2. नागपुर पुलिस कमिश्नर ने स्क्रीन टाइम को लेकर क्या चेतावनी दी? उन्होंने बताया कि 6-7 घंटे लगातार स्क्रीन स्क्रॉल करने से दिमाग हर 5 से 7 सेकंड में भटकता है, जिससे एकाग्रता नष्ट होती है और मस्तिष्क में रासायनिक लोचा होता है। 3. भाषण में आचार्य नारायण के किस श्लोक का उल्लेख किया गया? उन्होंने हितोपदेश ग्रंथ के श्लोक 'यौवनं धनसंपत्तिः प्रभुत्वमविवेकिता' का उल्लेख किया, जो यह सिखाता है कि जवानी, धन, सत्ता और अविवेक में से एक भी चीज विनाश के लिए पर्याप्त है। 4. पुलिस कमिश्नर ने जीवन में किस कोशिएंट (Quotient) को सबसे महत्वपूर्ण माना? उन्होंने आईक्यू (IQ), ईक्यू (EQ) और एसक्यू (SQ) के मुकाबले एडवर्सity कोशिएंट (AQ) को सबसे अहम बताया, जो कठिन परिस्थितियों में लड़ने की क्षमता को दर्शाता है। 5. भाषण के दौरान किन वॉर हीरोज का जिक्र किया गया? उन्होंने 1999 के कारगिल युद्ध के नायकों परमवीर चक्र विजेता कैप्टन विक्रम बत्रा ('ये दिल मांगे मोर') और लेफ्टिनेंट मनोज कुमार पांडे के सर्वोच्च बलिदान को याद किया। 6. कमिश्नर ने गालियों और आलोचनाओं का जवाब कैसे दिया? उन्होंने बताया कि पुलिस की नौकरी थैंकलेस होती है और हाल के दिनों में आलोचना झेलने के बावजूद वे अपनी कर्तव्यनिष्ठा पर कायम हैं, जिसे उन्होंने अपनी कविता 'मैं खाकी हूं' के माध्यम से व्यक्त किया। प्रेरणा और सबक प्रेरणा और महत्वपूर्ण सीख: • फोकस और नियंत्रण: 6 से 7 घंटे की अनियंत्रित स्क्रीन स्क्रॉलिंग छोड़कर दैनिक जीवन में एकाग्रता और सीखने की आदत बनाएं। • एडवर्सिटी कोशिएंट (AQ) का निर्माण: केवल आईक्यू या ईक्यू ही नहीं, बल्कि कठिन परिस्थितियों से मजबूती से निपटने की क्षमता विकसित करें। • उम्र की ऊर्जा का सही उपयोग: 16 से 18 वर्ष की आयु में मस्तिष्क के प्रीफ्रंटल कॉर्टेक्स विकास के समय छत्रपति शिवाजी महाराज की भांति बड़े लक्ष्यों का संकल्प लें। • निःस्वार्थ कर्तव्यनिष्ठा: सार्वजनिक आलोचनाओं या गालियों से विचलित हुए बिना अपने लक्ष्य और जनसेवा के प्रति अडिग रहें। https://trendkia.com/maharashtra/bhonsala-military-school-men-nagpur-pulisa-pramukha-ka-jena-ji-ko-sndesha-skrina-ki-lata-se-ubarakara-rashtra-seva-ka-ahvana-12881 TrendKia — Har trend, sabse pehle.