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  "type": "article",
  "title": "देवेंद्र फडणवीस के फोन वाले तंज पर उद्धव ठाकरे का पलटवार, 2019 के बाद बातचीत हमेशा के लिए खत्म",
  "summary": "संजय राउत की किताब के विमोचन पर उद्धव ठाकरे ने महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस पर कटाक्ष करते हुए साफ किया कि 2019 के घटनाक्रम के बाद दोनों पक्षों के बीच संवाद पूरी तरह समाप्त हो गया था।",
  "content": "महाराष्ट्र की सियासत में पुराने सहयोगियों के बीच तल्खी एक बार फिर सार्वजनिक मंच पर दिखाई दी है। शिवसेना (UBT) प्रमुख उद्धव ठाकरे ने स्पष्ट किया है कि वर्ष 2019 के राजनीतिक घटनाक्रम के बाद भारतीय जनता पार्टी के साथ संवाद के तमाम रास्ते पूरी तरह बंद हो गए थे, जो आज तक बहाल नहीं हो सके हैं। ठाकरे का यह तीखा पलटवार महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस के उस हालिया बयान के बाद आया है, जिसमें फडणवीस ने फोन कॉल्स और बातचीत को लेकर चुटकी ली थी।\n\nसंजय राउत की पुस्तक विमोचन पर साधा निशाना\nशनिवार को मुंबई में आयोजित एक साहित्यिक कार्यक्रम के दौरान ठाकरे अपनी बात रख रहे थे। यह समारोह शिवसेना (UBT) सांसद तथा 'सामना' के कार्यकारी संपादक संजय राउत की नई कृति 'बोध कीर्तन' के लोकार्पण के उपलक्ष्य में आयोजित किया गया था। इस मंच से ठाकरे ने फडणवीस के पूर्व वक्तव्य पर तंज कसते हुए कहा कि कुछ लोगों को संपर्क सूत्र टूटने के बाद कभी दोबारा कॉल नहीं गए और यह सिलसिला स्थायी तौर पर खत्म हो गया।\n\nफडणवीस की पूर्व टिप्पणी और पृष्ठभूमि\nइस जुबानी जंग की शुरुआत दो दिन पहले आयोजित एक अन्य पुस्तक विमोचन समारोह में हुई थी। उस कार्यक्रम में मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस, उद्धव ठाकरे और महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (मनसे) के अध्यक्ष राज ठाकरे एक साथ मौजूद थे। फडणवीस ने हल्के-फुल्के लहजे में दावा किया था कि जब भी ठाकरे की तरफ से संपर्क साधा गया, उन्होंने सदैव सकारात्मक प्रतिक्रिया दी। इसके साथ ही फडणवीस ने यह भी जोड़ दिया था कि 2019 के उपरांत उन्हें कोई कॉल नहीं मिला, जबकि वह संवाद की प्रतीक्षा कर रहे थे।\n\n2019 का टकराव और 2022 का राजनीतिक विभाजन\nमहाराष्ट्र में दोनों दलों का दशकों पुराना गठबंधन 2019 के विधानसभा चुनाव परिणामों के तत्काल बाद टूट गया था। उस समय अविभाजित शिवसेना ने शीर्ष प्रशासनिक पद यानी मुख्यमंत्री की कुर्सी के बंटवारे को लेकर भाजपा से अपनी राहें अलग कर ली थीं। इसके बाद 2022 में शिवसेना के भीतर बड़ा विभाजन हुआ, जब एकनाथ शिंदे के गुट ने अलग होकर भाजपा के सहयोग से सत्ता की कमान संभाली। इस आंतरिक टूट ने ठाकरे गुट और भाजपा के आपसी संबंधों में कड़वाहट को चरम पर पहुंचा दिया।\n\n'बोध कीर्तन' की विषयवस्तु और राज ठाकरे के संस्मरण\nजिस 'बोध कीर्तन' किताब का विमोचन हुआ, उसमें राउत के दार्शनिक विचार, निजी अनुभव और कई महत्वपूर्ण राजनीतिक क्षण दर्ज हैं। इस संग्रह में अयोध्या स्थित राम मंदिर के प्राण-प्रतिष्ठा उत्सव के पश्चात प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा दिए गए उद्बोधन पर आधारित एक आलेख भी शामिल है।\n\nसमारोह में उपस्थित मनसे प्रमुख राज ठाकरे ने पत्रकार के रूप में संजय राउत के चार दशकों से अधिक लंबे सफर को साझा किया। राज ठाकरे ने स्मरण कराया कि जब राउत किसी अन्य अखबार में कार्यरत थे, तब वे शिवसेना की नीतियों पर तीखी आलोचनात्मक सामग्री लिखते थे। इस कारण शिवसेना संस्थापक बाल ठाकरे आरंभ में काफी क्षुब्ध हुए थे। हालांकि बाल ठाकरे को राउत की निर्भीक लेखनी पसंद आई और कालांतर में इसी विशिष्ट शैली के चलते उन्हें 'सामना' के कार्यकारी संपादक का दायित्व सौंपा गया।\n\nइसका आप पर असर\nमहाराष्ट्र के राजनीतिक घटनाक्रम से स्पष्ट संकेत मिलता है कि ठाकरे और भाजपा के बीच सुलह की कोई गुंजाइश नहीं बची है।\n\n• राष्ट्रीय स्तर पर: विपक्षी गठबंधन और भाजपा के बीच की तकरार चुनावी रणनीतियों को और अधिक आक्रामक बनाएगी। इसका सीधा असर संसद और राष्ट्रीय स्तर पर बनने वाले राजनीतिक समीकरणों पर देखने को मिलेगा।\n• महाराष्ट्र में: आगामी चुनावों में दलों के बीच सीधा और कड़ा मुकाबला तय है, जिससे कार्यकर्ताओं के बीच टकराव बढ़ सकता है। मतदाताओं के सामने गठबंधन विकल्पों को लेकर स्थिति अब पूरी तरह स्पष्ट हो चुकी है।\n• गठबंधन राजनीति: 2019 के बाद बने अविश्वास के माहौल ने क्षेत्रीय दलों और राष्ट्रीय पार्टियों के रिश्तों को प्रभावित किया है। भविष्य में चुनावी समझौतों से पहले पार्टियां नेतृत्व के पदों पर स्पष्ट शर्तें तय करेंगी।\n• जनता के सरोकार: राजनीतिक बयानबाजी के चलते वास्तविक प्रशासनिक और नागरिक मुद्दों पर चर्चा पीछे छूट सकती है। आम नागरिकों को नीतिगत योजनाओं के सुचारू क्रियान्वयन पर नजर रखनी होगी।\n\nऐसा क्यों हुआ\nयह राजनीतिक तकरार दोनों नेताओं के पुराने मतभेदों और हाल ही में पुस्तक विमोचन कार्यक्रमों में की गई परस्पर टिप्पणियों का परिणाम है।\n\n• तात्कालिक कारण: दो दिन पहले मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने एक मंच पर चुटकी लेते हुए कहा था कि 2019 के बाद ठाकरे का कोई फोन नहीं आया, जिसका ठाकरे ने शनिवार को जवाब दिया। इस सार्वजनिक टिप्पणी ने संवाद खत्म होने के पुराने विवाद को दोबारा हवा दे दी।\n• 2019 की सत्ता साझेदारी का विवाद: 2019 के विधानसभा चुनाव के बाद मुख्यमंत्री पद के बंटवारे पर असहमति के कारण दशकों पुराना गठबंधन टूट गया था। इस अलगाव ने दोनों नेताओं के बीच व्यक्तिगत और राजनीतिक दूरियां पैदा कर दी थीं।\n• 2022 का दलीय विभाजन: 2022 में एकनाथ शिंदे के नेतृत्व में हुए विद्रोह और भाजपा के साथ सरकार गठन ने दोनों खेमों की कटुता को और गहरा कर दिया। इसके बाद से दोनों पक्षों के बीच संवाद की कोई औपचारिक या अनौपचारिक संभावना नहीं बची थी।\n\nसवाल-जवाब\n\n1. उद्धव ठाकरे ने 2019 के बाद बातचीत को लेकर क्या कहा?\nउन्होंने कहा कि 2019 के बाद भाजपा के साथ सभी संवाद पूरी तरह बंद हो गए थे और उसके बाद कभी बहाल नहीं हुए।\n\n2. देवेंद्र फडणवीस ने फोन को लेकर पहले क्या टिप्पणी की थी?\nफडणवीस ने कहा था कि ठाकरे के फोन पर वे हमेशा सकारात्मक रहे, लेकिन 2019 के बाद उन्हें कोई कॉल नहीं आया और वे इंतजार कर रहे थे।\n\n3. ठाकरे ने यह बयान किस अवसर पर दिया?\nयह बयान शनिवार को सांसद संजय राउत की पुस्तक 'बोध कीर्तन' के विमोचन समारोह के दौरान दिया गया।\n\n4. 2019 में शिवसेना और भाजपा का गठबंधन क्यों टूटा था?\nविधानसभा चुनाव परिणामों के बाद मुख्यमंत्री पद को लेकर उपजे विवाद के कारण यह गठबंधन टूट गया था।\n\n5. राज ठाकरे ने संजय राउत के आरंभिक पत्रकारिता जीवन के बारे में क्या बताया?\nउन्होंने बताया कि राउत पहले शिवसेना की आलोचना करते थे जिससे बाल ठाकरे नाराज हुए, पर बाद में इसी खूबी के कारण उन्हें 'सामना' का संपादक बनाया गया।",
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