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  "type": "article",
  "title": "धर्मांतरण विरोधी नए कानून पर बवाल, मौलाना असद मदनी बोले संविधान के अनुच्छेद 25 पर सीधा हमला",
  "summary": "महाराष्ट्र फ्रीडम ऑफ रिलीजन एक्ट 2026 के लागू होने पर जमीअत उलमा-ए-हिंद ने कड़ी चिंता व्यक्त की है। संगठन के अध्यक्ष मौलाना महमूद असद मदनी का कहना है कि यह कानून नागरिकों के संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन करता है।",
  "content": "महाराष्ट्र राज्य में लागू किए गए नए धर्म स्वातंत्र्य अधिनियम 2026 की संवैधानिक वैधानिकता पर तीव्र विवाद छिड़ गया है। जमीअत उलमा-ए-हिंद संगठन के प्रमुख मौलाना असद मदनी ने इस विधिक कदम पर गहरी चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि इसके कई नियम आम नागरिकों की मौलिक स्वाधीनता को नुकसान पहुंचाते हैं। उनके अनुसार, यह नया विधान लोगों को अपनी अंतरात्मा के आधार पर जीने, निजता का अधिकार बनाए रखने तथा स्वेच्छा से अपना पंथ चुनने के संवैधानिक संरक्षण को सीमित करता है। संगठन के शीर्ष पदाधिकारी ने स्पष्ट किया कि विविध धार्मिक व सांस्कृतिक विरासत ही भारतीय समाज की असली शक्ति है, और यदि नागरिकों से उनकी मर्जी का विश्वास अपनाने का अधिकार छीन लिया गया, तो भारतीय संविधान के 25वें अनुच्छेद में दिए गए प्रावधानों का मूल औचित्य ही समाप्त हो जाएगा।\n\n \n\n25वें अनुच्छेद और व्यक्तिगत आस्था का संरक्षण\n\nमौलाना महमूद मदनी ने जोर देकर कहा कि लोकतांत्रिक व्यवस्था की मूल रीढ़ नागरिक अधिकार होते हैं। देश का 25वां अनुच्छेद प्रत्येक नागरिक को अपनी आस्था मानने और उसके अनुरूप आचरण करने का सीधा अधिकार प्रदान करता है। यदि कोई नागरिक स्वेच्छा से विश्वास चयन के लिए स्वतंत्र नहीं रहेगा, तो संवैधानिक गारंटी का व्यावहारिक अर्थ निष्प्रभावी हो जाएगा। उन्होंने कहा कि देश के विविध ताने-बाने को बचाए रखने के लिए व्यक्तिगत फैसलों का सम्मान किया जाना बेहद आवश्यक है।\n\n \n\nअन्य प्रांतीय ढांचों के अनुकरण का आरोप\n\nजमीअत प्रमुख के अनुसार, महाराष्ट्र की वर्तमान सरकार ने इस नए कानून को तैयार करने में उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश तथा गुजरात द्वारा पहले बनाए गए कानूनी ढांचों का अनुकरण किया है। उन्होंने ध्यान दिलाया कि प्रमुख मुस्लिम संगठन जमीअत ने इन तीनों राज्यों के विवादित अधिनियमों के विरुद्ध देश की शीर्ष अदालत का रुख करते हुए पूर्व में ही याचिकाएं दाखिल कर रखी हैं। उनका कहना है कि अन्य राज्यों के प्रारूपों को हूबहू अपनाना प्रशासनिक दुरुपयोग का मार्ग प्रशस्त करता है।\n\n \n\n'प्रलोभन' और 'धोखाधड़ी' की अनिश्चित परिभाषा पर आपत्ति\n\nअधिनियम की शब्दावली का विश्लेषण करते हुए उन्होंने रेखांकित किया कि इसमें प्रयुक्त 'प्रलोभन' और 'धोखाधड़ी' जैसे पदों की विधिक सीमाएं स्पष्ट नहीं हैं। इन शब्दों की अनिश्चित व्याख्या के कारण शांतिपूर्ण ढंग से धर्म का संदेश देने वाली गतिविधियों को भी कानूनी शिकंजे में लाया जा सकता है। उदाहरण प्रस्तुत करते हुए उन्होंने बताया कि एकेश्वरवादी मान्यताओं में परलोक के कल्याण, आखिरत के इनाम और मोक्ष अथवा मुक्ति की प्राप्ति के उपदेश दिए जाते हैं। यदि आध्यात्मिक मोक्ष के इन सिद्धांतों को भी 'लालच' मान लिया जाएगा, तो आस्था के प्रसार के वैधानिक अधिकार पर सीधा कुठाराघात होगा।\n\n \n\nनागरिकों के निजी फैसलों में राज्य के प्रवेश पर रोक\n\nविगत वर्षों के व्यावहारिक अनुभवों का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि इस तरह की धाराओं की आड़ लेकर अनेक निर्दोष लोगों को जेल की सलाखों के पीछे डाला गया है। राज्य प्रशासन को यह अधिकार कभी नहीं दिया जा सकता कि वह नागरिक के व्यक्तिगत विवेक, आस्थागत प्राथमिकताओं और निजी निर्णयों की निगरानी करे या उनका संरक्षक बनने का दावा करे।\n\n इसके साथ ही उन्होंने पिछले साल देश के उच्चतम न्यायालय द्वारा व्यक्त की गई चिंताओं का स्मरण कराया। शीर्ष अदालत ने भी माना था कि पंथ परिवर्तन से पूर्व अनिवार्य सरकारी घोषणा पत्र जमा कराने, पुलिस जांच प्रक्रिया से गुजरने और नागरिक के अति-संवेदनशील विवरण को सार्वजनिक करने जैसे नियम व्यक्तिगत स्वाधीनता पर अनुचित व अत्यधिक बोझ डालते हैं।\n\n \n\nकानूनी ढांचे और बहुसंख्यकवादी मंशा की न्यायिक पड़ताल\n\nविभिन्न प्रदेशों में इन कानूनों के असर को देखते हुए उन्होंने न्यायपालिका और लोकतांत्रिक निकायों से आग्रह किया कि वे केवल औपचारिक रूप से बताए गए विधिक उद्देश्यों तक ही अपना दायरा सीमित न रखें। अदालतों को कानून की संपूर्ण संरचना, इसके पीछे छिपी बहुसंख्यकवादी सोच और धरातल पर हो रहे दुरुपयोग के मामलों की व्यापक समीक्षा करनी चाहिए। उन्होंने शीर्ष अदालत से नागरिक स्वतंत्रताओं की रक्षा हेतु इस विषय पर शीघ्र सुनवाई की अपील की।\n\n \n\nअनुचित दबाव व छल-कपट रोकने की कार्रवाई का समर्थन\n\nअपने वक्तव्य के समापन में जमीअत प्रमुख ने स्थिति पूरी तरह स्पष्ट की कि उनका संगठन बलपूर्वक, धोखे या अनुचित दबाव के जरिए कराए जाने वाले पंथ परिवर्तन को रोकने के वास्तविक सरकारी प्रयासों के खिलाफ नहीं है। यदि विधिक कदम का वास्तविक ध्येय छल-कपट और जब्र को रोकना है, तो उस मंशा पर कोई आपत्ति नहीं है। हालांकि, उन्होंने सचेत किया कि आस्थागत स्वाधीनता की रक्षा का नाम लेकर बनाया गया कोई भी विधान खुद उसी स्वाधीनता को छीनने का माध्यम कदापि नहीं बनना चाहिए और न ही इसे किसी विशेष समुदाय को प्रताड़ित करने का हथियार बनाया जाना चाहिए।\n\nइसका आप पर असर\nभारत में: यह मामला देश भर में धार्मिक स्वाधीनता, अनुच्छेद 25 के संवैधानिक दायरे और राज्य स्तर पर कानून निर्माण की सीमाओं पर व्यापक बहस को जन्म देता है।\n\nमहाराष्ट्र में: नए अधिनियम के लागू होने से राज्य में धर्म परिवर्तन से जुड़ी प्रशासनिक घोषणाओं, पुलिस जांच प्रक्रियाओं और व्यक्तिगत अधिकारों के क्रियान्वयन पर सीधा प्रभाव पड़ेगा।\n\nसवाल-जवाब\n\n1. मौलाना असद मदनी ने महाराष्ट्र के नए कानून पर क्या आपत्ति जताई है?\nउन्होंने कहा कि फ्रीडम ऑफ रिलीजन एक्ट 2026 के कई नियम नागरिकों की अंतरात्मा की आजादी, निजता और अनुच्छेद 25 के तहत मिले अधिकारों का हनन करते हैं।\n\n2. कानून की किन शब्दावलियों पर जमीअत ने सवाल उठाए हैं?\nजमीअत के अनुसार 'प्रलोभन' और 'धोखाधड़ी' की अनिश्चित परिभाषाओं के कारण शांतिपूर्ण धार्मिक प्रचार और आध्यात्मिक उपदेशों को भी अपराध माना जा सकता है।\n\n3. क्या जमीअत उलमा-ए-हिंद जबरन धर्मांतरण के खिलाफ कार्रवाई का विरोध करती है?\nनहीं, मौलाना मदनी ने स्पष्ट किया कि संगठन बलपूर्वक या धोखाधड़ी से कराए जाने वाले धर्म परिवर्तन को रोकने के वास्तविक प्रयासों के खिलाफ नहीं है।\n\n4. महाराष्ट्र के इस कानून की तुलना किन अन्य राज्यों के ढांचों से की गई है?\nमौलाना मदनी ने बताया कि महाराष्ट्र ने उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और गुजरात के धर्मांतरण विरोधी कानूनों का मॉडल अपनाया है, जिन्हें सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी जा चुकी है।",
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  "category": "महाराष्ट्र",
  "publishedAt": "2026-08-22",
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