महाराष्ट्र में मॉनसून की बेरुखी से खरीफ की फसलें चौपट, 1972 से भी बड़े सूखे का अंदेशा महाराष्ट्र में कम बारिश की वजह से 1.40 करोड़ हेक्टेयर की खरीफ फसलें नष्ट हो गई हैं और करीब 1.40 करोड़ किसान गंभीर संकट में घिर चुके हैं। हालात ऐसे हैं कि दशहरे-दिवाली से पहले ही ग्रामीण इलाकों से मजदूरों का पलायन शुरू हो चुका है। कमज़ोर मानसूनी बारिश ने महाराष्ट्र के ग्रामीण इलाकों की कमर तोड़कर रख दी है। खेतों में खड़ी कपास, सोयाबीन, दालें, फल और सब्जियां पानी के अभाव में सूख चुकी हैं। प्रमुख नकदी फसल गन्ने पर भी इसका बेहद प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है, जिससे खेती-किसानी से जुड़े परिवारों की आमदनी को गहरा झटका लगा है। संकट केवल खेतों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका सीधा असर पूरे ग्रामीण जनजीवन पर साफ महसूस किया जा रहा है। समय से पहले पलायन को मजबूर हुए खेत मजदूर आमतौर पर हर वर्ष गन्ने की कटाई करने वाले मजदूर दशहरे अथवा दिवाली के आसपास काम के लिए निकलते थे। इस बार हालात इतने गंभीर हो चुके हैं कि उन्हें कई सप्ताह पहले ही अपने घर छोड़ने पड़ रहे हैं। जालना इलाके के मजदूरों का कहना है कि मजदूरी चाहे कम मिले, लेकिन बाहर जाने पर कम से कम पीने के पानी की व्यवस्था तो हो सकेगी। जमीन के मालिक किसानों को नुकसान पर कुछ सरकारी राहत मिलने की उम्मीद रहती है, मगर भूमिहीन मजदूरों के सामने न रोजगार बचा है और न ही किसी नियमित आय का जरिया बचा है। 1972 के ऐतिहासिक अकाल की यादें हुईं ताजा साल 1960 के बाद से महाराष्ट्र अब तक 15 दफा सूखे की विभीषिका झेल चुका है। इनमें 1972 के अकाल को सबसे विनाशकारी माना जाता रहा है, जिसने पूरे प्रदेश में त्राहिमाम मचा दिया था। राज्य सरकार के मुताबिक मौजूदा हालात 1972 से भी अधिक भयावह रूप ले सकते हैं। पुराने दौर की तबाही देख चुके बुजुर्गों का कहना है कि अब उनमें एक और भयानक सूखे की मार झेलने की शारीरिक और मानसिक शक्ति नहीं बची है। पेंशन और सरकारी योजनाओं की मदद में देरी से बढ़ी मुश्किलें संकट के समय में गरीबों और कमजोर तबकों के लिए सामाजिक सुरक्षा योजनाएं जीवनरेखा साबित होती हैं। जब यह सहायता सही वक्त पर हाथों तक नहीं पहुंचती, तब रोजमर्रा का गुजारा करना नामुमकिन हो जाता है। लातूर जिले के मातेफल गांव में रहने वाले दिव्यांगों और बुजुर्ग नागरिकों के सामने नियमित भुगतान न मिलने से रोजी-रोटी का गंभीर संकट खड़ा हो गया है। राहत बजट पर सवाल और रबी फसलों पर संशय सूखे से निपटने और रोजगार मुहैया कराने के मकसद से महाराष्ट्र सरकार ने ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना के तहत 6,728 करोड़ रुपये की व्यवस्था की है। हालांकि मजदूरों का मानना है कि चंद दिनों की दिहाड़ी उन्हें कई महीनों तक चलने वाली इस तंगी से बाहर नहीं निकाल पाएगी। राज्य में करीब 1 करोड़ 40 लाख हेक्टेयर में खरीफ की फसलें बर्बाद हो चुकी हैं, जिसका सीधा प्रभाव 1 करोड़ 40 लाख किसानों पर पड़ा है। जलाशयों और कुओं में पानी इतना कम बचा है कि आगामी रबी सत्र में बुवाई करने की कोई गुंजाइश नहीं दिख रही है। महाराष्ट्र से देशभर में अनाज, दालों और सब्जियों की आपूर्ति होती है, इसलिए इस क्षेत्रीय संकट की तपिश जल्द ही पूरे देश के बाजारों तक पहुंचेगी। इसका आप पर असर महाराष्ट्र में सूखे और फसल बर्बादी के कारण आने वाले महीनों में खाद्य आपूर्ति और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर सीधा दबाव बढ़ेगा। • भारत में: महाराष्ट्र से आने वाली दालों, सोयाबीन, चीनी और मौसमी सब्जियों की आवक घटने से खुदरा बाजारों में महंगाई बढ़ सकती है। त्योहारी सीजन के दौरान आम उपभोक्ताओं को खाद्य वस्तुओं के ऊंचे दाम चुकाने पड़ सकते हैं। • महाराष्ट्र में: लगभग 1.40 करोड़ किसानों और लाखों खेतिहर मजदूरों की नियमित आय पूरी तरह ठप हो गई है। प्रभावित परिवारों को आजीविका के लिए जल्द से जल्द मनरेगा या रोजगार योजनाओं में पंजीकरण कराना होगा। • घरेलू बजट पर असर: दालों और खाद्य तेलों की कीमतों में उछाल आने से आम परिवारों का मासिक रसोई बजट प्रभावित होगा। उपभोक्ताओं को जरूरी सामानों की योजना पहले से बनाकर रखनी होगी। • पानी और चारे का संकट: ग्रामीण इलाकों में पानी की उपलब्धता कम होने से पशुपालकों और आम ग्रामीणों के सामने पेयजल की समस्या गंभीर रूप ले सकती है। प्रशासन द्वारा टैंकरों और राहत शिविरों पर निर्भरता बढ़ जाएगी। ऐसा क्यों हुआ यह संकट मुख्य रूप से मॉनसून के दौरान बहुत कम बारिश होने और पूर्ववर्ती जल संचयन में आई भारी गिरावट के चलते पैदा हुआ है। • सीधा कारण: राज्य में मानसूनी वर्षा सामान्य से काफी कम रही, जिससे खेतों में नमी खत्म हो गई और खड़ी फसलें सूख गईं। पर्याप्त बारिश न होने से खरीफ की फसलें पूरी तरह से बर्बाद हो गईं। • जल स्रोतों की कमी: बारिश न होने के कारण कुओं, तालाबों और बांधों का जलस्तर तेजी से नीचे चला गया। इस भारी जल संकट की वजह से आगामी रबी फसलों की बुवाई के लिए भी पानी नहीं बचा है। • पुराना इतिहास: 1960 के बाद से महाराष्ट्र 15 बार सूखे का सामना कर चुका है, जिसमें 1972 का सूखा सबसे भीषण रहा था। मौजूदा जल संकट के संकेत बता रहे हैं कि स्थितियां 1972 के स्तर से भी ज्यादा बदतर हो सकती हैं। • आगामी स्थिति: सरकारी विभागों द्वारा राहत कार्यों और ग्रामीण रोजगार योजना के 6,728 करोड़ रुपये के बजट के जरिए काम देने की कोशिश की जा रही है। अगर राहत वितरण समय पर नहीं हुआ तो शहरों की ओर ग्रामीण आबादी का पलायन और तेज होगा। सवाल-जवाब 1. महाराष्ट्र में सूखे से कितनी कृषि भूमि और कितने किसान प्रभावित हुए हैं? सूखे की वजह से लगभग 1 करोड़ 40 लाख हेक्टेयर में खरीफ फसलें बर्बाद हुई हैं और करीब 1 करोड़ 40 लाख किसान इससे प्रभावित हुए हैं। 2. किन प्रमुख फसलों को सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचा है? कपास, सोयाबीन, दालें, फल, सब्जियां और नकदी फसल गन्ना सूखे से बुरी तरह प्रभावित हुए हैं। 3. मजदूर समय से पहले गांव क्यों छोड़ रहे हैं? खेतों में काम न होने और गांवों में पानी की भारी किल्लत के कारण मजदूर दशहरे-दिवाली से कई हफ्ते पहले ही रोजगार की तलाश में निकल पड़े हैं। 4. महाराष्ट्र सरकार ने राहत के लिए कितना बजट तय किया है? राज्य सरकार ने ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना के संचालन के लिए 6,728 करोड़ रुपये का प्रावधान किया है। 5. क्या आगामी रबी सीजन में फसलें उगाई जा सकेंगी? पानी की भारी किल्लत के चलते किसानों के अनुसार अगली रबी फसल की बुवाई कर पाना नामुमकिन नजर आ रहा है। 6. महाराष्ट्र में अब तक कितनी बार सूखे के हालात बन चुके हैं? साल 1960 से लेकर अब तक महाराष्ट्र ने 15 बार सूखे का सामना किया है, जिसमें 1972 का सूखा सबसे गंभीर था। https://trendkia.com/maharashtra/maharashtra-men-monasuna-ki-berukhi-se-kharipha-ki-phasalen-chaupata-1972-se-bhi-bare-sukhe-ka-andesha-49751 TrendKia — Har trend, sabse pehle.