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  "title": "मुंबई में छात्रों के मंच से मोहन भागवत का बड़ा बयान, आरक्षण, बेरोजगारी और समलैंगिक विवाह पर रखी बेबाक राय",
  "summary": "मुंबई में एक छात्र कार्यक्रम के दौरान राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ प्रमुख मोहन भागवत ने देश के कई ज्वलंत मुद्दों पर अपनी बात रखी। उन्होंने युवाओं के विरोध प्रदर्शनों को जायज ठहराते हुए शिक्षा व्यवस्था में सुधार, आरक्षण की निरंतरता और श्रम के प्रति सम्मान पर बल दिया।",
  "content": "मुंबई में आयोजित 'इंडियाज इंटरनेशनल मूवमेंट टू यूनाइट नेशंस' (IIMUN) के एक विशेष कार्यक्रम में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के प्रमुख मोहन भागवत ने शिरकत की और युवाओं के साथ सीधा संवाद कायम किया। इस दौरान उन्होंने देश के वर्तमान सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक परिदृश्य से जुड़े कई संवेदनशील और महत्वपूर्ण विषयों पर विचार व्यक्त किए। छात्रों और युवाओं द्वारा हाल ही में किए गए आंदोलनों से लेकर देश में बेरोजगारी, सामाजिक आरक्षण, डिजिटल मीडिया की भूमिका, समलैंगिक विवाह और पड़ोसियों के साथ भारत के कूटनीतिक संबंधों जैसे मुद्दों पर संघ प्रमुख ने खुलकर अपनी बात रखी।\n\nजेन-जी के आंदोलन और शिक्षा प्रणाली में सुधार की आवश्यकता\nकार्यक्रम के दौरान संघ प्रमुख ने नई पीढ़ी के विरोध प्रदर्शनों का समर्थन करते हुए कहा कि आंदोलन भी संवाद स्थापित करने का ही एक तरीका होता है। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि जेन-जी की शिकायतें और मांगें पूरी तरह से तर्कसंगत हैं और देश की वर्तमान शिक्षा व्यवस्था में व्यापक सुधारों की सख्त जरूरत है। आज के युवा तार्किक और स्पष्ट उत्तर चाहते हैं, इसलिए पुरानी व्यवस्थाओं की तरह केवल बड़ों के कहने मात्र से बातें स्वीकार नहीं की जा सकतीं।\n\nमोहन भागवत ने इस बात को खारिज किया कि युवाओं को सड़कों पर उतरकर विरोध नहीं करना चाहिए। उन्होंने स्पष्ट कहा कि जब युवा अपनी बात रख रहे हों, तो समाज और प्रशासन को उन्हें ध्यान से सुनना चाहिए। हालिया आंदोलनों के दौरान संवाद की कमी देखी गई, जिसे दूर किया जाना चाहिए। युवाओं को राष्ट्रविरोधी करार दिए जाने पर सवाल उठाते हुए उन्होंने कहा कि जेन-जी और जेन-अल्फा हमारी सबसे ईमानदार पीढ़ियां हैं। वे हमारी आने वाली पीढ़ी हैं, इसलिए उनके साथ आत्मीयता और निरंतर बातचीत का रिश्ता होना आवश्यक है।\n\nसोशल मीडिया का प्रभाव, नियमन और उपयोगकर्ताओं की जिम्मेदारी\nडिजिटल प्लेटफॉर्म और इंटरनेट पर प्रतिबंध लगाने की चर्चाओं के बीच संघ प्रमुख ने कहा कि समाज में नियम बनाना और अनुशासन स्थापित करना बेहद जरूरी है, लेकिन यह तभी प्रभावी होता है जब लोगों की सोच और व्यवहार में बदलाव आए। केवल कानून बना देने से बदलाव नहीं आता, बल्कि कानून का प्रभाव तभी दिखता है जब समाज उसे स्वीकार करे और उसका पालन करे।\n\nसमय के साथ समाज के रोल मॉडल बदलते रहते हैं और उन्हें अपनी सामाजिक जिम्मेदारी को समझना होगा। मोहन भागवत ने कहा कि यदि किसी व्यक्ति का अनुसरण सोशल मीडिया पर लाखों लोग करते हैं, तो उस व्यक्ति की जिम्मेदारी और बढ़ जाती है। उसे इस बात का हमेशा ख्याल रखना चाहिए कि उसके व्यवहार, वक्तव्य और संदेशों का समाज पर क्या प्रभाव पड़ रहा है। इसके साथ ही उन्होंने आम जनता से अपील की कि इंटरनेट पर मिलने वाली हर जानकारी पर तुरंत भरोसा न करें और किसी भी वीडियो या सूचना को आगे बढ़ाने से पहले उसकी प्रामाणिकता की जांच भरोसेमंद स्रोतों से जरूर करें।\n\nसमलैंगिक विवाह और सामाजिक व्यवस्था पर संघ का दृष्टिकोण\nएलजीबीटीक्यूआईए+ (LGBTQIA+) समुदाय के संदर्भ में बात करते हुए मोहन भागवत ने कहा कि यह वर्ग भी हमारे समाज का ही हिस्सा है और भारतीय परंपरा में उनके लिए हमेशा से स्थान रहा है। हालांकि, विवाह व्यवस्था पर अपने विचार स्पष्ट करते हुए उन्होंने कहा कि भारतीय संस्कृति में विवाह केवल दो व्यक्तियों के एक साथ रहने का समझौता नहीं है, बल्कि यह परिवार जैसी महत्वपूर्ण संस्था की नींव है। परिवार ही समाज की मूल इकाई है जहां अगली पीढ़ी का निर्माण होता है और उन्हें संस्कार दिए जाते हैं।\n\nउन्होंने कहा कि किसी भी स्थापित सामाजिक व्यवस्था में जल्दबाजी में बदलाव करने से अन्य सामाजिक समस्याएं खड़ी हो सकती हैं। कानून समाज की स्वीकृति के आधार पर बनते हैं, न कि कानून से समाज संचालित होता है। समलैंगिक साथियों के साथ सम्मानजनक व्यवहार होना चाहिए और उनके एक साथ रहने के लिए अलग कानूनी ढांचा या प्रणाली बनाने पर विचार किया जा सकता है। इस संवेदनशील विषय पर समाज में व्यापक और खुली चर्चा होनी चाहिए ताकि सभी को साथ लेकर आगे बढ़ा जा सके।\n\nआरक्षण व्यवस्था और डॉ. आंबेडकर के विचारों की प्रासंगिकता\nसामाजिक आरक्षण के मुद्दे पर संघ प्रमुख ने कहा कि इस व्यवस्था को सही मायनों में समझने के लिए डॉ. भीमराव आंबेडकर के विचारों को ईमानदारी से पढ़ना और अपनाना जरूरी है। भारत में आरक्षण की व्यवस्था सामाजिक भेदभाव और असमानता के कारण लागू की गई थी। इसलिए जब तक समाज में सामाजिक भेदभाव मौजूद रहेगा, तब तक आरक्षण की जरूरत बनी रहेगी।\n\nइसके साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि आरक्षण की मदद से जिन वर्गों और व्यक्तियों को सामाजिक तथा आर्थिक उत्थान का लाभ मिल चुका है, उनमें यह भावना विकसित होनी चाहिए कि वे स्वयं आगे बढ़कर अन्य जरूरतमंद लोगों को अवसर प्रदान करें। आरक्षण कोई हमेशा रहने वाली व्यवस्था नहीं है, बल्कि यह समाज के वंचित वर्गों के उत्थान का एक सशक्त माध्यम है।\n\nबेरोजगारी का समाधान और श्रम के प्रति सामाजिक सम्मान\nदेश में बेरोजगारी की समस्या पर बात करते हुए मोहन भागवत ने कहा कि सबसे पहले समाज को अपनी पारंपरिक मानसिकता बदलनी होगी। रोजगार का अर्थ केवल सरकारी या कॉरपोरेट नौकरी पाना नहीं है, बल्कि इसमें स्वरोजगार, उद्यमिता और कौशल-आधारित कार्य भी शामिल हैं। उन्होंने अफसोस जताया कि हमारे समाज में शारीरिक श्रम या हाथ से काम करने वाले व्यक्तियों को वह सम्मान नहीं दिया जाता जिसके वे हकदार हैं।\n\nउन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि जिन कामों को सामान्य या छोटा समझा जाता है, उनमें भी कई लोगों ने अपनी मेहनत से बड़ी सफलता और आर्थिक समृद्धि हासिल की है। समाज में जब तक काम को ऊंच-नीच के दृष्टिकोण से देखा जाता रहेगा, तब तक बेरोजगारी की समस्या पूरी तरह हल नहीं हो सकती। इसलिए उद्यमिता को बढ़ावा देना और हर प्रकार के श्रम के प्रति सम्मान का भाव विकसित करना बेहद जरूरी है।\n\nपड़ोसी देशों के साथ संबंध और ऐतिहासिक-सांस्कृतिक विरासत\nअंतरराष्ट्रीय संबंधों विशेषकर चीन और पाकिस्तान के मुद्दे पर संघ प्रमुख ने कहा कि जब देश के सामने संघर्ष की स्थिति होती है, तब हमें वही कदम उठाने होते हैं जो हमारी सरकार तय करती है। लेकिन संघर्ष के बावजूद पुरानी ऐतिहासिक और सांस्कृतिक जड़ों को भुलाया नहीं जा सकता। चीन के लोग स्वयं मानते हैं कि दो हजार साल पहले भारत ने उन्हें सांस्कृतिक और नैतिक मूल्य दिए थे। वहीं पाकिस्तान भी सौ साल से भी कम समय पहले भारत का ही अभिन्न अंग था।\n\nमोहन भागवत ने जोर देकर कहा कि इन ऐतिहासिक संबंधों को पूरी तरह से समाप्त नहीं किया जा सकता। सैन्य या राजनीतिक संघर्ष के दौरान ये संबंध कुछ समय के लिए रुक सकते हैं, लेकिन वे खत्म नहीं होते और न ही उन्हें खत्म किया जाना चाहिए। संघर्ष समाप्त होने के बाद देशों को वहीं से बातचीत आगे बढ़ानी होती है जहां से वह रुकी थी। स्थायी दुश्मनी या नफरत किसी भी समस्या का स्थायी समाधान नहीं हो सकती।\n\nइसका आप पर असर\n• भारत में: संघ प्रमुख का यह वक्तव्य देश में शिक्षा सुधार, सामाजिक समावेशिता, आरक्षण नीति और श्रम के प्रति नजरिया बदलने पर व्यापक बहस को गति दे सकता है।\n• युवाओं और छात्रों के लिए: युवा आंदोलनों के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण और हुनर आधारित रोजगार पर जोर दिए जाने से छात्रों और नौकरी की तलाश कर रहे युवाओं को नई दिशा मिल सकती है।\n\nसवाल-जवाब\n\n1. जेन-जी के आंदोलनों पर मोहन भागवत ने क्या कहा?\nउन्होंने कहा कि युवाओं का विरोध प्रदर्शन संवाद का ही एक तरीका है और उनकी शिकायतें सही हैं। उन्होंने छात्रों को राष्ट्रविरोधी कहे जाने को गलत बताया और शिक्षा सुधारों की वकालत की।\n\n2. आरक्षण पर आरएसएस प्रमुख का क्या रुख है?\nमोहन भागवत ने स्पष्ट किया कि जब तक समाज में सामाजिक भेदभाव रहेगा, तब तक आरक्षण की व्यवस्था जारी रहनी चाहिए।\n\n3. बेरोजगारी दूर करने के लिए मोहन भागवत ने क्या सुझाव दिया?\nउन्होंने कहा कि केवल नौकरी के पीछे भागने के बजाय उद्यमिता और कौशल-आधारित कार्यों को अपनाना चाहिए और हाथ से किए जाने वाले काम को सामाजिक सम्मान मिलना चाहिए।\n\n4. समलैंगिक विवाह पर मोहन भागवत के क्या विचार हैं?\nउन्होंने कहा कि एलजीबीटीक्यूआईए+ समुदाय समाज का हिस्सा है, लेकिन विवाह परिवार संस्था का आधार है। उन्होंने साथ रहने के लिए अलग कानूनी व्यवस्था बनाने का सुझाव दिया।\n\n5. सोशल मीडिया के इस्तेमाल पर उन्होंने क्या सलाह दी?\nउन्होंने लोगों से अपील की कि इंटरनेट पर मिली किसी भी जानकारी या वीडियो को बिना प्रमाणिक स्रोतों से जांचे तुरंत सही न मानें।",
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  "publishedAt": "2026-08-06",
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