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  "title": "मणिपुर यौन हिंसा मामले में सुप्रीम कोर्ट की सीबीआई को दो मुख्य गवाहों की गवाही तय तारीखों पर कराने की सख्त हिदायत",
  "summary": "सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआई और निचली अदालत को निर्देश दिया है कि मणिपुर यौन हिंसा मामले में दो प्रमुख पीड़िता गवाहों की पेशी सुनिश्चित की जाए। अदालत ने साफ किया कि गवाहों को सुरक्षा देना जांच एजेंसियों का दायित्व है।",
  "content": "मणिपुर में हुए जातीय संघर्ष के दौरान सामने आए जघन्य यौन उत्पीड़न के मामले में देश की सर्वोच्च अदालत ने सख्त रुख अपनाया है। सुप्रीम कोर्ट ने केंद्रीय जांच ब्यूरो यानी सीबीआई और संबंधित ट्रायल कोर्ट को आदेश दिया है कि दो अहम पीड़िता गवाहों की अदालत में पेशी और बयान दर्ज कराने की प्रक्रिया बिना किसी देरी के पूरी की जाए। इसके साथ ही शीर्ष अदालत ने मामले की सुनवाई तेज गति से आगे बढ़ाने पर जोर दिया है।\n\nजमानत रद्द करने की याचिका और सुरक्षा की चिंता\nयह मामला भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, जस्टिस जोयमाल्या बागची और जस्टिस वी मोहना की तीन सदस्यीय विशेष पीठ के समक्ष सुनवाई के लिए आया था। सुप्रीम कोर्ट में यह सुनवाई दो आरोपियों को मिली जमानत को रद्द करने की सीबीआई की अर्जी पर चल रही थी। सुनवाई के दौरान जांच एजेंसी की ओर से पेश हुए एडिशनल सॉलिसिटर जनरल डीपी सिंह ने दलील दी कि आरोपियों का जेल से बाहर रहना सीधे तौर पर गवाहों की मानसिक स्थिति और उनकी गवाही देने की इच्छा को प्रभावित कर सकता है। उन्होंने पीठ को याद दिलाया कि इस मामले में ट्रायल शुरू हो चुका है, जहां पीड़ितों के साथ अत्यंत अमानवीय तरीके से यौन दुर्व्यवहार किया गया, उन्हें निर्वस्त्र कर घुमाया गया और उस बर्बरता का वीडियो भी बनाया गया था।\n\nट्रायल की रफ्तार और गैरहाजिरी की वजहें\nदूसरी तरफ एक आरोपी की पैरवी कर रहे वरिष्ठ अधिवक्ता शादान फरासत ने अदालत में दलील पेश की कि सीबीआई तय रफ्तार से इस मुकदमे को आगे बढ़ाने में नाकाम रही है। उन्होंने अदालत को अवगत कराया कि मामले में करीब 30 गवाह शामिल हैं और कानूनी प्रक्रिया अभी अपने दूसरे चरण में ही पहुंची है। इस बीच जस्टिस जोयमाल्या बागची ने सवाल उठाया कि पिछली तारीखों पर पीड़िता गवाह अपने बयान दर्ज कराने के लिए पेश क्यों नहीं हुईं।\n\nपीड़िता पक्ष की ओर से पेश हुए वकील निजाम पाशा ने अदालत को स्थिति स्पष्ट करते हुए बताया कि पिछली निर्धारित तारीख पर सार्वजनिक अवकाश था, जिसके कारण वे केंद्र पूरी तरह बंद थे जहां पीड़ितों के बयान दर्ज होने थे। इसके अलावा उन्होंने यह भी जानकारी दी कि पीड़ितों में से एक महिला उस समय डेंगू से पीड़ित थी। इन तथ्यों को सुनने के बाद चीफ जस्टिस ने टिप्पणी की कि जब अदालत की कार्यवाही किसी सार्वजनिक छुट्टी के दिन सूचीबद्ध हो, तब पीड़ितों के उपस्थित होने की उम्मीद नहीं की जा सकती। पीठ ने निर्देश दिया कि आगामी तारीख पर कम से कम एक गवाह की उपस्थिति हर हाल में सुनिश्चित की जाए।\n\nगवाहों की सुरक्षा पर पीठ का कड़ा संदेश\nजब सीबीआई के वकील डीपी सिंह ने यह आशंका जताई कि आरोपियों के बाहर घूमने से कोई भी गवाही देने आगे नहीं आएगा, तो सीजेआई ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि गवाहों की हिफाजत करना प्रशासन और जांच एजेंसियों की बुनियादी जिम्मेदारी है। अदालत ने कहा कि गवाह सुरक्षा प्रदान करने का दायित्व पूरी तरह अधिकारियों पर है। पीठ ने यह भी स्पष्ट कर दिया कि यदि आरोपियों द्वारा जमानत की छूट का किसी भी तरह से दुरुपयोग किया जाता है, तो अदालत उनकी जमानत की स्थिति की तुरंत समीक्षा करेगी। इसके साथ ही पीठ ने संकेत दिया कि दोनों मुख्य पीड़िता गवाहों के बयान दर्ज होने के बाद ही जमानत रद्द करने की याचिकाओं पर आगे विचार करना उचित होगा।\n\nमणिपुर हिंसा से जुड़े मामलों की निरंतर निगरानी\nयह अदालती कार्यवाही मणिपुर में वर्ष 2023 के दौरान भड़की जातीय हिंसा से जुड़े मुकदमों पर सुप्रीम कोर्ट की लगातार जारी निगरानी का एक प्रमुख हिस्सा है। इससे पहले 17 सितंबर को इसी पीठ ने विस्थापित लोगों के राहत शिविरों में हो रही मौतों को लेकर गंभीर चिंता जताई थी। उस समय अदालत ने मणिपुर के मुख्य सचिव को निर्देश दिया था कि वे इन मौतों की जांच, आपराधिक कार्यवाही और शिविरों में रह रहे लोगों की सुरक्षा के लिए उठाए गए कदमों की पूरी जानकारी अदालत को सौंपें।\n\nइसके अलावा अदालत ने मणिपुर और असम की सरकारों समेत सभी संबंधित पक्षों से यह भी कहा था कि वे सीबीआई तथा राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) द्वारा जांचे जा रहे हिंसा से जुड़े मामलों की विशेष सुनवाई के लिए दो अलग-अलग फास्ट ट्रैक अदालतें गठित करने पर विचार करें। मणिपुर में यह जातीय संघर्ष 3 मई 2023 को तब शुरू हुआ था, जब मैतेई समुदाय को अनुसूचित जनजाति का दर्जा दिए जाने की मांग के विरोध में एक आदिवासी एकजुटता मार्च निकाला गया था। उस हिंसा के बाद से सैकड़ों लोगों की जान जा चुकी है और हजारों नागरिक अपने घरों से बेघर हो चुके हैं।\n\nइसका आप पर असर\nसुप्रीम कोर्ट का यह आदेश संवेदनशील और गंभीर आपराधिक मामलों में पीड़ित गवाहों की सुरक्षा और न्याय प्रक्रिया की गति को सीधे प्रभावित करता है।\n\n• भारत में: देश भर में चलने वाले संवेदनशील मुकदमों में जांच एजेंसियों और राज्य सरकारों के लिए यह स्पष्ट संदेश है कि गवाहों को सुरक्षित माहौल देना उनकी वैधानिक जिम्मेदारी है। किसी भी आपराधिक मामले में गवाहों की सुरक्षा सुनिश्चित होने से न्याय प्रणाली पर नागरिकों का विश्वास मजबूत होता है।\n• मणिपुर में: हिंसा प्रभावित पीड़ितों के लिए यह निर्देश राहत भरा है क्योंकि अदालत ने साफ किया है कि बीमारी या प्रशासनिक छुट्टियों जैसी वास्तविक समस्याओं पर विचार किया जाएगा। इसके साथ ही आरोपियों की जमानत की समीक्षा गवाहों के बयान दर्ज होने के बाद तय होगी, जिससे गवाहों को बिना दबाव बयान देने का अवसर मिलेगा।\n• कानूनी प्रक्रिया: निचली अदालतों में लंबित गंभीर मामलों की सुनवाई में बेवजह देरी को रोकने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने तेज गति से सुनवाई का मानक तय किया है। करीब 30 गवाहों वाले इस मुकदमे में अब सीबीआई को समयबद्ध तरीके से पेशी करानी होगी।\n• सुरक्षा तंत्र: इस निर्देश के बाद जांच एजेंसियों को गवाह सुरक्षा कानून और प्रावधानों को जमीनी स्तर पर सख्ती से लागू करना होगा। अगर आरोपी किसी भी तरह का दबाव बनाते हैं, तो उनकी जमानत तुरंत निरस्त की जा सकती है।\n\nऐसा क्यों हुआ\nयह अदालती आदेश तब आया जब मणिपुर यौन हिंसा मामले में मुख्य पीड़िता गवाह पिछली तारीख पर बयान दर्ज कराने के लिए अदालत में उपस्थित नहीं हो सकी थीं और सीबीआई ने आरोपियों की जमानत रद्द करने की मांग की थी।\n\n• तारीख पर अनुपस्थिति का कारण: पूर्व में तय की गई तारीख पर सार्वजनिक अवकाश होने के कारण गवाही केंद्र बंद थे, जबकि दूसरी पीड़िता उस दौरान गंभीर रूप से डेंगू की बीमारी से जूझ रही थी। इस व्यावहारिक बाधा के चलते दोनों मुख्य गवाह अपने बयान दर्ज कराने अदालत के समक्ष नहीं पहुंच सकी थीं।\n• जमानत का विरोध और गवाहों पर दबाव: सीबीआई ने दो आरोपियों की जमानत को चुनौती देते हुए यह आधार बनाया था कि आरोपियों के जेल से बाहर रहने से पीड़िता गवाहों में भय पैदा हो सकता है। एजेंसी ने दलील दी कि स्वतंत्र घूमते आरोपियों के डर से संवेदनशील मामलों में गवाह अदालत आकर बोलने से हिचकिचाते हैं।\n• ट्रायल की धीमी गति पर विवाद: बचाव पक्ष के वकील ने आरोप लगाया कि करीब 30 गवाहों वाले इस मुकदमे में सीबीआई अपेक्षित गति से आगे नहीं बढ़ पा रही है। इसके चलते अदालत को दोनों पक्षों की दलीलें सुनकर संतुलन बनाते हुए ट्रायल को रफ्तार देने का आदेश देना पड़ा।\n• मणिपुर जातीय संघर्ष की पृष्ठभूमि: 3 मई 2023 को मैतेई समुदाय के एसटी दर्जे की मांग के खिलाफ आयोजित आदिवासी एकजुटता मार्च के बाद राज्य में बड़े पैमाने पर जातीय हिंसा भड़क उठी थी। उसी दौरान यह भयानक यौन उत्पीड़न हुआ था, जिसकी जांच और मुकदमों की निगरानी सुप्रीम कोर्ट खुद कर रहा है।\n\nसवाल-जवाब\n\n1. सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआई और निचली अदालत को क्या निर्देश दिया है?\nसुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया है कि मणिपुर यौन हिंसा मामले की दो मुख्य पीड़िता गवाहों की उपस्थिति सुनिश्चित की जाए और ट्रायल को तेजी से आगे बढ़ाया जाए।\n\n2. इस मामले की सुनवाई कौन सी बेंच कर रही थी?\nयह सुनवाई चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया सूर्यकांत, जस्टिस जोयमाल्या बागची और जस्टिस वी मोहना की तीन सदस्यीय पीठ कर रही थी।\n\n3. पिछली तारीख पर पीड़िता गवाह अदालत में क्यों नहीं आ सकी थीं?\nपिछली तारीख पर सार्वजनिक अवकाश होने के कारण गवाही केंद्र बंद थे और पीड़ितों में से एक महिला डेंगू से पीड़ित थी।\n\n4. सीबीआई ने आरोपियों की जमानत रद्द कराने के लिए क्या दलील दी?\nसीबीआई ने दलील दी कि आरोपियों के बाहर रहने से गवाहों के गवाही देने की इच्छा और हिम्मत पर बुरा असर पड़ सकता है।\n\n5. गवाहों की सुरक्षा को लेकर चीफ जस्टिस ने क्या कहा?\nचीफ जस्टिस ने स्पष्ट किया कि गवाहों को सुरक्षा मुहैया कराना प्रशासन और जांच अधिकारियों की जिम्मेदारी है।\n\n6. आरोपियों की जमानत अर्जी पर अदालत कब विचार करेगी?\nअदालत ने संकेत दिया कि दोनों मुख्य पीड़िता गवाहों के बयान दर्ज हो जाने के बाद ही जमानत रद्द करने की याचिकाओं पर सुनवाई की जाएगी।\n\n7. इस मुकदमे में कुल कितने गवाह हैं?\nआरोपी के वकील के अनुसार इस मुकदमे में करीब 30 गवाह हैं और कानूनी कार्यवाही अभी दूसरे चरण में है।\n\n8. मणिपुर में जातीय हिंसा कब शुरू हुई थी?\nमणिपुर में जातीय हिंसा 3 मई 2023 को मैतेई समुदाय की अनुसूचित जनजाति दर्जे की मांग के खिलाफ आयोजित आदिवासी एकजुटता मार्च के बाद भड़की थी।",
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  "category": "मणिपुर",
  "publishedAt": "2026-10-05",
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