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  "type": "article",
  "title": "पूर्वोत्तर में अशांति की आड़ लेकर म्यांमार के सिंडिकेट भारत में झोंक रहे नशीली खेप",
  "summary": "म्यांमार के ड्रग माफिया पूर्वोत्तर और खासतौर पर मणिपुर में जारी अस्थिरता का फायदा उठाकर भारतीय सीमा में भारी मात्रा में नशीले पदार्थ पहुंचा रहे हैं। संसद में पेश आंकड़ों के अनुसार जब्ती की मात्रा कई गुना बढ़ी है, फिर भी सिंडिकेट नए रास्तों और भारी उत्पादन के दम पर तस्करी जारी रखे हुए हैं।",
  "content": "भारत की पूर्वी सीमाओं पर नशीले पदार्थों की तस्करी एक गंभीर सुरक्षा चुनौती बनकर उभरी है। म्यांमार से संचालित होने वाले संगठित ड्रग गिरोह पूर्वोत्तर राज्यों, विशेष रूप से मणिपुर में फैली अशांति और कानून-व्यवस्था की उलझनों का पूरा फायदा उठा रहे हैं। जब सुरक्षा बल संवेदनशील इलाकों में हिंसा नियंत्रित करने और शांति बहाल करने में व्यस्त होते हैं, उस दौरान ये सिंडिकेट अंतरराष्ट्रीय सीमा पार से भारी तादाद में नशीली खेप भारतीय क्षेत्र में दाखिल करवा देते हैं।\n\nपूर्वोत्तर राज्यों में नशीले पदार्थों की जब्ती में भारी उछाल\nमार्च 2026 में लोकसभा के पटल पर रखे गए सरकारी आंकड़ों से साफ होता है कि सीमावर्ती इलाकों में मादक पदार्थों की बरामदगी का दायरा कितनी तेजी से बढ़ा है। असम में 31,706 किलोग्राम और त्रिपुरा में 46,346 किलोग्राम नशीली सामग्री पकड़ी गई। मिजोरम में भी जब्ती का स्तर लगातार ऊपर गया है, जहां 2024 में 1,967 किलोग्राम बरामद हुआ था, वहीं 2025 में यह आंकड़ा बढ़कर 2,233 किलोग्राम पर पहुंच गया। इसी क्षेत्र के एक अन्य राज्य में तो चौंकाने वाली वृद्धि दर्ज की गई, जहां 2024 में महज 284 किलोग्राम की जब्ती हुई थी, जो 2025 में बढ़कर 2,556 किलोग्राम तक जा पहुंची। नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो यानी एनसीबी ने म्यांमार सीमा से फैलते इस व्यापार के पैमाने को अभूतपूर्व रूप से गंभीर माना है। हालांकि इतनी बड़ी मात्रा में माल पकड़े जाने के बावजूद समस्या थमने का नाम नहीं ले रही है।\n\nअशांति भड़काकर सुरक्षा बलों को उलझाने की साजिश\nखुफिया जानकारियों से संकेत मिलता है कि इन सिंडिकेट्स ने 2026 में नशीले पदार्थों का उत्पादन करीब तीन गुना तक बढ़ा दिया है। इंटेलिजेंस ब्यूरो के एक अधिकारी के अनुसार, ये गिरोह पूर्वोत्तर में जारी तनाव का लाभ उठाने की लगातार फिराक में रहते हैं। जांच में सामने आया है कि इन आपराधिक नेटवर्कों ने कई मौकों पर स्थानीय मददगारों के जरिए संवेदनशील सामाजिक और राजनीतिक मुद्दों को हवा देकर हिंसा भड़काने का काम किया। इस तरह के उपद्रव जब हफ्तों या महीनों तक खिंच जाते हैं, तो सुरक्षा बल कानून-व्यवस्था संभालने में उलझ जाते हैं। इसी ढील का लाभ उठाकर तस्कर भारी मात्रा में कन्साइनमेंट सीमा पार भेज देते हैं।\n\nअफगानिस्तान में पाबंदी के बाद म्यांमार बना अफीम का प्रमुख केंद्र\nसुरक्षा विश्लेषकों का मानना है कि म्यांमार के तस्करों का दबदबा बढ़ने के पीछे वैश्विक भू-राजनीतिक बदलाव भी जिम्मेदार हैं। अफगानिस्तान में तालिबान प्रशासन द्वारा अफीम की खेती पर पूरी तरह रोक लगाए जाने के बाद म्यांमार स्थित उत्पादकों को खुला मैदान मिल गया। वर्तमान में म्यांमार दुनिया का सबसे बड़ा अफीम उत्पादक क्षेत्र बन चुका है। एक अधिकारी द्वारा साझा किए गए आंकड़ों के मुताबिक 2025 में वहां अफीम की खेती का दायरा 53,100 हेक्टेयर तक फैल गया था। अफीम और हेरोइन के अलावा ये गिरोह विशाल स्तर पर सिंथेटिक ड्रग्स का भी निर्माण कर रहे हैं। विशेष रूप से मेथामफेटामाइन भारी तादाद में भारतीय सीमा में खपाया जा रहा है, जिसकी मुख्य वजह देश के भीतर बढ़ती मांग है।\n\nअपार वित्तीय साधन और मोरेह-तामू कॉरिडोर का इस्तेमाल\nएक अधिकारी ने खुलासा किया कि इन गिरोहों की आर्थिक ताकत इतनी विशाल है कि उनका साझा खजाना किसी देश की सरकार के बजट से भी बड़ा हो सकता है। इसी बेहिसाब पूंजी के कारण वे खेप पकड़े जाने पर होने वाले नुकसान को आसानी से झेल लेते हैं और तुरंत नए आपूर्ति मार्ग तैयार कर लेते हैं। भौगोलिक दृष्टि से मोरेह-तामू सीमा पारगमन इस काले कारोबार का सबसे महत्वपूर्ण केंद्र बना हुआ है। भारत और म्यांमार की सीमा पर कई खुले हिस्से हैं, जहां घने जंगल और दुर्गम पहाड़ियां मौजूद हैं। इस भौगोलिक बनावट के चलते गश्त लगाना और खेप पकड़ना बेहद चुनौतीपूर्ण काम साबित होता है।\n\nद्विपक्षीय बातचीत और पश्चिमी बनाम पूर्वी मोर्चे की चुनौती\nसीमा पर नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो और असम राइफल्स के बीच बेहतर तालमेल के चलते बीते दो से तीन वर्षों में कई बड़े खुलासे और बरामदगियां हुई हैं। इसके बावजूद म्यांमार की सीमा के भीतर चल रही अफीम की खेती सीधे भारतीय एजेंसियों के अधिकार क्षेत्र से बाहर है। नई दिल्ली और नेपिडॉ के बीच इस मसले पर कई दौर की उच्चस्तरीय बातचीत हुई है और दोनों पक्ष सहयोग पर सहमत भी हुए हैं, परंतु माफिया नेटवर्क के विशाल आकार को देखते हुए ठोस परिणाम आने में समय लगेगा। सुरक्षा एजेंसियों का कहना है कि दाऊद इब्राहिम और हाजी सलीम जैसे पाकिस्तान समर्थित सिंडिकेट्स पर दबाव बनाने में काफी कामयाबी मिली है, लेकिन भारत के लिए पूर्वोत्तर का यह पूर्वी मोर्चा कहीं अधिक जटिल और चुनौतीपूर्ण साबित हो रहा है।\n\nइसका आप पर असर\nपूर्वोत्तर सीमा से बढ़ रही नशीले पदार्थों की यह घुसपैठ देश की युवा पीढ़ी, सीमावर्ती क्षेत्रों की सुरक्षा और सामाजिक ताने-बाने पर सीधा असर डालती है।\n\n• भारत में: सिंथेटिक ड्रग्स और मेथामफेटामाइन की भारी खेप देश के आंतरिक महानगरों और छोटे शहरों तक पहुंच रही है, जिससे युवाओं में नशे की लत और अपराध का जोखिम बढ़ रहा है। परिजनों और स्थानीय समुदायों को नशा मुक्ति के लिए बढ़ती स्वास्थ्य लागत और सामाजिक चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है।\n• मणिपुर और पूर्वोत्तर में: सीमावर्ती इलाकों में सक्रिय ड्रग माफिया कानून-व्यवस्था की स्थिति को बिगाड़कर स्थानीय शांति बहाली के प्रयासों को नुकसान पहुंचा रहे हैं। इसके चलते स्थानीय निवासियों को आवाजाही पर कड़ी जांच, चेकपोस्टों पर देरी और अस्थिर माहौल का सामना करना पड़ रहा है।\n• सुरक्षा तंत्र पर: असम राइफल्स और पुलिस बलों को कानून-व्यवस्था के साथ-साथ दुर्गम जंगलों में तस्करी रोकने की दोहरी जिम्मेदारी निभानी पड़ रही है। सुरक्षा संसाधनों का बड़ा हिस्सा सीमाई निगरानी और गुप्त अभियानों में लगाना पड़ रहा है।\n• वित्तीय सुरक्षा: ड्रग सिंडिकेट्स की अकूत काली कमाई अवैध हवाला नेटवर्क और स्थानीय उग्रवाद को वित्तीय मदद दे सकती है। इससे सीमांत व्यापार और आर्थिक गतिविधियों में पारदर्शिता बनाए रखना मुश्किल हो जाता है।\n\nऐसा क्यों हुआ\nम्यांमार के ड्रग सिंडिकेट्स की इस आक्रामक बढ़त के पीछे पूर्वोत्तर की स्थानीय कानून-व्यवस्था की चुनौतियां और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नशीले पदार्थों के उत्पादन केंद्रों में आए भारी बदलाव जिम्मेदार हैं।\n\n• पूर्वोत्तर में अस्थिरता: मणिपुर और आसपास के क्षेत्रों में जारी सामाजिक तनाव के कारण सुरक्षा बल नागरिक सुरक्षा और कानून-व्यवस्था बनाए रखने में व्यस्त हो गए। इस रणनीतिक भटकाव का फायदा उठाकर तस्करों ने खुली सीमाओं से बेरोकटोक माल पार कराया।\n• अफगानिस्तान में पाबंदी: तालिबान द्वारा अफगानिस्तान में अफीम की खेती पर रोक लगाने से वैश्विक बाजार में बड़ा अभाव पैदा हुआ, जिसकी भरपाई के लिए म्यांमार दुनिया का सबसे बड़ा उत्पादक बन गया। 2025 में म्यांमार के भीतर अफीम की खेती का रकबा बढ़कर 53,100 हेक्टेयर तक पहुंच गया।\n• अपार आर्थिक क्षमता: इन अंतरराष्ट्रीय सिंडिकेट्स के पास अथाह वित्तीय साधन मौजूद हैं, जिससे वे नुकसान झेलकर भी तुरंत नए रास्ते बना लेते हैं। इसी पूंजी के बल पर वे स्थानीय संपर्कों का इस्तेमाल कर अशांति भड़काने और आपूर्ति चक्र चालू रखने में सक्षम हैं।\n• कठिन भौगोलिक परिस्थितियां: भारत-म्यांमार सीमा के खुले हिस्से, घने जंगल और दुर्गम पहाड़ियां सुरक्षा बलों के लिए प्रभावी गश्त को बेहद जटिल बना देती हैं। मोरेह-तामू जैसे संकरे ट्रांजिट कॉरिडोर से तस्करी रोकना व्यावहारिक रूप से चुनौतीपूर्ण रहा है।\n\nसवाल-जवाब\n\n1. म्यांमार के ड्रग माफिया पूर्वोत्तर की स्थिति का कैसे फायदा उठा रहे हैं?\nवे मणिपुर और पूर्वोत्तर में जारी तनाव का लाभ उठाकर उस समय भारी खेप सीमा पार कराते हैं जब सुरक्षा बल हिंसा नियंत्रित करने में व्यस्त होते हैं।\n\n2. लोकसभा में पेश रिपोर्ट के अनुसार विभिन्न राज्यों में कितनी नशीली दवाएं जब्त की गईं?\nअसम में 31,706 किग्रा, त्रिपुरा में 46,346 किग्रा और मिजोरम में 2,233 किग्रा ड्रग्स पकड़ी गई, जबकि एक अन्य पूर्वोत्तर राज्य में जब्ती 2,556 किग्रा तक पहुंच गई।\n\n3. म्यांमार दुनिया का सबसे बड़ा अफीम उत्पादक कैसे बना?\nअफगानिस्तान में तालिबान द्वारा अफीम पर पाबंदी लगाने के बाद म्यांमार में उत्पादन बढ़ा और 2025 में इसकी खेती का रकबा 53,100 हेक्टेयर तक पहुंच गया।\n\n4. तस्करी के लिए कौन सा सीमावर्ती मार्ग सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है?\nअधिकारियों के अनुसार भारत और म्यांमार के बीच मोरेह-तामू सीमा पारगमन इस अवैध व्यापार का प्रमुख केंद्र बिंदु है।\n\n5. भारत की सीमा पर कौन सी सुरक्षा एजेंसियां मुख्य रूप से कार्रवाई कर रही हैं?\nनारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो और असम राइफल्स संयुक्त रूप से सीमा पर मादक पदार्थों की बरामदगी के अभियान चला रहे हैं।",
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  "category": "मणिपुर",
  "publishedAt": "2026-10-06",
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    "पूर्वोत्तर ड्रग्स तस्करी",
    "म्यांमार कार्टेल",
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    "मोरेह तामू सीमा"
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