अमेरिकी रोजगार आंकड़ों में नरमी के बीच रुपया संभला, आरबीआई की नीतिगत बैठक पर नजरें टिकीं कमजोर अमेरिकी पेरोल डेटा के बाद फेडरल रिजर्व द्वारा दरें स्थिर रखने की संभावना 82.3 प्रतिशत तक पहुंच गई है, जिससे भारतीय रुपया 96.25 के आसपास स्थिर कारोबार करता दिखा। वैश्विक विदेशी मुद्रा बाजार में अमेरिकी फेडरल रिजर्व द्वारा ब्याज दरों में आक्रामक बढ़ोतरी की संभावनाओं के धीमे पड़ने से भारतीय मुद्रा में सप्ताह की शुरुआत में हल्का सुधार देखा गया है। भारतीय रिजर्व बैंक की आगामी मौद्रिक समीक्षा बैठक से ठीक पहले अमेरिकी डॉलर के मुकाबले घरेलू मुद्रा 96.25 के स्तर के आसपास कारोबार करती नजर आई। डॉलर के मुकाबले विनिमय दर में आई यह स्थिरता अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जोखिम उठाने की क्षमता में हुए सुधार से प्रेरित है, क्योंकि निवेशक अब अमेरिकी केंद्रीय बैंक की ओर से नीतिगत दरों को मौजूदा स्तर पर ही बनाए रखने की उम्मीद कर रहे हैं। हालांकि अमेरिकी बॉन्ड प्रतिफल में बना ऊंचा स्तर और डॉलर की व्यापक मजबूती उभरते बाजारों की मुद्राओं के लिए अब भी सतर्क रहने का संकेत दे रही है। कमजोर अमेरिकी पेरोल डेटा ने बदली बाजार की दिशा अमेरिकी श्रम बाजार से जुड़े हालिया आंकड़ों ने केंद्रीय बैंक के आगामी फैसलों को लेकर व्यापारियों की सोच को काफी हद तक बदल दिया है। सीएमई फेडवॉच टूल के ताजा आंकड़ों के अनुसार, अक्टूबर की नीतिगत बैठक में फेडरल रिजर्व द्वारा ब्याज दरों को यथावत रखने की संभावना बढ़कर 82.3 प्रतिशत हो गई है, जबकि पिछले सप्ताह यह संभावना केवल 35.8 प्रतिशत आंकी जा रही थी। नीतिगत दरों में स्थिरता की यह बढ़ी हुई उम्मीद मुख्य रूप से सितंबर महीने के गैर-कृषि पेरोल आंकड़ों के सामने आने के बाद बनी है, जिसमें रोजगार वृद्धि की गति अनुमान से काफी धीमी दर्ज की गई। अमेरिकी ब्यूरो ऑफ लेबर स्टैटिस्टिक्स द्वारा जारी आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक, सितंबर में अमेरिकी अर्थव्यवस्था में केवल 29 हजार नए रोजगार सृजित हुए। यह आंकड़ा विश्लेषकों के 90 हजार के अनुमान से काफी कमजोर रहा। इसके अतिरिक्त, अगस्त महीने के रोजगार आंकड़ों को भी पूर्व के 162 हजार से संशोधित कर 133 हजार कर दिया गया है। रोजगार के कमजोर सृजन के साथ ही बेरोजगारी दर भी बढ़कर 4.2 प्रतिशत पर पहुंच गई, जबकि बाजार इसके 4.1 प्रतिशत पर स्थिर रहने का अनुमान लगा रहा था। वेतन वृद्धि से जुड़े आंकड़ों ने भी फेड की आक्रामक नीति के ठंडे पड़ने की पुष्टि की है। औसत प्रति घंटा आय में सालाना आधार पर 3 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई, जो अगस्त के 3.1 प्रतिशत के आंकड़े से कम रही। विश्लेषकों का मानना था कि वेतन वृद्धि 3.2 प्रतिशत की तेज गति से आगे बढ़ेगी, लेकिन वास्तविक आंकड़ों ने नीति निर्माताओं पर दरों को तेजी से बढ़ाने का दबाव कुछ कम किया है। अमेरिकी बॉन्ड प्रतिफल और डॉलर इंडेक्स का दबाव बरकरार फेडरल रिजर्व द्वारा ब्याज दरों में बढ़ोतरी की गति धीमी पड़ने की चर्चाओं के बावजूद अमेरिकी बॉन्ड प्रतिफल और अमेरिकी डॉलर का दबदबा बाजार में बना हुआ है। इसके पीछे वैश्विक स्तर पर मुद्रास्फीति के ऊंचे अनुमान और फ्रांस के राजकोषीय जोखिमों से जुड़ी चिंताएं प्रमुख कारण बनी हुई हैं। अमेरिकी 10-वर्षीय ट्रेजरी प्रतिफल मामूली गिरावट के साथ 5.27 प्रतिशत के आसपास बना हुआ है, जो पिछले सप्ताह दर्ज किए गए दो दशक के उच्चतम स्तर 5.34 प्रतिशत से ज्यादा दूर नहीं है। एशियाई कारोबारी सत्र के दौरान छह प्रमुख अंतरराष्ट्रीय मुद्राओं के मुकाबले अमेरिकी मुद्रा की मजबूती को मापने वाला डॉलर इंडेक्स 102.53 के स्तर तक पहुंच गया, जो इस वर्ष का एक नया उच्चतम स्तर है। मजबूत डॉलर और ऊंची बॉन्ड यील्ड के कारण भारतीय रुपये पर अल्पावधि में दबाव लौटने की आशंकाएं पूरी तरह समाप्त नहीं हुई हैं। रिजर्व बैंक के नीतिगत रुख पर विश्लेषकों का आकलन भारतीय रिजर्व बैंक की मौद्रिक नीति समिति की बैठक से पहले वित्तीय संस्थानों का मानना है कि केंद्रीय बैंक फिलहाल दरों में तुरंत बदलाव करने से बच सकता है। एमयूएफजी/बीटीएमयू के विश्लेषकों ने स्पष्ट किया है कि वे आधिकारिक तौर पर आरबीआई द्वारा मौजूदा नीतिगत दरों को यथावत रखने का अनुमान लगा रहे हैं। हालांकि, उन्होंने इस बात पर भी जोर दिया कि केंद्रीय बैंक दिसंबर से ब्याज दरों में बढ़ोतरी का चक्र शुरू कर सकता है, इसलिए नीतिगत दरों का बढ़ना केवल समय की बात है। विश्लेषकों का यह भी मानना है कि इस बात की पूरी संभावना है कि आरबीआई अपने तटस्थ रुख को बदलकर कड़े मौद्रिक रुख का संकेत दे सकता है। भले ही समिति इस बैठक में दरों में कोई तात्कालिक बदलाव न करे, लेकिन भविष्य की दिशा को लेकर नीतिगत रुख में सख्ती का स्पष्ट संकेत दिया जा सकता है। तकनीकी स्तर और चार्ट विश्लेषण तकनीकी चार्ट पर यूएसडी/आईएनआर जोड़ी के लिए निकटतम समर्थन 50-दिवसीय घातीय चलती औसत पर 95.59 के स्तर पर मौजूद है। यदि विनिमय दर में कोई तेज गिरावट आती है, तो इस स्तर पर परीक्षण देखने को मिल सकता है, जिसके टूटने पर ही मुद्रा जोड़ी में बड़ी कमजोरी की गुंजाइश बनेगी। इसके विपरीत, ऊपर की ओर यह जोड़ी 97.00 के अपने सर्वकालिक उच्च स्तर को दोबारा छूने की दिशा में बढ़ सकती है। लाइव बाजार आंकड़ों के अनुसार, यूएसडी/आईएनआर 96.25 के स्तर पर बना हुआ है, जो पिछले बंद 96.22 से 0.03 प्रतिशत की मामूली बढ़त दर्शाता है। इसका 52-सप्ताह का दायरा 85.86 से 97.05 के बीच रहा है। दैनिक तकनीकी संकेतकों में 14-दिवसीय आरएसआई 58 पर स्थित है, जबकि एमएसीडी 0.22 पर अपने सिग्नल 0.17 के मुकाबले 0.05 के हिस्टोग्राम के साथ सकारात्मक रुझान दिखा रहा है। चलती औसत के मोर्चे पर, ईएमए 20 95.79, ईएमए 50 95.57 और ईएमए 200 93.59 पर है, जबकि एसएमए 50 95.46 और एसएमए 200 93.91 पर स्थित है। लंबी अवधि में ईएमए 50 का ईएमए 200 से ऊपर रहना गोल्डन क्रॉस की पुष्टि करता है। 20-दिवसीय बोलिंजर बैंड 94.78 से 96.67 के बीच फैले हैं और मध्य रेखा 95.72 पर है। एडीएक्स 30 पर एक सक्रिय प्रवृत्ति का संकेत दे रहा है, जबकि स्टोकेस्टिक की फास्ट लाइन 91 और सिग्नल लाइन 86 पर है। औसत वास्तविक सीमा 0.54 पर दर्ज की गई है। पिवट बिंदु 96.26 पर है, जिसमें पहला प्रतिरोध 96.31 और दूसरा 96.37 पर है, जबकि पहला समर्थन 96.20 और दूसरा 96.15 पर स्थित है। भारतीय रुपये को प्रभावित करने वाले वृहद आर्थिक कारक भारतीय रुपया विदेशी कारकों के प्रति संवेदनशील मुद्राओं में से एक माना जाता है। भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए कच्चे तेल के आयात पर बहुत अधिक निर्भर है, जिसके चलते तेल की अंतरराष्ट्रीय कीमतें सीधे तौर पर व्यापार संतुलन और रुपये के मूल्य को प्रभावित करती हैं। इसके अतिरिक्त, अधिकांश वैश्विक व्यापार अमेरिकी डॉलर में होने के कारण डॉलर के मूल्य में उतार-चढ़ाव और विदेशी पोर्टफोलियो निवेश का प्रवाह भी घरेलू मुद्रा के स्तर को तय करने में अहम भूमिका निभाते हैं। भारतीय रिजर्व बैंक विनिमय दर में अत्यधिक अस्थिरता को रोकने और विदेशी व्यापार को सुचारू बनाए रखने के लिए समय-समय पर विदेशी मुद्रा बाजार में हस्तक्षेप करता है। केंद्रीय बैंक ब्याज दरों के माध्यम से मुद्रास्फीति को अपने 4 प्रतिशत के लक्ष्य के आसपास सीमित रखने का प्रयास करता है। सामान्य परिस्थितियों में उच्च ब्याज दरें रुपये को मजबूती प्रदान करती हैं, क्योंकि यह विदेशी निवेशकों को कैरी ट्रेड का लाभ उठाने के लिए आकर्षित करती हैं। कैरी ट्रेड के तहत वैश्विक निवेशक कम ब्याज दर वाले देशों से उधार लेकर भारत जैसे अपेक्षाकृत अधिक रिटर्न देने वाले बाजारों में पूंजी लगाते हैं। रुपये के मूल्य निर्धारण में सकल घरेलू उत्पाद की वृद्धि दर, व्यापार घाटा और प्रत्यक्ष विदेशी निवेश एवं विदेशी संस्थागत निवेश का प्रवाह भी निर्णायक होते हैं। यदि देश की जीडीपी वृद्धि दर मजबूत रहती है, तो यह विदेशी पूंजी को आकर्षित करती है जिससे रुपये की मांग बढ़ती है। व्यापार संतुलन में सुधार से भी मुद्रा को सहारा मिलता है। वास्तविक ब्याज दरें, जो कि मुद्रास्फीति घटाने के बाद मिलने वाला शुद्ध रिटर्न हैं, सकारात्मक रहने पर घरेलू मुद्रा के पक्ष में काम करती हैं। वैश्विक स्तर पर जोखिम लेने का माहौल बनने से विदेशी निवेश का प्रवाह सुधरता है, जिससे रुपये को सीधा लाभ होता है। इसके विपरीत, यदि घरेलू मुद्रास्फीति प्रतिस्पर्धी अर्थव्यवस्थाओं की तुलना में अधिक बनी रहती है, तो यह मुद्रा के अवमूल्यन का कारण बनती है। उच्च महंगाई के कारण निर्यात की लागत बढ़ जाती है और महंगे आयातों के भुगतान के लिए अधिक रुपये बेचने पड़ते हैं, जिससे विनिमय दर कमजोर होती है। हालांकि, महंगाई बढ़ने पर यदि आरबीआई नीतिगत दरों में बढ़ोतरी करता है, तो विदेशी निवेशकों की ओर से बढ़ती मांग के चलते मुद्रा को कुछ सहारा भी मिल सकता है। वैश्विक मुद्राओं और अन्य परिसंपत्तियों की स्थिति अंतरराष्ट्रीय मुद्रा बाजार में केवल भारतीय रुपया ही नहीं, बल्कि कई अन्य प्रमुख संपत्तियां भी अमेरिकी डॉलर की चाल से प्रभावित हो रही हैं। ऑस्ट्रेलियाई डॉलर बनाम अमेरिकी डॉलर में देर के एशियाई कारोबार में बिकवाली देखी गई और यह जोड़ी 0.6900 के स्तर की ओर फिसल गई। मध्य पूर्व और रूस-यूक्रेन के बीच जारी भू-राजनीतिक तनाव और डॉलर की निरंतर मजबूती ने इस जोड़ी पर दबाव बनाए रखा है, जहां निवेशकों की नजरें अब कच्चे तेल की कीमतों, बॉन्ड यील्ड और ऑस्ट्रेलियाई रिजर्व बैंक के कदमों पर टिकी हैं। जापानी येन के मुकाबले अमेरिकी डॉलर 158.00 के स्तर को दोबारा हासिल करने में कामयाब रहा और पिछले एक सप्ताह के सीमित दायरे में कारोबार करता दिखा। फेडरल रिजर्व की ओर से दर वृद्धि की घटती उम्मीदों के बावजूद भू-राजनीतिक अनिश्चितता डॉलर को सहारा दे रही है, हालांकि बैंक ऑफ जापान की संभावित सख्ती और बाजार में प्रत्यक्ष हस्तक्षेप के जोखिम के कारण येन में आगे बड़ी गिरावट सीमित रह सकती है। कमोडिटी बाजार में सोने की कीमतें एशियाई सत्र में मामूली बढ़त के बाद 4,150 डॉलर प्रति औंस के ठीक नीचे लगभग स्थिर रुख के साथ कारोबार करती दिखीं। अमेरिकी रोजगार के कमजोर आंकड़ों के बावजूद डॉलर की व्यापक मजबूती ने सोने की बढ़त को सीमित कर रखा है, यद्यपि फेड की ओर से अक्टूबर में दर वृद्धि की संभावना घटने से सोने को निचले स्तरों पर सहारा मिल रहा है। दूसरी ओर, यूरो बनाम अमेरिकी डॉलर मई 2025 के बाद के अपने सबसे निचले स्तर तक गिर गया है। यह जोड़ी 1.1312 के स्तर तक लुढ़क चुकी है, जो जनवरी के 1.2082 के शिखर से काफी नीचे है। यूरोप में ऊर्जा कीमतों के बढ़ने की आशंका और व्यापक डॉलर मजबूती यूरो पर भारी दबाव बना रही है। इसका आप पर असर अमेरिकी रोजगार आंकड़ों में नरमी और रुपये में स्थिरता से भारतीय उपभोक्ताओं, आयातकों और विदेशी यात्रियों को तात्कालिक राहत मिल सकती है। • भारत में: विनिमय दर में स्थिरता आने से कच्चे तेल और इलेक्ट्रॉनिक्स के आयात बिल पर दबाव कुछ कम होगा। इससे आने वाले हफ्तों में घरेलू स्तर पर आयातित महंगाई को नियंत्रित रखने में मदद मिलेगी। • विदेशी यात्रियों और छात्रों के लिए: डॉलर के 96.25 के आसपास स्थिर होने से विदेश में पढ़ाई और यात्रा का बजट फिलहाल अनियंत्रित नहीं होगा। छात्रों को ट्यूशन फीस और रहने के खर्च के लिए डॉलर खरीदते समय अत्यधिक उतार-चढ़ाव का सामना नहीं करना पड़ेगा। • निवेशकों और व्यापारियों के लिए: फेड द्वारा ब्याज दरें न बढ़ाने की संभावना से इक्विटी बाजार में विदेशी पूंजी की निकासी थम सकती है। मुद्रा बाजार के व्यापारी 95.59 से 97.00 के दायरे में तकनीकी स्तरों पर नजर रखकर अपने सौदे प्रबंधित कर सकते हैं। • आम उपभोक्ताओं के लिए: आरबीआई द्वारा नीतिगत दरें स्थिर रखे जाने की संभावना से बैंक ऋणों की ईएमआई में तुरंत कोई बढ़ोतरी नहीं होगी। यदि महंगाई नियंत्रित रहती है तो खुदरा उपभोक्ताओं पर अतिरिक्त वित्तीय बोझ नहीं पड़ेगा। ऐसा क्यों हुआ भारतीय रुपये में यह मामूली सुधार अमेरिकी श्रम बाजार के कमजोर आंकड़ों और उसके बाद फेडरल रिजर्व द्वारा ब्याज दरें न बढ़ाने की बढ़ती संभावनाओं के कारण देखने को मिला है। • अमेरिकी रोजगार आंकड़ों में गिरावट: अमेरिकी श्रम विभाग के अनुसार सितंबर में केवल 29 हजार नए रोजगार जुड़े, जो 90 हजार के अनुमान से काफी कम थे। रोजगार वृद्धि धीमी पड़ने और बेरोजगारी दर 4.2 प्रतिशत होने से आक्रामक मौद्रिक सख्ती की जरूरत कम हो गई। • फेड नीतिगत अपेक्षाओं में बदलाव: कमजोर आर्थिक आंकड़ों के बाद अक्टूबर की बैठक में फेडरल रिजर्व द्वारा दरें स्थिर रखने की संभावना 35.8 प्रतिशत से उछलकर 82.3 प्रतिशत हो गई। अमेरिकी दरों में ठहराव की उम्मीद ने जोखिम भरी परिसंपत्तियों और उभरते बाजारों की मुद्राओं को सहारा दिया। • डॉलर और बॉन्ड यील्ड का दबाव: हालांकि डॉलर इंडेक्स 102.53 के वार्षिक उच्च स्तर पर रहा और अमेरिकी 10-वर्षीय यील्ड 5.27 प्रतिशत के आसपास बनी रही। वैश्विक मुद्रास्फीति चिंताओं और फ्रांसीसी राजकोषीय जोखिमों ने रुपये की बड़ी बढ़त को सीमित रखा। • आरबीआई बैठक का इंतजार: भारतीय रिजर्व बैंक की मौद्रिक नीति बैठक से पहले बाजार सतर्क है, जहां दरें यथावत रहने की उम्मीद के बीच भविष्य में सख्त रुख का संकेत मिलने की संभावना है। सवाल-जवाब 1. सप्ताह की शुरुआत में भारतीय रुपये में क्या बदलाव देखा गया? अमेरिकी फेडरल रिजर्व द्वारा ब्याज दरों में बढ़ोतरी की संभावना घटने से रुपया अमेरिकी डॉलर के मुकाबले हल्का सुधरकर 96.25 के स्तर पर आ गया। 2. अमेरिकी रोजगार आंकड़ों में क्या गिरावट दर्ज की गई? सितंबर में अमेरिकी अर्थव्यवस्था में केवल 29 हजार नए रोजगार सृजित हुए, जो 90 हजार के अनुमान से काफी कम रहे और बेरोजगारी दर बढ़कर 4.2 प्रतिशत हो गई। 3. फेडरल रिजर्व की आगामी नीतिगत बैठक को लेकर बाजार का क्या अनुमान है? सीएमई फेडवॉच टूल के अनुसार, अक्टूबर में फेडरल रिजर्व द्वारा ब्याज दरों को स्थिर रखने की संभावना बढ़कर 82.3 प्रतिशत हो गई है। 4. आरबीआई की मौद्रिक नीति बैठक से विश्लेषकों को क्या उम्मीदें हैं? एमयूएफजी के विश्लेषकों का मानना है कि आरबीआई फिलहाल दरें स्थिर रखेगा, लेकिन अपने रुख में सख्ती का संकेत देते हुए दिसंबर से बढ़ोतरी शुरू कर सकता है। 5. यूएसडी/आईएनआर जोड़ी के लिए प्रमुख तकनीकी स्तर कौन से हैं? नीचे की तरफ 50-दिवसीय ईएमए 95.59 पर मजबूत समर्थन स्तर है, जबकि ऊपर की ओर विनिमय दर 97.00 के अपने सर्वकालिक उच्च स्तर की ओर बढ़ सकती है। https://trendkia.com/market/ameriki-rojagara-ankaron-men-narami-ke-bicha-rupee-snbhala-rbi-ki-nitigata-baithaka-para-najaren-tikin-43094 TrendKia — Har trend, sabse pehle.