अमेरिकी रोजगार आंकड़ों से पहले यूरो में तेज गिरावट, डॉलर के सामने 1.1235 के करीब फिसली यूरोपीय मुद्रा फ्रांस के वित्तीय संकट और फेडरल रिजर्व के आक्रामक ब्याज दर रुख के बीच अमेरिकी डॉलर मजबूत हुआ है, जिससे यूरो लुढ़ककर 1.1235 के स्तर तक पहुंच गया। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा बाजार में शुक्रवार के एशियाई कारोबारी सत्र के दौरान यूरो में भारी कमजोरी दर्ज की गई और यूरोपीय मुद्रा अमेरिकी डॉलर के मुकाबले फिसलकर 1.1235 के स्तर के आसपास आ गई। यूरोपीय साझा मुद्रा पर कई मोर्चों से दबाव बना हुआ है, जिसमें फ्रांस के बढ़ते वित्तीय घाटे को लेकर चिंताएं और अमेरिकी फेडरल रिजर्व के अधिकारियों की ओर से ब्याज दरों में आगे और बढ़ोतरी के सख्त संकेत शामिल हैं। इसके साथ ही अमेरिकी ट्रेजरी बॉन्ड यील्ड में लगातार हो रही वृद्धि ने अमेरिकी डॉलर को व्यापक मजबूती प्रदान की है, जिससे प्रमुख मुद्रा जोड़े पर मंदी के बादल गहरे हो गए हैं। निवेशक और ट्रेडर्स अब पूरी तरह से शुक्रवार को जारी होने वाले अमेरिका के सितंबर महीने के नॉनफार्म पेरोल रोजगार आंकड़ों पर नजरें टिकाए हुए हैं, जो वैश्विक मौद्रिक नीतियों और ब्याज दरों की दिशा तय करने में निर्णायक भूमिका निभा सकते हैं। फेडरल रिजर्व के सख्त तेवर और ब्याज दरों में बढ़ोतरी की आशंका अमेरिकी केंद्रीय बैंक फेडरल रिजर्व के नीति-निर्माताओं के बयानों ने वैश्विक वित्तीय बाजारों में हलचल बढ़ा दी है। डलास फेड की अध्यक्ष लोरी लोगन ने स्पष्ट किया कि केंद्रीय बैंक को अपनी मौद्रिक नीति को मामूली रूप से सख्त स्तर पर ले जाने के लिए अल्पकालिक उधारी लागत में कम से कम 50 आधार अंक यानी 50 बेसिस पॉइंट्स या उससे अधिक की बढ़ोतरी करने की आवश्यकता होगी। उनका मानना है कि मुद्रास्फीति को फेड के दो प्रतिशत के वार्षिक लक्ष्य तक सफलतापूर्वक वापस लाने के लिए यह कदम अनिवार्य है। लोगन ने कहा कि वर्तमान आर्थिक नीतियां अभी तक पूरी तरह से प्रतिबंधात्मक दायरे में नहीं पहुंची हैं, खासकर जब अर्थव्यवस्था का विस्तार तेज बना हुआ है और श्रम बाजार संतुलित स्थिति में है। उन्होंने संकेत दिया कि हालांकि अंतिम टर्मिनल दर को लेकर अनिश्चितता बनी हुई है, फिर भी ब्याज दरों में आगे कई बढ़ोतरी की गुंजाइश बरकरार है। बाजार के विश्लेषकों का ध्यान इस बात पर भी गया है कि दीर्घावधि ट्रेजरी यील्ड में बढ़ोतरी आंशिक रूप से बढ़ते टर्म प्रीमियम को दर्शा सकती है, जो अतिरिक्त सख्ती की जरूरत को कुछ हद तक सीमित करती है। इसके बावजूद 50 बेसिस पॉइंट्स की न्यूनतम दर वृद्धि की खुली मांग ने डॉलर के पक्ष में आक्रामक माहौल तैयार किया है। शिकागो मर्केंटाइल एक्सचेंज के फेडवॉच टूल के ताजा आंकड़ों के मुताबिक, वित्तीय बाजार अक्टूबर महीने में फेड द्वारा ब्याज दर बढ़ाने की 24.9 प्रतिशत संभावना देख रहे हैं, जबकि दिसंबर की बैठक में दर वृद्धि की संभावना बढ़कर लगभग 79.4 प्रतिशत तक पहुंच चुकी है। यह साफ तौर पर दर्शाता है कि उधारी दरों में तत्काल कटौती की उम्मीदें अब पूरी तरह से खत्म हो चुकी हैं और नीतिगत सख्ती का दौर लंबा खिंच सकता है। अमेरिकी रोजगार रिपोर्ट पर टिकीं बाजार की निगाहें वैश्विक मुद्रा कारोबारी अब अमेरिका के सितंबर रोजगार आंकड़ों की प्रतीक्षा कर रहे हैं, जो अमेरिकी ब्याज दर परिदृश्य के लिए सबसे बड़ा उत्प्रेरक साबित होंगे। बाजार के अनुमानों के अनुसार, सितंबर में अमेरिकी अर्थव्यवस्था में नॉनफार्म पेरोल के तहत 90,000 नई नौकरियों के जुड़ने की उम्मीद है। इसी अवधि के दौरान अमेरिका की बेरोजगारी दर 4.1 प्रतिशत पर स्थिर रहने का अनुमान लगाया गया है। यदि लेबर मार्केट के आंकड़े उम्मीद से अधिक मजबूत आते हैं, तो यह फेडरल रिजर्व को और अधिक आक्रामक रुख अपनाने की छूट देगा, जिससे डॉलर इंडेक्स को और अधिक पंख लगेंगे। इसके विपरीत, यदि रोजगार आंकड़ों में किसी भी तरह की सुस्ती या कमजोरी के संकेत मिलते हैं, तो डॉलर में मुनाफावसूली देखने को मिल सकती है, जिससे यूरो और अन्य प्रमुख वैश्विक मुद्राओं को गिरावट से उबरने में फौरी राहत मिल सकती है। रैबोबैंक का विश्लेषण और युद्ध के बाद का वैश्विक परिदृश्य रैबोबैंक के विश्लेषकों ने वैश्विक मुद्रा प्रवाह का गहन अध्ययन करते हुए रेखांकित किया है कि अमेरिकी डॉलर के हालिया मजबूत प्रदर्शन के पीछे सबसे बड़ा कारण फेड की मौद्रिक नीति को लेकर बाजार की उम्मीदों में आया बड़ा बदलाव है। शुरुआत में जहां वित्तीय बाजार फेड द्वारा नीतिगत नरमी और ब्याज दरों में कटौती की उम्मीद कर रहे थे, वहीं अब परिदृश्य पूरी तरह बदलकर नीतिगत सख्ती की ओर झुक चुका है। इसी बदलाव ने गर्मियों के महीनों और पिछले महीने में डॉलर को जोरदार उछाल दिया है। इसके अलावा, ईरान युद्ध शुरू होने के बाद से यूरो का सुस्त और कमजोर प्रदर्शन भी यूरो-डॉलर जोड़ी में लगातार गिरावट का बड़ा कारण बना हुआ है। विश्लेषकों का कहना है कि वर्ष 2025 के शुरुआती दौर में यूरोपीय साझा मुद्रा के आकर्षण ने अमेरिकी डॉलर से निवेशकों की पूंजी बाहर खींचने में अहम भूमिका निभाई थी। लेकिन ईरान युद्ध के भड़कने के बाद परिस्थितियां पूरी तरह बदल गईं। यूरोपीय सेंट्रल बैंक के सख्त और आक्रामक रुख अपनाने के बावजूद यूरो उस नीतिगत मजबूती का लाभ उठाने में पूरी तरह नाकाम साबित हुआ है। मुद्रा बाजार में यूरोपीय मुद्रा की इस लाचारी ने निवेशकों को सुरक्षित ठिकाने के रूप में अमेरिकी डॉलर की ओर भागने पर मजबूर किया है, जिसके चलते यूरो लगातार बिकवाली के दबाव में पिस रहा है। यूरो-डॉलर का तकनीकी विश्लेषण और अहम स्तर दैनिक तकनीकी चार्ट पर नजर डालें तो यूरो-डॉलर जोड़ी बोलिंगर बैंड्स (20, 2) के मध्य बैंड और 100-दिवसीय सिंपल मूविंग एवरेज के काफी नीचे फिसल चुकी है। यह तकनीकी संरचना निकट अवधि में एक बेहद मजबूत मंदी के रुख की पुष्टि करती है, जहां ऊपर की ओर कई स्तरों पर भारी प्रतिरोध बना हुआ है। वर्तमान में स्पॉट भाव 1.12 के पास है और बोलिंगर के निचले बैंड के बेहद करीब कारोबार कर रहा है। 14-दिवसीय रिलेटिव स्ट्रेंथ इंडेक्स 17.21 पर आ चुका है, जो गहरे ओवरसोल्ड जोन में स्थित है। यह तकनीकी स्थिति संकेत देती है कि यद्यपि नीचे की ओर बिकवाली का दबाव अत्यंत तीव्र है, फिर भी अत्यधिक बिकवाली के चलते किसी भी समय सुधारात्मक तकनीकी उछाल की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। चार्ट पर प्रतिरोध स्तरों की बात करें तो पहला बड़ा प्रतिरोध बोलिंगर मध्य बैंड के पास 1.1460 के स्तर पर है। इसके बाद 100-दिवसीय एसएमए लगभग 1.1515 पर दूसरा अवरोध पेश करेगा। यदि यूरो में कोई बड़ा सुधार आता है, तो ऊपरी सीमा बोलिंगर अपर बैंड के पास 1.1705 पर स्थित है, जहां बिकवाली का भारी दबाव फिर से सक्रिय हो सकता है। दूसरी तरफ, नीचे की ओर तात्कालिक मजबूत सपोर्ट बोलिंगर लोअर बैंड यानी 1.1215 के स्तर पर बना हुआ है। यदि यह सपोर्ट स्तर टूटता है, तो मंदी का रुझान और अधिक गहरा जाएगा और गिरावट का नया दौर शुरू हो सकता है। वहीं, जब तक यूरो 1.1215 के ऊपर टिके रहने में कामयाब रहता है, तब तक कीमतों में कुछ समय के लिए ठहराव और सीमित दायरे में कंसॉलिडेशन देखने को मिल सकता है। लाइव मार्केट आंकड़ों के अनुसार, इस मुद्रा जोड़े का 52-सप्ताह का दायरा 1.12 से 1.20 के बीच बना हुआ है और वर्तमान स्तर 52-सप्ताह के निचले आधार के बिल्कुल करीब आ चुके हैं। यूरोपीय संघ की अर्थव्यवस्था और मुद्रा प्रबंधन की व्यवस्था यूरो यूरोपीय संघ के 20 सदस्य देशों की आधिकारिक मुद्रा है, जो सामूहिक रूप से यूरोजोन कहलाते हैं। यह अमेरिकी डॉलर के बाद दुनिया की दूसरी सबसे अधिक कारोबार की जाने वाली वैश्विक मुद्रा है। वर्ष 2022 के आंकड़ों के मुताबिक, दुनिया भर के सभी विदेशी मुद्रा लेन-देन में यूरो की हिस्सेदारी 31 प्रतिशत थी, जिसका औसत दैनिक कारोबार 2.2 ट्रिलियन डॉलर से अधिक था। वित्तीय बाजारों में यूरो-डॉलर दुनिया का सबसे सक्रिय और बड़ा करेंसी पेयर है, जिसकी कुल वैश्विक फॉरेक्स ट्रेडिंग में लगभग 30 प्रतिशत हिस्सेदारी है। इसके बाद यूरो-जापानी येन की हिस्सेदारी 4 प्रतिशत, यूरो-ब्रिटिश पाउंड की हिस्सेदारी 3 प्रतिशत और यूरो-ऑस्ट्रेलियाई डॉलर की हिस्सेदारी लगभग 2 प्रतिशत आंकी गई है। जर्मनी के फ्रैंकफर्ट में स्थित यूरोपीय सेंट्रल बैंक यानी ईसीबी पूरे यूरोजोन का केंद्रीय बैंक है। ईसीबी ही ब्याज दरें तय करता है और पूरी मौद्रिक नीति का संचालन करता है। ईसीबी का प्राथमिक दायित्व मूल्य स्थिरता बनाए रखना है, जिसका सीधा अर्थ मुद्रास्फीति को नियंत्रित करना या जरूरत पड़ने पर आर्थिक विकास को गति देना है। इसके लिए उसका सबसे बड़ा उपकरण ब्याज दरों में कटौती या बढ़ोतरी करना होता है। ऐतिहासिक रूप से जब यूरोजोन में ब्याज दरें ऊंची होती हैं या उनके बढ़ने की उम्मीद होती है, तो यूरो को मजबूती मिलती है क्योंकि वैश्विक निवेशक ऊंचे रिटर्न की तलाश में पूंजी यहां लगाते हैं। ईसीबी की गवर्निंग काउंसिल साल में आठ बार बैठक करके मौद्रिक नीतियों पर अंतिम फैसला लेती है। इन बैठकों में यूरोजोन के राष्ट्रीय केंद्रीय बैंकों के प्रमुख और छह स्थायी सदस्य शामिल होते हैं, जिनकी अध्यक्षता ईसीबी अध्यक्ष क्रिस्टीन लेगार्ड करती हैं। मुद्रास्फीति, आर्थिक आंकड़े और ट्रेड बैलेंस का प्रभाव यूरो की सेहत का आकलन करने के लिए हार्मोनाइज्ड इंडेक्स ऑफ कंज्यूमर प्राइसेज द्वारा मापी जाने वाली यूरोजोन मुद्रास्फीति सबसे महत्वपूर्ण पैमाना मानी जाती है। यदि महंगाई दर उम्मीद से अधिक बढ़ती है और ईसीबी के 2 प्रतिशत के लक्ष्य से ऊपर निकल जाती है, तो ईसीबी को इसे काबू में करने के लिए ब्याज दरों में इजाफा करना पड़ता है। इसके अलावा जीडीपी वृद्धि दर, मैन्युफैक्चरिंग और सर्विसेज पीएमआई, बेरोजगारी दर और उपभोक्ता धारणा सर्वेक्षण जैसे प्रमुख आर्थिक आंकड़े भी सीधे तौर पर यूरो की चाल तय करते हैं। एक मजबूत अर्थव्यवस्था यूरो को सहारा देती है क्योंकि यह विदेशी निवेश को आकर्षित करती है और ईसीबी को ब्याज दरें ऊंची बनाए रखने का हौसला देती है। इसके विपरीत, कमजोर आर्थिक आंकड़े यूरो में गिरावट लाते हैं। यूरोजोन की चार सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाएं जर्मनी, फ्रांस, इटली और स्पेन हैं, जो अकेले पूरे यूरोजोन की अर्थव्यवस्था का 75 प्रतिशत हिस्सा बनाती हैं। इसलिए इन चार देशों से आने वाले आंकड़े बाजार के लिए सबसे संवेदनशील होते हैं। यूरो के लिए एक अन्य निर्णायक संकेतक यूरोजोन का व्यापार संतुलन यानी ट्रेड बैलेंस है। यह पैमाना एक निश्चित समयावधि के दौरान किसी क्षेत्र द्वारा निर्यात से की गई कुल कमाई और आयात पर किए गए कुल खर्च के बीच के अंतर को मापता है। यदि यूरोजोन में तैयार होने वाले उत्पादों और सेवाओं की वैश्विक स्तर पर भारी मांग होती है, तो विदेशी खरीदारों को उन वस्तुओं को खरीदने के लिए यूरो हासिल करना पड़ता है, जिससे मुद्रा की मांग और मूल्य दोनों बढ़ते हैं। इस प्रकार, एक सकारात्मक नेट ट्रेड बैलेंस मुद्रा को ठोस सहारा देता है, जबकि व्यापार घाटा या नकारात्मक बैलेंस मुद्रा की आंतरिक कीमत को कमजोर करता है। फ्रांस के बिगड़ते वित्तीय बजट और घाटे ने ठीक यही चिंता पैदा की है, जिससे यूरोजोन के वित्तीय संतुलन को लेकर सवाल उठ रहे हैं। अन्य वैश्विक संपत्तियों और मुद्राओं का ताजा हाल अमेरिकी डॉलर के बहु-महीने के उच्च स्तर पर बने रहने के कारण शुक्रवार के एशियाई सत्र में केवल यूरो ही नहीं, बल्कि अन्य प्रमुख मुद्राओं और कीमती धातुओं में भी दबाव देखा गया। ऑस्ट्रेलियाई डॉलर और अमेरिकी डॉलर की जोड़ी नए बिकवाली दबाव के चलते 0.6900 के स्तर की ओर खिसक गई, जो जुलाई की शुरुआत के बाद का इसका सबसे निचला स्तर है। कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों के कारण पैदा हुई महंगाई की चिंताओं ने डॉलर को 17 महीने के उच्च स्तर के करीब बनाए रखा है, जिससे ऑस्ट्रेलियाई डॉलर पर दबाव गहरा गया। दूसरी ओर, अमेरिकी डॉलर और जापानी येन की जोड़ी 158.00 के स्तर के पास कंसॉलिडेट होती नजर आई, जो इसके साप्ताहिक दायरे का ऊपरी छोर है। टोक्यो में उपभोक्ता मूल्य सूचकांक के आंकड़े अनुमान से अधिक गर्म रहने के बाद भी येन में सीमित हलचल रही, हालांकि इन आंकड़ों से बैंक ऑफ जापान द्वारा दरें बढ़ाने की संभावनाओं को बल मिला है। इस बीच, कच्चे तेल जनित महंगाई और भू-राजनीतिक अनिश्चितताओं के बीच सुरक्षित निवेश के रूप में डॉलर को मजबूती मिलती रही। कीमती धातु बाजार में सोना एशियाई सत्र के दौरान 4,150 डॉलर प्रति औंस के करीब सीमित दायरे में कारोबार करता दिखा। निवेशक अमेरिकी पेरोल रिपोर्ट के इंतजार में हैं, जो तय करेगी कि गैर-उपज वाले सोने और मजबूत डॉलर के बीच आगामी दिनों में पलड़ा किसका भारी रहेगा। इसका आप पर असर यूरो में कमजोरी और अमेरिकी डॉलर की बढ़ती मजबूती से अंतरराष्ट्रीय व्यापार, विदेश यात्रा और आयात लागत पर सीधा असर पड़ेगा। • भारतीय आयातकों और उपभोक्ताओं पर असर: मजबूत अमेरिकी डॉलर के कारण कच्चे तेल और इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों का आयात महंगा हो सकता है। इससे घरेलू बाजार में आयातित वस्तुओं की कीमतें बढ़ने और मुद्रास्फीति का दबाव बनने की संभावना है। • यूरोप यात्रा और पढ़ाई का खर्च: यूरो में आई इस गिरावट से यूरोजोन देशों की यात्रा करने वाले पर्यटकों और वहां पढ़ रहे भारतीय छात्रों को राहत मिलेगी। यूरो के कमजोर होने से भारतीय रुपये के मुकाबले यूरोपीय खर्च और कॉलेज ट्यूशन फीस में मामूली बचत संभव है। • वैश्विक निवेशकों और फॉरेक्स ट्रेडर्स के लिए: यूरो-डॉलर जोड़ी 17 के आरएसआई के साथ अत्यधिक ओवरसोल्ड जोन में पहुंच चुकी है। शॉर्ट टर्म ट्रेडर्स के लिए यह स्तर गिरावट पर मुनाफावसूली या तकनीकी सुधार पर नजर रखने का मौका देता है। • निर्यातकों के लिए कारोबारी समीकरण: यूरोप को निर्यात करने वाली भारतीय कंपनियों के मार्जिन पर नकारात्मक असर पड़ सकता है क्योंकि यूरोपीय खरीदारों के लिए आयात महंगा हो जाता है। दूसरी ओर, अमेरिका को डॉलर में माल भेजने वाले आईटी और फार्मा निर्यातकों को मजबूत डॉलर से बेहतर रिटर्न मिल सकता है। ऐसा क्यों हुआ यूरो में आई इस ताजा गिरावट के पीछे फ्रांस की वित्तीय चुनौतियां, अमेरिकी केंद्रीय बैंक का कड़ा रुख और ऊर्जा संकट से उपजी महंगाई मुख्य कारण हैं। • फ्रांस के वित्तीय बजट को लेकर चिंताएं: फ्रांस के सार्वजनिक ऋण और राजकोषीय घाटे को लेकर निवेशकों में गहरा अविश्वास पैदा हो गया है। सरकार की उधारी और खर्च की अनिश्चित दिशा ने यूरोजोन की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था की साख को प्रभावित किया है। • फेडरल रिजर्व की ओर से सख्त मौद्रिक नीति के संकेत: डलास फेड की अध्यक्ष लोरी लोगन ने दरों में कम से कम 50 बेसिस पॉइंट्स की और बढ़ोतरी की जरूरत बताई है। इस सख्त रुख ने बाजार में फेड द्वारा दरों में कटौती की सभी उम्मीदों को पूरी तरह समाप्त कर दिया है। • ईरान युद्ध और तेल की ऊंची कीमतें: पश्चिम एशिया में संघर्ष शुरू होने के बाद ऊर्जा कीमतों में उछाल आया है जिसने वैश्विक स्तर पर महंगाई की चिंताएं बढ़ा दी हैं। ईसीबी द्वारा ब्याज दरों को लेकर आक्रामक रुख अपनाने के बावजूद भू-राजनीतिक संकट ने यूरो के आकर्षण को सीमित कर दिया है। • यूएस ट्रेजरी बॉन्ड यील्ड में लगातार उछाल: अमेरिकी सरकारी बॉन्ड पर मिलने वाले रिटर्न में बढ़ोतरी के कारण वैश्विक पूंजी सुरक्षित संपत्ति के रूप में डॉलर की ओर मुड़ गई है। बॉन्ड यील्ड में बढ़त ने डॉलर इंडेक्स को 17 महीने के उच्चतम स्तर के करीब बनाए रखा है। सवाल-जवाब 1. एशियाई कारोबारी सत्र में यूरो गिरकर किस स्तर पर पहुंच गया? शुक्रवार के एशियाई सत्र में यूरो डॉलर के मुकाबले फिसलकर 1.1235 के करीब आ गया। 2. फेडरल रिजर्व की अधिकारी लोरी लोगन ने ब्याज दरों पर क्या कहा? उन्होंने कहा कि मुद्रास्फीति को 2% के लक्ष्य पर लाने के लिए ब्याज दरों में कम से कम 50 आधार अंक या उससे अधिक की बढ़ोतरी जरूरी है। 3. अमेरिकी श्रम विभाग के सितंबर आंकड़ों से क्या उम्मीदें हैं? नॉनफार्म पेरोल में 90,000 नई नौकरियों के जुड़ने और बेरोजगारी दर 4.1% पर स्थिर रहने का अनुमान है। 4. तकनीकी चार्ट पर यूरो-डॉलर के लिए मुख्य सपोर्ट और रेजिस्टेंस स्तर क्या हैं? तात्कालिक सपोर्ट 1.1215 के बोलिंगर लोअर बैंड पर है, जबकि पहला बड़ा रेजिस्टेंस 1.1460 के बोलिंगर मिडिल बैंड पर स्थित है। 5. वैश्विक विदेशी मुद्रा कारोबार में यूरो की कुल कितनी हिस्सेदारी है? वर्ष 2022 के आंकड़ों के अनुसार, कुल वैश्विक मुद्रा लेन-देन में यूरो की हिस्सेदारी 31% थी, जिसमें दैनिक कारोबार 2.2 ट्रिलियन डॉलर से अधिक रहा। https://trendkia.com/market/ameriki-rojagara-ankaron-se-pahale-euro-men-teja-giravata-us-dollar-ke-samane-1-1235-ke-kariba-phisali-yuropiya-mudra-41629 TrendKia — Har trend, sabse pehle.