दलाल स्ट्रीट पर भारी बिकवाली से सेंसेक्स 1247 अंक फिसला, निफ्टी 23100 के नीचे कमजोर वैश्विक संकेतों, बढ़ती अमेरिकी बॉन्ड यील्ड और कच्चे तेल में उछाल के चलते भारतीय शेयर बाजार में भारी गिरावट दर्ज की गई, जिससे सेंसेक्स 73580 और निफ्टी 23063 पर बंद हुआ। घरेलू शेयर बाजार में गुरुवार के कारोबारी सत्र के दौरान चौतरफा बिकवाली का माहौल देखने को मिला। सुबह के समय बाजार खुलते ही सूचकांकों पर दबाव बना हुआ था, जो दिन का कारोबार आगे बढ़ने के साथ और गहराता चला गया। इस तीव्र गिरावट के कारण सेंसेक्स 1,200 अंक से अधिक का गोता लगाकर बंद हुआ, जबकि निफ्टी 23,100 के अहम मनोवैज्ञानिक स्तर से नीचे फिसल गया। इस बिकवाली की सबसे खास बात यह रही कि यह गिरावट किसी विशेष क्षेत्र तक सीमित नहीं थी, बल्कि लगभग हर प्रमुख सेक्टर में लाल निशान के साथ समाप्ति देखी गई। कारोबार समाप्त होने पर 24 सितंबर को सेंसेक्स 1,247.71 अंक अथवा 1.67% का बड़ा नुकसान उठाकर 73,580.54 के स्तर पर बंद हुआ। इसी तरह निफ्टी भी 383.70 अंक या 1.64% टूटकर 23,063.10 के स्तर पर आ गया। बाजार की चौड़ाई काफी कमजोर रही, जहां करीब 1,400 शेयरों में बढ़त दर्ज की गई, जबकि 2,772 शेयरों में गिरावट देखने को मिली। व्यक्तिगत शेयरों की बात करें तो निफ्टी बास्केट में बजाज फाइनेंस, एचडीएफसी लाइफ, बजाज फिनसर्व, एक्सिस बैंक और इंटरग्लोब एविएशन सबसे ज्यादा टूटने वाले शेयरों की सूची में शीर्ष पर रहे। इसके विपरीत, इस तेज बिकवाली के बीच केवल सिप्ला और एनटीपीसी ही हरे निशान में टिकने और बढ़त हासिल करने में कामयाब रहे। चौतरफा दबाव में रहे सभी सेक्टोरल इंडेक्स बाजार में बिकवाली का दायरा इतना व्यापक था कि हर प्रमुख सेक्टोरल इंडेक्स नुकसान के साथ बंद हुआ। सबसे ज्यादा मार वित्तीय और बैंकिंग शेयरों पर पड़ी, जिसके चलते निफ्टी प्राइवेट बैंक इंडेक्स में 2.2% की गिरावट दर्ज की गई। मेटल इंडेक्स में 1.9% और निफ्टी बैंक में 1.7% की कमजोरी देखी गई। इसके अलावा ऑटो और इंफ्रास्ट्रक्चर इंडेक्स 1.5% टूटे, जबकि ऑयल एंड गैस इंडेक्स में 1.3% की गिरावट रही। व्यापक बाजार में भी निवेशकों की धारणा कमजोर बनी रही, जिसके कारण मिडकैप इंडेक्स लगभग 2% और स्मॉलकैप इंडेक्स 1.5% नीचे लुढ़ककर बंद हुए। गिरावट के पीछे रहे तीन प्रमुख कारण बाजार में इस तेज गिरावट के पीछे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उभरे कई नकारात्मक कारक जिम्मेदार रहे। सबसे बड़ी चिंता अमेरिकी बॉन्ड बाजार में यील्ड की तेज बढ़ोतरी से पैदा हुई। अमेरिका की 10 साल की ट्रेजरी यील्ड 2007 के बाद के उच्चतम स्तर पर पहुंच गई, जबकि 2 साल की ट्रेजरी यील्ड भी 4.9% के स्तर को पार कर गई। जब बॉन्ड यील्ड बढ़ती है, तो निवेशकों के लिए बॉन्ड और डेट इंस्ट्रूमेंट्स ज्यादा सुरक्षित और आकर्षक विकल्प बन जाते हैं। ऐसी स्थिति में संस्थागत निवेशक इक्विटी जैसे जोखिम भरे एसेट्स से पूंजी निकालकर स्थिर आय वाले विकल्पों में स्थानांतरित करने लगते हैं, जिससे शेयर बाजार पर बिकवाली का गहरा दबाव बन जाता है। दूसरा प्रमुख कारण मौद्रिक नीति को लेकर बढ़ती अनिश्चितता रहा। अमेरिका से आए मजबूत आर्थिक आंकड़ों के बाद बाजार में यह आशंका तेज हो गई कि अमेरिकी फेडरल रिजर्व आने वाले समय में ब्याज दरों को लेकर सख्त रुख अपना सकता है। दरों में लंबे समय तक सख्ती बने रहने की आशंका ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इक्विटी बाजारों को हिला दिया, जिसका सीधा असर भारतीय बाजार की धारणा पर भी पड़ा। तीसरा बड़ा दबाव ऊर्जा बाजार से आया, जहां कच्चे तेल की कीमतों में अचानक जोरदार तेजी देखी गई। ब्रेंट क्रूड एक बार फिर 102 डॉलर प्रति बैरल के पार निकल गया। अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव तथा होर्मुज जलडमरूमध्य को लेकर जारी घटनाक्रमों ने आपूर्ति को लेकर अनिश्चितता बढ़ा दी है। भारत अपनी जरूरत का अधिकांश कच्चा तेल आयात करता है, इसलिए तेल की ऊंची कीमतें घरेलू महंगाई और चालू खाता घाटे की चिंताएं बढ़ा देती हैं, जिससे निवेशकों का मनोबल कमजोर हुआ। इसका आप पर असर शेयर बाजार में आई इस भारी गिरावट से खुदरा निवेशकों के पोर्टफोलियो पर तत्काल नकारात्मक असर पड़ा है। • इक्विटी निवेशकों पर प्रभाव: शेयरों और म्यूचुअल फंड के मूल्यांकन में एक ही दिन में भारी कमी आई है। नए निवेश करने वाले ट्रेडर्स को बाजार के स्थिर होने तक अतिरिक्त सावधानी बरतनी होगी। • फिक्स्ड इनकम विकल्प: बढ़ती बॉन्ड यील्ड के कारण डेट फंड और फिक्स्ड डिपॉजिट के रिटर्न अधिक प्रतिस्पर्धी हो सकते हैं। सुरक्षित आय चाहने वाले निवेशक डेट इंस्ट्रूमेंट्स की ओर रुख कर सकते हैं। • ईंधन और महंगाई: कच्चे तेल के 102 डॉलर प्रति बैरल के पार जाने से ईंधन की कीमतों पर दबाव बढ़ सकता है। यदि यह स्तर बना रहा तो इसका असर रोजमर्रा के सामानों की ढुलाई लागत पर पड़ सकता है। • ऋण और ईएमआई: अमेरिकी दरों में नरमी की उम्मीदें टलने से घरेलू ब्याज दरों में जल्द कटौती की गुंजाइश सीमित हो सकती है। आम कर्जदारों को होम या ऑटो लोन की ब्याज दरों में राहत के लिए लंबा इंतजार करना पड़ सकता है। ऐसा क्यों हुआ भारतीय बाजारों में यह भारी गिरावट घरेलू कारणों के बजाय मुख्य रूप से वैश्विक चुनौतियों और भू-राजनीतिक तनावों के संयोजन के कारण देखने को मिली। • अमेरिकी बॉन्ड यील्ड में उछाल: अमेरिका की 10 साल की ट्रेजरी यील्ड 2007 के बाद के उच्चतम स्तर पर पहुंच गई, जबकि 2 साल की यील्ड 4.9% के पार निकल गई। इसने वैश्विक फंडों को विकासशील बाजारों की इक्विटी से पैसा निकालकर सुरक्षित अमेरिकी डेट में लगाने के लिए प्रेरित किया। • फेड की सख्ती की आशंका: अमेरिकी अर्थव्यवस्था के मजबूत आंकड़ों के बाद बाजार में यह चिंता बढ़ गई कि फेडरल रिजर्व लंबे समय तक ब्याज दरों को ऊंचा बनाए रख सकता है। ऊंची दरों का जोखिम वैश्विक इक्विटी बाजारों की नकदी को प्रभावित करता है। • कच्चे तेल में तेजी और भू-राजनीति: अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव और होर्मुज जलडमरूमध्य से जुड़ी चिंताओं के कारण कच्चे तेल का भाव 102 डॉलर प्रति बैरल के पार चला गया। इस घटनाक्रम ने आपूर्ति संकट और बढ़ती लागत की चिंताओं को गहरा कर दिया। सवाल-जवाब 1. 24 सितंबर को सेंसेक्स और निफ्टी कितने अंक गिरकर बंद हुए? सेंसेक्स 1,247.71 अंक गिरकर 73,580.54 पर और निफ्टी 383.70 अंक टूटकर 23,063.10 के स्तर पर बंद हुआ। 2. निफ्टी में सबसे ज्यादा नुकसान उठाने वाले प्रमुख शेयर कौन से रहे? बजाज फाइनेंस, एचडीएफसी लाइफ, बजाज फिनसर्व, एक्सिस बैंक और इंटरग्लोब एविएशन में सबसे ज्यादा गिरावट दर्ज की गई। 3. क्या इस भारी बिकवाली के बीच किसी प्रमुख शेयर में तेजी आई? हां, सिप्ला और एनटीपीसी इस कारोबारी सत्र में बढ़त दर्ज करते हुए हरे निशान में बंद होने में सफल रहे। 4. शेयर बाजार में गिरावट के मुख्य अंतरराष्ट्रीय कारण क्या थे? अमेरिकी 10-वर्षीय बॉन्ड यील्ड का 2007 के बाद के उच्चतम स्तर पर पहुंचना, कच्चे तेल का 102 डॉलर के पार जाना और फेड के सख्त रुख की आशंका इसके मुख्य कारण रहे। https://trendkia.com/market/dalala-strita-para-bhari-bikavali-se-sensex-1247-anka-phisala-nifty-23100-ke-niche-37775 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