# फेड चेयर केविन वॉर्श के भाषण से पहले ग्लोबल करेंसी मार्केट में हलचल, इंडोनेशियाई रुपिया पर जकार्ता प्रदर्शनों का दबाव

> जैकसन होल सम्मेलन में फेडरल रिजर्व चेयर केविन वॉर्श के संबोधन से पहले वैश्विक मुद्रा बाजारों में सतर्कता का माहौल है। इंडोनेशियाई रुपिया जकार्ता में जारी विरोध प्रदर्शनों और घरेलू मुद्रास्फीति के जोखिमों के कारण दबाव में दिखाई दे रहा है।

**Type:** article · **Category:** बाज़ार · **Published:** 2026-08-28 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/market/fed-chair-kevin-warsh-ke-bhashana-se-pahale-globala-karensi-marketa-men-halachala-indonesian-rupiah-para-jakarta-pradarshanon-ka-d-23600 · **Language:** Hindi
**Tags:** फॉरेक्स मार्केट, इंडोनेशियाई रुपिया, फेडरल रिजर्व, केविन वॉर्श, जैकसन होल, जकार्ता प्रदर्शन, अमेरिकी डॉलर, बॉन्ड यील्ड

वैश्विक विदेशी मुद्रा बाजार इस समय अत्यधिक सतर्कता के दौर से गुजर रहा है। निवेशकों की निगाहें अमरीका में होने वाले जैकसन होल सम्मेलन और वहां फेडरल रिजर्व के अध्यक्ष केविन वॉर्श के आगामी भाषण पर टिकी हुई हैं। इस महत्वपूर्ण संबोधन से पहले अमरीकी डॉलर अपनी स्थिति मजबूत बनाए हुए है, जिसके चलते अमरीकी डॉलर और इंडोनेशियाई रुपिया की विनिमय दर में फिर से तेजी आने के संकेत मिल रहे हैं। हालांकि शुरुआती सत्रों में इंडोनेशियाई रुपिया ने कुछ मजबूती दिखाई थी, लेकिन इंडोनेशिया की राजधानी जकार्ता में बड़े पैमाने पर चल रहे विरोध प्रदर्शनों और घरेलू स्तर पर बढ़ती मुद्रास्फीति की चिंताओं ने बाजार की धारणा को कमजोर कर दिया है। राजनीतिक अनिश्चितता और अंतरराष्ट्रीय मौद्रिक नीतियों के प्रभाव से आने वाले दिनों में उभरते बाजारों की मुद्राओं पर गहरा असर पड़ने की संभावना जताई जा रही है।

## फेडरल रिजर्व की मौद्रिक नीति और अमरीकी ट्रेजरी यील्ड की स्थिति
अमरीका में जारी मुद्रास्फीति के आंकड़ों ने केंद्रीय बैंक द्वारा ब्याज दरों में कटौती या बढ़ोतरी के गणित को बदल दिया है। नए आर्थिक आंकड़ों के बाद दिसंबर में फेडरल रिजर्व द्वारा ब्याज दरों में वृद्धि की संभावना बढ़कर 74 प्रतिशत हो गई है। वहीं दूसरी ओर, सितंबर की मौद्रिक नीति बैठक में ब्याज दरों को मौजूदा स्तर पर ही स्थिर रखे जाने की पूरी उम्मीद की जा रही है। 27 अगस्त से 29 अगस्त तक आयोजित हो रहे जैकसन होल संगोष्ठी का मुख्य विषय वित्तीय नवाचार और भुगतान तथा नीति पर इसके प्रभाव रखा गया है। शुक्रवार को फेड अध्यक्ष के रूप में केविन वॉर्श का यह पहला जैकसन होल भाषण होगा, जिस पर दुनिया भर के वित्तीय विशेषज्ञों की नजरें टिकी हुई हैं। बाजार केवल सितंबर दर फैसले पर नहीं, बल्कि आने वाले वर्षों के लिए अमरीकी केंद्रीय बैंक के दीर्घकालिक दृष्टिकोण को समझना चाहता है।

इसी पृष्ठभूमि में अंतरराष्ट्रीय बॉन्ड बाजारों में भी हलचल देखी जा रही है। डॉयचे बैंक के वित्तीय विश्लेषकों ने स्पष्ट किया है कि हाल के दिनों में अमरीकी बॉन्ड यील्ड में हल्की बढ़ोतरी दर्ज की गई है। विश्लेषकों का मानना है कि इस यील्ड बढ़ोतरी का मुख्य कारण फेडरल रिजर्व की टिप्पणी के बजाय कच्चे तेल और प्राकृतिक गैस की कीमतों में हुई हालिया तेजी है। आंकड़े दर्शाते हैं कि 2 साल की अमरीकी ट्रेजरी यील्ड 2.2 आधार अंक बढ़कर 4.23 प्रतिशत पर पहुंच गई। वहीं 10 साल की बेंचमार्क यील्ड 2.9 आधार अंक की बढ़त के साथ 4.68 प्रतिशत हो गई, जबकि 30 साल की लंबी अवधि वाली ट्रेजरी यील्ड 2.6 आधार अंक बढ़कर 5.19 प्रतिशत के स्तर पर दर्ज की गई। यह स्थिति साफ करती है कि निवेशक ऊर्जा कीमतों के दबाव और सरकारी कर्ज की दरों पर बारीकी से ध्यान दे रहे हैं।

## जकार्ता में राजनीतिक विरोध और इंडोनेशियाई रुपिया पर घरेलू दबाव
इंडोनेशिया की घरेलू अर्थव्यवस्था इस समय दोहरे संकट का सामना कर रही है। एक तरफ जहां वैश्विक स्तर पर अमरीकी डॉलर की मजबूती का दबाव है, वहीं दूसरी तरफ देश के भीतर राजनीतिक माहौल गरमाया हुआ है। राजधानी जकार्ता की सड़कों पर जारी विशाल विरोध प्रदर्शनों ने निवेशकों के मन में डर पैदा कर दिया है। बाजार प्रतिभागियों को आशंका है कि यदि यह राजनीतिक अशांति लंबी खिंचती है, तो इससे देश में अतीत जैसी आर्थिक सुस्ती और वित्तीय उथल-पुथल की पुनरावृत्ति हो सकती है। स्थानीय बाजार में निवेशकों का विश्वास कमजोर होने से इंडोनेशियाई रुपिया को निकट भविष्य में और ज्यादा गिरावट का सामना करना पड़ सकता है।

इस बीच, डीबीएस ग्रुप रिसर्च के विशेषज्ञों ने इंडोनेशिया के केंद्रीय बैंक के प्रस्तावित गवर्नर की सुनवाई का हवाला देते हुए देश की वित्तीय संरचना पर विचार साझा किए हैं। डीबीएस रिसर्च के अनुसार, मौजूदा आर्थिक चुनौतियां इस बात की ओर इशारा करती हैं कि देश के राजकोषीय और मौद्रिक प्राधिकरणों के बीच बेहतर और करीबी समन्वय की अत्यधिक आवश्यकता है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव, हस्तक्षेपकारी व्यापार नीतियां और वैश्विक वित्तीय बाजारों की अस्थिरता ऐसे कारक हैं जो किसी भी देश की अर्थव्यवस्था को झटका दे सकते हैं। डीबीएस ने जोर देकर कहा कि गवर्नर पद के दावेदार ने अपनी टिप्पणियों में यह स्पष्ट किया है कि राजकोषीय और मौद्रिक नीतियों का तालमेल इस तरह होना चाहिए जिससे केंद्रीय बैंक की विश्वसनीयता और स्वायत्तता बनी रहे। यह एक बेहद नाजुक संतुलन साधने का कार्य होगा। साथ ही यह उम्मीद भी जताई गई है कि नए गवर्नर केंद्रीय बैंक प्रमुख के रूप में अपना पूरा 5 साल का कार्यकाल पूरा करेंगे।

## वित्तीय बाजारों में रिस्क-ऑन और रिस्क-ऑफ की अवधारणा
वैश्विक वित्तीय बाजारों के उतार-चढ़ाव को समझने के लिए दो प्रमुख शब्दावलियों रिस्क-ऑन और रिस्क-ऑफ का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल किया जाता है। ये दोनों शब्द निवेशकों की जोखिम लेने की इच्छा और उनकी मानसिकता को दर्शाते हैं। जब बाजार में रिस्क-ऑन का माहौल होता है, तब निवेशक भविष्य की आर्थिक वृद्धि को लेकर आशान्वित रहते हैं। ऐसे समय में वे उच्च रिटर्न देने वाली लेकिन अधिक जोखिम भरी संपत्तियों में पैसा लगाने से नहीं हिचकिचाते। इसके विपरीत, जब बाजार में रिस्क-ऑफ की स्थिति बनती है, तो निवेशक सतर्क रुख अपनाते हैं और अपने पूंजी की सुरक्षा को प्राथमिकता देते हैं। ऐसी स्थिति में सुरक्षित संपत्तियों की मांग बढ़ जाती है, भले ही उन पर मिलने वाला रिटर्न अपेक्षाकृत कम ही क्यों न हो।

रिस्क-ऑन माहौल के दौरान आमतौर पर दुनिया भर के शेयर बाजारों में तेजी देखी जाती है। सोने को छोड़कर लगभग सभी प्रमुख जिंसों या कमोडिटीज की कीमतों में बढ़ोतरी दर्ज की जाती है, क्योंकि आर्थिक गतिविधियों में सुधार से कच्चे माल की खपत बढ़ने की उम्मीद होती है। ऐसे समय में जिन देशों की अर्थव्यवस्था मुख्य रूप से कमोडिटी निर्यात पर टिकी होती है, उनकी राष्ट्रीय मुद्राएं मजबूत होती हैं। साथ ही क्रिप्टो परिसंपत्तियों में भी तेजी का रुख देखने को मिलता है। इसके विपरीत, रिस्क-ऑफ चरण में निवेशक शेयर बाजार से पैसा निकालकर प्रमुख सरकारी बॉन्ड में लगाते हैं। ऐसे समय में सोना चमकने लगता है और सुरक्षित ठिकाना मानी जाने वाली मुद्राएं जैसे अमरीकी डॉलर, जापानी येन और स्विस फ्रैंक मजबूत होती हैं।

जिंस निर्यात पर निर्भर अर्थव्यवस्थाओं की मुद्राएं जैसे ऑस्ट्रेलियाई डॉलर, कनाडाई डॉलर, न्यूजीलैंड डॉलर, रूसी रूबेल और दक्षिण अफ्रीकी रैंड रिस्क-ऑन अवधि में अच्छा प्रदर्शन करती हैं। इसका मुख्य कारण यह है कि वैश्विक विनिर्माण और औद्योगिक गतिविधियों में तेजी से इन देशों के संसाधनों की मांग बढ़ जाती है। वहीं जब दुनिया में संकट या मंदी का माहौल होता है, तब सुरक्षित मुद्राओं का बोलबाला रहता है। अमरीकी डॉलर को दुनिया की प्रमुख रिजर्व करेंसी माना जाता है, इसलिए संकट के समय अमरीकी सरकारी बॉन्ड को सबसे सुरक्षित निवेश विकल्प के रूप में देखा जाता है। जापानी येन को इसलिए मजबूती मिलती है क्योंकि जापान के अधिकांश सरकारी बॉन्ड घरेलू निवेशकों के पास होते हैं, जो संकट में भी अपनी होल्डिंग्स नहीं बेचते। स्विस फ्रैंक की मजबूती के पीछे स्विट्जरलैंड के सख्त बैंकिंग कानून और निवेशकों को मिलने वाली पूंजी सुरक्षा मुख्य वजह होती है।

## प्रमुख वैश्विक मुद्रा जोड़ों का हाल: जीबीपी और यूरो की चाल
इंडोनेशियाई रुपिया के अलावा अन्य प्रमुख वैश्विक मुद्राओं में भी मिश्रित रुझान देखने को मिल रहा है। ब्रिटिश पाउंड और अमरीकी डॉलर की विनिमय दर (जीबीपी/यूएसडी) लगातार दो दिनों की गिरावट से उबरते हुए एशियाई व्यापारिक घंटों के दौरान 1.3600 के स्तर के आसपास कारोबार कर रही है। हालांकि, ब्रिटिश पाउंड के सामने आने वाले समय में चुनौतियां बनी रह सकती हैं। अंतरराष्ट्रीय बाजार में ब्रेंट क्रूड तेल की कीमतों में आई हालिया गिरावट से अमरीका और यूरोप में तत्काल मुद्रास्फीति का दबाव कुछ कम हुआ है। इस बदलाव के कारण मुद्रा बाजारों ने बैंक ऑफ इंग्लैंड द्वारा ब्याज दरों में अगली बढ़ोतरी की समयसीमा को आगे खिसका दिया है। पहले जहां दरों में वृद्धि की उम्मीद वर्ष 2026 के उत्तरार्ध में लगाई जा रही थी, वहीं अब इसके वर्ष 2027 की शुरुआत तक टलने की संभावना जताई जा रही है।

दूसरी ओर, यूरो और अमरीकी डॉलर की विनिमय दर (ईयूआर/यूएसडी) में भी मामूली बढ़त दर्ज की गई है। पिछले दिन के सकारात्मक रुख को जारी रखते हुए यह मुद्रा जोड़ा एशियाई सत्र में 1.1650 के स्तर के आसपास कारोबार करता दिखा। यूरो को यूरोपियन सेंट्रल बैंक की ओर से मिल रहे सख्त मौद्रिक नीति के संकेतों से समर्थन मिल रहा है। यूरोपीय केंद्रीय बैंक के अधिकारी मुद्रास्फीति को नियंत्रित करने के लिए सख्त रुख बनाए रखने के पक्ष में हैं, जिससे यूरो की विनिमय दर को आधार मिल रहा है। कुल मिलाकर, वैश्विक मुद्रा बाजार इस समय केंद्रीय बैंकों के रुख, कच्चे तेल के उतार-चढ़ाव और उभरते बाजारों की अंदरूनी राजनीतिक स्थितियों के बीच संतुलन साधने का प्रयास कर रहा है।

## इसका आप पर असर
यह समाचार वैश्विक मुद्रा बाजार की हलचल और केंद्रीय बैंकों की मौद्रिक नीतियों से सीधा संबंध रखता है।

- **भारत में:** अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कच्चे तेल की कीमतों में बढ़ोतरी और अमरीकी डॉलर की मजबूती से भारतीय रुपये पर दबाव बढ़ सकता है, जिससे आयात महंगा होने की संभावना है।
- **इंडोनेशिया और उभरते बाजारों में:** जकार्ता में जारी प्रदर्शनों के कारण स्थानीय संपत्ति बाजारों और विनिमय दरों में अस्थिरता का जोखिम बढ़ गया है, जिससे विदेशी निवेशकों का रुख सतर्क हो सकता है।
- **वैश्विक निवेशकों के लिए:** अमरीकी ट्रेजरी यील्ड में बढ़ोतरी और फेडरल रिजर्व के रुख से वैश्विक इक्विटी और कमोडिटी बाजारों में अल्पकालिक उतार-चढ़ाव देखने को मिल सकता है।
- **अंतरराष्ट्रीय यात्रियों के लिए:** प्रमुख विदेशी मुद्राओं के मुकाबले अमरीकी डॉलर के मजबूत होने से विदेशों में यात्रा और पढ़ाई की लागत पर असर पड़ सकता है।

## सवाल-जवाब

### 1. इंडोनेशियाई रुपिया पर दबाव क्यों बन रहा है?
राजधानी जकार्ता में जारी बड़े पैमाने पर राजनीतिक प्रदर्शनों और बढ़ती मुद्रास्फीति के जोखिमों के कारण इंडोनेशियाई रुपिया पर घरेलू दबाव बना हुआ है।

### 2. फेडरल रिजर्व अध्यक्ष केविन वॉर्श का भाषण कब और कहां होने वाला है?
केविन वॉर्श का भाषण 27 से 29 अगस्त तक आयोजित जैकसन होल संगोष्ठी में शुक्रवार को प्रस्तावित है।

### 3. अमरीकी ट्रेजरी यील्ड में हालिया बदलाव क्या दर्ज किए गए हैं?
डॉयचे बैंक के अनुसार 2 साल की यील्ड 4.23 प्रतिशत, 10 साल की यील्ड 4.68 प्रतिशत और 30 साल की यील्ड 5.19 प्रतिशत पर पहुंच गई है।

### 4. ब्रिटिश पाउंड (GBP/USD) में दर वृद्धि की संभावना क्यों टल गई है?
ब्रेंट क्रूड के दामों में गिरावट से मुद्रास्फीति की चिंताएं कम हुई हैं, जिससे बैंक ऑफ इंग्लैंड द्वारा दर वृद्धि की उम्मीद 2026 के अंत से खिसककर 2027 की शुरुआत हो गई है।

### 5. रिस्क-ऑन और रिस्क-ऑफ बाजार माहौल में क्या अंतर है?
रिस्क-ऑन में निवेशक विकास की उम्मीद में जोखिम भरी परिसंपत्तियों में पैसा लगाते हैं, जबकि रिस्क-ऑफ में निवेशक सोने और सरकारी बॉन्ड जैसी सुरक्षित संपत्तियों में शरण लेते हैं।

### 6. सुरक्षित ठिकाना मानी जाने वाली प्रमुख मुद्राएं कौन सी हैं?
अमरीकी डॉलर (USD), जापानी येन (JPY) और स्विस फ्रैंक (CHF) को वैश्विक बाजारों में पारंपरिक रूप से सुरक्षित मुद्राएं माना जाता है।

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