# फेडरल रिजर्व के सख्त रुख और जर्मनी के सियासी संकट से यूरो पर दबाव, डॉलर ने की वापसी

> अमेरिकी फेडरल रिजर्व के नीतिगत रुख और जर्मनी में प्रांतीय चुनाव परिणामों के चलते विदेशी मुद्रा बाजार में यूरो कमजोर बना हुआ है, जबकि अमेरिकी डॉलर सूचकांक फिर से 100 के स्तर से ऊपर पहुंच गया है।

**Type:** article · **Category:** बाज़ार · **Published:** 2026-09-22 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/market/federal-reserve-ke-sakhta-rukha-aura-germany-ke-siyasi-snkata-se-euro-para-dabava-dollar-ne-ki-vapasi-36291 · **Language:** Hindi
**Tags:** यूरो, अमेरिकी डॉलर, विदेशी मुद्रा बाजार, फेडरल रिजर्व, यूरोपीय सेंट्रल बैंक, जर्मनी चुनाव

अंतरराष्ट्रीय मुद्रा बाजार में यूरो पर लगातार दबाव बना हुआ है, जिससे मंगलवार के यूरोपीय कारोबारी सत्र में यूरो और अमेरिकी डॉलर की विनिमय दर 1.1460 के करीब सीमित दायरे में रही। पिछले सप्ताह अमेरिकी फेडरल रिजर्व द्वारा मौद्रिक नीति को कड़ा करने के फैसले के बाद अमेरिकी डॉलर मजबूत स्थिति में कारोबार कर रहा है। फेडरल रिजर्व के सख्त नीतिगत रुख से डॉलर को मिल रहे समर्थन ने यूरो की किसी भी बड़ी रिकवरी को रोके रखा है।

## डॉलर सूचकांक में उछाल और प्रमुख प्रतिरोध स्तर
विदेशी मुद्रा बाजार में कारोबारी सप्ताह की शुरुआत काफी शांत रही है। मौद्रिक नीति सख्त करने के फेडरल रिजर्व के ताजा निर्णय के सहारे अमेरिकी डॉलर सूचकांक अगस्त की शुरुआत के बाद पहली बार 100.00 के मनोवैज्ञानिक स्तर को पार करने में सफल रहा है। बाजार विश्लेषकों का मानना है कि डॉलर के लिए अगला बड़ा तकनीकी प्रतिरोध स्तर 101.80 पर है, जो कि 24 जून को दर्ज किया गया साल का उच्चतम स्तर भी है।

हालांकि, वैश्विक स्तर पर बढ़ते रिस्क-ऑन रुझान के कारण अमेरिकी डॉलर की आगे की बढ़त के सामने कुछ चुनौतियां भी आ सकती हैं। दुनिया की दो सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के बीच संबंधों में सुधार के संकेतों के लिए निवेशक आगामी अमेरिका-चीन शिखर सम्मेलन पर करीबी नजर रख रहे हैं। इसके साथ ही, संयुक्त राष्ट्र महासभा सत्र के दौरान ईरानी राष्ट्रपति पेजेशकियन की उपस्थिति और ट्रंप की मुलाकात को लेकर खुली बातचीत से पश्चिम एशिया में कूटनीतिक समाधान की उम्मीदों ने निवेशकों की धारणा को सहारा दिया है।

## जर्मनी में राजनीतिक अनिश्चितता का असर
यूरोपीय मुद्रा के लिए एक बड़ी चुनौती जर्मनी की आंतरिक राजनीतिक उठापटक भी साबित हो रही है। उत्तर-पूर्वी जर्मनी में रविवार को संपन्न हुए प्रांतीय चुनावों में दक्षिणपंथी अल्टरनेटिव फॉर जर्मनी (AfD) ने पहला स्थान हासिल किया। दूसरी ओर, चांसलर फ्रेडरिक मर्ज की कंजर्वेटिव पार्टी को युद्ध के बाद के इतिहास में अपनी सबसे करारी क्षेत्रीय हार का सामना करना पड़ा है। इस चुनावी झटके के चलते चांसलर फ्रेडरिक मर्ज का नेतृत्व पहले की तुलना में अधिक कमजोर और अस्थिर हो गया है, जिससे यूरो की धारणा पर नकारात्मक असर पड़ा है।

## वैश्विक वित्तीय तंत्र में यूरो का स्थान और बाजार संरचना
यूरो वर्तमान में यूरोपीय संघ के उन 20 सदस्य देशों की आधिकारिक मुद्रा है जो यूरोज़ोन का हिस्सा हैं। वैश्विक स्तर पर अमेरिकी डॉलर के बाद यूरो दुनिया की दूसरी सबसे अधिक ट्रेड होने वाली मुद्रा है। साल 2022 के आंकड़ों के अनुसार, अंतरराष्ट्रीय विदेशी मुद्रा बाजार के कुल दैनिक लेनदेन में यूरो की हिस्सेदारी 31 प्रतिशत थी, जिसका औसत दैनिक टर्नओवर 2.2 ट्रिलियन डॉलर से अधिक रहा।

विदेशी मुद्रा बाजार में यूरो और अमेरिकी डॉलर (EUR/USD) दुनिया की सबसे अधिक सक्रिय करेंसी जोड़ी है, जो सभी वैश्विक लेनदेन के लगभग 30 प्रतिशत हिस्से का प्रतिनिधित्व करती है। इसके बाद EUR/JPY का हिस्सा लगभग 4 प्रतिशत, EUR/GBP का 3 प्रतिशत और EUR/AUD का 2 प्रतिशत आता है।

## यूरोपीय सेंट्रल बैंक की मौद्रिक नीति और नियमन
जर्मनी के फ्रैंकफर्ट में स्थित यूरोपीय सेंट्रल बैंक (ECB) पूरे यूरोज़ोन का केंद्रीय बैंक है। यूरोपीय सेंट्रल बैंक ही यूरोज़ोन में ब्याज दरें तय करता है और मौद्रिक नीति का संचालन करता है। बैंक का मुख्य दायित्व मूल्य स्थिरता बनाए रखना है, जिसमें मुद्रास्फीति को नियंत्रित करने के साथ-साथ आर्थिक विकास को गति देना शामिल है। ब्याज दरों में वृद्धि या कटौती ईसीबी का मुख्य नीतिगत हथियार है। सामान्य तौर पर, ब्याज दरों में वृद्धि या सख्त मौद्रिक नीति की उम्मीदें यूरो को मजबूत करती हैं, जबकि दरों में कटौती से मुद्रा कमजोर होती है।

ईसीबी की गवर्निंग काउंसिल साल में आठ बार मौद्रिक नीति की समीक्षा बैठकें आयोजित करती है। इन महत्वपूर्ण नीतिगत बैठकों में यूरोज़ोन के सभी राष्ट्रीय केंद्रीय बैंकों के प्रमुख और बैंक अध्यक्ष क्रिस्टीन लेगार्ड सहित छह स्थायी सदस्य मतदान और निर्णय प्रक्रिया में भाग लेते हैं।

## आर्थिक आंकड़े, मुद्रास्फीति और व्यापार संतुलन की भूमिका
यूरोज़ोन में मुद्रास्फीति के रुझान को मापने के लिए हार्मोनाइज्ड इंडेक्स ऑफ कंज्यूमर प्राइसेज (HICP) सबसे महत्वपूर्ण पैमाना है। यदि मुद्रास्फीति ईसीबी के 2 प्रतिशत के लक्ष्य से ऊपर बढ़ती है, तो केंद्रीय बैंक को ब्याज दरों में बढ़ोतरी करने के लिए मजबूर होना पड़ता है। दुनिया के अन्य देशों की तुलना में उच्च ब्याज दरें यूरो को लाभ पहुंचाती हैं, क्योंकि इससे वैश्विक निवेशकों को इस क्षेत्र में पूंजी लगाने का आकर्षण मिलता है।

मुद्रास्फीति के अलावा सकल घरेलू उत्पाद (GDP), विनिर्माण और सेवा क्षेत्र के पीएमआई (PMI), रोजगार आंकड़े तथा उपभोक्ता धारणा सर्वेक्षण भी यूरो के उतार-चढ़ाव को सीधे प्रभावित करते हैं। यूरोज़ोन की चार सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाएं जर्मनी, फ्रांस, इटली और स्पेन हैं, जिनकी कुल हिस्सेदारी यूरोज़ोन की कुल अर्थव्यवस्था के 75 प्रतिशत के बराबर है। इसलिए इन चार देशों से आने वाले आर्थिक आंकड़े सबसे ज्यादा देखे जाते हैं। मजबूत आर्थिक आंकड़े न केवल विदेशी निवेश लाते हैं बल्कि ईसीबी को दरें बढ़ाने का आधार भी देते हैं, जिससे मुद्रा मजबूत होती है।

इसके अतिरिक्त, व्यापार संतुलन के आंकड़े भी मुद्रा के मूल्य निर्धारण में अहम माने जाते हैं। व्यापार संतुलन किसी देश द्वारा किए गए कुल निर्यात और आयात के मूल्य का अंतर होता है। जब किसी देश के निर्यात की वैश्विक मांग बढ़ती है, तो विदेशी खरीदारों की मांग के कारण उस देश की मुद्रा का मूल्य बढ़ता है। परिणामस्वरूप, सकारात्मक व्यापार संतुलन मुद्रा को सहारा देता है जबकि व्यापार घाटा मुद्रा पर दबाव बनाता है।

## एशियाई सत्र में अन्य प्रमुख मुद्राओं और कमोडिटी का रुख
मंगलवार को एशियाई कारोबारी सत्र के दौरान ऑस्ट्रेलियाई डॉलर और अमेरिकी डॉलर (AUD/USD) की विनिमय दर 0.7100 के स्तर से ऊपर कारोबार करती दिखी। इसे रिजर्व बैंक ऑफ ऑस्ट्रेलिया (RBA) की गवर्नर मिशेल बुलॉक और सहायक गवर्नर सारा हंटर की आक्रामक टिप्पणियों से सहारा मिला। हालांकि, पश्चिम एशिया का तनाव और फेडरल रिजर्व का कड़ा रुख अमेरिकी डॉलर को मजबूती दे रहे हैं, जिससे इस जोड़ी की बढ़त भी सीमित हो सकती है। बाजार की नजर आगामी ट्रंप-शी शिखर सम्मेलन पर भी टिकी हुई है।

जापानी येन और डॉलर की जोड़ी (USD/JPY) 157.50 के आसपास मामूली बढ़त के साथ कारोबार करती नजर आई। जापानी अधिकारियों द्वारा बाजार में हस्तक्षेप की आशंकाओं ने येन की गिरावट को कुछ हद तक थामा है। हालांकि, बैंक ऑफ जापान (BoJ) द्वारा ब्याज दरों में बढ़ोतरी के बावजूद इसका रुख नरम माना जा रहा है, जिससे येन पर दबाव बना रहा। बैंक ऑफ जापान ने मौद्रिक नीति को सामान्य बनाने की दिशा में कदम बढ़ाते हुए 7-2 के बहुमत से अल्पकालिक ब्याज दर लक्ष्य को 1.00 प्रतिशत से बढ़ाकर 1.25 प्रतिशत कर दिया है, जो कि 31 साल का नया उच्चतम स्तर है और बाजार की पूर्व उम्मीदों के अनुरूप रहा।

कमोडिटी बाजार में सोने में एशियाई सत्र की शुरुआती बढ़त के बाद बिकवाली देखने को मिली और यह 4,350 डॉलर प्रति औंस के स्तर से नीचे फिसल गया। अमेरिकी फेडरल रिजर्व के सख्त नीतिगत दृष्टिकोण को ब्याज न देने वाली इस पीली धातु पर दबाव का मुख्य कारण माना जा रहा है। दूसरी ओर, कच्चे तेल (WTI) की कीमतों में चार दिनों की गिरावट का सिलसिला टूट गया। पिछले दिन लगभग दो सप्ताह के निचले स्तर 91.00 डॉलर से नीचे जाने के बाद कच्चा तेल करीब 1.40 प्रतिशत चढ़कर 93.00 डॉलर के स्तर के ठीक नीचे कारोबार करता दिखा, जहां पश्चिम एशिया के घटनाक्रम पर निवेशकों का पूरा ध्यान बना हुआ है।

## इसका आप पर असर
अमेरिकी डॉलर के मजबूत होने और यूरो की कमजोरी से अंतरराष्ट्रीय मुद्रा विनिमय दरों, आयात-निर्यात लागत और वैश्विक निवेश प्रवाह पर सीधा असर पड़ेगा।

- **भारतीय यात्रियों और छात्रों पर प्रभाव:** यूरोप जाने वाले भारतीय छात्रों और पर्यटकों के लिए यूरो के कमजोर रहने से स्थानीय खर्चों में हल्की राहत मिल सकती है। हालांकि, अमेरिकी डॉलर के मजबूत होने से अमेरिका में अध्ययन और डॉलर-मूल्य वाले खर्च महंगे बने रहेंगे।
- **आयात-निर्यात व्यापार:** भारतीय निर्यातकों को यूरोप से प्राप्त होने वाले ऑर्डरों के भुगतान मूल्य पर नजर रखनी होगी क्योंकि यूरो में उतार-चढ़ाव मार्जिन को प्रभावित करता है। वहीं, कच्चे तेल और डॉलर आधारित वैश्विक आयातों की बिलिंग लागत बढ़ सकती है।
- **कमोडिटी और सोने की कीमतें:** अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोने के 4,350 डॉलर प्रति औंस से नीचे फिसलने से घरेलू बाजार में भी सर्राफा कीमतों पर कुछ नरमी देखने को मिल सकती है। निवेशकों को फेडरल रिजर्व की सख्त मौद्रिक नीति के चलते सोने में निवेश से पहले ब्याज दरों के रुझान पर ध्यान देना चाहिए।
- **कच्चा तेल और ईंधन लागत:** कच्चे तेल के 93 डॉलर के करीब पहुंचने से तेल विपणन कंपनियों की खरीद लागत पर दबाव बना रहेगा। यदि अंतरराष्ट्रीय कीमतें इसी स्तर पर बनी रहती हैं तो आने वाले हफ्तों में घरेलू स्तर पर ईंधन दरों पर इसका असर पड़ सकता है।

## ऐसा क्यों हुआ
मुद्रा बाजार में यह बदलाव अमेरिकी केंद्रीय बैंक के आक्रामक मौद्रिक कदमों और यूरोप की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था में पैदा हुई राजनीतिक उथल-पुथल के सम्मिलित प्रभाव के कारण हुआ है।

- **फेडरल रिजर्व की सख्त मौद्रिक नीति:** अमेरिकी फेडरल रिजर्व द्वारा पिछले सप्ताह नीति को सख्त करने और आगामी दिनों में दरों को ऊंचा रखने के संकेतों ने निवेशकों की पूंजी को अमेरिकी डॉलर की ओर आकर्षित किया है। इससे डॉलर इंडेक्स 100 से ऊपर निकल गया और अन्य प्रमुख मुद्राओं पर बिकवाली का दबाव बढ़ गया।
- **जर्मनी में ऐतिहासिक चुनावी हार:** उत्तर-पूर्वी जर्मनी के प्रांतीय चुनावों में दक्षिणपंथी एएफडी की जीत और चांसलर फ्रेडरिक मर्ज की पार्टी की रिकॉर्ड शिकस्त ने राजनीतिक स्थिरता को लेकर चिंताएं बढ़ा दी हैं। चांसलर के कमजोर पड़ते नेतृत्व के कारण यूरो में निवेशकों का भरोसा डिगा है।
- **वैश्विक भू-राजनीतिक और आर्थिक घटनाएं:** पश्चिम एशिया में जारी तनाव और कच्चे तेल में उतार-चढ़ाव के बीच निवेशक सुरक्षित संपत्तियों की तलाश में डॉलर को प्राथमिकता दे रहे हैं। इसके साथ ही बैंक ऑफ जापान की नरम दरों और आगामी अमेरिका-चीन शिखर सम्मेलन की प्रतीक्षा ने बाजार में सतर्कता बढ़ाई है।

## सवाल-जवाब

### 1. यूरो/डॉलर (EUR/USD) की विनिमय दर पर क्या प्रभाव पड़ा है?
फेडरल रिजर्व के सख्त नीतिगत रुख और डॉलर की मजबूती के कारण मंगलवार को EUR/USD जोड़ी घटकर 1.1460 के आसपास सीमित दायरे में आ गई।

### 2. अमेरिकी डॉलर इंडेक्स किस स्तर पर पहुंचा है?
फेडरल रिजर्व द्वारा मौद्रिक नीति सख्त करने के फैसले के बाद डॉलर इंडेक्स अगस्त की शुरुआत के बाद पहली बार 100.00 के स्तर से ऊपर निकला है।

### 3. जर्मनी के प्रांतीय चुनावों में क्या नतीजे रहे?
उत्तर-पूर्वी जर्मनी में दक्षिणपंथी पार्टी एएफडी ने पहला स्थान हासिल किया, जबकि चांसलर फ्रेडरिक मर्ज की कंजर्वेटिव पार्टी को युद्ध के बाद की सबसे करारी हार झेलनी पड़ी।

### 4. बैंक ऑफ जापान ने ब्याज दरों में क्या बदलाव किया है?
बैंक ऑफ जापान ने 7-2 के बहुमत से अपनी अल्पकालिक ब्याज दर को 1.00 प्रतिशत से बढ़ाकर 1.25 प्रतिशत कर दिया है, जो 31 वर्षों का उच्चतम स्तर है।

### 5. कमोडिटी बाजार में सोने और कच्चे तेल का क्या रुख रहा?
ब्याज दरों में सख्ती के चलते सोना 4,350 डॉलर प्रति औंस से नीचे फिसल गया, जबकि कच्चा तेल (WTI) 1.40 प्रतिशत चढ़कर 93 डॉलर के करीब पहुंच गया।

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