जर्मनी में महंगाई बढ़ने की आशंका, लेकिन प्रॉफिट पर दबाव के कारण कीमतों में भारी उछाल से राहत की उम्मीद जर्मनी में महंगाई दर तीन फीसदी से ऊपर जाने की संभावना है, लेकिन कमजोर मांग और श्रम बाजार में नरमी के चलते 2022 जैसे रिकॉर्ड उछाल की पुनरावृत्ति की संभावना नहीं है। जर्मनी की अर्थव्यवस्था को लेकर अर्थशास्त्रियों का मानना है कि आने वाले महीनों में मुद्रास्फीति की दर तीन प्रतिशत के आंकड़े को पार कर सकती है और साल के अंत तक ऊंची बनी रह सकती है। हालांकि, इसके बावजूद साल 2022 के दौरान देखे गए दो अंकों वाले भारी उछाल के फिर से लौटने की कोई संभावना नजर नहीं आ रही है। इस स्थिति के पीछे मुख्य वजहें कमजोर होती उपभोक्ता मांग, सुस्त पड़ता श्रम बाजार और महामारी के दौरान बचाई गई पुरानी बचतों का पूरी तरह खत्म हो जाना हैं। ये सभी कारक मिलकर कंपनियों की कीमत तय करने की ताकत को सीमित कर रहे हैं, जिसके कारण व्यवसायों को उपभोक्ताओं तक लागत का बोझ पहुंचाने के बजाय अपने मुनाफे में कटौती करके इसे खुद ही सहन करना पड़ रहा है। साल 2022 के संकट से क्यों अलग है मौजूदा स्थिति विशेषज्ञों के अनुसार, हालांकि ऊर्जा सेक्टर से अन्य वस्तुओं की तरफ लागत के कुछ असर पड़ सकते हैं, जो फिलहाल स्पष्ट रूप से दिखाई नहीं दे रहे हैं, लेकिन उन परिस्थितियों का पूरी तरह अभाव है जिन्होंने चार साल पहले महंगाई को एक गंभीर और व्यापक समस्या बना दिया था। उस दौर में कंपनियों का मुनाफा भी महंगाई बढ़ाने वाले कारकों में शामिल माना जाता था, जिससे ग्रीडफ्लेशन और श्रिंकफ्लेशन जैसे शब्द चलन में आए थे। इसके विपरीत, मौजूदा समय में कंपनियों के मुनाफे में आने वाली कमी महंगाई के दबाव को बढ़ाने के बजाय उसे कम करने का काम करेगी। श्रम बाजार की नरमी और घटती क्रय शक्ति मौजूदा आर्थिक माहौल में श्रम बाजार काफी नरम पड़ चुका है, जिसका अर्थ है कि कर्मचारियों के लिए भारी-भरकम वेतन वृद्धि की मांग करने के बजाय अपनी नौकरी की सुरक्षा सुनिश्चित करना पहली प्राथमिकता बन गया है। इसके अलावा, नागरिकों की महामारी के समय की बचत भी अब पूरी तरह से समाप्त हो चुकी है। इन तमाम वजहों से ग्राहकों की वित्तीय क्षमता और अधिक कीमत चुकाने की इच्छाशक्ति दोनों ही उस दौर के मुकाबले काफी कम हैं जो महामारी के तुरंत बाद देखने को मिला था। यही वजह है कि उत्पादक श्रृंखला में भले ही शुरुआती स्तर पर कीमतें बढ़ाने की क्षमता बची हो, लेकिन उपभोक्ता तक पहुंचते-पहुंचते वह क्षमता लगभग गायब हो जाती है। बाजार की अन्य हलचलें और कमोडिटी का हाल दूसरी तरफ मुद्रा बाजारों में भी कई तरह के बदलाव देखने को मिल रहे हैं, जहां चीनी सीपीआई और पीपीआई के गर्म आंकड़ों से अप्रभावित रहते हुए एशियाई सत्र के दौरान ऑस्ट्रेलियन डॉलर शुरुआती दायरे में बना हुआ है। इसके साथ ही, रिजर्व बैंक ऑफ ऑस्ट्रेलिया द्वारा ब्याज दरों में बढ़ोतरी की बढ़ती उम्मीदें ऑस्ट्रेलियाई मुद्रा को सहारा दे रही हैं। अमेरिकी डॉलर में कमजोरी और भू-राजनीतिक मोर्चे पर बनी अनिश्चितताओं के बीच सोने की कीमतों में भी तेजी दर्ज की गई है, जिससे यह कीमती धातु तीन दिन की लगातार गिरावट के सिलसिले को तोड़ते हुए प्रति ट्रॉय औंस चार हजार चार सौ डॉलर के महत्वपूर्ण स्तर से ऊपर वापस लौट आई है। अमेरिकी सत्र के दौरान जापानी येन में आई मजबूती के बीच अमेरिकी डॉलर भी संभलता हुआ नजर आ रहा है, जबकि जापान के ठोस आंकड़े केंद्रीय बैंक द्वारा मौद्रिक नीति को सामान्य बनाने की प्रक्रिया को जारी रखने की उम्मीदों को बल दे रहे हैं। इसका आप पर असर जर्मनी और वैश्विक बाजारों में आर्थिक गतिविधियों और महंगाई के रुझानों का सीधा असर निवेशकों, आयातकों और आम उपभोक्ताओं की जेब पर पड़ता है। • भारत में: वैश्विक स्तर पर कमोडिटी की कीमतों और मुद्रास्फीति के नियंत्रण में रहने से आयातित वस्तुओं की लागत स्थिर रह सकती है, जिसका लाभ भारतीय घरेलू बाजार और आयातकों को मिल सकता है। • यूरोप और वैश्विक स्तर पर: जर्मनी में कंपनियों द्वारा मुनाफा कम करके लागत सहन करने से उपभोक्ताओं को खुदरा सामान खरीदते समय अत्यधिक बढ़े हुए दामों से राहत मिलती रहेगी। • निवेशकों के लिए: मुद्रास्फीति के अनियंत्रित न होने और केंद्रीय बैंकों की नीतियों में बदलाव की संभावनाओं के बीच शेयर और जिंस बाजारों में सतर्क रुख बनाए रखने की जरूरत है। • सोना और मुद्रा बाजार: कीमती धातुओं और मुद्राओं में उतार-चढ़ाव निवेशकों को सुरक्षित परिसंपत्तियों में निवेश करने के नए अवसर और जोखिम दोनों प्रदान करते हैं। • रोजगार और वेतन: श्रम बाजार में नरमी और नौकरी की सुरक्षा को प्राथमिकता मिलने से कर्मचारियों की वेतन वृद्धि की उम्मीदें सीमित हो सकती हैं। ऐसा क्यों हुआ मुद्रास्फीति और कॉर्पोरेट मूल्य निर्धारण के वर्तमान रुख के पीछे कई महत्वपूर्ण आर्थिक कारण और पिछले वर्षों के अनुभवों का मिश्रण काम कर रहा है। • कमजोर उपभोक्ता मांग: महामारी के दौरान जमा की गई बचत के पूरी तरह समाप्त होने और श्रम बाजार के सुस्त होने के कारण नागरिकों की खर्च करने की क्षमता घट गई है। • कंपनियों की विवशता: मांग कम होने के कारण व्यवसाय बढ़ी हुई लागत को सीधे ग्राहकों पर थोपने में असमर्थ हैं, जिससे उन्हें अपने मुनाफे में कटौती करनी पड़ रही है। • 2022 के संकट से अंतर: ऊर्जा संकट के दौर जैसी चौतरफा परिस्थितियां और अनियंत्रित मूल्य वृद्धि के कारक आज मौजूद नहीं हैं, जिससे व्यापक महंगाई पर लगाम लगी हुई है। • मौद्रिक और कमोडिटी कारक: वैश्विक स्तर पर विनिमय दरों में बदलाव, केंद्रीय बैंकों की नीतियां और भू-राजनीतिक अनिश्चितताएं कमोडिटी और मुद्रा बाजारों को सीधे प्रभावित कर रही हैं। सवाल-जवाब 1. जर्मनी में महंगाई दर के कहां तक पहुंचने की संभावना है? जर्मनी में महंगाई दर के तीन प्रतिशत से ऊपर जाने और साल के अंत तक ऊंची बनी रहने की उम्मीद है। 2. क्या 2022 जैसे महंगाई के रिकॉर्ड स्तर दोबारा लौटेंगे? नहीं, अर्थशास्त्रियों का मानना है कि 2022 के जैसे दो अंकों वाले भारी उछाल के फिर से लौटने की संभावना नहीं है। 3. कंपनियां बढ़ी हुई लागत का क्या कर रही हैं? कमजोर मांग के कारण कंपनियां बढ़ी हुई लागत को उपभोक्ताओं पर डालने के बजाय अपने मुनाफे में कटौती करके खुद सहन कर रही हैं। 4. सोने की कीमतों में हाल ही में क्या बदलाव आया है? सोने की कीमतें तीन दिन की लगातार गिरावट से उबरते हुए प्रति ट्रॉय औंस चार हजार चार हजार चार सौ डॉलर के स्तर से ऊपर पहुंच गई हैं। https://trendkia.com/market/german-profit-squeezes-set-to-muffle-price-risks-despite-inflation-warnings-30490 TrendKia — Har trend, sabse pehle.