बीमा कंपनियों के खर्चों और एजेंट कमीशन पर नकेल कसने की तैयारी, वेबसाइट्स पर डार्क पैटर्न पर भी रोक की सिफारिश भारतीय बीमा विनियामक और विकास प्राधिकरण ने बीमा क्षेत्र के लिए नए नियमों का मसौदा जारी किया है। इसमें एजेंटों के कमीशन की सीमा तय करने, कंपनियों के प्रबंधन खर्च घटाने और ऑनलाइन पोर्टल्स पर भ्रामक तरीकों को खत्म करने के सुझाव शामिल हैं। भारतीय बीमा नियामक और विकास प्राधिकरण (आईआरडीएआई) ने घरेलू बीमा उद्योग के वित्तीय ढांचे और वितरण नियमों में व्यापक फेरबदल की रूपरेखा तैयार की है। नियामक द्वारा 23 सितंबर को जारी किए गए एक परामर्श पत्र में बीमा कंपनियों के प्रबंधन खर्चों पर सख्त नियंत्रण लगाने, एजेंटों और मध्यस्थों के कमीशन ढांचे को तर्कसंगत बनाने तथा डिजिटल प्लेटफॉर्मों पर उपभोक्ताओं को गुमराह करने वाली रणनीतियों पर रोक लगाने के नए प्रस्ताव रखे गए हैं। इन बदलावों का सीधा असर बीमा कंपनियों, एजेंटों, कॉर्पोरेट ब्रोकरों और ऑनलाइन पॉलिसी बेचने वाले वेब एग्रीगेटर्स की कार्यप्रणाली पर पड़ सकता है। प्रबंधन खर्च घटाने के लिए पांच साल का रोडमैप नियामक ने जीवन और गैर-जीवन बीमा कंपनियों के खर्च प्रबंधन यानी एक्सपेंस ऑफ मैनेजमेंट (ईओएम) को कम करने के लिए पांच साल की क्रमिक समयसीमा निर्धारित करने का प्रस्ताव दिया है। वर्तमान में कंपनियों द्वारा परिचालन और वितरण पर किए जाने वाले खर्चों की गणना के लिए जो व्यवस्था लागू है, उसमें व्यापक बदलाव की योजना है। जीवन बीमा प्रदाताओं के मामले में यह सीमा अब कंपनी स्तर पर ग्रॉस डायरेक्ट प्रीमियम इनकम (जीडीपीआई) के आधार पर तय की जाएगी। मसौदे के अनुसार, जीवन बीमा कंपनियों के लिए इस प्रबंधन व्यय की सीमा को दो वर्षों के भीतर घटाकर 15 प्रतिशत और पांच वर्षों के भीतर 12.5 प्रतिशत तक सीमित करने का लक्ष्य रखा गया है। वहीं साधारण यानी जनरल इंश्योरेंस कंपनियों के लिए नियामक ने गणना के आधार को ग्रॉस रिटन प्रीमियम (जीडब्ल्यूपी) से बदलकर घरेलू जीडीपीआई करने का सुझाव दिया है। साधारण बीमा क्षेत्र में प्रबंधन खर्च की सीमा को पांच वर्षों के भीतर 30 प्रतिशत से घटाकर 20 प्रतिशत तक लाने का प्रस्ताव पेश किया गया है। नियामक का स्पष्ट मानना है कि इस व्यवस्था से बीमा संचालन की समग्र लागत घटेगी, साधारण बीमा में जोखिम का दायरा बढ़ेगा और बचत आधारित जीवन बीमा पॉलिसियों में पॉलिसीधारकों को बेहतर रिटर्न हासिल हो सकेगा। उत्पादों की प्रकृति के आधार पर अलग-अलग कमीशन नए प्रस्तावों के तहत आईआरडीएआई हर बीमा उत्पाद के लिए एक समान कमीशन दर रखने के पक्ष में नहीं है। इसके बजाय, पॉलिसी के प्रकार, उसकी जटिलता, उसे बेचने के तौर-तरीकों और ग्राहकों को बाद में दी जाने वाली सर्विस में लगने वाले श्रम के आधार पर कमीशन की सीमाएं तय की जाएंगी। इस नीति से जटिल और गैर-पारदर्शी उत्पादों की जगह स्पष्ट और वास्तविक सुरक्षा देने वाले उत्पादों को बढ़ावा देने का प्रयास किया गया है। व्यक्तिगत गैर-लिंक्ड और लिंक्ड जीवन बीमा उत्पादों के लिए मध्यस्थों का कमीशन प्रीमियम भुगतान अवधि के आधार पर 5 प्रतिशत से 20 प्रतिशत के बीच रखने का प्रस्ताव है। वहीं पारंपरिक व्यक्तिगत बीमा एजेंटों के लिए यह दायरा 6.25 प्रतिशत से 25 प्रतिशत के बीच तय किया जा सकता है। प्योर टर्म इंश्योरेंस यानी व्यक्तिगत सुरक्षा पॉलिसियों के मामले में पहले वर्ष के प्रीमियम पर मध्यस्थों को 25 प्रतिशत और व्यक्तिगत एजेंटों को 30 प्रतिशत तक कमीशन देने का प्रावधान किया गया है। बाद के वर्षों में होने वाले रिन्यूअल प्रीमियम पर यह कमीशन क्रमशः 7.5 प्रतिशत और 10 प्रतिशत रहने का सुझाव दिया गया है। ब्रोकरेज फर्म बर्नस्टीन और जेफरीज ने विश्लेषण किया है कि यदि यह कमीशन कटौती इसी रूप में लागू होती है, तो बीमा वितरण से जुड़ी कंपनियों और एजेंटों की आय पर दबाव बन सकता है। हालांकि, वितरण लागत कम होने से बीमा पॉलिसियां ग्राहकों के लिए अधिक किफायती और आकर्षक बन सकती हैं। डिजिटल पोर्टल्स पर डार्क पैटर्न के खिलाफ कड़े नियम इस परामर्श पत्र का एक अहम हिस्सा ऑनलाइन बीमा वितरण में प्रचलित अनुचित डिजिटल अभ्यासों और डार्क पैटर्न्स पर रोक लगाना है। नियामक ने देखा है कि कई डिजिटल बीमा प्लेटफॉर्म बुनियादी जानकारी देने से पहले ही उपयोगकर्ताओं से संपर्क विवरण जुटाने का दबाव बनाते हैं। प्रस्तावित नियमों के तहत किसी भी बीमाकर्ता या डिजिटल वितरक को इस बात की अनुमति नहीं होगी कि वह उपभोक्ता को पॉलिसी की बुनियादी जानकारी, प्रीमियम की कीमत या फीचर्स देखने के लिए अपनी व्यक्तिगत जानकारी साझा करने पर मजबूर करे। इस रोक के बाद उपभोक्ता बिना अपनी पहचान या संपर्क सूत्र दिए स्वतंत्र रूप से बीमा योजनाओं का अध्ययन और तुलना कर सकेंगे। इससे लोगों को अनचाहे कॉल्स और स्पैम से राहत मिलेगी और वे बिना किसी दबाव के बीमा चुन सकेंगे। इस पूरे परामर्श पत्र पर संबंधित हितधारक 25 अक्टूबर तक अपने सुझाव और आपत्तियां दर्ज करा सकते हैं, जिसके बाद अंतिम नियमों को अधिसूचित किया जाएगा। इसका आप पर असर बीमा नियामक के इन नए प्रस्तावों से ग्राहकों के लिए पॉलिसी की लागत कम हो सकती है और डिजिटल सुरक्षा में सुधार हो सकता है। • प्रीमियम लागत पर असर: कंपनियों के प्रबंधन खर्च और वितरण कमीशन घटने से भविष्य में बीमा पॉलिसियों के प्रीमियम कम हो सकते हैं। इससे बचत वाली जीवन बीमा योजनाओं पर ग्राहकों को अधिक परिपक्वता लाभ मिलने की संभावना बनेगी। • डिजिटल निजता और तुलना: वेबसाइटों पर डार्क पैटर्न बंद होने से आप बिना फोन नंबर या ईमेल दिए प्रीमियम और फीचर्स की तुलना कर सकेंगे। इसके लागू होने के बाद अनचाहे टेलीमार्केटिंग और एजेंट कॉल्स की परेशानी से मुक्ति मिलेगी। • एजेंटों की कमाई: कमीशन की सीमा तय होने से पारंपरिक एजेंटों और फिनटेक ब्रोकरों की आय में कटौती हो सकती है। ग्राहकों को सेवाएं देने के लिए अब एजेंटों को अधिक पारदर्शी और कुशल तरीके अपनाने होंगे। • सुझाव देने का अवसर: यह मसौदा 25 अक्टूबर तक जनता और उद्योग जगत के सुझावों के लिए खुला है। इसके बाद नियम अंतिम रूप से अधिसूचित होंगे, जिससे बदलाव अगले वित्तीय वर्षों में चरणबद्ध तरीके से लागू होंगे। ऐसा क्यों हुआ बीमा नियामक ने यह कदम बीमा उत्पादों को आम जनता के लिए सस्ता बनाने, कंपनियों की कार्यक्षमता बढ़ाने और ऑनलाइन धोखाधड़ी रोकने के उद्देश्य से उठाया है। • अत्यधिक परिचालन लागत: बीमा कंपनियों द्वारा वितरण, मार्केटिंग और प्रबंधन पर भारी धनराशि खर्च करने से ग्राहकों पर प्रीमियम का बोझ बढ़ रहा था। इस खर्च को जीडीपीआई से जोड़कर नियंत्रित करने से कंपनियों का वित्तीय ढांचा सुदृढ़ होगा। • उत्पादों की असमान जटिलता: जटिल पॉलिसियों को बेचने के लिए दिए जाने वाले भारी कमीशन से मिस-सेलिंग की शिकायतें बढ़ रही थीं। नियामक ने उत्पाद के प्रयास और जटिलता के अनुसार कमीशन दरें तय करने का रास्ता चुना है ताकि सही उत्पाद बिकें। • उपभोक्ता डेटा का दुरुपयोग: ऑनलाइन बीमा ब्रोकर अक्सर सामान्य कोटेशन दिखाने से पहले ग्राहकों का डेटा हासिल कर लेते थे। इस डार्क पैटर्न पर अंकुश लगाने के लिए सख्त डिजिटल नियम जरूरी समझे गए। सवाल-जवाब 1. आईआरडीएआई ने प्रबंधन खर्चों को लेकर क्या प्रस्ताव दिया है? नियामक ने जीवन बीमा कंपनियों के प्रबंधन खर्च को पांच वर्षों में घटाकर 12.5 प्रतिशत और साधारण बीमा कंपनियों के लिए 20 प्रतिशत तक सीमित करने का प्रस्ताव रखा है। 2. टर्म इंश्योरेंस पर एजेंटों को कितना कमीशन मिल सकेगा? प्रस्ताव के अनुसार व्यक्तिगत टर्म प्लान के पहले साल के प्रीमियम पर एजेंटों को अधिकतम 30 प्रतिशत और मध्यस्थों को 25 प्रतिशत कमीशन मिल सकेगा। 3. बीमा वेबसाइट्स पर डार्क पैटर्न को लेकर क्या रोक लगाई जा रही है? कंपनियां अब केवल बुनियादी पॉलिसी विवरण, फीचर्स या प्रीमियम रेट दिखाने के लिए ग्राहकों से व्यक्तिगत जानकारी मांगने पर मजबूर नहीं कर सकेंगी। 4. इन नए नियमों पर अपनी राय देने की अंतिम तिथि क्या है? हितधारक और आम जनता 25 अक्टूबर तक इस परामर्श पत्र पर अपने सुझाव और प्रतिक्रियाएं दर्ज करा सकते हैं। https://trendkia.com/market/irdai-ka-bima-knpaniyon-ke-kharchon-aura-ejenta-kamishana-para-nakela-kasane-ka-prastava-37557 TrendKia — Har trend, sabse pehle.