कच्चे तेल की मार और बढ़ते राजकोषीय घाटे के बीच ब्याज दरों पर फंसा रिजर्व बैंक क्रूड की बढ़ती कीमतों और थोक व खुदरा महंगाई में उछाल के बीच केंद्रीय बैंक पर दरें बढ़ाने का दबाव है, हालांकि बढ़ता राजकोषीय घाटा नीतिगत फैसलों को पेचीदा बना रहा है। घरेलू अर्थव्यवस्था में ईंधन की ऊंची लागत और महंगाई का दबाव गहराने के साथ ही मौद्रिक नीति को लेकर चर्चाएं तेज हो गई हैं। वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में आई तेजी के कारण केंद्रीय बैंक पर ब्याज दरों में बढ़ोतरी करने और मौद्रिक रुख को कड़ा करने का दबाव बढ़ रहा है। हालांकि मजबूत आर्थिक वृद्धि के बावजूद सरकार की उधारी लागत और बजट घाटे के समीकरण ऐसे बने हुए हैं, जिनसे नीतिगत फैसलों का असर उलटा पड़ने का जोखिम भी खड़ा हो गया है। मजबूत जीडीपी आंकड़ों के बीच तेल का बढ़ता जोखिम अर्थव्यवस्था के बुनियादी आंकड़ों पर नजर डालें तो वित्तीय वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही में वास्तविक सकल घरेलू उत्पाद यानी जीडीपी की वृद्धि दर 7.8% दर्ज की गई थी। यह आंकड़ा भारतीय रिजर्व बैंक के 7% के पिछले अनुमान से काफी बेहतर रहा, जिससे घरेलू कारोबारी गतिविधियों की मजबूती साफ झलकती है। इसके बाद सितंबर में जारी अपने मासिक आर्थिक समीक्षा दस्तावेज में वित्त मंत्रालय ने रेखांकित किया कि देश ने चालू वित्त वर्ष की दूसरी तिमाही में मजबूत शुरुआत की है। इसके साथ ही मंत्रालय ने सतर्क किया कि चुनौतीपूर्ण वैश्विक माहौल में इस वृद्धि को स्वाभाविक मानकर नहीं बैठा जा सकता। दुनिया भर में जारी भू-राजनीतिक तनाव और आपूर्ति श्रृंखलाओं पर बढ़ते असर ने ऊर्जा बाजार में अनिश्चितता को काफी बढ़ा दिया है। यह स्थिति भारत के लिए बेहद संवेदनशील है, क्योंकि देश अपनी कच्चे तेल की जरूरतों का लगभग 90% हिस्सा आयात करता है। अंतरराष्ट्रीय बेंचमार्क ब्रेंट क्रूड की कीमतें औसतन 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर बनी हुई हैं। ऐसे में यदि घरेलू मुद्रा कमजोर पड़ती है, तो आयातित महंगाई परिवहन खर्च और विनिर्माण लागत के जरिए सीधे तौर पर आम बाजार में फैल सकती है। खुदरा और थोक महंगाई के आंकड़ों ने बढ़ाई चुनौती आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक अगस्त महीने में सालाना आधार पर उपभोक्ता मूल्य सूचकांक यानी सीपीआई मुद्रास्फीति 4.45% से बढ़कर 4.82% पर पहुंच गई। वहीं दूसरी तरफ थोक मूल्य सूचकांक यानी डब्ल्यूपीआई मुद्रास्फीति उछलकर 9.92% दर्ज की गई। मुद्रास्फीति के इस स्तर पर पहुंचने के कारण केंद्रीय बैंक के पास वर्तमान नीतिगत दरों को स्थिर बनाए रखने के विकल्प सीमित होते जा रहे हैं। मुद्रास्फीति को नियंत्रित करने के पारंपरिक तरीके आम तौर पर दरों को बढ़ाकर मांग को कम करने पर केंद्रित होते हैं। लेकिन मौजूदा समय में राजकोषीय गणित एक नई चुनौती पेश कर रहा है। अप्रैल से अगस्त की अवधि के दौरान सरकार का राजकोषीय घाटा पूरे साल के लक्ष्य के लगभग 42% तक पहुंच गया है। पूंजीगत संपत्तियों पर पहले से किया गया अग्रिम खर्च और लगातार बढ़ता व्यय, बढ़ते कर्ज खर्च के बीच पूरे साल के लिए तय 4.3% के राजकोषीय घाटे के लक्ष्य पर दबाव डाल सकता है। यदि कर राजस्व इस गति से नहीं बढ़ा, तो सरकार की उधारी लागत में वृद्धि से मुद्रा पर दबाव फिर बढ़ सकता है, जिससे ब्याज दरों में बढ़ोतरी का मूल उद्देश्य ही कमजोर पड़ सकता है। विदेशी मुद्रा भंडार का मजबूत सुरक्षा कवच दूसरी तरफ मुद्रा बाजार में अत्यधिक उतार-चढ़ाव को थामने के लिए केंद्रीय बैंक के पास पर्याप्त वित्तीय संसाधन उपलब्ध हैं। सितंबर महीने में भारत का विदेशी मुद्रा भंडार रिकॉर्ड 785.7 अरब डॉलर के स्तर पर पहुंच गया। भंडार का यह विशाल स्तर नीति निर्माताओं को विदेशी मुद्रा विनिमय बाजार में किसी भी अनियंत्रित अस्थिरता को रोकने की ठोस क्षमता देता है। पर्याप्त विदेशी मुद्रा भंडार की मौजूदगी इस बात का संकेत देती है कि आने वाले समय में रुपये पर पड़ने वाला भारी मूल्यह्रास का दबाव काफी हद तक नियंत्रित और सुगम रह सकता है। तकनीकी चार्ट और विनिमय दरों के रुझानों को देखें तो अप्रैल के अंत से जारी दोनों तरफ का उतार-चढ़ाव दैनिक चार्ट पर एक आयताकार दायरा बना रहा है। इसे मई 2025 के निचले स्तर से आई जोरदार तेजी की पृष्ठभूमि में एक तेजी का समेकन चरण माना जा सकता है। बाजार में तेजी की उम्मीद रखने वालों को 96.60-96.65 के दायरे वाली बाधा के ऊपर एक निरंतर ब्रेकआउट का इंतजार करना होगा। इसके पार निकलने पर विनिमय दर 97.00 के सर्वकालिक उच्च स्तर के करीब पहुंच सकती है, जो मौजूदा रुझान को और विस्तार देने का मार्ग प्रशस्त करेगी। गिरावट की स्थिति में शुरुआती समर्थन 95.75-95.70 के क्षैतिज क्षेत्र के पास बना हुआ है। इसके नीचे 95.00 का मनोवैज्ञानिक स्तर और फिर ट्रेडिंग रेंज का निचला हिस्सा यानी 94.25 का स्तर आता है। इसके ठीक नीचे 93.80 के आसपास तकनीकी रूप से अहम 200-दिवसीय सिंपल मूविंग एवरेज यानी एसएमए स्थित है। जब तक इस गतिशील समर्थन स्तर के नीचे स्पष्ट गिरावट नहीं आती, तब तक बाजार में मंदी के गहरे बदलाव का संकेत नहीं मिलेगा। मूल्य स्थिरता और विनिमय दर प्रबंधन का दोहरा दायरा भारतीय रिजर्व बैंक का घोषित मुख्य दायित्व विकास के लक्ष्य को ध्यान में रखते हुए मूल्य स्थिरता बनाए रखना है। इसके तहत ब्याज दर के प्राथमिक उपकरण का उपयोग करके मुद्रास्फीति को 4% के स्तर पर स्थिर रखने का लक्ष्य रखा जाता है। इसके अलावा केंद्रीय बैंक विनिमय दर को ऐसे दायरे में बनाए रखने का प्रयास करता है जिससे अनावश्यक उतार-चढ़ाव न हो और आयातकों व निर्यातकों के सामने संकट पैदा न हो, क्योंकि भारतीय अर्थव्यवस्था विशेष रूप से तेल के मामले में विदेशी व्यापार पर भारी निर्भरता रखती है। केंद्रीय बैंक अपनी मौद्रिक नीति की समीक्षा और ब्याज दरों में आवश्यक समायोजन के लिए वर्ष में छह द्विमासिक बैठकें आयोजित करता है। जब मुद्रास्फीति 4% के लक्ष्य से अधिक हो जाती है, तो उधारी और खर्च को हतोत्साहित करने के लिए ब्याज दरों में बढ़ोतरी की जाती है, जिससे आम तौर पर रुपये को समर्थन मिलता है। इसके विपरीत जब मुद्रास्फीति लक्ष्य से बहुत नीचे गिर जाती है, तो ऋण प्रवाह बढ़ाने के लिए दरें घटाई जा सकती हैं, जो मुद्रा के लिए कमजोरी का कारण बन सकती हैं। विदेशी व्यापार की अहमियत को देखते हुए केंद्रीय बैंक हाजिर बाजार में प्रमुख स्तरों पर रुपये की खरीद-बिक्री करता है और अपने जोखिम को प्रबंधित करने के लिए डेरिवेटिव्स का उपयोग करता है। वैश्विक बाजारों की चाल और अमेरिकी रोजगार आंकड़ों पर नजर वैश्विक विदेशी मुद्रा बाजार में भी शुक्रवार को मिला-जुला रुख देखने को मिला। एशियाई सत्र के दौरान ऑस्ट्रेलियाई डॉलर अमेरिकी डॉलर के मुकाबले उछलकर 0.6950 के करीब पहुंच गया। अमेरिका के महत्वपूर्ण गैर-कृषि पेरोल आंकड़ों से पहले मुनाफावसूली के कारण अमेरिकी डॉलर 17 महीने के उच्च स्तर से पीछे हटा। उधर वैश्विक बॉन्ड प्रतिफल और मुद्रास्फीति के बढ़ते जोखिमों के चलते नवंबर में ब्याज दर वृद्धि की उम्मीदों से ऑस्ट्रेलियाई मुद्रा को सहारा मिला। दूसरी ओर टोक्यो सीपीआई के उम्मीद से अधिक गर्म रहने और अमेरिकी डॉलर की कमजोरी के बावजूद डॉलर-येन जोड़ी 158.00 के करीब संघर्ष करती दिखी और अपनी साप्ताहिक सीमा के ऊपरी स्तर से फिसल गई। धातु बाजार में सोने की चाल शुक्रवार को भी एक सीमित दायरे में रही और यूरोपीय सत्र की शुरुआत से पहले यह 4,200 डॉलर प्रति औंस के नीचे कारोबार करता नजर आया। व्यापारी अमेरिकी श्रम बाजार के नए आंकड़ों का इंतजार कर रहे हैं, जहां सितंबर में गैर-कृषि रोजगार में केवल 90,000 की वृद्धि का अनुमान है, जो अगस्त के 162,000 से काफी कम है। डिजिटल परिसंपत्ति बाजार में पाई नेटवर्क की कीमत में उतार-चढ़ाव जारी रहा और पिछले दिन 3% से अधिक की गिरावट के बाद यह 0.0900 डॉलर के आसपास बनी रही। चार घंटे के चार्ट पर बने पैटर्न से नीचे फिसलने का जोखिम दिख रहा है, क्योंकि यह परिसंपत्ति 0.1000 डॉलर के मनोवैज्ञानिक स्तर को पार करने में संघर्ष कर रही है। वहीं अमेरिकी श्रम सांख्यिकी ब्यूरो शुक्रवार को 12:30 जीएमटी पर सितंबर के गैर-कृषि पेरोल आंकड़े जारी करने जा रहा है, जहां बेरोजगारी दर 4.1% पर स्थिर रहने और औसत प्रति घंटा कमाई के जरिए मापी जाने वाली मासिक वेतन मुद्रास्फीति 0.3% पर रहने की संभावना जताई गई है। इसका आप पर असर कच्चे तेल की ऊंची कीमतों और ब्याज दरों में संभावित बढ़ोतरी से आम नागरिकों के मासिक बजट और लोन की किस्तों पर सीधा असर पड़ सकता है। • कर्ज की ईएमआई पर: नीतिगत दरों में बढ़ोतरी होने पर बैंक होम, ऑटो और पर्सनल लोन की ब्याज दरें बढ़ा सकते हैं। इससे उधारकर्ताओं की मासिक किस्त या लोन की अवधि तुरंत बढ़ जाएगी। • महंगाई और घरेलू बजट पर: अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कच्चा तेल महंगा रहने से पेट्रोल, डीजल और माल ढुलाई की लागत बढ़ती है। इसका सीधा असर रोजमर्रा की खाने-पीने की चीजों और उपभोक्ता वस्तुओं की कीमतों पर देखने को मिलता है। • आयात और यात्रा खर्च पर: विनिमय दर में उतार-चढ़ाव रहने से विदेशों से आने वाले इलेक्ट्रॉनिक सामान और विदेश यात्रा महंगी हो सकती है। आयात पर निर्भर उद्योगों की विनिर्माण लागत बढ़ने से अंतिम उत्पादों के दाम बढ़ सकते हैं। • फिक्स्ड डिपॉजिट निवेशकों के लिए: केंद्रीय बैंक द्वारा सख्त मौद्रिक रुख अपनाने पर बैंक अपनी जमा योजनाओं पर ब्याज दरें बढ़ा सकते हैं। इससे वरिष्ठ नागरिकों और बचतकर्ताओं को अपनी बचत पर बेहतर रिटर्न मिल सकता है। ऐसा क्यों हुआ यह स्थिति मुख्य रूप से अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा बाजार में आई तेजी, घरेलू मुद्रास्फीति में उछाल और बजट घाटे के बढ़ते दबाव की वजह से बनी है। • कच्चे तेल की भारी निर्भरता: भारत अपनी कच्चे तेल की जरूरतों का लगभग 90% हिस्सा आयात करता है और ब्रेंट क्रूड 100 डॉलर प्रति बैरल के पार बना हुआ है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ऊर्जा की ऊंची कीमतें सीधे तौर पर देश में आयातित महंगाई को बढ़ा रही हैं। • मुद्रास्फीति में तेज उछाल: अगस्त में खुदरा मुद्रास्फीति बढ़कर 4.82% और थोक महंगाई 9.92% पर पहुंच गई। केंद्रीय बैंक का लक्ष्य खुदरा मुद्रास्फीति को 4% पर रखने का है, जिससे नीतिगत सख्ती का दबाव बना है। • राजकोषीय घाटे का दबाव: चालू वित्त वर्ष के शुरुआती पांच महीनों में सरकार का घाटा वार्षिक लक्ष्य के 42% तक पहुंच गया है। बढ़ती उधारी लागत के बीच यदि सरकार का खर्च बढ़ता है, तो इससे मुद्रा पर अतिरिक्त दबाव बन सकता है। सवाल-जवाब 1. रिजर्व बैंक पर ब्याज दरें बढ़ाने का दबाव क्यों है? अगस्त में खुदरा मुद्रास्फीति बढ़कर 4.82% और थोक महंगाई 9.92% हो गई है, जबकि ब्रेंट क्रूड 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर है। इन बढ़ती कीमतों पर काबू पाने के लिए दरों में बढ़ोतरी की संभावना जताई जा रही है। 2. भारत कच्चे तेल का कितना हिस्सा आयात करता है? भारत अपनी कच्चे तेल की कुल आवश्यकता का लगभग 90% हिस्सा विदेशी बाजारों से आयात करता है। 3. चालू वित्त वर्ष की पहली तिमाही में भारत की जीडीपी वृद्धि दर क्या रही? अप्रैल से जून की तिमाही में भारत की वास्तविक जीडीपी वृद्धि दर 7.8% दर्ज की गई, जो रिजर्व बैंक के 7% के अनुमान से अधिक थी। 4. भारत का विदेशी मुद्रा भंडार किस रिकॉर्ड स्तर पर पहुंचा है? सितंबर महीने में भारत का विदेशी मुद्रा भंडार रिकॉर्ड 785.7 अरब डॉलर के स्तर पर पहुंच गया है। 5. वित्त वर्ष 2026-27 के लिए सरकार का राजकोषीय घाटा लक्ष्य क्या है? सरकार ने वित्त वर्ष 2026-27 के लिए 4.3% का राजकोषीय घाटा लक्ष्य तय किया है, जिसमें से 42% अप्रैल-अगस्त के दौरान ही खर्च हो चुका है। https://trendkia.com/market/kachche-tela-ki-mara-aura-barhate-rajakoshiya-ghate-ke-bicha-byaja-daron-para-phnsa-rbi-41884 TrendKia — Har trend, sabse pehle.