कच्चे तेल की नरमी से भारतीय रुपये में मजबूती, अमेरिकी डॉलर के मुकाबले 95.65 पर पहुंचा अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में आई हालिया गिरावट के चलते भारतीय रुपये में मजबूती देखी गई है, जिससे डॉलर के मुकाबले यह 95.65 के स्तर तक सुधरा। हालांकि पश्चिम एशिया के भू-राजनीतिक तनाव और अमेरिकी फेडरल रिजर्व के कड़े रुख के बीच विश्लेषक तेल कीमतों में सीमित गिरावट की संभावना जता रहे हैं। अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा बाजार में कच्चे तेल के भाव में चल रहे सुधारात्मक दौर के बीच मंगलवार को भारतीय रुपये ने अमेरिकी डॉलर के सामने अपनी स्थिति मजबूत की है। विदेशी मुद्रा बाजार में कारोबारी सत्र की शुरुआत के साथ ही डॉलर के मुकाबले रुपया बढ़त दर्ज करते हुए 95.65 के आसपास आ गया। भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का एक बड़ा हिस्सा आयात के जरिए पूरा करता है, इसलिए कच्चे तेल की कीमतों में आई यह नरमी घरेलू अर्थव्यवस्था और मुद्रा दोनों के लिए राहत लेकर आई है। हालांकि, पश्चिम एशिया में सऊदी अरब और हूती विद्रोहियों के बीच जारी संघर्ष तथा अमेरिकी केंद्रीय बैंक फेडरल रिजर्व के ब्याज दरों पर कड़े रुख के चलते बाजार विशेषज्ञ मान रहे हैं कि तेल की कीमतों में बहुत बड़ी गिरावट की गुंजाइश सीमित रह सकती है। घरेलू वायदा और अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल का रुख घरेलू कमोडिटी एक्सचेंज एमसीएक्स पर 19 अक्टूबर को समाप्त होने वाला कच्चे तेल का अनुबंध शुरुआती कारोबार में 1.2 प्रतिशत चढ़कर लगभग 8,940 रुपये प्रति बैरल पर पहुंच गया। इस मामूली बढ़त के बावजूद यह अनुबंध सोमवार को दर्ज किए गए अपने 12 दिनों के निचले स्तर 8,753 रुपये के करीब बना हुआ है। उधर वैश्विक बाजार में वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट चार कारोबारी सत्रों की लगातार गिरावट के सिलसिले को तोड़ते हुए कुछ खरीदारों को आकर्षित करने में सफल रहा। पिछले दिन लगभग दो सप्ताह के निचले स्तर 91.00 डॉलर से नीचे फिसलने के बाद डब्ल्यूटीआई लगभग 1.40 प्रतिशत की तेजी के साथ 93.00 डॉलर के स्तर के ठीक नीचे कारोबार करता दिखा। बाजार के लाइव आंकड़ों के अनुसार, कच्चे तेल के वैश्विक मानक अनुबंध में मौजूदा भाव 93.50 डॉलर पर चल रहा है, जो पिछले बंद स्तर 95.78 डॉलर से 2.38 प्रतिशत की गिरावट दर्शाता है। इसका 52 हफ्तों का दायरा 54.98 डॉलर से 119.48 डॉलर के बीच रहा है, जबकि ट्रेडिंग वॉल्यूम 20-दिवसीय औसत का 0.07 गुना दर्ज किया गया है। तकनीकी संकेतकों की बात करें तो 14-दिवसीय आरएसआई 51 पर तटस्थ बना हुआ है। एमएसीडी 3.88 और सिग्नल 4.28 पर होने से हिस्टोग्राम -0.40 के साथ मंदी का रुख दिखा रहा है। वहीं 20-दिवसीय ईएमए 94.77 डॉलर, 50-दिवसीय ईएमए 89.53 डॉलर और 200-दिवसीय ईएमए 79.64 डॉलर पर स्थित है, जो लंबी अवधि के अपट्रेंड और गोल्डन क्रॉस स्थिति को दर्शाते हैं। वर्तमान में बोलिंगर बैंड 78.98 डॉलर से 108.43 डॉलर के बीच फैला है, जिसका मध्य स्तर 93.70 डॉलर है। इसके अलावा 14-दिवसीय एडीएक्स 32 पर मजबूत ट्रेंड की पुष्टि करता है, जबकि 14-दिवसीय एटीआर 4.42 डॉलर पर दैनिक उतार-चढ़ाव को मापता है। प्रमुख स्तरों में पिवट 92.94 डॉलर, प्रतिरोध आर1 94.14 डॉलर और आर2 94.77 डॉलर हैं, जबकि समर्थन स्तर एस1 92.31 डॉलर और एस2 91.11 डॉलर पर मौजूद हैं। सऊदी अरब की आपूर्ति और हूती हमलों का भू-राजनीतिक जोखिम तेल बाजार पर दबाव का एक बड़ा कारण यह आशावाद रहा है कि सऊदी अरब से ऊर्जा उत्पादों की आपूर्ति में सुधार होगा, क्योंकि उसने तेल की खेप बढ़ाने के विकल्पों पर काम करने की प्रतिबद्धता जताई है। लेकिन वित्तीय विश्लेषकों का कहना है कि सऊदी अरब और ईरान समर्थित हूती विद्रोहियों के बीच जारी सैन्य टकराव के कारण कीमतों में गिरावट का दायरा सीमित हो सकता है। ओसीबीसी के विश्लेषकों के अनुसार, सप्ताहांत में सऊदी अरब पर नए हमलों के बाद कच्चे तेल की कीमतों को दोबारा सहारा मिल सकता है। हूती गुट ने राजधानी रियाद और यानबु स्थित अरामको तेल संयंत्र पर मिसाइल तथा ड्रोन हमलों का दावा किया था। सऊदी अधिकारियों ने स्पष्ट किया कि यानबु और कई अन्य रणनीतिक ठिकानों पर किए गए हमलों को नाकाम कर दिया गया और अब तक तेल बुनियादी ढांचे को कोई ताजा नुकसान नहीं पहुंचा है। इसके बावजूद ओसीबीसी का विश्लेषण रेखांकित करता है कि सप्ताहांत के इन हमलों ने ऊर्जा आपूर्ति और भू-राजनीतिक जोखिमों को जीवित रखा है, जिससे निकट भविष्य में तेल कीमतों में भारी गिरावट पर रोक लग सकती है। विश्लेषकों का स्पष्ट मानना है कि जब तक सऊदी अरब से तेल का सामान्य प्रवाह पूरी तरह बहाल नहीं होता और ऊर्जा प्रतिष्ठानों पर हमले पूरी तरह बंद नहीं होते, तब तक तेल के भाव में टिकाऊ गिरावट आना मुश्किल है। संयुक्त राष्ट्र बैठक और कूटनीतिक चर्चाओं पर टिकी निगाहें भू-राजनीतिक घटनाक्रमों के बीच न्यूयॉर्क में संयुक्त राष्ट्र महासभा की बैठक के इतर खाड़ी देशों के नेताओं और संयुक्त राज्य अमेरिका के बीच एक अहम वार्ता संभावित है। इस बैठक में शामिल पक्ष मध्य पूर्व के रास्ते तेल की वैश्विक आपूर्ति बढ़ाने के संभावित तौर-तरीकों पर विस्तार से विचार-विमर्श करेंगे। इसके साथ ही अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन के साथ मौजूदा क्षेत्रीय संघर्षों पर चर्चा करने के लिए मुलाकात होने की भी उम्मीद है। यदि इन बैठकों से कोई सकारात्मक कूटनीतिक हल निकलता है, तो वह तेल की कीमतों पर दबाव बढ़ा सकता है, जिससे दुनिया भर में महंगाई की बढ़ती आशंकाओं को शांत करने में खासी मदद मिलेगी। फेडरल रिजर्व की मौद्रिक नीति और डॉलर की चाल मुद्रा बाजार के दूसरे पहलू पर नजर डालें तो अमेरिकी फेडरल रिजर्व द्वारा ब्याज दरों को लेकर अपनाए गए सख्त रुख के चलते डॉलर को व्यापक स्तर पर मजबूती मिली है। एचएसबीसी के विश्लेषकों ने उल्लेख किया है कि फेडरल रिजर्व के नीतिगत फैसले के बाद डॉलर को अतिरिक्त बल मिला। बैंक के अनुसार वर्ष 2026 के मध्यमान 'डॉट प्लॉट' से संकेत मिलता है कि साल के अंत से पहले ब्याज दरों में एक और बढ़ोतरी हो सकती है, जबकि कई प्रतिभागी वर्ष 2027 में भी दरों में और वृद्धि की संभावना जता रहे हैं। एचएसबीसी का मानना है कि यह रास्ता केवल एक बार दर बढ़ाने के रुख से अधिक सख्त है, हालांकि यह बाजार की मौजूदा कीमतों से कुछ नीचे है। इसलिए वे डॉलर या दर अपेक्षाओं में किसी बहुत बड़े बदलाव की उम्मीद नहीं कर रहे हैं, बल्कि आने वाले आर्थिक आंकड़े इस बात की पुष्टि करेंगे कि क्या फेड अपने अनुमानित पथ पर कायम रहता है। तकनीकी स्तरों पर नजर डालें तो अमेरिकी डॉलर और भारतीय रुपये के युग्म के लिए 20-दिवसीय ईएमए 95.53 पर तत्काल समर्थन के रूप में कार्य कर रहा है, जिसके बाद अगला अहम स्तर 95.00 है। इसके विपरीत, ऊपर की ओर पिछले सप्ताह का उच्च स्तर 96.00 एक प्रमुख बाधा साबित हो सकता है। भारतीय रुपये की चाल को तय करने वाले वृहद-आर्थिक कारक भारतीय रुपया विदेशी कारकों के प्रति सबसे अधिक संवेदनशील मुद्राओं में गिना जाता है। कच्चे तेल की कीमतें, देश में आने वाला प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई और एफआईआई), और अंतरराष्ट्रीय व्यापार में अमेरिकी डॉलर का व्यापक उपयोग रुपये के मूल्य निर्धारण में अहम भूमिका निभाते हैं। इसके साथ ही भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा विदेशी मुद्रा बाजार में किया जाने वाला हस्तक्षेप और उसकी ब्याज दर नीतियां भी मुद्रा की स्थिरता तय करने में केंद्रीय भूमिका निभाती हैं। आरबीआई 4 प्रतिशत मुद्रास्फीति लक्ष्य को साधने के लिए दरों को समायोजित करता है और विनिमय दर को अत्यधिक अस्थिर होने से रोकता है ताकि व्यापार सुगम बना रहे। ऊंची ब्याज दरें आमतौर पर रुपये को मजबूती प्रदान करती हैं, जिसका मुख्य कारण 'कैरी ट्रेड' है, जिसमें निवेशक कम ब्याज दर वाले देशों से उधार लेकर भारत जैसे अपेक्षाकृत उच्च ब्याज देने वाले बाजारों में पूंजी लगाते हैं। इसके अलावा आर्थिक विकास दर (जीडीपी), व्यापार संतुलन और जोखिम लेने की वैश्विक धारणा भी रुपये को प्रभावित करती है। तेज विकास दर से विदेशी पूंजी आकर्षित होती है जिससे रुपये की मांग बढ़ती है। वहीं व्यापार घाटे में कमी भी घरेलू मुद्रा के पक्ष में काम करती है। यदि भारत में महंगाई प्रतिस्पर्धी अर्थव्यवस्थाओं की तुलना में ज्यादा बढ़ती है तो इससे रुपये का अवमूल्यन होता है, लेकिन जब आरबीआई इसके जवाब में ब्याज दरें बढ़ाता है तो विदेशी निवेशकों की लिवाली रुपये को दोबारा समर्थन दे सकती है। वैश्विक मुद्राओं, सोने और प्रमुख केंद्रीय बैंकों के फैसले एशियाई कारोबारी सत्र के दौरान अन्य प्रमुख संपत्तियों में भी हलचल देखी गई। ऑस्ट्रेलियाई रिजर्व बैंक की सहायक गवर्नर सारा हंटर और गवर्नर मिशेल बुलक की आक्रामक टिप्पणियों के बाद ऑस्ट्रेलियन डॉलर बनाम अमेरिकी डॉलर 0.7100 से ऊपर बोली आकर्षित करने में सफल रहा। हालांकि, फेड के सख्त रुख और पश्चिम एशिया के तनाव ने डॉलर को समर्थन देकर इस जोड़ी की बढ़त को सीमित रखा। दूसरी तरफ बैंक ऑफ जापान ने अपनी मौद्रिक नीति को सामान्य करने की दिशा में कदम बढ़ाते हुए 7-2 के बहुमत से अपनी अल्पकालिक ब्याज दर के लक्ष्य को 1.00 प्रतिशत से बढ़ाकर 1.25 प्रतिशत कर दिया, जो 31 वर्षों का उच्चतम स्तर है। जापानी अधिकारियों द्वारा संभावित हस्तक्षेप की आशंकाओं के बावजूद इस नरम दर वृद्धि के बाद डॉलर बनाम येन 157.50 के आसपास मामूली बढ़त के साथ कारोबार करता दिखा। कीमती धातुओं के बाजार में अमेरिकी फेडरल रिजर्व के आक्रामक नीतिगत रुख के कारण सोने में बिकवाली का दबाव देखा गया। एशियाई सत्र में मामूली बढ़त के बाद सोना फिसलकर 4,350 डॉलर प्रति औंस से नीचे आ गया, हालांकि सीमित गिरावट के संकेत अभी भी बने हुए हैं। आने वाले दिनों में बाजार की निगाहें अमेरिका और चीन के बीच ट्रंप और शी जिनपिंग के महत्वपूर्ण शिखर सम्मेलन पर भी टिकी रहेंगी। इसका आप पर असर कच्चे तेल के भाव में गिरावट से भारत के आयात खर्च में कमी आएगी, जिसका सीधा लाभ घरेलू अर्थव्यवस्था और रुपये की मजबूती के रूप में दिखेगा। • ईंधन और महंगाई पर असर: कच्चे तेल की कीमतों में नरमी रहने से पेट्रोल और डीजल के खुदरा दामों पर दबाव कम होता है। इससे परिवहन लागत नियंत्रित रहने से आम उपभोक्ताओं के लिए रोजमर्रा की वस्तुओं और खाद्य पदार्थों की महंगाई सीमित रह सकती है। • आयातकों और विदेशी यात्रियों के लिए: रुपये के 95.65 तक मजबूत होने से विदेश से सामान मंगाने वाली कंपनियों की लागत में स्थिरता आएगी। विदेश में पढ़ाई करने वाले छात्रों और यात्रा करने वाले नागरिकों को डॉलर खरीदने के लिए अपेक्षाकृत कम रुपये चुकाने होंगे। • निवेशकों और शेयर बाजार पर: रुपये की स्थिरता और तेल बिल घटने से देश का चालू खाता घाटा नियंत्रण में रहता है। इससे विदेशी संस्थागत निवेशकों का भरोसा बढ़ता है, जिसका सकारात्मक असर घरेलू इक्विटी और बॉन्ड बाजार पर देखने को मिल सकता है। • निर्यातकों के मार्जिन पर: डॉलर के मुकाबले रुपये में आने वाली मजबूती से निर्यातकों की आय में मामूली दबाव देखने को मिल सकता है। आईटी और फार्मा जैसे निर्यात-उन्मुख क्षेत्रों को अपनी विदेशी आय को भुनाते समय विनिमय दरों पर सावधानीपूर्वक नजर रखनी होगी। ऐसा क्यों हुआ कच्चे तेल में नरमी के बावजूद भू-राजनीतिक तनाव और अमेरिकी मौद्रिक नीति की सख्ती ने वैश्विक बाजार में दोहरे दबाव की स्थिति पैदा की है। • सऊदी आपूर्ति की उम्मीदें: सऊदी अरब द्वारा ऊर्जा उत्पादों की आपूर्ति बढ़ाने के वैकल्पिक रास्तों की तलाश करने की प्रतिबद्धता से वैश्विक बाजार में तेल की कीमतें नरम पड़ीं। इस आपूर्ति आशावाद के चलते कच्चे तेल में एक सुधारात्मक गिरावट का दौर शुरू हुआ। • हूती हमलों से भू-राजनीतिक जोखिम: सऊदी अरब के रियाद और यानबु स्थित अरामको तेल संयंत्र पर हूती विद्रोहियों के ड्रोन और मिसाइल हमलों ने आपूर्ति जोखिम को फिर जिंदा कर दिया है। हालांकि सऊदी अधिकारियों ने हमलों को विफल बताया, लेकिन इस तनाव ने तेल में बहुत बड़ी गिरावट पर रोक लगा दी। • फेडरल रिजर्व का आक्रामक रुख: अमेरिकी फेडरल रिजर्व के 2026 तक ब्याज दरों में अतिरिक्त बढ़ोतरी के संकेतों ने अमेरिकी डॉलर को मजबूती दी है। डॉलर के मजबूत बने रहने से गैर-अमेरिकी मुद्राओं की बढ़त पर लगाम लगी है। • आगामी कूटनीतिक वार्ताएं: न्यूयॉर्क में संयुक्त राष्ट्र महासभा के इतर खाड़ी देशों और अमेरिका की बैठक तथा ट्रंप और पेजेशकियन के बीच संभावित बातचीत पर बाजार की नजरें हैं। इन वार्ताओं के संभावित नतीजों को देखते हुए व्यापारी किसी भी बड़े एकतरफा सौदे से बच रहे हैं। सवाल-जवाब 1. मंगलवार को भारतीय रुपया अमेरिकी डॉलर के मुकाबले किस स्तर पर खुला? कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट के बीच रुपया डॉलर के मुकाबले बढ़त के साथ 95.65 के स्तर के करीब खुला। 2. एमसीएक्स पर कच्चे तेल का भाव किस स्तर पर दर्ज किया गया? एमसीएक्स पर 19 अक्टूबर को एक्सपायर होने वाला कच्चा तेल अनुबंध 1.2 प्रतिशत बढ़कर 8,940 रुपये के करीब रहा, जो 8,753 रुपये के निचले स्तर के समीप है। 3. सऊदी अरब पर किन हमलों की खबरें सामने आई हैं? हूती विद्रोहियों ने रियाद और यानबु स्थित अरामको संयंत्र पर मिसाइल व ड्रोन हमलों का दावा किया, जिसे सऊदी अधिकारियों ने विफल करने की जानकारी दी। 4. डॉलर-रुपया विनिमय दर के लिए प्रमुख तकनीकी स्तर कौन से हैं? नीचे की ओर 20-दिवसीय ईएमए 95.53 और उसके बाद 95.00 पर समर्थन है, जबकि ऊपर की तरफ 96.00 का स्तर प्रमुख बाधा बना हुआ है। 5. बैंक ऑफ जापान ने अपनी ब्याज दरों में क्या बदलाव किया? बैंक ऑफ जापान ने 7-2 के बहुमत से अपनी अल्पकालिक ब्याज दर 1.00 प्रतिशत से बढ़ाकर 1.25 प्रतिशत कर दी, जो 31 वर्षों का उच्चतम स्तर है। https://trendkia.com/market/kachche-tela-ki-narami-se-bharatiya-rupee-men-majabuti-us-dollar-ke-mukabale-95-65-para-pahuncha-36206 TrendKia — Har trend, sabse pehle.