# कच्चे तेल में उबाल से यूरो पर बना भारी दबाव, जर्मनी के मजबूत आंकड़ों के बाद भी गिरा ईयूआर/यूएसडी

> ब्रेंट क्रूड के 100 डॉलर प्रति बैरल के पार जाने से बुधवार को विदेशी मुद्रा बाजार में यूरो लुढ़ककर 1.1225 पर आ गया, जिससे जर्मन औद्योगिक उत्पादन की बढ़त बेअसर हो गई।

**Type:** article · **Category:** बाज़ार · **Published:** 2026-10-07 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/market/kachche-tela-men-ubala-se-euro-para-bana-bhari-dabava-germany-ke-majabuta-ankaron-ke-bada-bhi-gira-eur-usd-44428 · **Language:** Hindi
**Tags:** यूरो, कच्चा तेल, विदेशी मुद्रा बाजार, जर्मनी अर्थव्यवस्था, आरबीआई, अमेरिकी डॉलर, वित्त

अंतरराष्ट्रीय मुद्रा बाजार में बुधवार को साझा यूरोपीय मुद्रा ने मंगलवार को हासिल की गई अपनी शुरुआती बढ़त गंवा दी और सत्र के निचले स्तर 1.1225 पर फिसल गई। जर्मनी के विनिर्माण क्षेत्र से उम्मीद से कहीं बेहतर आंकड़े सामने आने के बावजूद वैश्विक ऊर्जा बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में आई जोरदार तेजी ने यूरो की रफ्तार पर ब्रेक लगा दिया है। पश्चिम एशिया में नए सिरे से उपजे तनाव के चलते ब्रेंट क्रूड एक बार फिर 100 डॉलर प्रति बैरल के अहम मनोवैज्ञानिक स्तर के पार निकल गया है, जिससे यूरोज़ोन के आर्थिक विकास पर गंभीर दबाव के बादल मंडराने लगे हैं।

इसी बीच अमेरिकी डॉलर अपने प्रमुख प्रतिद्वंद्वियों के मुकाबले मजबूत स्थिति में कारोबार करता दिखाई दिया, क्योंकि निवेशक अमेरिकी फेडरल रिजर्व की हालिया बैठक के मिनट्स जारी होने का बेसब्री से इंतजार कर रहे हैं। वैश्विक वित्तीय बाजारों में हल्के जोखिम-बचाव यानी रिस्क-ऑफ का माहौल हावी रहने से निवेशक सुरक्षित संपत्तियों की तरफ रुख कर रहे हैं, जिसका सीधा नुकसान यूरो को उठाना पड़ रहा है।

## जर्मनी के औद्योगिक उत्पादन में रिकवरी, लेकिन बाजार ने किया नजरअंदाज
जर्मनी के आधिकारिक सांख्यिकी कार्यालय द्वारा जारी ताजा आंकड़ों के अनुसार, देश के कारखानों के उत्पादन में सितंबर महीने के दौरान 2% का उछाल दर्ज किया गया। यह आंकड़ा विश्लेषकों के महज 0.5% की वृद्धि के अनुमान से कहीं अधिक बेहतर रहा। इसके साथ ही सितंबर की इस तेजी ने अगस्त महीने में दर्ज की गई 1.2% की गिरावट की भी काफी हद तक भरपाई कर दी। सालाना आधार पर देखा जाए तो जर्मनी का औद्योगिक उत्पादन 2.3% बढ़ा है, जबकि इससे पिछले महीने यानी अगस्त में 1.6% का संकुचन दर्ज किया गया था।

सामान्य परिस्थितियों में यूरोप की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था से आए ऐसे मजबूत आंकड़े साझा मुद्रा को मजबूती प्रदान करते, लेकिन मौजूदा सत्र में मुद्रा बाजार ने इन उत्साहवर्धक नंबरों को लगभग पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया। इसकी मुख्य वजह पश्चिम एशिया में भड़के नए भू-राजनीतिक तनाव हैं, जिन्होंने कच्चे तेल की कीमतों को दोबारा हवा दे दी है। ब्रेंट क्रूड का 100 डॉलर प्रति बैरल के ऊपर पहुंचना यूरोज़ोन की ऊर्जा लागत और मुद्रास्फीति के दृष्टिकोण से बेहद चिंताजनक माना जा रहा है। लाइव मार्केट आंकड़ों के अनुसार, कच्चे तेल का भाव वर्तमान में 90.10 डॉलर प्रति बैरल पर दर्ज किया गया है, जो पिछले बंद भाव 89.44 डॉलर से 0.74% अधिक है। इसका 52 हफ्तों का दायरा 54.98 डॉलर से 119.48 डॉलर के बीच रहा है, जबकि तकनीकी स्तर पर 14-दिवसीय आरएसआई 46 और दैनिक पिवट 90.11 डॉलर पर स्थित है।

## फ्रांस के राजकोषीय वादों से मिली राहत हुई बेअसर
यूरो को मंगलवार के सत्र में कुछ समय के लिए बड़ी राहत मिली थी, जब फ्रांस में अगले वर्ष होने वाले राष्ट्रपति चुनाव की दौड़ में शीर्ष पर मानी जा रहीं दक्षिणपंथी नेता मरीन ले पेन ने खर्च में कटौती की एक बड़ी योजना का ऐलान किया था। ले पेन ने आने वाले पांच वर्षों में 140 अरब यूरो बचाने और 2030 तक देश के राजकोषीय घाटे को मौजूदा 5.1% से घटाकर 3% से नीचे लाने का संकल्प लिया।

इस राजकोषीय योजना से उत्साहित होकर निवेशकों ने फ्रांसीसी सरकारी बॉन्ड में खरीदारी की, जिससे उनकी यील्ड कई दशकों के रिकॉर्ड उच्च स्तर से पीछे हट गई। इस घटनाक्रम के दम पर ईयूआर/यूएसडी सोमवार को दर्ज किए गए 17 महीने के निचले स्तर 1.1160 से उबरकर 1.1200 के ऊपरी दायरे तक उछलने में कामयाब रहा था। हालांकि, ऊर्जा संकट के गहराते जोखिम के आगे यह राजनीतिक राहत अल्पकालिक साबित हुई और बुधवार को बिकवाली फिर लौट आई।

## अन्य वैश्विक मुद्राओं और संपत्तियों की स्थिति
वैश्विक वित्तीय बाजार के अन्य हिस्सों में भी व्यापक हलचल देखने को मिल रही है। एशियाई कारोबारी सत्र में ऑस्ट्रेलियाई डॉलर अमेरिकी डॉलर के मुकाबले 0.7000 के नीचे नकारात्मक रुख के साथ कारोबार करता रहा। रिजर्व बैंक ऑफ ऑस्ट्रेलिया की आक्रामक ब्याज दर उम्मीदों के बावजूद अमेरिकी बॉन्ड यील्ड में आई तेजी ने डॉलर इंडेक्स को सहारा दिया, जिससे एयूडी/यूएसडी दबाव में बना रहा।

जापानी येन के मुकाबले अमेरिकी डॉलर डेढ़ हफ्ते के उच्च स्तर के करीब 158.50 पर ट्रेड करता दिखा। बैंक ऑफ जापान के नरम रुख वाले बयानों और अमेरिकी ट्रेजरी यील्ड में बढ़ोतरी ने यूएसडी/जेपीवाई को मजबूती दी। दूसरी तरफ, सोने की कीमतों में भी बिकवाली का दबाव बना रहा और यह 4,100 डॉलर प्रति औंस के करीब अपने दो महीने के निचले स्तर के आसपास स्थिर रहा। क्रिप्टो बाजार में डॉगकॉइन 5% से अधिक गिरकर 0.090 डॉलर के आसपास आ गया, जहां शॉर्ट पोजीशन एक महीने के शीर्ष पर पहुंच गई हैं।

## भारतीय रिजर्व बैंक का फैसला और ईसीबी की दुविधा
भारतीय रुपये की बात करें तो रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया के मौद्रिक नीति निर्णय के बाद घरेलू मुद्रा अमेरिकी डॉलर के मुकाबले 96.37 के स्तर पर काफी हद तक स्थिर बनी रही। अपनी हालिया नीतिगत समीक्षा बैठक में आरबीआई ने अपनी प्रमुख रेपो दर को 25 आधार अंक बढ़ाकर 5.5% करने का फैसला किया, जो फरवरी 2023 के बाद केंद्रीय बैंक की पहली दर वृद्धि है।

इधर यूरोप में, यूरोपीय सेंट्रल बैंक के सामने असाधारण चुनौती खड़ी हो गई है। सामान्य परिस्थितियों में अगर मुद्रास्फीति लक्ष्य से लगभग दोगुनी रफ्तार से भाग रही हो, तो ईसीबी के पास ब्याज दरें बढ़ाने का सीधा रास्ता होता है। लेकिन वर्तमान परिस्थितियां सामान्य नहीं हैं। बॉन्ड बाजार पहले ही यील्ड बढ़ाकर वित्तीय सख्ती का एक हिस्सा खुद ही अंजाम दे चुका है, जिसके कारण ईसीबी के नीति निर्माताओं के सामने आर्थिक मंदी और बेलगाम महंगाई के बीच संतुलन साधने की पेचीदा दुविधा खड़ी हो गई है।

## इसका आप पर असर
कच्चे तेल की कीमतें 100 डॉलर के पार जाने और वैश्विक मुद्रा बाजार में डॉलर के मजबूत होने से आयात लागत तथा ईंधन खर्च में बढ़ोतरी का खतरा बढ़ गया है।

- **भारत में प्रभाव:** कच्चे तेल की ऊंची कीमतें भारत के आयात बिल को बढ़ा सकती हैं, जिससे आने वाले समय में पेट्रोल और डीजल के दामों पर ऊपर की ओर दबाव बन सकता है। भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा रेपो दर बढ़ाकर 5.5% करने से होम लोन और ऑटो लोन की ईएमआई भी महंगी हो जाएगी।
- **वैश्विक यात्रियों और छात्रों पर:** अमेरिकी डॉलर के मुकाबले यूरो और अन्य मुद्राओं में उतार-चढ़ाव से विदेश में पढ़ाई और यात्रा के बजट पर सीधा असर पड़ेगा। मुद्रा विनिमय दरों में बदलाव के चलते अंतरराष्ट्रीय लेनदेन करते समय अतिरिक्त लागत वहन करनी पड़ सकती है।
- **घरेलू निवेशकों और ट्रेडर्स के लिए:** विदेशी मुद्रा और कमोडिटी बाजार में जारी अस्थिरता के बीच आयात-आधारित कंपनियों के शेयरों के मार्जिन पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है। निवेशकों को बॉन्ड यील्ड और केंद्रीय बैंकों के नीतिगत बयानों पर नजर बनाए रखनी चाहिए।

## ऐसा क्यों हुआ
यूरो में आई इस गिरावट और मुद्रा बाजार में डॉलर के दबदबे के पीछे मुख्य कारण पश्चिम एशिया का भू-राजनीतिक संकट और ऊर्जा कीमतों में तेज उछाल है।

- **भू-राजनीतिक तनाव और कच्चा तेल:** पश्चिम एशिया में नए सिरे से तनाव भड़कने के चलते आपूर्ति बाधाओं की आशंका बढ़ गई, जिससे ब्रेंट क्रूड 100 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गया। यूरोप ऊर्जा आयात पर काफी हद तक निर्भर है, इसलिए महंगे ईंधन ने यूरोज़ोन की आर्थिक सेहत पर सीधा प्रहार किया।
- **जर्मन आंकड़ों की अनदेखी:** हालांकि जर्मनी का औद्योगिक उत्पादन सितंबर में 2% बढ़ा, लेकिन ऊर्जा संकट के डर ने इन सकारात्मक आंकड़ों के प्रभाव को पूरी तरह दबा दिया। निवेशकों को आशंका है कि यदि तेल की कीमतें ऊंची बनी रहीं तो यूरोपीय कारखानों की लागत बेतहाशा बढ़ जाएगी।
- **अमेरिकी बॉन्ड यील्ड और फेड का रुख:** अमेरिकी ट्रेजरी यील्ड में नए सिरे से आई तेजी और आगामी फेड मिनट्स से पहले सुरक्षित निवेश के रूप में अमेरिकी डॉलर की मांग बढ़ गई। इससे यूरो और ऑस्ट्रेलियाई डॉलर जैसी अन्य प्रमुख मुद्राओं पर बिकवाली हावी रही।

## सवाल-जवाब

### 1. ईयूआर/यूएसडी में बुधवार को गिरावट क्यों आई?
कच्चे तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल के पार जाने और अमेरिकी डॉलर में मजबूती आने से यूरो गिरकर 1.1225 के स्तर पर आ गया।

### 2. जर्मनी के औद्योगिक उत्पादन के आंकड़े कैसे रहे?
जर्मनी के कारखानों का उत्पादन सितंबर में 2% बढ़ा, जिसने अगस्त की 1.2% की गिरावट को पलट दिया और 0.5% के अनुमान को पीछे छोड़ दिया।

### 3. मरीन ले पेन की घोषणा से यूरो पर क्या असर पड़ा था?
मरीन ले पेन द्वारा 140 अरब यूरो के खर्च में कटौती की योजना से फ्रांसीसी बॉन्ड यील्ड घटी थी और यूरो उछलकर 1.1200 के पार गया था।

### 4. भारतीय रिजर्व बैंक ने अपनी नीतिगत बैठक में क्या फैसला लिया?
आरबीआई ने रेपो दर में 25 आधार अंकों की बढ़ोतरी कर इसे 5.5% कर दिया, जो फरवरी 2023 के बाद पहली दर वृद्धि है।

### 5. यूरोपीय सेंट्रल बैंक के सामने क्या बड़ी चुनौती है?
बॉन्ड बाजार द्वारा पहले ही वित्तीय स्थितियां सख्त किए जाने के कारण ईसीबी के सामने उच्च मुद्रास्फीति से निपटने में दुविधा पैदा हो गई है।

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