मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव के बीच यूएस डॉलर इंडेक्स 101.00 के करीब पहुंचा अमेरिका और ईरान के बीच स्ट्रेट ऑफ होर्मुज़ को लेकर बढ़ते तनाव ने अमेरिकी डॉलर की गिरावट को थाम लिया है, जिससे यूएस डॉलर इंडेक्स 101.00 के करीब स्थिर बना हुआ है। कच्चे तेल की कीमतों में भारी उछाल और ब्याज दरों की अटकलों के बीच वैश्विक वित्तीय बाजार इस भू-राजनीतिक संकट पर कड़ी नजर रख रहे हैं। गुरुवार के शुरुआती यूरोपीय ट्रेडिंग सेशन में यूएस डॉलर इंडेक्स (DXY) 101.00 के महत्वपूर्ण स्तर के आसपास बना हुआ है। लाइव मार्केट डेटा के अनुसार, इस एसेट का मौजूदा भाव 101.04 पर है, जो पिछले क्लोजिंग स्तर 101.14 के मुकाबले 0.10% की मामूली गिरावट को दर्शाता है। यह इंडेक्स छह प्रमुख वैश्विक मुद्राओं की बास्केट के मुकाबले अमेरिकी डॉलर की ताकत को मापता है। वर्तमान में वैश्विक बाजारों में रिस्क सेंटिमेंट (जोखिम लेने की भावना) में काफी सुधार देखने को मिल रहा है, जिसका सीधा असर डॉलर पर बिकवाली के दबाव के रूप में पड़ा है। जब निवेशकों का भरोसा बढ़ता है, तो वे आमतौर पर डॉलर जैसे सुरक्षित निवेश (सेफ-हेवन एसेट) से पैसा निकालकर ज्यादा रिटर्न देने वाले जोखिम भरे विकल्पों की ओर रुख करते हैं। लेकिन, डॉलर की इस गिरावट को अमेरिका और ईरान के बीच तेजी से बढ़ रहे भू-राजनीतिक तनाव ने मजबूती से थाम लिया है। इन गंभीर अंतरराष्ट्रीय चिंताओं के कारण अमेरिकी डॉलर को एक मजबूत सपोर्ट मिला है, जिससे साफ पता चलता है कि जब भी दुनिया में अस्थिरता का खतरा मंडराता है, तो बाजार का मिजाज कितनी तेजी से बदल सकता है। भू-राजनीतिक तनाव और कच्चे तेल की कीमतों में उछाल मिडिल ईस्ट में तनाव अब अपने चरम पर पहुंच गया है, और इसका सीधा असर दुनिया भर की करेंसी और कमोडिटी की कीमतों पर पड़ रहा है। इस विवाद का सबसे बड़ा केंद्र स्ट्रेट ऑफ होर्मुज़ है, जो एक बेहद अहम समुद्री मार्ग है। दुनिया भर में रोजाना इस्तेमाल होने वाले कच्चे तेल का एक बहुत बड़ा हिस्सा इसी रास्ते से होकर गुजरता है। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक बेहद सख्त और स्पष्ट चेतावनी जारी करते हुए कहा है कि अगर ईरान स्ट्रेट ऑफ होर्मुज़ से गुजरने वाले किसी भी कमर्शियल या सैन्य जहाज को निशाना बनाता है, तो अमेरिकी सेना इसके जवाब में ईरान के अंदर एक पुल या पावर प्लांट को नष्ट कर देगी। अमेरिका के इस सीधे अल्टीमेटम के जवाब में ईरान ने भी कड़ा पलटवार किया है। ईरान की सरकार ने साफ शब्दों में बयान दिया है कि अगर उसे उकसाया गया, तो वह पूरे मिडिल ईस्ट क्षेत्र में फैले बुनियादी ढांचे (इंफ्रास्ट्रक्चर) और ऊर्जा ठिकानों पर हमला करने से बिल्कुल पीछे नहीं हटेगा। दोनों देशों के बीच चल रही इस खतरनाक जुबानी जंग का सीधा असर ग्लोबल एनर्जी मार्केट पर पड़ा है। इसी तनाव के कारण कच्चे तेल की कीमतों में भारी उछाल आया है और यह 11 जून के बाद अपने सबसे ऊंचे स्तर पर पहुंच गया है। तेल के दामों में इस तरह की तेज बढ़ोतरी सीधे तौर पर वैश्विक महंगाई बढ़ने का डर पैदा करती है, क्योंकि महंगा ईंधन कंज्यूमर गुड्स और ट्रांसपोर्टेशन की लागत को काफी बढ़ा देता है। फॉरेक्स मार्केट के नजरिए से यह एक बेहद अहम घटनाक्रम है, क्योंकि महंगाई बढ़ने की आशंका के चलते फेडरल रिज़र्व (Fed) ब्याज दरों को ऊंचे स्तर पर बनाए रखने या उन्हें और बढ़ाने के लिए मजबूर हो सकता है, जो अंततः अमेरिकी डॉलर के लिए एक बड़े सहारे का काम करेगा। तकनीकी विश्लेषण और डॉलर के अहम स्तर तकनीकी नजरिए से देखें, तो यूएस डॉलर इंडेक्स अभी भी सतर्कता के साथ बुलिश (तेजी वाले) ट्रेंड में बना हुआ है। लाइव चार्टिंग डेटा के मुताबिक, यह एसेट अपने 100-दिवसीय सिंपल मूविंग एवरेज (SMA) के ऊपर मजबूती से टिका हुआ है, जो कि मीडियम-टर्म ट्रेंड की दिशा तय करने वाला एक अहम इंडिकेटर है। लाइव आंकड़ों की बात करें तो 200-दिवसीय SMA 99.08 पर और 50-दिवसीय SMA 100.18 पर है। यहां ध्यान देने वाली सबसे बड़ी बात यह है कि 50-दिवसीय SMA ने 200-दिवसीय SMA को पार करते हुए एक बुलिश गोल्डन क्रॉस पैटर्न बनाया है, जो लॉन्ग-टर्म में डॉलर की मजबूती का बहुत साफ संकेत देता है। कीमत इस समय बोलिंजर बैंड्स (20,2) के दायरे में है, जिसकी निचली सीमा 100.58 और ऊपरी सीमा 101.50 पर है, जबकि प्राइस 101.04 पर बिल्कुल इसके मध्य में स्थित है। 14-दिन के चार्ट पर रिलेटिव स्ट्रेंथ इंडेक्स (RSI) 56 पर है, जो इसे न्यूट्रल से लेकर पॉजिटिव जोन में रखता है। इसका मतलब है कि बाजार में खरीदारी का दबाव तो मौजूद है, लेकिन यह कोई बहुत आक्रामक या ओवरबॉट स्थिति नहीं है। एवरेज डायरेक्शनल इंडेक्स (ADX) फिलहाल 23 पर है, जो बताता है कि इस समय ट्रेंड थोड़ा कमजोर है या बाजार एक सीमित दायरे में कारोबार कर रहा है। वहीं, स्टोकास्टिक ऑसिलेटर में फास्ट लाइन 71 पर और सिग्नल लाइन 70 पर देखी जा रही है। अगर अहम तकनीकी स्तरों की बात करें, तो ट्रेडर्स की नजर तुरंत ऊपर मौजूद रेजिस्टेंस पर है। डॉलर के लिए पहली बड़ी बाधा 101.45 के स्तर पर है, जो ऊपरी बोलिंजर बैंड के बेहद करीब है। अगर दैनिक आधार पर कीमत इसके ऊपर बंद होने में कामयाब रहती है, तो यह 24 जून के हाई लेवल 101.80 को फिर से टेस्ट कर सकता है। यह 101.80 का स्तर डॉलर के 52-हफ्ते की रेंज का सबसे ऊपरी बिंदु भी है। अगर खरीदारी का सिलसिला इसके बाद भी जारी रहता है, तो मार्केट साइकोलॉजी कीमत को 102.00 के बड़े मनोवैज्ञानिक स्तर तक आसानी से खींच सकती है। दूसरी तरफ, अगर बाजार में बिकवाली हावी होती है, तो डॉलर को 100.60 के आसपास शुरुआती सपोर्ट मिलने की उम्मीद है, जो निचले बोलिंजर बैंड से थोड़ा ही ऊपर है। लाइव पिवट पॉइंट डेटा के मुताबिक, आज का मुख्य पिवट स्तर 101.04 पर है, जबकि नीचे की तरफ सपोर्ट लेवल S1 100.95 और S2 100.85 पर स्थित हैं। हालांकि, डॉलर की तेजी बरकरार रखने के लिए सबसे अहम लेवल 100.00 का मनोवैज्ञानिक आंकड़ा है, जिसके नीचे 99.65 के आसपास 100-दिवसीय SMA का मजबूत सपोर्ट बेस भी मौजूद है। एवरेज ट्रू रेंज (ATR) फिलहाल 0.41 पर है, जो डॉलर की रोजाना की वोलैटिलिटी (उतार-चढ़ाव) को अच्छे से दर्शाता है। ट्रेडर्स अपना स्टॉप-लॉस सेट करते समय इस आंकड़े का इस्तेमाल बफर के रूप में कर सकते हैं। वैश्विक प्रणाली में अमेरिकी डॉलर का दबदबा डीएक्सवाई (DXY) के इस भारी उतार-चढ़ाव की अहमियत को पूरी तरह से समझने के लिए, वैश्विक वित्तीय प्रणाली में अमेरिकी डॉलर के एकछत्र राज को समझना बेहद जरूरी है। यूएसडी केवल संयुक्त राज्य अमेरिका की आधिकारिक करेंसी नहीं है, बल्कि यह दुनिया के कई अन्य देशों में एक डी फैक्टो करेंसी के रूप में भी काम करती है, जहां यह स्थानीय नोटों के साथ धड़ल्ले से इस्तेमाल होती है। इंटरनेशनल ट्रेड और विदेशी मुद्रा बाजारों में इसका दबदबा सबसे ज्यादा है। साल 2022 के व्यापक आंकड़ों के अनुसार, अमेरिकी डॉलर दुनिया में सबसे ज्यादा ट्रेड होने वाली करेंसी है। ग्लोबल फॉरेक्स मार्केट के कुल टर्नओवर में इसकी हिस्सेदारी 88% से भी ज्यादा है, जिसका सीधा मतलब है कि हर दिन औसतन 6.6 ट्रिलियन डॉलर का विशाल लेन-देन सिर्फ इसी मुद्रा में होता है। इसकी यही भारी लिक्विडिटी यह सुनिश्चित करती है कि यूएसडी सीमा पार निवेश और अंतरराष्ट्रीय कर्ज लेने-देने का सबसे प्रमुख जरिया हमेशा बना रहे। डॉलर ने यह अभूतपूर्व वित्तीय सर्वोच्चता रातों-रात हासिल नहीं की है। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद आए बड़े भू-राजनीतिक बदलावों के बीच अमेरिकी डॉलर ने ब्रिटिश पाउंड को पछाड़ते हुए दुनिया की मुख्य रिज़र्व करेंसी का शानदार दर्जा हासिल किया था। युद्ध के बाद के उस मुश्किल दौर में वैश्विक व्यापार को एक बहुत ही स्थिर सहारे की जरूरत थी। आधुनिक वित्तीय इतिहास के एक बड़े हिस्से में यह स्थिरता कीमती धातुओं के जरिए सुनिश्चित की गई थी, क्योंकि अमेरिकी डॉलर भौतिक रूप से गोल्ड द्वारा पूरी तरह समर्थित था। यह प्रणाली 1971 के एक ऐतिहासिक मोड़ तक मजबूती से चलती रही। बढ़ते घाटे और बेलगाम महंगाई के भारी दबाव में आकर अमेरिकी सरकार ने गोल्ड स्टैंडर्ड को आधिकारिक तौर पर पूरी तरह खत्म कर दिया, जिससे ऐतिहासिक ब्रेटन वुड्स एग्रीमेंट पूरी तरह से टूट गया। इसके ठीक बाद यूएसडी पूरी तरह से एक फिएट करेंसी बन गया, जिसकी वैल्यू अब सोने से नहीं, बल्कि अमेरिकी सरकार के भरोसे और उसकी अर्थव्यवस्था की वास्तविक ताकत से तय होती है। फेडरल रिज़र्व और अमेरिकी मौद्रिक नीति मौजूदा फिएट करेंसी के इस आधुनिक दौर में अमेरिकी डॉलर की वैल्यू तय करने वाला सबसे अहम कारक संयुक्त राज्य अमेरिका के केंद्रीय बैंक यानी फेडरल रिज़र्व की मौद्रिक नीति है। फेडरल रिज़र्व अमेरिकी कांग्रेस द्वारा सौंपे गए दो मुख्य लक्ष्यों पर दिन-रात काम करता है। इसका पहला उद्देश्य देश में कीमतों में स्थिरता लाना है, जिसका मतलब है लंबी अवधि में महंगाई दर को ठीक 2% के लक्ष्य पर बनाए रखना। वहीं, इसका दूसरा सबसे बड़ा उद्देश्य घरेलू अर्थव्यवस्था में ज्यादा से ज्यादा रोजगार के अवसर पैदा करना है। फेडरल रिज़र्व इन दोनों विपरीत लक्ष्यों के बीच सही संतुलन बनाने के लिए मुख्य रूप से अपनी बेंचमार्क ब्याज दरों में बदलाव का असरदार हथियार इस्तेमाल करता है। फेड की इस नीति के काम करने का तरीका सिद्धांत रूप में तो सीधा है, लेकिन हकीकत में लागू करने में यह काफी जटिल होता है। जब अर्थव्यवस्था में जरूरत से ज्यादा तेजी आती है, कीमतें तेजी से बढ़ने लगती हैं और महंगाई 2% के तय लक्ष्य को पार कर जाती है, तब फेडरल रिज़र्व आमतौर पर ब्याज दरों में बढ़ोतरी कर देता है। कर्ज महंगा होने से आर्थिक गतिविधियां तुरंत धीमी पड़ जाती हैं, लेकिन फॉरेक्स ट्रेडर्स के लिए इसका एक बड़ा फायदा यह होता है कि अमेरिकी डॉलर वाले एसेट्स में निवेश पर अब पहले से ज्यादा रिटर्न मिलने लगता है। इस बढ़े हुए यील्ड के लालच में दुनिया भर का पैसा अमेरिकी बाजार की तरफ तेजी से खिंचने लगता है, जिससे डॉलर की डिमांड और वैल्यू दोनों बढ़ जाती है। इसके बिल्कुल उलट, जब महंगाई दर 2% के लक्ष्य से बहुत नीचे गिर जाती है या फिर बेरोजगारी दर खतरनाक स्तर तक पहुंच जाती है, तो यह पूरी अर्थव्यवस्था के संकट में होने का स्पष्ट संकेत देता है। ऐसी स्थिति में, फेडरल रिज़र्व कर्ज लेने और निवेश को बढ़ावा देने के लिए ब्याज दरों में भारी कटौती करता है। रिटर्न कम होने की वजह से अंतरराष्ट्रीय निवेशकों के लिए डॉलर का आकर्षण काफी घट जाता है, जिसका सीधा नतीजा अक्सर डॉलर की वैल्यू में गिरावट के रूप में सामने आता है। क्वांटिटेटिव ईज़िंग और टाइटनिंग का तंत्र अर्थव्यवस्था जब किसी बहुत ही गंभीर संकट में फंस जाती है, तो सिर्फ ब्याज दरों में बदलाव से काम बिल्कुल नहीं चलता। ऐसी गंभीर स्थितियों से निपटने के लिए फेडरल रिज़र्व ने कुछ गैर-पारंपरिक और बड़े मौद्रिक हथियारों का एक विशेष सेट तैयार किया है। इनमें सबसे चर्चित नाम क्वांटिटेटिव ईज़िंग (QE) का है। जब अर्थव्यवस्था में नई जान फूंकने के लिए ब्याज दरों में कटौती का कोई भी असर नहीं होता—अक्सर ऐसा तब होता है जब दरें पहले से ही शून्य के बहुत करीब हों—तब फेडरल रिज़र्व भौतिक रूप से और ज्यादा नए डॉलर छापना शुरू कर देता है। हालांकि, वह इस नकदी को सीधे जनता में बिल्कुल नहीं बांटता। इसके बजाय, वह क्यूई का सहारा लेता है, जो एक ऐसी जटिल प्रक्रिया है जिसे ठप पड़े वित्तीय सिस्टम में भारी मात्रा में क्रेडिट फ्लो बढ़ाने के लिए विशेष तौर पर डिज़ाइन किया गया है। क्वांटिटेटिव ईज़िंग के तहत, केंद्रीय बैंक नए छापे गए पैसों का इस्तेमाल करके बड़े वित्तीय संस्थानों से सीधे तौर पर लंबी अवधि की सिक्योरिटीज (ज्यादातर अमेरिकी सरकारी बॉन्ड और मॉर्गेज-बैक्ड सिक्योरिटीज) बहुत बड़े पैमाने पर खरीदता है। फेड की इस गैर-मानक नीति का इस्तेमाल खास तौर पर तब किया जाता है जब क्रेडिट मार्केट पूरी तरह से सूख जाता है। ऐसा आमतौर पर तब होता है जब बैंक एक-दूसरे के डिफॉल्ट होने के डर से आपस में बिल्कुल कर्ज देना बंद कर देते हैं। ऐसे समय में क्यूई संकटमोचक की अहम भूमिका निभाता है। यह पूरी बैंकिंग सिस्टम को नकदी से लबालब भर देता है और लंबी अवधि की ब्याज दरों को बहुत नीचे लाने का भारी दबाव बनाता है। 2008 के ग्रेट फाइनेंशियल क्राइसिस के दौरान क्रेडिट क्रंच से निपटने के लिए फेड ने इसी हथियार का सबसे ज्यादा इस्तेमाल किया था। हालांकि यह कदम जमे हुए बाजारों को फिर से खोलने में काफी कारगर साबित होता है, लेकिन बाजार में नई करेंसी की भारी सप्लाई डॉलर की असली वैल्यू को हमेशा कम कर देती है। यही वजह है कि लंबी अवधि में क्वांटिटेटिव ईज़िंग के कारण अमेरिकी डॉलर आमतौर पर संरचनात्मक रूप से काफी कमजोर होता है। इस पूरी प्रक्रिया का ठीक उल्टा रूप क्वांटिटेटिव टाइटनिंग (QT) है। जब अर्थव्यवस्था किसी भी संकट से पूरी तरह उबर कर पटरी पर आ जाती है और केंद्रीय बैंक को लगता है कि उसे अपनी बैलेंस शीट को फिर से सामान्य करना चाहिए और बाजार से अतिरिक्त नकदी तुरंत निकालनी चाहिए, तब वह क्यूटी लागू करता है। यह पूरी तरह से एक उल्टी प्रक्रिया है: इसमें फेडरल रिज़र्व वित्तीय संस्थानों से नए बॉन्ड खरीदना पूरी तरह से बंद कर देता है। इसके अलावा, फेड के पास पहले से मौजूद जो पुराने बॉन्ड मैच्योर हो रहे होते हैं, उनके प्रिंसिपल अमाउंट को भी वह दोबारा बाजार में बिल्कुल निवेश नहीं करता। इस तरह वह एक तरह से उस अतिरिक्त पैसे को नष्ट कर देता है जो क्यूई के दौरान बनाया गया था। वित्तीय प्रणाली से नकदी सोखने और जनता के लिए उपलब्ध बॉन्ड की भारी सप्लाई बढ़ाने से, क्यूटी आम तौर पर यील्ड पर ऊपर की तरफ बहुत दबाव डालता है। ऐतिहासिक रूप से देखा गया है कि क्वांटिटेटिव टाइटनिंग अमेरिकी डॉलर की वैल्यू के लिए एक बेहद सकारात्मक और उसे मजबूत करने वाला अहम कारक होता है। व्यापक फॉरेक्स मार्केट: GBP और EUR का प्रदर्शन भले ही सारा ध्यान अमेरिकी डॉलर पर बहुत ज्यादा केंद्रित है, लेकिन विस्तृत करेंसी मार्केट में अन्य क्षेत्रीय घटनाओं का भी काफी गहरा असर देखा जा रहा है। अमेरिकी डॉलर के मुकाबले ब्रिटिश पाउंड (GBP/USD) इस समय रिकवरी की जोरदार कोशिश कर रहा है और एशियाई ट्रेडिंग घंटों के दौरान यह 1.3385 के स्तर के आसपास लगातार कारोबार कर रहा है। हालांकि, इस अहम पेयर की इस बढ़त की सीमा काफी सीमित लग रही है। ब्रिटेन से हाल ही में आए महंगाई के ताजा आंकड़ों ने विशेषज्ञों के अनुमानों से बहुत कम नतीजे दिखाए हैं, जो पाउंड के लिए एक बड़ी बाधा बन रहे हैं। महंगाई दर नरम पड़ने से बैंक ऑफ इंग्लैंड पर बहुत ज्यादा सख्त मौद्रिक नीति बनाए रखने का दबाव काफी कम हो गया है, जिससे पाउंड का यील्ड आकर्षण काफी घट रहा है। इसके अलावा, मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव के कारण निवेशकों का रुझान एक बार फिर सुरक्षित निवेश के रूप में अमेरिकी डॉलर की तरफ तेजी से हो गया है, जिससे पाउंड की बढ़त पर ब्रेक लग गया है। फॉरेक्स ट्रेडर्स अब कोई भी बड़ा दांव लगाने से बच रहे हैं और शुक्रवार को आने वाली यूके रिटेल सेल्स रिपोर्ट का बेसब्री से इंतजार कर रहे हैं। इस खास रिपोर्ट से ब्रिटिश उपभोक्ताओं की आर्थिक सेहत को लेकर बहुत ही अहम संकेत मिलने की पूरी उम्मीद है। इसी बीच, डॉलर के मुकाबले यूरो काफी ज्यादा मजबूती दिखा रहा है। EUR/USD पेयर ने अपनी हालिया शानदार बढ़त को लगातार दूसरे दिन भी बरकरार रखा है और एशियाई सेशन के दौरान यह 1.1410 के आंकड़े के आसपास मजबूती से ट्रेड कर रहा है। यूरोप की साझा करेंसी को एक बहुत मजबूत संस्थागत सपोर्ट मिल रहा है, क्योंकि बाजार के बड़े निवेशक खुद को यूरोपियन सेंट्रल बैंक के बहुप्रतीक्षित ब्याज दर के बड़े फैसले से पहले ही सही पोजीशन में ला रहे हैं। ईसीबी के भविष्य के अहम दिशा-निर्देशों और दरों में संभावित बदलाव को लेकर बाजार में चल रही भारी अटकलें फिलहाल यूरो को एक मजबूत आधार प्रदान कर रही हैं, वह भी तब जब अमेरिकी डॉलर खुद काफी मजबूत स्थिति में खड़ा है। कमोडिटी बाजार और क्रिप्टो सेक्टर का लचीलापन कमोडिटी सेक्टर की बात करें तो कीमती धातुओं का बाजार इस वक्त एक सीमित दायरे में सिमटता दिख रहा है। हमेशा से सबसे सुरक्षित निवेश माने जाने वाले गोल्ड की कीमतें एशियाई ट्रेडिंग सेशन के दौरान 4,100 डॉलर के अहम मनोवैज्ञानिक स्तर के ऊपर बिल्कुल स्थिर बनी हुई हैं। पीली धातु में पिछले कारोबारी दिन अपने दो हफ्ते से अधिक के उच्चतम स्तर को छूने के बाद जो हल्की सी गिरावट आई थी, वह अब पूरी तरह रुक गई है। दुनिया भर में छाई भारी भू-राजनीतिक अनिश्चितता सोने की कीमतों को लगातार एक मजबूत स्ट्रक्चरल बिड प्रदान कर रही है, जिससे इसमें किसी भी बड़ी गिरावट की संभावना बहुत कम हो गई है। अंत में, डिजिटल एसेट (क्रिप्टोकरेंसी) का बाजार व्यापक आर्थिक दबावों से बिल्कुल अलग अपनी एक नई कहानी गढ़ने की जोरदार कोशिश कर रहा है। बिटवाइज़ के चीफ इन्वेस्टमेंट ऑफिसर मैट होगन का स्पष्ट मानना है कि क्रिप्टोकरेंसी बाजार में अगली बड़ी तेजी (बुल मार्केट) रिटेल सट्टेबाजी से बिल्कुल नहीं, बल्कि ब्लॉकचेन आधारित वित्तीय बुनियादी ढांचे और पारंपरिक वित्त प्रणालियों के तेजी से आपस में जुड़ने से ही आएगी। मंगलवार देर रात पब्लिश हुई एक बहुत ही विस्तृत रिपोर्ट में होगन ने एक मजबूत तर्क पेश करते हुए कहा कि क्रिप्टो सेक्टर इस समय स्ट्रक्चरल मार्केट बॉटम के शुरुआती और स्पष्ट संकेत दे रहा है। उन्होंने परफॉर्मेंस में एक बड़े अंतर को मुख्य सबूत के तौर पर पेश किया: 1 जुलाई से अब तक बिटकॉइन ने 9% की बहुत शानदार बढ़त हासिल की है। यह असाधारण मजबूती तब देखने को मिली है जब नैस्डैक 100 इंडेक्स द्वारा दर्शाए गए पारंपरिक टेक-शेयरों में 6% की भारी गिरावट दर्ज की गई है। ऑल्टकॉइन स्पेस के भीतर, कुछ खास टोकन बेहद अहम तकनीकी मोड़ों से होकर गुजर रहे हैं। रिपल (XRP) और स्टेलर (XLM) दोनों ही टोकन बहुत अधिक सतर्कता के साथ अपने प्रमुख तकनीकी सपोर्ट और रेजिस्टेंस स्तरों के ठीक ऊपर मंडरा रहे हैं। XRP इस समय अपने 50-दिवसीय एक्सपोनेंशियल मूविंग एवरेज (EMA) पर मौजूद ऊपरी रेजिस्टेंस को सीधे तौर पर भारी वॉल्यूम के साथ टेस्ट कर रहा है। अगर यह इस स्तर को पार कर लेता है, तो बाजार की दिशा पूरी तरह बदल सकती है। दूसरी ओर, XLM का लंबे समय से चला आ रहा कंसोलिडेशन का सुस्त दौर अभी भी जारी है और यह 0.187 डॉलर के सपोर्ट जोन से पूरी तरह चिपका हुआ है। इन सबके बीच, विस्तृत क्रिप्टो डेरिवेटिव्स बाजार का कुल सेंटिमेंट काफी मिला-जुला बना हुआ है, हालांकि इसमें गिरावट (बेयरिश) का हल्का सा झुकाव लगातार बना हुआ है। डेरिवेटिव्स के ये ताजा आंकड़े यह साफ बताते हैं कि बड़े संस्थागत और रिटेल ट्रेडर्स दोनों ही इस समय बहुत ज्यादा सतर्क हैं, और अपना पैसा बचाकर चल रहे हैं, जिससे निकट भविष्य में पूरे क्रिप्टो मार्केट की अगली स्पष्ट दिशा का सही अनुमान लगाना बेहद मुश्किल हो गया है। इसका आप पर असर • वैश्विक निवेशकों के लिए: भू-राजनीतिक तनाव ने डॉलर की गिरावट को थाम लिया है, जिससे फॉरेक्स मार्केट में बहुत ज्यादा उतार-चढ़ाव देखने को मिल रहा है; मिडिल ईस्ट की कोई भी खबर कीमतों में अचानक बदलाव ला सकती है। • आम उपभोक्ताओं के लिए: अमेरिका और ईरान के बीच तनाव के कारण कच्चे तेल की कीमतों में आए उछाल से महंगाई बढ़ने का खतरा पैदा हो गया है, जिसका सीधा असर पेट्रोल-डीजल और रोजमर्रा के सामानों की बढ़ती कीमतों के रूप में आपकी जेब पर पड़ सकता है। • कर्ज लेने वालों और बचतकर्ताओं के लिए: अगर कच्चे तेल के कारण महंगाई ऊंचे स्तर पर बनी रहती है, तो फेडरल रिज़र्व लंबे समय तक ब्याज दरों को ऊंचा रख सकता है; इसका मतलब है कि होम लोन और क्रेडिट कार्ड का कर्ज महंगा ही रहेगा, जबकि एफडी (FD) और बचत खातों पर अच्छा रिटर्न मिलता रहेगा। सवाल-जवाब 1. यूएस डॉलर इंडेक्स (DXY) फिलहाल 101.00 के आसपास क्यों मंडरा रहा है? ग्लोबल रिस्क सेंटिमेंट में सुधार के कारण डॉलर पर दबाव है, लेकिन अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव ने इसकी गिरावट को थाम रखा है। 2. डोनाल्ड ट्रंप ने स्ट्रेट ऑफ होर्मुज़ को लेकर क्या चेतावनी दी है? डोनाल्ड ट्रंप ने सख्त चेतावनी दी है कि अगर ईरान ने स्ट्रेट ऑफ होर्मुज़ में किसी जहाज को निशाना बनाया, तो अमेरिका इसके जवाब में ईरान का एक पुल या पावर प्लांट नष्ट कर देगा। 3. मिडिल ईस्ट के तनाव का कच्चे तेल की कीमतों पर क्या असर हो रहा है? ऊर्जा बुनियादी ढांचे पर हमले की धमकियों और बढ़ते तनाव के कारण कच्चे तेल की कीमतों उछलकर 11 जून के बाद से अपने उच्चतम स्तर पर पहुंच गई हैं। 4. यूएस डॉलर इंडेक्स के लिए अहम तकनीकी स्तर कौन से हैं? डॉलर के लिए तुरंत ऊपर की तरफ 101.45 पर एक बड़ा रेजिस्टेंस है, जबकि नीचे की तरफ शुरुआती सपोर्ट 100.60 के आसपास देखा जा रहा है। 5. मैट होगन के अनुसार अगली क्रिप्टो बुल मार्केट का कारण क्या होगा? बिटवाइज़ के अधिकारी मैट होगन का मानना है कि ब्लॉकचेन आधारित वित्तीय ढांचे और पारंपरिक फाइनेंस सिस्टम के आपस में जुड़ने से क्रिप्टो बाजार में अगली बड़ी तेजी आएगी। 6. नैस्डैक 100 की तुलना में हाल ही में बिटकॉइन का प्रदर्शन कैसा रहा है? 1 जुलाई से पारंपरिक टेक-शेयरों वाले नैस्डैक 100 इंडेक्स में 6% की गिरावट आई है, जबकि इसके ठीक उलट बिटकॉइन ने 9% की शानदार बढ़त हासिल की है। https://trendkia.com/market/middle-east-men-barhate-tanava-ke-bicha-us-dollar-index-101-00-ke-kariba-pahuncha-10115 TrendKia — Har trend, sabse pehle.