राज़दार बैंकर्स पर बढ़ता सियासी शिकंजा और डॉलर की दहाड़ से पस्त होते वैश्विक बाजार राज़दार संस्थानों और केंद्रीय बैंकों पर राजनीतिक दबाव गहराने के बीच अमेरिकी डॉलर की जबरदस्त मजबूती ने सोना, यूरो और एशियाई मुद्राओं पर भारी दबाव बना दिया है। दुनिया भर के वित्तीय तंत्र को दिशा देने वाले केंद्रीय बैंकों की स्वायत्तता पर गंभीर राजनीतिक सवाल खड़े होने लगे हैं। वैश्विक अर्थव्यवस्था के सबसे मजबूत स्तंभ माने जाने वाले इन नीतिगत संस्थानों की भूमिका में आने वाले दिनों में संरचनात्मक बदलाव देखने को मिल सकते हैं। राजकोषीय फैसलों और आर्थिक नीतियों को लेकर नीति निर्माताओं तथा केंद्रीय बैंकों के बीच खींचतान लगातार तेज हो रही है। इसी राजनीतिक दबाव के बीच, विदेशी मुद्रा बाजार और वैश्विक परिसंपत्तियों में अमेरिकी डॉलर का एकतरफा दबदबा देखने को मिल रहा है, जिसने सर्राफा बाजार से लेकर डिजिटल टोकन तक सभी को प्रभावित किया है। केंद्रीय बैंकों पर राजनीतिक घेराबंदी और सुधार की मांग आर्थिक विश्लेषकों का मानना है कि केंद्रीय बैंक राजनीतिक अर्थव्यवस्था के ऐसे अनिवार्य अंग हैं, जिनकी कार्यप्रणाली पर अब राजनीतिक दायरे से सीधे हमले हो रहे हैं। इसी क्रम में, यूनाइटेड किंगडम की पूर्व प्रधानमंत्री ट्रस ने एक हालिया साक्षात्कार में दोबारा यह दावा किया कि उन्हें एक ऐसे उदारवादी डीप स्टेट द्वारा सत्ता से बाहर करने के लिए मजबूर किया गया, जिसमें बैंक ऑफ इंग्लैंड भी शामिल था। ट्रस ने तर्क दिया कि उन्होंने बैंक ऑफ इंग्लैंड में व्यापक प्रशासनिक और नीतिगत सुधार करने की चेतावनी दी थी, जिसके चलते उन्हें पद छोड़ना पड़ा। यह बयान इस बात को स्पष्ट करता है कि राजनेताओं और स्वतंत्र मौद्रिक नियामकों के बीच अविश्वास की खाई कितनी चौड़ी हो चुकी है। कच्चे तेल से भड़की महंगाई और अमेरिकी बॉन्ड यील्ड का असर मुद्रा बाजार में इस समय अमेरिकी फेडरल रिजर्व की ब्याज दरों को लेकर जारी अटकलें केंद्र में बनी हुई हैं। हालिया पर्सनल कंजम्पशन एक्सपेंडिचर यानी पीसीई आंकड़ों ने अक्टूबर में फेड की ओर से ब्याज दरें बढ़ाए जाने की संभावनाओं को कुछ हद तक शांत जरूर किया है, लेकिन ऊर्जा संकट ने नई चुनौतियां खड़ी कर दी हैं। कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों के कारण महंगाई दोबारा भड़कने का खतरा मंडरा रहा है, जिससे अमेरिकी ट्रेजरी यील्ड लगातार कई वर्षों के उच्चतम स्तर पर टिकी हुई है। बॉन्ड बाजार से मिलने वाला यह ऊंचा प्रतिफल डॉलर को अतिरिक्त मजबूती दे रहा है, जिससे गैर-यील्ड वाली संपत्तियों और अन्य प्रतिस्पर्धी मुद्राओं से निवेशकों का रुझान घट रहा है। सोने की चमक पर डॉलर का साया सर्राफा बाजार में सोने की कीमतें लगातार संघर्ष के दौर से गुजर रही हैं। यूरोपीय सत्र के पहले पहर के दौरान सोना 4,200 डॉलर के दायरे में एक मामूली इंट्राडे बढ़त बनाने की कोशिश करता दिखा, लेकिन यह तेजी ज्यादा देर तक टिक नहीं सकी और पीली धातु दिन के कारोबार में लगभग सपाट स्तर पर बनी रही। बुधवार को जारी हुए अमेरिका के कमजोर मुद्रास्फीति आंकड़ों के बावजूद निवेशक डॉलर की खरीदारी में जुटे रहे। अमेरिकी सरकारी बॉन्ड यील्ड के नए बहु-वर्षीय शिखर पर पहुंचने के कारण निवेशकों के लिए सोना रखना कम आकर्षक साबित हो रहा है, जिससे इसकी मांग सीमित बनी हुई है। डॉलर के सामने एशियाई और ऑस्ट्रेलियाई मुद्राओं की सुस्ती विदेशी मुद्रा बाजार में ऑस्ट्रेलियाई डॉलर अमेरिकी मुद्रा के सामने दो महीने के निचले स्तर के करीब सुस्ता रहा है। गुरुवार के एशियाई कारोबारी सत्र में यह जोड़ी 0.6900 के मध्य दायरे के आसपास कारोबार करती देखी गई। ऑस्ट्रेलिया का व्यापार अधिशेष अगस्त महीने में तेजी से सिकुड़कर 495 मिलियन ऑस्ट्रेलियाई डॉलर रह गया। हालांकि इस तेज गिरावट का ऑस्ट्रेलियाई डॉलर पर बहुत अधिक सीधा असर नहीं पड़ा, क्योंकि बाजार की दिशा पूरी तरह से डॉलर की मजबूती से तय हो रही है। दूसरी तरफ, जापानी मुद्रा के मुकाबले अमेरिकी डॉलर गुरुवार को एशियाई सत्र में 158.00 के पार अपने साप्ताहिक दायरे के ऊपरी सिरे पर टिका रहा। नरम पीसीई आंकड़ों के बावजूद बॉन्ड यील्ड में नरमी नहीं आने और अमेरिका-ईरान के बीच बढ़ते तनाव ने डॉलर को सुरक्षित निवेश का मजबूत जरिया बना दिया है। इस भू-राजनीतिक टकराव के कारण सुरक्षित ठिकाना तलाश रहे निवेशक डॉलर में पूंजी लगा रहे हैं। डॉलर का यह चौतरफा प्रभाव बैंक ऑफ जापान की आक्रामक ब्याज दर नीतियों और जापानी अधिकारियों द्वारा बाजार में हस्तक्षेप के जोखिमों पर पूरी तरह भारी पड़ रहा है। यूरो ऐतिहासिक गिरावट की ओर और डिजिटल परिसंपत्तियों में सुस्ती यूरोपीय मुद्रा के लिए भी हालात बेहद चुनौतीपूर्ण बने हुए हैं। अमेरिकी डॉलर के मुकाबले यूरो गिरकर मई 2025 के बाद के अपने सबसे निचले स्तर पर पहुंच गया है। बुधवार को यूरो फिसलकर 1.1312 के स्तर तक आ गया, जो कि जनवरी के 1.2082 के शिखर से काफी नीचे है। यूरो में आई यह भारी गिरावट मजबूत अमेरिकी डॉलर, भू-राजनीतिक अनिश्चितता और यूरोप के सामने खड़ी महंगी ऊर्जा लागत का सीधा परिणाम है। हालांकि, यूरोज़ोन में आने वाला महंगाई का एक नया झटका इस साझा मुद्रा को अप्रत्याशित राहत दे सकता है। क्रिप्टोकरेंसी बाजार में भी संस्थागत पूंजी की निकासी का असर देखा गया। हाइपरलिक्विड यानी एचवाईपीई गुरुवार को 2 प्रतिशत गिर गया, जिससे पिछले दिन हासिल की गई 5 प्रतिशत की बढ़त का एक बड़ा हिस्सा खत्म हो गया। संस्थागत निवेशकों की मांग कमजोर पड़ने और बुधवार को 5 मिलियन डॉलर की भारी निकासी दर्ज होने से निकट अवधि में धारणा प्रभावित हुई है। तकनीकी दृष्टिकोण से एचवाईपीई पर मिलाजुला रुख बना हुआ है क्योंकि इसका भाव 90 डॉलर के स्तर के नीचे ही सीमित बना हुआ है। इसका आप पर असर अमेरिकी डॉलर और बॉन्ड यील्ड में लगातार हो रही बढ़ोतरी से भारतीय मुद्रा और आयात पर खर्च बढ़ने का सीधा जोखिम पैदा होता है। • भारत में: कच्चे तेल की कीमतों और मजबूत डॉलर से देश का आयात बिल महंगा हो सकता है। इससे घरेलू बाजार में ईंधन और अन्य आयातित वस्तुओं की कीमतों पर ऊपर की ओर दबाव बना रह सकता है। • निवेशकों के लिए: अमेरिकी बॉन्ड यील्ड के ऊंचे स्तर पर बने रहने से सोने और डिजिटल टोकन जैसी गैर-ब्याज वाली संपत्तियों में रिटर्न सीमित रह सकता है। बाजार के भागीदार डॉलर आधारित संपत्तियों और ऋण प्रतिभूतियों में अधिक पूंजी लगा सकते हैं। • विदेशी व्यापार पर: डॉलर के मुकाबले प्रमुख वैश्विक मुद्राओं की कमजोरी से भारतीय निर्यातकों को नए मूल्य निर्धारण की रणनीतियां अपनानी पड़ सकती हैं। विदेशी मुद्रा में किए जाने वाले भुगतान और व्यापारिक सौदों में उतार-चढ़ाव बढ़ सकता है। • वैश्विक यात्रियों और छात्रों के लिए: अंतरराष्ट्रीय स्तर पर डॉलर की क्रय शक्ति बढ़ने से विदेश में पढ़ाई और यात्रा की लागत बढ़ सकती है। छात्रों को ट्यूशन फीस और रहने के खर्च के लिए अतिरिक्त बजट तैयार रखना पड़ सकता है। ऐसा क्यों हुआ वैश्विक बाजारों में मची इस हलचल के पीछे राजनीतिक खींचतान, कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों से उपजी महंगाई की आशंका और अमेरिका-ईरान तनाव मुख्य कारण हैं। • बॉन्ड प्रतिफल में तेजी: अमेरिकी मुद्रास्फीति के आंकड़ों में नरमी के बावजूद ऊर्जा कीमतों में उछाल ने महंगाई की नई लहर का डर पैदा कर दिया है। इसी वजह से सरकारी बॉन्ड यील्ड कई वर्षों के रिकॉर्ड स्तर पर टिकी हुई है। • भू-राजनीतिक जोखिम: संयुक्त राज्य अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते गतिरोध ने निवेशकों को जोखिम भरी संपत्तियों से दूर कर दिया है। अनिश्चितता के दौर में वैश्विक पूंजी डॉलर को सबसे सुरक्षित ठिकाना मानकर वहां पहुंच रही है। • संस्थागत पूंजी की निकासी: क्रिप्टोकरेंसी परिसंपत्ति एचवाईपीई में बुधवार को दर्ज हुई 5 मिलियन डॉलर की पूंजी निकासी ने दर्शाया है कि बड़े निवेशक जोखिम भरे बाजारों से अपना मुनाफा निकाल रहे हैं। • केंद्रीय बैंकों पर राजनीतिक असंतोष: यूनाइटेड किंगडम की पूर्व प्रधानमंत्री ट्रस जैसे नेताओं द्वारा बैंक ऑफ इंग्लैंड पर सीधे आरोप लगाने से यह साफ हो गया है कि मौद्रिक नीतिगत फैसलों का राजनीतिक विरोध बढ़ रहा है। सवाल-जवाब 1. पूर्व ब्रिटिश प्रधानमंत्री ट्रस ने बैंक ऑफ इंग्लैंड को लेकर क्या दावा किया? उन्होंने दावा किया कि बैंक ऑफ इंग्लैंड में व्यापक सुधार की चेतावनी देने के बाद उन्हें उदारवादी डीप स्टेट द्वारा पद से बाहर करने पर मजबूर किया गया था। 2. सोने की कीमतों में तेजी क्यों नहीं टिक पा रही है? अमेरिकी बॉन्ड यील्ड के बहु-वर्षीय शिखर पर पहुंचने के कारण निवेशकों का आकर्षण गैर-यील्ड वाली सोने की धातु के प्रति घट गया है। 3. यूएसडी/जेपीवाई जोड़ी 158.00 से ऊपर क्यों बनी हुई है? ऊंची बॉन्ड यील्ड और अमेरिका-ईरान तनाव के चलते डॉलर को सुरक्षित निवेश का समर्थन मिल रहा है, जो जापानी बैंक की सख्ती पर भारी पड़ा है। 4. अगस्त में ऑस्ट्रेलिया के व्यापार अधिशेष में क्या बदलाव आया? ऑस्ट्रेलिया का व्यापार अधिशेष अगस्त में तेजी से सिकुड़कर 495 मिलियन ऑस्ट्रेलियाई डॉलर रह गया। 5. यूरो गिरकर किस स्तर पर पहुंच गया है? यूरो बुधवार को फिसलकर 1.1312 के स्तर तक आ गया, जो कि मई 2025 के बाद का सबसे निचला स्तर है। 6. क्रिप्टो टोकन एचवाईपीई में कितनी गिरावट दर्ज की गई? एचवाईपीई में गुरुवार को 2 प्रतिशत की गिरावट आई और बुधवार को इससे 5 मिलियन डॉलर की संस्थागत निकासी देखी गई। https://trendkia.com/market/razadara-bainkarsa-para-barhata-siyasi-shiknja-aura-dollar-ki-dahara-se-pasta-hote-vaishvika-bajara-41198 TrendKia — 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