रिजर्व बैंक के दखल और कच्चे तेल में नरमी से भारतीय रुपये को मिला सहारा, 96 के करीब थमी गिरावट कच्चे तेल की कीमतों में आई हालिया गिरावट और भारतीय रिजर्व बैंक के निरंतर हस्तक्षेप से अमेरिकी डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपया 96 के स्तर के आसपास स्थिर बना हुआ है। हालांकि पश्चिम एशिया में भू-राजनीतिक तनाव और आगामी अमेरिकी मुद्रास्फीति आंकड़ों के चलते मुद्रा बाजार में सतर्कता बनी हुई है। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा बाजार में बुधवार को भारतीय रुपया अमेरिकी डॉलर के मुकाबले 96.00 के आसपास सपाट स्तर पर कारोबार करता दिखाई दिया। ऊर्जा बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में आई नरमी और भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा विदेशी मुद्रा विनिमय बाजार में किए जा रहे निरंतर हस्तक्षेप ने घरेलू मुद्रा को बड़ा सहारा प्रदान किया है। भारत अपनी घरेलू पेट्रोलियम जरूरतों के लिए भारी पैमाने पर आयात पर निर्भर रहता है, लिहाजा जब भी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कच्चे तेल के भाव में गिरावट दर्ज की जाती है, तब भारतीय अर्थव्यवस्था और रुपये दोनों को चालू खाता घाटे के मोर्चे पर उल्लेखनीय राहत मिलती है। हालांकि अमेरिका और ईरान के बीच कूटनीतिक सुलह की घटती उम्मीदों के बीच तेल की कीमतों में दोबारा उछाल आने का जोखिम बरकरार है, जिससे मुद्रा बाजार में कारोबारी लगातार सतर्क रुख अपनाए हुए हैं। कमोडिटी बाजार में नरमी और कच्चे तेल का प्रवाह बुधवार के शुरुआती कारोबारी सत्र के दौरान मल्टी कमोडिटी एक्सचेंज यानी एमसीएक्स पर 19 अक्टूबर को समाप्त होने वाला क्रूड ऑयल अनुबंध 0.45 प्रतिशत की गिरावट के साथ लगभग 8,635 रुपये प्रति बैरल के आसपास देखा गया। वैश्विक स्तर पर ब्रेंट क्रूड में पहले आई तेजी के थमने का मुख्य कारण आपूर्ति में हुआ आंशिक सुधार रहा है। डॉयचे बैंक के विश्लेषकों का आकलन है कि सऊदी अरब द्वारा अपनी ईस्ट-वेस्ट पाइपलाइन के जरिए लगभग आधी आपूर्ति बहाल किए जाने के बाद अंतरराष्ट्रीय कीमतों में आई तीखी तेजी पर ब्रेक लगा है। वहीं गोल्डमैन सैक्स के एक हालिया शोध नोट के मुताबिक सितंबर के महीने में दोगुना होने के बाद फारस की खाड़ी से होने वाला कच्चा तेल निर्यात, जिसमें गैर-पारंपरिक या डार्क निर्यात भी शामिल है, सुधरकर अपने 2025 के औसत स्तर पर लौट आया है। इन कारकों ने आपूर्ति की तात्कालिक चिंताओं को कुछ हद तक शांत किया है। बाजार के लाइव ट्रेडिंग आंकड़ों पर नजर डालें तो कमोडिटी सेगमेंट में क्रूड ऑयल अनुबंध वर्तमान में 90.91 डॉलर प्रति बैरल पर पहुंच गया है, जो पिछले बंद भाव 89.38 डॉलर के मुकाबले 1.71 प्रतिशत की दैनिक बढ़त दर्शाता है। इसका 52 सप्ताह का निचला स्तर 54.98 डॉलर और उच्चतम स्तर 119.48 डॉलर रहा है, जबकि मौजूदा कारोबारी मात्रा इसके 20 दिनों के औसत का 0.68 गुना दर्ज की गई है। तकनीकी स्तरों के विश्लेषण के अनुसार 14-दिवसीय आरएसआई 47 के स्तर पर है और 20-दिवसीय एक्सपोनेंशियल मूविंग एवरेज यानी ईएमए 93.50 डॉलर तथा 50-दिवसीय ईएमए 90.08 डॉलर पर स्थित है, जो 200-दिवसीय ईएमए 80.47 डॉलर से ऊपर बना हुआ है। दैनिक पिवट स्तर 90.48 डॉलर पर है, जहां पहला रेजिस्टेंस 92.39 डॉलर (R1) और दूसरा 93.86 डॉलर (R2) पर दिखाई देता है, जबकि निचला सपोर्ट 89.01 डॉलर (S1) और 87.10 डॉलर (S2) पर रेखांकित है। भू-राजनीतिक अनिश्चितता और होर्मुज जलडमरूमध्य का गतिरोध कच्चे तेल की कीमतों में आए हालिया सुधार के बावजूद ऊर्जा बाजार के विशेषज्ञ इसे स्थायी मानने से बच रहे हैं। रणनीतिकारों का मानना है कि वर्ष 2026 के बाद भी तेल की कीमतों में दोबारा तीव्र उछाल आने का खतरा बना हुआ है, क्योंकि अमेरिका और ईरान के बीच निकट भविष्य में कूटनीतिक समाधान निकलने की संभावनाएं काफी क्षीण हो चुकी हैं। डॉयचे बैंक के अनुसार होर्मुज जलडमरूमध्य के जल्द खुलने को लेकर बाजार में गहरा संशय बना हुआ है, जिसके चलते वैश्विक निवेशक अगले साल के लिए भी ऊंचे कच्चे तेल के दामों का अनुमान लगाकर अपनी रणनीति बना रहे हैं। इसके अलावा कतर की मध्यस्थता में चल रहे कूटनीतिक प्रयासों से भी कोई ठोस नतीजा नहीं निकल सका है। एक्सिओस के विवरण के अनुसार कतरी मध्यस्थों द्वारा अमेरिका और ईरान के बीच तनाव घटाने की कोशिशों में इस हफ्ते बेहद मामूली प्रगति देखी गई है, क्योंकि दोनों में से कोई भी पक्ष अपनी घोषित शर्तों से पीछे हटने को तैयार नहीं है। इस तरह के गतिरोध बने रहने से ऊर्जा आपूर्ति श्रृंखला में नई रुकावटें आ सकती हैं, जिससे अंतरराष्ट्रीय तेल कीमतें एक बार फिर तेज रफ्तार पकड़ सकती हैं और आयात प्रधान अर्थव्यवस्थाओं पर मुद्रास्फीति का दबाव बढ़ा सकती हैं। अमेरिकी पीसीई मुद्रास्फीति डेटा और फेडरल रिजर्व की मौद्रिक नीति विदेशी मुद्रा बाजार के कारोबारी अब अमेरिकी पर्सनल कंजम्पशन एक्सपेंडिचर्स यानी पीसीई प्राइस इंडेक्स के अगस्त महीने के आंकड़ों की प्रतीक्षा कर रहे हैं, जो वैश्विक समयानुसार 12:30 जीएमटी पर जारी होने हैं। अमेरिकी केंद्रीय बैंक फेडरल रिजर्व के लिए कोर पीसीई मुद्रास्फीति का सबसे पसंदीदा पैमाना मानी जाती है। बाजार को उम्मीद है कि कोर पीसीई सालाना आधार पर 3.3 प्रतिशत पर स्थिर बनी रहेगी, हालांकि मासिक आधार पर इसके 0.3 प्रतिशत की तेज गति से बढ़ने का अनुमान है, जबकि पूर्व पठन में यह 0.2 प्रतिशत दर्ज की गई थी। यह आर्थिक आंकड़ा फेडरल रिजर्व की भविष्य की ब्याज दर नीति को दिशा देने में अत्यंत महत्वपूर्ण साबित होगा। वर्तमान में वित्तीय बाजार इस बात को लेकर आश्वस्त दिखाई दे रहे हैं कि फेडरल रिजर्व अपनी सख्त मौद्रिक नीति के चक्र को आगे भी जारी रखेगा। वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति में आ रही बाधाओं और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी एआई क्षेत्र की तीव्र वृद्धि से उत्पन्न नई मांग के कारण अर्थव्यवस्था में मुद्रास्फीति के दबाव लगातार बने हुए हैं, जिससे नीतिगत दरों में आक्रामक कटौती की संभावनाओं को झटका लगा है। यूएसडी/आईएनआर चार्ट का तकनीकी परिदृश्य दैनिक तकनीकी चार्ट पर नजर डालें तो अमेरिकी डॉलर और भारतीय रुपये की विनिमय दर (USD/INR) 95.9755 के स्तर पर कारोबार कर रही है। यह जोड़ी अपने 20-दिवसीय एक्सपोनेंशियल मूविंग एवरेज (ईएमए) 95.6996 से ऊपर बनी हुई है, जो अल्पावधि में हल्की तेजी के रुख का संकेत देती है। हाल के कारोबारी सत्रों के दौरान विनिमय दर लगातार ऊपर की ओर बढ़ने का प्रयास करती रही है। चार्ट पर रिलेटिव स्ट्रेंथ इंडेक्स यानी आरएसआई वर्तमान में 59.8 के स्तर पर सकारात्मक दायरे में बना हुआ है और अभी ओवरबॉट स्थिति का संकेत नहीं दे रहा है। इसका मतलब है कि तकनीकी तौर पर डॉलर में बढ़त की गुंजाइश अभी बाकी है, जबकि किसी भी गिरावट की स्थिति में 20-दिवसीय ईएमए से सहारा मिलने की संभावना है। नीचे की तरफ पहला प्रमुख सपोर्ट 95.70 के ईएमए के करीब स्थित है, जहां खरीदारी की सक्रियता दोबारा देखने को मिल सकती है। ऊपर की तरफ तत्काल कोई मजबूत तकनीकी प्रतिरोध स्तर मौजूद न होने से यह तेजी जारी रह सकती है, लेकिन यदि दैनिक आधार पर विनिमय दर 20-दिवसीय ईएमए से नीचे बंद होती है, तो यह मौजूदा तेजी के कमजोर पड़ने और सुधारात्मक गिरावट का संकेत होगा। रुपये के मूल्य निर्धारण में विदेशी कारकों और भारतीय रिजर्व बैंक की भूमिका भारतीय रुपया अंतरराष्ट्रीय बाजार में सबसे अधिक संवेदनशील मुद्राओं में गिना जाता है, जिस पर वैश्विक घटनाओं का सीधा असर पड़ता है। देश की ऊर्जा जरूरतों के लिए कच्चे तेल का आयात, अधिकांश अंतरराष्ट्रीय व्यापार का अमेरिकी डॉलर में संचालित होना और विदेशी पूंजी प्रवाह की मात्रा रुपये के मूल्य को तय करने वाले सबसे बड़े कारक हैं। इन परिस्थितियों में भारतीय रिजर्व बैंक विदेशी मुद्रा विनिमय बाजार में सक्रिय रूप से हस्तक्षेप करता है ताकि विनिमय दर में होने वाले भारी उतार-चढ़ाव को थामा जा सके और आयात-निर्यात व्यापार को सुचारु रूप से जारी रखा जा सके। रिजर्व बैंक अपनी ब्याज दरों के समायोजन के जरिए मुद्रास्फीति को 4 प्रतिशत के लक्ष्य के दायरे में बनाए रखने की कोशिश करता है। सामान्य तौर पर जब घरेलू स्तर पर ब्याज दरें ऊंची होती हैं, तो इससे रुपये को मजबूती मिलती है। ऐसा कैरी ट्रेड के कारण होता है, जहां अंतरराष्ट्रीय निवेशक कम ब्याज दर वाले देशों से उधार लेकर भारत जैसे अधिक प्रतिफल वाले देशों में पूंजी लगाते हैं और अंतर से मुनाफा कमाते हैं। इसके अतिरिक्त देश की जीडीपी विकास दर, व्यापार संतुलन और प्रत्यक्ष तथा अप्रत्यक्ष विदेशी निवेश यानी एफडीआई और एफआईआई का प्रवाह रुपये की मजबूती के लिए बेहद अनुकूल माहौल तैयार करते हैं। हालांकि जब घरेलू महंगाई साथी देशों की तुलना में अधिक हो जाती है, तो यह मुद्रा के आंतरिक मूल्य में कमी लाती है और व्यापार घाटा बढ़ाकर विनिमय दर पर नकारात्मक दबाव डालती है। वैश्विक मुद्रा, धातु और क्रिप्टो बाजारों का व्यापक रुख बुधवार के कारोबारी सत्र में केवल भारतीय रुपया ही नहीं, बल्कि दुनिया भर के अन्य प्रमुख परिसंपत्ति वर्गों में भी मिला-जुला और सतर्क रुख देखने को मिला। एशियाई सत्र में ऑस्ट्रेलियाई डॉलर अमेरिकी मुद्रा के मुकाबले गिरकर दो महीने के निचले स्तर 0.6950 के पास आ गया, क्योंकि ऑस्ट्रेलिया के उम्मीद से कमजोर अगस्त अंतर्निहित सीपीआई आंकड़ों ने वहां के केंद्रीय बैंक द्वारा ब्याज दरों में बढ़ोतरी की उम्मीदों पर पानी फेर दिया। इसके साथ ही चीन के कमजोर पीएमआई आंकड़ों ने भी ऑस्ट्रेलियाई डॉलर को सहारा नहीं दिया। दूसरी तरफ जापानी येन में डॉलर के मुकाबले मजबूती देखी गई और यूएसडी/जेपीवाई 157.00 के नीचे बना रहा, जिसे बैंक ऑफ जापान की सख्त नीतिगत अपेक्षाओं और संभावित सरकारी हस्तक्षेप के डर से समर्थन मिला। कीमती धातुओं में सोने की कीमतों में आठ सप्ताह के निचले स्तर 4,110 डॉलर प्रति औंस से आई पूर्व उछाल के बाद स्थिरता देखी गई, हालांकि अमेरिकी एडीपी रोजगार आंकड़ों और कोर पीसीई इंडेक्स के जारी होने से पहले यह 4,200 डॉलर के मनोवैज्ञानिक स्तर से नीचे कारोबार करता दिखा। क्रिप्टोकरेंसी बाजार में भी हालिया रिकॉर्ड स्तरों के बाद तेजी की रफ्तार धीमी पड़ी है। प्रमुख डिजिटल परिसंपत्ति बिटकॉइन को 85,000 डॉलर के स्तर के पास कड़े प्रतिरोध का सामना करना पड़ रहा है, जबकि इथेरियम लगभग 2,674 डॉलर और एक्सआरपी 1.500 डॉलर के स्तर पर सीमित दायरे में बने हुए हैं, जहां ट्रेडर अगली बड़ी चाल के संकेतों का इंतजार कर रहे हैं। इसका आप पर असर अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में नरमी और रुपये में स्थिरता से देश में पेट्रोल-डीजल की कीमतों और आयातित सामानों की लागत पर सीधा असर पड़ता है। • भारत में उपभोक्ताओं पर असर: कच्चे तेल के 90 डॉलर के आसपास टिके रहने से सरकारी तेल कंपनियों पर ईंधन के दाम तुरंत बढ़ाने का दबाव कम होता है। इससे आम नागरिकों को आने वाले हफ्तों में पेट्रोल और डीजल के खुदरा भाव में स्थिरता देखने को मिल सकती है। • आयातित सामान और इलेक्ट्रॉनिक्स: डॉलर के मुकाबले रुपये के 96 के आसपास स्थिर रहने से आयात महंगा होने की रफ्तार धीमी हो जाती है। विदेश से आने वाले स्मार्टफोन, लैपटॉप और इलेक्ट्रॉनिक कलपुर्जों के दाम अचानक नहीं बढ़ेंगे। • विदेश में पढ़ाई और यात्रा: विदेश में पढ़ाई कर रहे भारतीय छात्रों के लिए ट्यूशन फीस और रहने का खर्च स्थिर बना रहेगा। छात्रों के परिवारों को डॉलर में फीस भेजने के लिए अचानक अतिरिक्त बजट नहीं जुटाना पड़ेगा। • शेयर और कमोडिटी निवेशक: कच्चे तेल और मुद्रा में सीमित उतार-चढ़ाव से घरेलू शेयर बाजार में विदेशी संस्थागत निवेशकों की भारी बिकवाली पर लगाम लगेगी। कमोडिटी ट्रेडर्स एमसीएक्स पर 8,635 रुपये के सपोर्ट स्तर को ध्यान में रखकर अपनी रणनीति बना सकते हैं। ऐसा क्यों हुआ यह स्थिति मुख्य रूप से भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा विदेशी मुद्रा बाजार में किए गए सक्रिय हस्तक्षेप और मध्य पूर्व में पाइपलाइन आपूर्ति की आंशिक बहाली के कारण बनी है। इसके साथ ही भू-राजनीतिक गतिरोध और आगामी अमेरिकी मुद्रास्फीति आंकड़ों ने बाजार को एक सीमित दायरे में बांध रखा है। • केंद्रीय बैंक का सक्रिय दखल: भारतीय रिजर्व बैंक ने डॉलर की बढ़ती मांग को पूरा करने के लिए विदेशी मुद्रा बाजार में लगातार तरलता उपलब्ध कराई है। इस सतत हस्तक्षेप ने सट्टेबाजी पर रोक लगाकर रुपये को 96 के स्तर पर थामे रखा है। • सऊदी पाइपलाइन और निर्यात बहाली: सऊदी अरब द्वारा अपनी ईस्ट-वेस्ट पाइपलाइन के जरिए लगभग 50 प्रतिशत आपूर्ति बहाल करने और खाड़ी देशों के तेल निर्यात के सामान्य होने से तात्कालिक किल्लत दूर हुई है। इसी आपूर्ति सुधार ने वैश्विक तेल कीमतों में आई पहले की आक्रामक तेजी को ठंडा किया। • कूटनीतिक विफलता और भू-राजनीतिक जोखिम: कतरी मध्यस्थों की कोशिशों के बावजूद अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत में कोई प्रगति नहीं हो सकी है। होर्मुज जलडमरूमध्य को लेकर बरकरार आशंकाओं ने तेल में बड़ी गिरावट को रोक रखा है। • अमेरिकी मुद्रास्फीति और फेड नीति: अमेरिकी कोर पीसीई मुद्रास्फीति के 3.3 प्रतिशत पर स्थिर रहने के अनुमानों ने अमेरिकी डॉलर को वैश्विक मजबूती दी है। उच्च ब्याज दरों की संभावना के चलते डॉलर इंडेक्स में भारी कमजोरी नहीं आ सकी है। सवाल-जवाब 1. अमेरिकी डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपया किस स्तर पर कारोबार कर रहा है? बुधवार को भारतीय रुपया अमेरिकी डॉलर के मुकाबले 96.00 के आसपास सपाट स्तर पर कारोबार करता देखा गया। 2. भारतीय रुपये को किन प्रमुख कारकों से सहारा मिला है? रुपये को भारतीय रिजर्व बैंक के निरंतर विदेशी मुद्रा हस्तक्षेप और अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल की कीमतों में आई नरमी से समर्थन मिला है। 3. एमसीएक्स पर क्रूड ऑयल वायदा का क्या भाव रहा? मल्टी कमोडिटी एक्सचेंज पर 19 अक्टूबर को समाप्त होने वाला कच्चा तेल अनुबंध 0.45 प्रतिशत की गिरावट के साथ 8,635 रुपये के आसपास कारोबार कर रहा था। 4. सऊदी अरब ने आपूर्ति को लेकर क्या कदम उठाया है? सऊदी अरब ने अपनी ईस्ट-वेस्ट पाइपलाइन के जरिए लगभग आधी तेल आपूर्ति को दोबारा बहाल कर दिया है। 5. अमेरिका और ईरान के बीच कूटनीतिक बातचीत की क्या स्थिति है? कतरी मध्यस्थों द्वारा कराई जा रही बातचीत में बहुत कम प्रगति हुई है और दोनों पक्षों में से कोई भी झुकने को तैयार नहीं है। 6. अमेरिकी कोर पीसीई मुद्रास्फीति का क्या अनुमान है? बाजार का अनुमान है कि कोर पीसीई मुद्रास्फीति सालाना आधार पर 3.3 प्रतिशत पर स्थिर रहेगी और मासिक आधार पर 0.3 प्रतिशत बढ़ेगी। https://trendkia.com/market/reserve-bank-ke-dakhal-aur-kachche-tel-mein-narmi-se-indian-rupee-ko-mila-sahara-96-ke-kareeb-thami-giravat-40613 TrendKia — Har trend, sabse pehle.