रूसी कच्चे तेल पर अमेरिकी शुल्क छूट से थमी तेजी, डब्ल्यूटीआई में सात दिनों बाद गिरावट डोनाल्ड ट्रंप द्वारा ग्राहम एक्ट के तहत रूसी तेल खरीदारों पर 100 प्रतिशत तक के प्रस्तावित शुल्क को टालने के बाद वैश्विक ऊर्जा बाजार में कच्चे तेल की लगातार सात दिनों की बढ़त थम गई है। अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा बाजार में लगातार सात कारोबारी सत्रों से जारी तेजी के सिलसिले पर विराम लग गया है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा रूस पर लगाए जाने वाले कड़े प्रतिबंधों और शुल्कों पर दी गई अस्थायी छूट के फैसले ने कच्चे तेल की कीमतों पर दबाव बना दिया है। वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट (WTI) कच्चा तेल शुक्रवार को दर्ज किए गए अपने एक महीने के उच्चतम स्तर से नीचे फिसल गया है। हालांकि हालिया बिकवाली के बावजूद तेल की कीमतें शुक्रवार के कारोबारी दायरे के भीतर ही बनी हुई हैं। शुक्रवार को WTI ने 99.00 डॉलर प्रति बैरल के स्तर को पार कर लिया था, जो सितंबर के मध्य के बाद का सबसे उच्चतम स्तर था। इसके बाद आई सुस्ती में भाव लुढ़ककर 96.50 डॉलर के करीब आ गए, जिससे पिछले सात सत्रों में हासिल की गई बढ़त का लगभग पांचवां हिस्सा साफ हो गया। वर्तमान में बाजार में स्थिरता लौटती दिख रही है और कीमतें 98.00 डॉलर के आसपास घूम रही हैं, जहां ताजा लाइव ट्रेडिंग के दौरान यह 98.24 डॉलर प्रति बैरल पर दर्ज की गई हैं। ग्राहम एक्ट और भारत के लिए अमेरिकी छूट का रणनीतिक महत्व इस पूरे बाजार बदलाव का मुख्य कारण राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का वह कार्यकारी आदेश है, जिस पर उन्होंने शुक्रवार को हस्ताक्षर किए। इस आदेश के जरिए ग्राहम एक्ट के उन विशेष प्रावधानों पर रोक लगा दी गई है जो रूस के ऊर्जा निर्यात को लक्षित करते थे। यदि यह कानून लागू हो जाता, तो रूसी कच्चे तेल के शीर्ष पांच सबसे बड़े आयातक देशों पर 100 प्रतिशत तक का भारी-भरकम दंडात्मक शुल्क लग जाता। उल्लेखनीय है कि ग्राहम एक्ट सितंबर में अमेरिकी सीनेट में 86 के मुकाबले 11 मतों के भारी बहुमत से पारित हुआ था। हालांकि, कानून के लागू होने से पहले ही ट्रंप प्रशासन ने इसके रूस संबंधी खंडों को निलंबित करने का कदम उठाया। यह निर्णय विशेष रूप से भारत जैसे बड़े ऊर्जा उपभोक्ताओं के लिए बेहद राहत भरा साबित हुआ है। चालू वर्ष की शुरुआत में भारत अपनी कुल कच्चे तेल की जरूरतों का लगभग आधा हिस्सा रूस से रियायती दरों पर आयात कर रहा था। यदि 100 प्रतिशत शुल्क का यह नियम प्रभावी हो जाता, तो भारतीय रिफाइनरियों को रातों-रात रूसी तेल की आपूर्ति रोकनी पड़ती और उसकी जगह महंगे विकल्पों, जिसमें अमेरिकी कच्चा तेल भी शामिल है, की ओर रुख करना पड़ता। इससे वैश्विक स्तर पर तेल की मांग का संतुलन अचानक बिगड़ सकता था और कीमतों में अप्रत्याशित उछाल आ सकता था। अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने भी इस दिशा में अहम संकेत दिए हैं। मंगलवार को मुंबई में भारतीय विदेश मंत्री एस जयशंकर के साथ होने वाली अपनी बैठक से ठीक पहले रुबियो ने सोमवार को स्पष्ट किया कि दोनों देशों के बीच प्रस्तावित द्विपक्षीय व्यापार समझौता अब अंतिम चरण में है। उन्होंने यह भी पुष्टि की कि व्यापार वार्ता की अनुकूल प्रगति ही शुक्रवार को दिए गए इस नीतिगत छूट के बड़े कारणों में से एक थी, जिससे भारत के रूसी तेल कार्गो को भारी शुल्कों से सुरक्षा मिल सकी है। मध्य पूर्व में तनाव और फारस की खाड़ी से आपूर्ति में भारी गिरावट नीतिगत स्तर पर रूसी तेल को मिली राहत के विपरीत, भौगोलिक और सामरिक मोर्चे पर आपूर्ति के जोखिम अभी पूरी तरह समाप्त नहीं हुए हैं। ऊर्जा डेटा ट्रैकर केपलर के आंकड़ों से पता चला है कि फारस की खाड़ी से होने वाला कच्चे तेल का सात दिवसीय औसत प्रवाह घटकर 8.5 मिलियन बैरल प्रतिदिन पर आ गया है, जबकि ठीक एक सप्ताह पहले यही प्रवाह 20 मिलियन बैरल प्रतिदिन से अधिक था। इस तीव्र गिरावट के पीछे मुख्य वजह होर्मुज जलडमरूमध्य में उत्पन्न हुआ सुरक्षा संकट है। ईरान के रिवोल्यूशनरी गार्ड ने रविवार को पुष्टि की थी कि दक्षिणी होर्मुज जलडमरूमध्य के पास एक वाणिज्यिक तेल टैंकर समुद्री बारूदी सुरंग से टकरा गया था। इस घटना के बाद रणनीतिक जलमार्ग में वाणिज्यिक जहाजों की आवाजाही को लेकर भय का माहौल बन गया है। इस भू-राजनीतिक उथल-पुथल के बीच अमेरिकी कच्चे तेल की भूमिका अंतरराष्ट्रीय खरीदारों के लिए काफी महत्वपूर्ण हो गई है। WTI कच्चे तेल का अधिकांश लदान टेक्सास के तटीय बंदरगाहों से होता है। ऐसे में जो अंतरराष्ट्रीय तेल आयातक फारस की खाड़ी और होर्मुज जलडमरूमध्य के जोखिम भरे जलक्षेत्र से बचने के लिए वैकल्पिक सुरक्षित कार्गो की तलाश कर रहे हैं, उनके लिए टेक्सास से निर्यात होने वाला तेल एक आदर्श विकल्प बनकर उभरा है। इस विकल्प के जरिए टैंकरों को मध्य पूर्व के किसी भी तनावग्रस्त समुद्री मार्ग से गुजरने की आवश्यकता नहीं होती, जिससे ढुलाई बीमा और सुरक्षा लागत दोनों नियंत्रित रहती हैं। अमेरिकी तेल भंडार के आंकड़े और इन्वेंट्री रिपोर्ट का इंतजार बाजार प्रतिभागियों की नजरें अब अमेरिकी तेल भंडार के आगामी साप्ताहिक आंकड़ों पर टिकी हुई हैं। उद्योग निकाय अमेरिकन पेट्रोलियम इंस्टीट्यूट (API) मंगलवार को 20:30 GMT पर अपनी साप्ताहिक इन्वेंट्री रिपोर्ट जारी करेगा। इसके बाद अमेरिकी सरकार की आधिकारिक संस्था एनर्जी इंफॉर्मेशन एडमिनिस्ट्रेशन (EIA) बुधवार को 14:30 GMT पर अपनी स्थिति स्पष्ट करेगी। EIA की यह रिपोर्ट 16 अक्टूबर को समाप्त हुए सप्ताह की होगी, जो फारस की खाड़ी से आपूर्ति में आई कमी के बाद का पहला अमेरिकी भंडार आकलन होगा। इससे पिछले सप्ताह के दौरान अमेरिकी वाणिज्यिक तेल भंडारों में 8.6 मिलियन बैरल की भारी गिरावट दर्ज की गई थी, जिसने बाजार में आपूर्ति की तंगी की चिंताओं को बढ़ा दिया था। आमतौर पर API और EIA के आंकड़ों में काफी समानता पाई जाती है और लगभग 75 प्रतिशत मामलों में दोनों के परिणामों में 1 प्रतिशत से भी कम का अंतर होता है। हालांकि, सरकारी एजेंसी होने के कारण EIA के डेटा को वित्तीय बाजारों में अधिक प्रामाणिक और नीतिगत रूप से विश्वसनीय माना जाता है। इन्वेंट्री में कमी आने का सीधा मतलब मांग में मजबूती या आपूर्ति में बाधा से होता है, जो कीमतों को ऊपर की ओर धकेलता है। इसके विपरीत, यदि भंडारों में उम्मीद से अधिक वृद्धि दर्ज होती है, तो यह सुस्त मांग का संकेत माना जाता है और कीमतों पर दबाव बनता है। कच्चे तेल के तकनीकी संकेत और चार्ट विश्लेषण तकनीकी चार्ट पर WTI कच्चे तेल की हालिया यात्रा बेहद उतार-चढ़ाव भरी रही है। सात सत्रों की जिस तेजी का अभी अंत हुआ है, उसकी शुरुआत 7 अक्टूबर को 50-दिवसीय एक्सपोनेंशियल मूविंग एवरेज (EMA) के ठीक नीचे के स्तर से हुई थी। उस समय के बाद से यह प्रमुख मूविंग एवरेज ऊपर चढ़कर अब 91.63 डॉलर के पार पहुंच चुका है। शुक्रवार को 99.00 डॉलर के पार छूने वाला स्तर इस बात का प्रतीक था कि बाजार ने 15 सितंबर के 102.00 डॉलर के उच्च स्तर से लेकर 6 अक्टूबर के 86.50 डॉलर के निचले स्तर तक आई कुल गिरावट का 80 प्रतिशत से अधिक हिस्सा वापस हासिल कर लिया था। वर्तमान लाइव बाजार तकनीकी संकेतकों के अनुसार, WTI का रिलेटिव स्ट्रेंथ इंडेक्स (RSI) 59 के स्तर पर है, जो न तो ओवरबॉट है और न ही ओवरसोल्ड, बल्कि एक संतुलित तेजी का दायरा दर्शाता है। मूविंग एवरेज कन्वर्जेंस डाइवर्जेंस (MACD) 1.48 पर बना हुआ है जबकि इसकी सिग्नल लाइन 0.75 पर है, जो हिस्टोग्राम पर 0.73 के साथ बुलिश रुझान को पुष्ट करता है। 20-दिवसीय EMA वर्तमान में 94.34 डॉलर और 200-दिवसीय EMA 82.38 डॉलर पर स्थित है। 50-दिवसीय EMA के 200-दिवसीय EMA से ऊपर बने रहने के कारण बाजार में लंबी अवधि का गोल्डन क्रॉस पैटर्न अभी भी सक्रिय है। 20-दिवसीय बोलिंगर बैंड्स का दायरा 86.58 डॉलर से 99.54 डॉलर के बीच फैला हुआ है और मौजूदा कीमत बैंड के ऊपरी हिस्से के भीतर बनी हुई है। तात्कालिक कारोबार के लिए धुरी स्तर 98.20 डॉलर है, जिसके ऊपर 98.36 डॉलर (R1) और 98.48 डॉलर (R2) पर प्रतिरोध देखा जा रहा है, जबकि नीचे की ओर 98.08 डॉलर (S1) और 97.92 डॉलर (S2) प्रमुख समर्थन स्तर बने हुए हैं। पिछले 52 सप्ताह में तेल का न्यूनतम स्तर 54.98 डॉलर और उच्चतम स्तर 119.48 डॉलर रहा है। वैश्विक वित्तीय परिसंपत्तियों और मुद्राओं पर व्यापक प्रभाव कच्चे तेल में आई इस अस्थिरता और अमेरिकी नीतिगत कदमों का असर व्यापक वित्तीय बाजारों, विदेशी मुद्रा और कमोडिटी परिसंपत्तियों पर भी साफ देखा गया है। विदेशी मुद्रा बाजार में ऑस्ट्रेलियाई डॉलर (AUD/USD) में सोमवार को लगातार दूसरे दिन लिवाली का रुझान रहा और यह एशियाई सत्र में 0.7000 के स्तर की तरफ बढ़ता नजर आया। चीन की तीसरी तिमाही के मजबूत GDP आंकड़ों और सितंबर के बेहतर औद्योगिक उत्पादन आंकड़ों ने इस तेजी को समर्थन दिया, जिसे रिजर्व बैंक ऑफ ऑस्ट्रेलिया (RBA) के सहायक गवर्नर क्रिस केंट के सख्त बयानों से भी सहारा मिला। दूसरी तरफ, अमेरिकी डॉलर के मुकाबले जापानी येन (USD/JPY) 158.00 के स्तर के पास दबाव में बना रहा। बैंक ऑफ जापान (BoJ) के गवर्नर काजुओ उएदा के सख्त रुख और संभावित सरकारी हस्तक्षेप की आशंकाओं के बीच अमेरिकी बॉन्ड प्रतिफल में हालिया गिरावट ने डॉलर पर थोड़ा दबाव बनाया है। कीमती धातुओं के बाजार में सोने की चमक कुछ फीकी पड़ी है। पीली धातु शुक्रवार की गिरावट को आगे बढ़ाते हुए सोमवार को 4,150 डॉलर प्रति ट्रॉय औंस के नीचे फिसल गई। अमेरिकी डॉलर में स्थिरता और ट्रेजरी प्रतिफल में आई हल्की वापसी ने सोने पर दबाव बनाए रखा। इसके विपरीत, डिजिटल परिसंपत्तियों में मजबूती देखने को मिली। पिछले सप्ताह ETF से करीब 229 मिलियन डॉलर की शुद्ध निकासी के बावजूद बिटकॉइन 82,000 डॉलर के मनोवैज्ञानिक स्तर से ऊपर टिका हुआ है। वहीं इथेरियम भी गति संकेतकों में सुधार के दम पर संभलते हुए 2,400 डॉलर के स्तर के पार पहुंच गया है। अमेरिकी व्यापक आर्थिक परिदृश्य में मुद्रास्फीति (CPI) के अनुमान से अधिक आंकड़े आने के बाद दिसंबर में फेडरल रिजर्व द्वारा ब्याज दरों में बढ़ोतरी की संभावनाएं फिर से बढ़ गई हैं। हालांकि फेड अध्यक्ष केविन वार्श ने 28 अक्टूबर की आगामी बैठक में दरों को स्थिर रखने के संकेत दिए हैं, लेकिन बाजार अब 28 अक्टूबर को संभावित ठहराव और उसके बाद 9 दिसंबर की बैठक में संभावित दर वृद्धि के दोहरे घटनाक्रम को ध्यान में रखकर अपनी रणनीतियां बना रहा है। इसका आप पर असर अमेरिकी शुल्क छूट और कच्चे तेल की कीमतों में आई नरमी से वैश्विक ऊर्जा बाजारों में स्थिरता लौटने की उम्मीद है, जिसका सीधा असर परिवहन लागत और मुद्रास्फीति पर पड़ेगा। • भारत में: घरेलू तेल विपणन कंपनियों को रूसी कच्चे तेल की निरंतर रियायती आपूर्ति जारी रहने से ईंधन लागत में अचानक उछाल का सामना नहीं करना पड़ेगा। इसके चलते देश में पेट्रोल और डीजल की खुदरा कीमतों में स्थिरता बनी रहेगी और परिवहन क्षेत्र पर अतिरिक्त आर्थिक दबाव नहीं आएगा। • वैश्विक निवेशकों के लिए: कमोडिटी बाजारों में अप्रत्याशित आपूर्ति संकट टलने से तेल वायदा अनुबंधों में अत्यधिक अस्थिरता कम होगी। इससे ऊर्जा क्षेत्र के शेयरों और रिफाइनरी कंपनियों के परिचालन मार्जिन को निकट भविष्य में अधिक स्पष्टता मिलेगी। • आयातकों और उद्योगों के लिए: पेट्रोकेमिकल, प्लास्टिक, पेंट और विमानन जैसे ऊर्जा आधारित उद्योगों के लिए इनपुट लागत में तेज बढ़ोतरी का जोखिम टल गया है। यह विनिर्माण कंपनियों को अपनी उत्पादन लागत नियंत्रित रखने और उपभोक्ताओं पर अतिरिक्त भार डालने से बचने में मदद करेगा। • विदेशी मुद्रा भंडार के लिए: सस्ते रूसी तेल का आयात जारी रहने से भारत के चालू खाता घाटे और डॉलर की मांग पर नियंत्रण बना रहेगा। यह भारतीय रुपये की विनिमय दर को अमेरिकी डॉलर के मुकाबले तेज गिरावट से सुरक्षा प्रदान करता है। ऐसा क्यों हुआ कच्चे तेल की कीमतों में यह गिरावट मुख्य रूप से नीतिगत राहत और कड़े प्रतिबंधों को टालने के प्रत्यक्ष फैसले के कारण आई है, जिसने बाजार से आपूर्ति के तात्कालिक संकट को दूर कर दिया है। • ग्राहम एक्ट पर अमेरिकी छूट: राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ग्राहम एक्ट के तहत रूसी तेल आयातकों पर लगने वाले 100 प्रतिशत तक के प्रस्तावित दंडात्मक शुल्क को प्रभावी होने से पहले ही निलंबित कर दिया। इस कदम से भारत जैसे बड़े खरीदारों को वैकल्पिक और महंगी आपूर्ति तलाशने की तुरंत जरूरत नहीं पड़ी। • भारत-अमेरिका व्यापार वार्ता: अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने पुष्टि की कि भारत के साथ द्विपक्षीय व्यापार समझौते पर प्रगति ही इस छूट का बड़ा आधार बनी। दोनों देशों के बीच मजबूत कूटनीतिक तालमेल ने प्रतिबंधों के दबाव को कम करने में अहम भूमिका निभाई। • आपूर्ति शृंखला में राहत: यदि यह छूट न मिलती, तो वैश्विक स्तर पर तेल की मांग और आपूर्ति का संतुलन बिगड़ जाता, क्योंकि भारत अपनी कुल तेल जरूरतों का लगभग आधा रूस से ले रहा था। बाजार ने इस निर्णय को आपूर्ति निरंतरता के रूप में देखा, जिससे सट्टेबाजी की तेजी थम गई। सवाल-जवाब 1. WTI कच्चे तेल में हालिया गिरावट की मुख्य वजह क्या है? अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा रूसी तेल के प्रमुख खरीदारों पर लगने वाले 100 प्रतिशत तक के दंडात्मक शुल्क को टालने से कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट आई है। 2. ग्राहम एक्ट क्या है और इसका तेल बाजार पर क्या असर होना था? ग्राहम एक्ट अमेरिकी सीनेट द्वारा पारित कानून है जिसके तहत रूसी ऊर्जा के शीर्ष पांच खरीदारों पर भारी शुल्क लगाया जाना था, जिससे वैश्विक आपूर्ति बाधित होने का खतरा था। 3. इस अमेरिकी फैसले से भारत को क्या लाभ हुआ है? भारत अपनी जरूरत का लगभग आधा कच्चा तेल रूस से खरीद रहा था, और इस छूट से भारतीय रिफाइनरियों को 100 प्रतिशत दंडात्मक शुल्क से पूरी राहत मिल गई है। 4. होर्मुज जलडमरूमध्य में क्या घटना घटी थी? ईरानी रिवोल्यूशनरी गार्ड के अनुसार दक्षिणी होर्मुज जलडमरूमध्य में एक तेल टैंकर समुद्री बारूदी सुरंग की चपेट में आ गया था, जिससे खाड़ी से होने वाले तेल प्रवाह में भारी गिरावट आई। 5. अमेरिकी तेल भंडार से जुड़े आगामी आंकड़े कब जारी होंगे? API अपनी साप्ताहिक रिपोर्ट मंगलवार को 20:30 GMT पर और सरकारी एजेंसी EIA अपनी आधिकारिक रिपोर्ट बुधवार को 14:30 GMT पर जारी करेगी। https://trendkia.com/market/rusi-kachche-tela-para-ameriki-shulka-chhuta-se-thami-teji-wti-men-sata-dinon-bada-giravata-49551 TrendKia — Har trend, sabse pehle.