टाटा संस में चेयरमैन पद को लेकर गहराया विवाद, एन चंद्रशेखरन के कार्यकाल विस्तार को टाटा ट्रस्ट्स ने बताया गैरकानूनी टाटा संस के बोर्ड द्वारा एन चंद्रशेखरन को चेयरमैन के रूप में अगला पांच साल का कार्यकाल देने के फैसले को 66 प्रतिशत हिस्सेदारी वाले टाटा ट्रस्ट्स ने गैरकानूनी करार दिया है। टाटा समूह की शीर्ष नियंत्रक कंपनी टाटा संस के भीतर नेतृत्व और उत्तराधिकार को लेकर एक बड़ा कॉरपोरेट विवाद खड़ा हो गया है। कंपनी के बोर्ड ने मौजूदा चेयरमैन एन चंद्रशेखरन को पांच वर्षों का नया सेवा विस्तार देने का प्रस्ताव पारित किया है, जिसे प्रमुख परोपकारी शेयरधारक समूह टाटा ट्रस्ट्स ने पूरी तरह अस्वीकार करते हुए कानूनी तौर पर अमान्य बता दिया है। यह आंतरिक खींचतान ऐसे संवेदनशील मोड़ पर सामने आई है जब भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा कोर इन्वेस्टमेंट कंपनी के ढांचे से बाहर निकलने की याचिका खारिज किए जाने के बाद टाटा संस पर शेयर बाजार में सूचीबद्ध होने का दबाव भी नए सिरे से बढ़ गया है। टाटा ट्रस्ट्स ने बोर्ड के प्रस्ताव को ठहराया शून्य टाटा संस में लगभग 66 प्रतिशत की निर्णायक इक्विटी हिस्सेदारी रखने वाले टाटा ट्रस्ट्स ने बोर्ड द्वारा पारित इस पुनर्नियुक्ति प्रस्ताव को वैधानिक रूप से शून्य करार दिया है। ट्रस्ट्स का स्पष्ट कहना है कि निदेशक मंडल की यह कवायद टाटा संस के अंतर्नियमों यानी आर्टिकल्स ऑफ एसोसिएशन में निर्धारित अनिवार्य व्यवस्थाओं और नियमों का उल्लंघन करती है। सबसे बड़े शेयरधारक की असहमति के कारण बोर्ड के फैसले की वैधता अब गंभीर सवालों के घेरे में आ गई है, जिससे देश के सबसे पुराने औद्योगिक घराने में शासन और नियंत्रण का संतुलन डगमगाता दिख रहा है। पूर्व घोषणा और चयन समिति के गठन की पृष्ठभूमि विवाद की जड़ में केवल नियमों की व्याख्या ही नहीं, बल्कि हाल के घटनाक्रम भी शामिल हैं। टाटा संस के चेयरमैन के रूप में एन चंद्रशेखरन का मौजूदा कार्यकाल 20 फरवरी 2027 को समाप्त होने वाला है। इससे पहले उन्होंने स्वयं ही अगला कार्यकाल न लेने की स्पष्ट मंशा जाहिर की थी। उन्होंने 12 अगस्त को टाटा संस के बोर्ड के समक्ष आधिकारिक रूप से यह बात रखी थी कि वह अपने वर्तमान कार्यकाल के बाद पद पर बने रहने के इच्छुक नहीं हैं। टाटा ट्रस्ट्स ने 13 अगस्त को चंद्रशेखरन के इस फैसले को औपचारिक रूप से स्वीकार कर लिया था। इसके साथ ही ट्रस्ट्स ने मूल कंपनी को नए चेयरमैन की तलाश करने के लिए तुरंत एक औपचारिक चयन समिति गठित करने की स्पष्ट सलाह दी थी। ट्रस्ट्स की दलील है कि जब एक वरिष्ठ कार्यकारी ने स्वेच्छा से पद छोड़ने का निर्णय सार्वजनिक और आधिकारिक तौर पर ले लिया था, तो यह मामला अंतिम रूप से तय हो चुका था। ट्रस्ट्स के अनुसार, इस तय स्थिति से अचानक पीछे हटने और रुख बदलने से कंपनी के कर्मचारियों, कर्जदाताओं, व्यापारिक साझेदारों और अन्य हितधारकों के बीच अनावश्यक अनिश्चितता और असमंजस का माहौल पैदा होता है। नोएल टाटा का विरोध और आर्टिकल्स ऑफ एसोसिएशन का पेंच यह विवाद उस समय खुलकर सामने आ गया जब टाटा संस के बोर्ड में ट्रस्ट्स की ओर से नामित निदेशक और टाटा ट्रस्ट्स के चेयरमैन नोएल टाटा ने चंद्रशेखरन के नए कार्यकाल के प्रस्ताव के खिलाफ सीधे मतदान किया। नोएल टाटा के विरोध में वोट डालने के तुरंत बाद टाटा ट्रस्ट्स ने पूरे प्रस्ताव की वैधानिक वैधता को सीधे चुनौती दे दी। ट्रस्ट्स ने आधिकारिक रुख अपनाते हुए इस प्रस्ताव को कानूनी आधार से रहित बताया है। अब दोनों पक्षों के बीच शक्ति संतुलन और बोर्ड की निर्णय प्रक्रिया सीधे तौर पर कंपनी के आर्टिकल्स ऑफ एसोसिएशन के कानूनी प्रावधानों की व्याख्या पर केंद्रित हो गई है। आरबीआई का फैसला और शेयर बाजार में लिस्टिंग की अनिवार्यता नेतृत्व संकट के बीच टाटा संस के सामने वित्तीय नियामक स्तर पर भी एक बड़ी चुनौती खड़ी है। भारतीय रिजर्व बैंक ने टाटा संस की उस अर्जी को हाल ही में खारिज कर दिया है, जिसमें कंपनी ने अपनी कोर इन्वेस्टमेंट कंपनी की मान्यता को सरेंडर करने की मांग की थी। केंद्रीय बैंक ने वर्ष 2022 में टाटा संस को अपर-लेयर नॉन-बैंकिंग फाइनेंशियल कंपनी के रूप में वर्गीकृत किया था। रिजर्व बैंक के इस वर्गीकरण नियमों के अनुसार, अपर-लेयर एनबीएफसी के दायरे में आने वाली संस्थाओं के लिए तीन साल की तय समयसीमा के भीतर शेयर बाजार में सार्वजनिक तौर पर लिस्ट होना अनिवार्य होता है। टाटा संस के लिए यह निर्धारित तीन साल की अवधि सितंबर 2025 में ही समाप्त हो चुकी है, जबकि कंपनी उस समय नियामक से छूट प्राप्त करने के प्रयासों में जुटी हुई थी। कर्ज चुकाने के प्रयास और सूचीबद्ध कंपनियों पर प्रभाव शेयर बाजार में अनिवार्य लिस्टिंग के कड़े नियमों से राहत हासिल करने के उद्देश्य से टाटा संस ने पहले ही 21,000 करोड़ रुपये से अधिक के भारी कर्ज का पूर्ण भुगतान कर दिया था। कंपनी का विचार था कि अपनी ऋण देनदारियों को पूरी तरह समाप्त कर वह कोर इन्वेस्टमेंट कंपनी के दर्जे से मुक्त हो जाएगी और सार्वजनिक सूचीकरण से बच सकेगी। हालांकि केंद्रीय बैंक द्वारा अर्जी अस्वीकार किए जाने के बाद अब टाटा संस के आरंभिक सार्वजनिक निर्गम यानी आईपीओ की चर्चा दोबारा बेहद गर्म हो गई है। यह पूरा घटनाक्रम भारतीय कॉरपोरेट जगत के लिए इसलिए अत्यंत महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि टाटा संस देश के विशालकाय कारोबारी साम्राज्य की शीर्ष नियंत्रक होल्डिंग इकाई है। इस होल्डिंग कंपनी के प्रत्यक्ष नियंत्रण में टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज, टाटा मोटर्स और टाटा स्टील जैसी भारत के शेयर बाजार की दिग्गज और अग्रणी कंपनियां शामिल हैं। ऐसे में शीर्ष स्तर पर उपजा यह प्रशासनिक मतभेद और लिस्टिंग की अनिवार्य संभावना समूचे समूह की भविष्य की रणनीति को प्रभावित कर सकती है। इसका आप पर असर टाटा समूह की शीर्ष नियंत्रक कंपनी में नेतृत्व का टकराव और संभावित लिस्टिंग का असर सीधे तौर पर निवेशकों और बाजार पर पड़ेगा। • शेयर बाजार के निवेशकों के लिए: टाटा समूह की प्रमुख सूचीबद्ध कंपनियों के शेयरों में उतार-चढ़ाव देखने को मिल सकता है। टाटा संस में शीर्ष नेतृत्व पर मतभेद से निवेशकों की धारणा पर अल्पकालिक असर पड़ सकता है। • संभावित आईपीओ के खरीदारों के लिए: आरबीआई के रुख के बाद भारत का अब तक का सबसे बड़ा सार्वजनिक निर्गम बाजार में आ सकता है। यदि कंपनी सूचीबद्ध होती है तो खुदरा निवेशकों को देश के सबसे बड़े औद्योगिक घराने की पैरेंट कंपनी में सीधे हिस्सेदारी खरीदने का ऐतिहासिक अवसर मिलेगा। • कॉरपोरेट गवर्नेंस पर असर: बोर्ड और बहुलांश शेयरधारक के बीच नियमों की व्याख्या को लेकर होने वाला फैसला भारतीय उद्योग जगत के लिए नजीर बनेगा। इससे यह तय होगा कि होल्डिंग कंपनियों में ट्रस्ट्स और निदेशकों के अधिकारों का संतुलन किस प्रकार लागू रहेगा। • कंपनी के कर्मचारियों और भागीदारों के लिए: शीर्ष स्तर पर स्थिरता की कमी व्यापारिक निर्णयों को धीमा कर सकती है। स्पष्ट उत्तराधिकार व्यवस्था बनने तक बड़े पूंजीगत आवंटन और समूह की नई रणनीतियों पर सतर्कता बरती जाएगी। ऐसा क्यों हुआ यह विवाद अचानक पैदा नहीं हुआ, बल्कि एन चंद्रशेखरन द्वारा पहले पद छोड़ने की बात कहने और बाद में बोर्ड द्वारा सेवा विस्तार देने के कारण उपजा है। इसके साथ ही केंद्रीय बैंक के नियमों ने कंपनी पर सूचीबद्ध होने का दबाव भी बढ़ा दिया है। • पद छोड़ने का पिछला बयान: एन चंद्रशेखरन ने 12 अगस्त को बोर्ड को सूचित किया था कि वे 2027 के बाद पद पर नहीं रहेंगे। टाटा ट्रस्ट्स ने अगले ही दिन इसे स्वीकार करते हुए नए उत्तराधिकारी के लिए चयन समिति बनाने की प्रक्रिया शुरू करने की बात कही थी। • बोर्ड के फैसले पर नोएल टाटा का विरोध: बोर्ड ने जब चंद्रशेखरन को फिर से पांच साल का कार्यकाल देने का प्रस्ताव रखा, तो नोएल टाटा ने इसके विरोध में वोट दिया। ट्रस्ट्स का तर्क है कि यह फैसला अंतर्नियमों का उल्लंघन करता है और कानूनन अमान्य है। • आरबीआई द्वारा छूट अर्जी खारिज होना: केंद्रीय बैंक ने टाटा संस की कोर इन्वेस्टमेंट कंपनी दर्जे से हटने की अर्जी को अस्वीकार कर दिया। इसके चलते अपर-लेयर एनबीएफसी के तहत तीन साल में लिस्ट होने का नियम प्रभावी हो गया, जिसकी अंतिम तिथि सितंबर 2025 में ही निकल चुकी है। • कर्ज चुकाने के बावजूद लिस्टिंग की बाध्यता: टाटा संस ने लिस्टिंग से छूट पाने के लिए 21,000 करोड़ रुपये से अधिक का कर्ज चुका दिया था। इसके बावजूद नियामक द्वारा कोई ढील न दिए जाने से कंपनी के सामने आंतरिक और बाहरी दोनों मोर्चों पर संकट गहरा गया है। सवाल-जवाब 1. टाटा संस के बोर्ड और टाटा ट्रस्ट्स के बीच विवाद का मुख्य कारण क्या है? टाटा संस के बोर्ड ने चेयरमैन एन चंद्रशेखरन को पांच साल का सेवा विस्तार दिया है, जिसे 66 प्रतिशत हिस्सेदारी वाले टाटा ट्रस्ट्स ने कंपनी के अंतर्नियमों के खिलाफ और कानूनी रूप से शून्य बताया है। 2. एन चंद्रशेखरन का मौजूदा कार्यकाल कब समाप्त हो रहा है? टाटा संस के चेयरमैन के रूप में उनका मौजूदा कार्यकाल 20 फरवरी 2027 को समाप्त होने वाला है। 3. चंद्रशेखरन ने अपने कार्यकाल को लेकर पहले क्या रुख अपनाया था? उन्होंने 12 अगस्त को बोर्ड को स्पष्ट रूप से बताया था कि वह वर्तमान कार्यकाल खत्म होने के बाद दूसरा कार्यकाल लेने के इच्छुक नहीं हैं। 4. बोर्ड की बैठक में नोएल टाटा ने क्या रुख अपनाया? टाटा ट्रस्ट्स के चेयरमैन और टाटा संस के नामित निदेशक नोएल टाटा ने चंद्रशेखरन के कार्यकाल विस्तार के प्रस्ताव के खिलाफ मतदान किया। 5. आरबीआई ने टाटा संस के मामले में क्या बड़ा फैसला सुनाया है? आरबीआई ने टाटा संस की कोर इन्वेस्टमेंट कंपनी का दर्जा वापस करने की अर्जी खारिज कर दी है, जिससे कंपनी के लिए शेयर बाजार में लिस्ट होना अनिवार्य हो गया है। 6. टाटा संस को शेयर बाजार में सूचीबद्ध होने के लिए क्या समयसीमा मिली थी? आरबीआई द्वारा 2022 में अपर-लेयर एनबीएफसी बनाए जाने के बाद तीन साल की मियाद तय की गई थी, जो सितंबर 2025 में ही समाप्त हो चुकी है। 7. टाटा संस ने लिस्टिंग से बचने के लिए कितना कर्ज चुकाया था? कंपनी ने नियामक छूट पाने और देनदारियों से मुक्त होने के लिए 21,000 करोड़ रुपये से अधिक के कर्ज का भुगतान किया था। https://trendkia.com/market/tata-sons-men-cheyaramaina-pada-ko-lekara-gaharaya-vivada-n-chandrasekaran-ke-karyakala-vistara-ko-tata-trusts-ne-bataya-gairakanu-33632 TrendKia — Har trend, sabse pehle.