कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों और अमेरिकी फेडरल रिजर्व के रुख से अमेरिकी डॉलर में मजबूती कच्चे तेल में तेजी के कारण वैश्विक स्तर पर महंगाई की चिंताएं बढ़ गई हैं, जिसके चलते अमेरिकी डॉलर इंडेक्स 101.80 के करीब स्थिर बना हुआ है। फेडरल रिजर्व द्वारा आगामी नीतिगत बैठक में ब्याज दरों को स्थिर रखने की संभावना 83.9 प्रतिशत आंकी जा रही है। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा बाजार में बुधवार को अमेरिकी डॉलर में मजबूती का रुख देखने को मिला। छह प्रमुख वैश्विक मुद्राओं के मुकाबले डॉलर की ताकत मापने वाला अमेरिकी डॉलर इंडेक्स (DXY) पिछले कारोबारी सत्र की मामूली बढ़त को आगे बढ़ाते हुए एशियाई कारोबारी घंटों के दौरान 101.80 के करीब कारोबार कर रहा था। कच्चे तेल के दामों में आई तेजी ने दुनिया भर में महंगाई बढ़ने की आशंकाएं तेज कर दी हैं, जिससे सुरक्षित निवेश के रूप में अमेरिकी डॉलर की मांग को सीधा समर्थन मिल रहा है। इसके साथ ही अमेरिकी फेडरल रिजर्व की मौद्रिक नीति को लेकर बने तटस्थ रुख ने भी ग्रीनबैक को सहारा दिया है। भू-राजनीतिक घटनाक्रम और कच्चे तेल का बाजार पर असर ऊर्जा बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में आई हालिया बढ़त के पीछे मध्य पूर्व से जुड़े कूटनीतिक संकेत प्रमुख वजह रहे हैं। संयुक्त राज्य अमेरिका और ईरान के बीच चल रहे राजनयिक प्रयासों को लेकर वित्तीय बाजारों में असमंजस की स्थिति बनी हुई है। हालांकि दोनों पक्षों के बीच बातचीत के रास्ते खुले हुए हैं, लेकिन तेहरान में हुई हालिया उच्चस्तरीय बैठकों के बाद निवेशकों का भरोसा पूरी तरह स्थिर नहीं हो सका। वहां पाकिस्तान के सेना प्रमुख फील्ड मार्शल आसिम मुनीर ने वरिष्ठ ईरानी राजनयिक और सैन्य नेतृत्व के साथ द्विपक्षीय संबंधों और वाशिंगटन के साथ जारी वार्ता की स्थिति पर व्यापक चर्चा की। इस पूरी प्रक्रिया से जुड़े एक राजनयिक ने स्पष्ट किया कि विवाद सुलझाने के प्रयास जरूर जारी हैं, लेकिन किसी अंतिम समझौते पर पहुंचने की खबरें अभी समय से पहले हैं। अनिश्चितता के इसी माहौल ने कच्चे तेल को सहारा दिया, जिससे सीधे तौर पर डॉलर मजबूत हुआ। वैश्विक वित्तीय तंत्र में अमेरिकी डॉलर की भूमिका अमेरिकी डॉलर (USD) संयुक्त राज्य अमेरिका की आधिकारिक राष्ट्रीय मुद्रा होने के साथ-साथ कई अन्य देशों में स्थानीय नोटों के समानांतर प्रचलन में रहने वाली वास्तविक मुद्रा भी है। अंतरराष्ट्रीय व्यापार और विदेशी मुद्रा विनिमय में इसका दबदबा सबसे बड़ा है। वर्ष 2022 के आंकड़ों के अनुसार, पूरी दुनिया के विदेशी मुद्रा कारोबार में 88 प्रतिशत से अधिक की हिस्सेदारी अमेरिकी डॉलर की है, जो रोजाना औसतन 6.6 ट्रिलियन डॉलर के वित्तीय लेन-देन के बराबर बैठती है। ऐतिहासिक दृष्टि से देखें तो द्वितीय विश्व युद्ध की समाप्ति के बाद ब्रिटिश पाउंड की जगह अमेरिकी डॉलर ने वैश्विक रिजर्व मुद्रा का दर्जा हासिल किया था। अपने इतिहास के लंबे दौर में अमेरिकी डॉलर सीधे सोने से समर्थित रहा, लेकिन 1971 के ब्रेटन वुड्स समझौते के साथ ही गोल्ड स्टैंडर्ड की यह व्यवस्था समाप्त हो गई। फेडरल रिजर्व की मौद्रिक नीति और डॉलर की दिशा अमेरिकी डॉलर के मूल्य को निर्धारित करने वाला सबसे प्रभावशाली कारक फेडरल रिजर्व की मौद्रिक नीति है। अमेरिकी केंद्रीय बैंक फेडरल रिजर्व के पास मुख्य रूप से दो वैधानिक जिम्मेदारियां हैं, जिनमें कीमतों में स्थिरता यानी मुद्रास्फीति पर नियंत्रण बनाए रखना और अर्थव्यवस्था में पूर्ण रोजगार को बढ़ावा देना शामिल है। इन दोहरे लक्ष्यों को साधने के लिए फेड मुख्य रूप से ब्याज दरों के समायोजन के औजार का इस्तेमाल करता है। जब बाजार में कीमतें बहुत तेजी से चढ़ने लगती हैं और महंगाई दर फेड के 2 प्रतिशत के तय लक्ष्य से ऊपर निकल जाती है, तब केंद्रीय बैंक ब्याज दरों में बढ़ोतरी करता है। दरों में यह इजाफा आमतौर पर डॉलर की साख और कीमत को मजबूत बनाता है। दूसरी तरफ, जब महंगाई 2 प्रतिशत से नीचे गिर जाती है या बेरोजगारी दर चिंताजनक रूप से बढ़ जाती है, तब फेड ब्याज दरों में कटौती का रास्ता चुन सकता है, जो अक्सर ग्रीनबैक पर दबाव डालता है। ब्याज दर उम्मीदें और मात्रात्मक नीतियां अक्टूबर की नीतिगत बैठक को लेकर ब्याज दरों के परिदृश्य पर नजर डालें तो फेडवॉच टूल के आंकड़े संकेत देते हैं कि बाजार अगले सप्ताह होने वाली बैठक में ब्याज दरों को जस का तस रखने की 83.9 प्रतिशत संभावना मानकर चल रहा है। फेड के चेयरमैन वॉर्श ने पहले से किसी फैसले का पूर्वाग्रह बनाने से इनकार कर दिया है और नीतिगत बैठक से पूर्व कोई स्पष्ट संकेत नहीं दिया है। चरम आर्थिक परिस्थितियों में जब केवल ब्याज दर घटाने से परिणाम नहीं मिलते, तब फेडरल रिजर्व अतिरिक्त डॉलर छापकर क्वांटिटेटिव ईजिंग (QE) यानी मात्रात्मक सहजता का सहारा लेता है। यह एक गैर-मानक नीतिगत उपाय है, जिसे तब लागू किया जाता है जब बैंकों के आपसी अविश्वास के कारण वित्तीय तंत्र में उधारी पूरी तरह सूख जाती है। वर्ष 2008 के भीषण वित्तीय संकट के दौरान फेड ने इसी हथियार का इस्तेमाल किया था, जिसमें वित्तीय संस्थानों से सरकारी बॉन्ड खरीदकर नकदी डाली जाती है। यह प्रक्रिया डॉलर को कमजोर करती है। इसके विपरीत क्वांटिटेटिव टाइटनिंग (QT) में फेड बॉन्ड खरीद बंद कर देता है और परिपक्व होने वाले बॉन्ड के मूलधन का पुनर्निवेश रोक देता है, जो डॉलर के लिए सकारात्मक माना जाता है। प्रमुख मुद्रा जोड़ों और सोने में हलचल विदेशी मुद्रा बाजार में अन्य प्रमुख जोड़ियों पर नजर डालें तो AUD/USD ने लगातार चौथे दिन तेजी की प्रवृत्ति बनाए रखी। एशियाई सत्र में यह जोड़ी 0.7000 के पार तीन सप्ताह के उच्चतम स्तर पर कारोबार करती दिखी। रिजर्व बैंक ऑफ ऑस्ट्रेलिया के डिप्टी गवर्नर एंड्रयू हॉसर की सख्त टिप्पणियों और मुद्रास्फीति की चिंताओं ने इस जोड़ी को समर्थन दिया, लेकिन अमेरिका और ईरान के बीच गहराती अनिश्चितता के कारण डॉलर को मिले नए खरीदारों ने इस बढ़त को सीमित कर दिया। उधर USD/JPY में एशियाई सत्र के दौरान निचले स्तरों पर लिवाली देखी गई, लेकिन बैंक ऑफ जापान की अगली ब्याज दर वृद्धि के समय को लेकर अनिश्चितता के चलते यह जोड़ी 158.50 के आसपास एक सीमित दायरे में फंसी रही। अस्थिर तेल कीमतों से उभरे महंगाई के जोखिम और फेड की सख्त उम्मीदों ने डॉलर को सहारा दिया, हालांकि जापानी येन में संभावित सरकारी हस्तक्षेप के डर ने इस जोड़ी की बढ़त को रोके रखा। दूसरी तरफ सोने में लगातार चौथे कारोबारी दिन गिरावट दर्ज की गई। एशियाई सत्र में सोना 0.2 प्रतिशत टूटकर 4,115 डॉलर के करीब कारोबार कर रहा था। बीते कुछ हफ्तों में कच्चे तेल की कीमतों में आई भारी उछाल के बाद अमेरिकी ट्रेजरी यील्ड में हुई वृद्धि ने इस कीमती धातु पर सीधा दबाव बनाया। क्रिप्टो बाजार की स्थिति और आगामी आंकड़े डिजिटल परिसंपत्तियों के बाजार में शीर्ष तीन क्रिप्टोकरेंसी यानी बिटकॉइन, एथेरियम और रिपल पिछले दिन की तेजी के बाद बुधवार को स्थिर रुख के साथ कारोबार करती नजर आईं। बाजार से बिकवाली का दबाव घटने के कारण यह हल्की रिकवरी आने वाले समय में तेजी के विस्तार का संकेत दे रही है। बिटकॉइन बुधवार को 82,930 डॉलर के स्तर पर पहुंच गया, जिसे पिछले दिन के सुधार के बाद अल्पकालिक तेजी का सहारा मिला हुआ है। व्यापक आर्थिक आंकड़ों की बात करें तो ब्रिटेन के ऑफिस फॉर नेशनल स्टैटिस्टिक्स द्वारा बुधवार को 06:00 GMT पर सितंबर महीने के उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI) के आंकड़े जारी किए जाने हैं। इन मुद्रास्फीति आंकड़ों के साथ ही उत्पादक मूल्य सूचकांक (PPI) और खुदरा बिक्री के आंकड़े भी प्रस्तुत किए जाएंगे, जिन पर अंतरराष्ट्रीय निवेशकों की पैनी नजर रहेगी। इसका आप पर असर कच्चे तेल में तेजी और डॉलर में मजबूती से आयातित ईंधन और उपभोक्ता वस्तुओं के दाम बढ़ने का जोखिम उत्पन्न हो गया है। • भारत में: मजबूत डॉलर और महंगे कच्चे तेल से भारतीय रुपये पर दबाव बढ़ सकता है, जिससे पेट्रोल-डीजल और परिवहन लागत में बढ़ोतरी का खतरा पैदा होता है। आयात महंगा होने से देश का व्यापार घाटा बढ़ सकता है और आम उपभोक्ताओं की जेब पर असर पड़ सकता है। • वैश्विक स्तर पर: दुनिया भर में कच्चे तेल की तेजी से माल ढुलाई और उत्पादन लागत बढ़ जाएगी, जिसके चलते केंद्रीय बैंकों को सख्त मौद्रिक नीतियां जारी रखनी पड़ सकती हैं। उच्च ब्याज दरों का सीधा असर वैश्विक आर्थिक वृद्धि और नए रोजगार के अवसरों पर पड़ सकता है। • निवेशकों के लिए: अमेरिकी ट्रेजरी यील्ड में वृद्धि के कारण सोने की कीमतों में गिरावट दर्ज की जा रही है, जो सुरक्षित निवेश वाले पोर्टफोलियो को प्रभावित कर रही है। निवेशकों को बॉन्ड यील्ड और कमोडिटी बाजार में होने वाले उतार-चढ़ाव के अनुसार अपनी रणनीतियां बदलनी पड़ सकती हैं। • मुद्रा कारोबारियों के लिए: प्रमुख मुद्राओं जैसे ऑस्ट्रेलियाई डॉलर और जापानी येन में अमेरिकी डॉलर के मुकाबले तेज उतार-चढ़ाव देखा जा रहा है। विदेशी मुद्रा बाजार में काम करने वाले ट्रेडर्स को केंद्रीय बैंकों के नीतिगत बयानों और ब्याज दर निर्णयों पर कड़ी नजर रखनी होगी। ऐसा क्यों हुआ अमेरिकी डॉलर में मजबूती मुख्य रूप से ऊर्जा बाजार में आए उछाल और फेडरल रिजर्व की मौद्रिक नीति को लेकर बने रुख के कारण आई है। • कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें: मध्य पूर्व से जुड़े कूटनीतिक घटनाक्रमों और अनिश्चितता के कारण तेल की कीमतों में तेजी आई, जिससे वैश्विक स्तर पर महंगाई दोबारा बढ़ने का डर पैदा हुआ और सुरक्षित निवेश के रूप में डॉलर की मांग बढ़ी। • फेडरल रिजर्व की नीतिगत अनिश्चितता: फेड चेयरमैन वॉर्श द्वारा अक्टूबर बैठक से पहले कोई स्पष्ट फैसला देने से मना करने और ब्याज दरों में बदलाव न होने की 83.9 प्रतिशत संभावना ने डॉलर की कीमतों को स्थिर बनाए रखा। • बॉन्ड यील्ड में तेजी: तेल की कीमतों में आई उछाल के कारण अमेरिकी ट्रेजरी यील्ड में बढ़त देखी गई, जिसने अमेरिकी डॉलर को मजबूती दी और सोने जैसी गैर-ब्याज वाली संपत्तियों पर दबाव बनाया। • राजनयिक वार्ताओं पर असमंजस: अमेरिका और ईरान के बीच वार्ता जारी रहने के बावजूद तेहरान में पाकिस्तानी सेना प्रमुख और ईरानी नेतृत्व की बैठक के बाद किसी अंतिम समझौते पर पहुंचने की खबरें अपरिपक्व पाई गईं, जिससे भू-राजनीतिक जोखिम बना रहा। सवाल-जवाब 1. बुधवार को अमेरिकी डॉलर इंडेक्स (DXY) किस स्तर पर कारोबार कर रहा था? अमेरिकी डॉलर इंडेक्स बुधवार को एशियाई कारोबारी घंटों के दौरान 101.80 के करीब कारोबार कर रहा था। 2. फेडरल रिजर्व की अगली बैठक में ब्याज दरों को लेकर क्या संभावना जताई जा रही है? फेडवॉच टूल के अनुसार, वित्तीय बाजार अगली नीतिगत बैठक में ब्याज दरों के स्थिर रहने की 83.9 प्रतिशत संभावना मानकर चल रहे हैं। 3. कच्चे तेल की कीमतों का अमेरिकी डॉलर पर क्या असर पड़ा? कच्चे तेल में तेजी से वैश्विक महंगाई बढ़ने की चिंताएं बढ़ गईं, जिससे सुरक्षित निवेश के रूप में डॉलर की मांग में इजाफा हुआ। 4. सोने की कीमतों में बुधवार को क्या रुख रहा? सोने में लगातार चौथे दिन गिरावट रही और यह 0.2 प्रतिशत टूटकर 4,115 डॉलर प्रति औंस के करीब कारोबार कर रहा था। 5. बुधवार को बिटकॉइन किस भाव पर कारोबार कर रहा था? बुधवार को बिटकॉइन 82,930 डॉलर के स्तर पर सकारात्मक रुझान के साथ कारोबार कर रहा था। 6. वैश्विक विदेशी मुद्रा कारोबार में अमेरिकी डॉलर की कितनी हिस्सेदारी है? वर्ष 2022 के आंकड़ों के अनुसार, वैश्विक विदेशी मुद्रा कारोबार में अमेरिकी डॉलर की हिस्सेदारी 88 प्रतिशत से अधिक है, जो प्रतिदिन औसतन 6.6 ट्रिलियन डॉलर का लेन-देन है। https://trendkia.com/market/us-dollar-index-holds-firm-due-to-oil-driven-inflation-fed-neutrality-50041 TrendKia — Har trend, sabse pehle.