# अमेरिकी डॉलर की मजबूती के बीच ऑस्ट्रेलियाई डॉलर में गिरावट, एफओएमसी मिनट्स पर टिकी निगाहें

> वैश्विक भू-राजनीतिक तनाव और अमेरिकी बॉन्ड यील्ड में तेजी के कारण डॉलर मजबूत हुआ है, जिससे ऑस्ट्रेलियाई डॉलर की तीन दिनों की बढ़त पर ब्रेक लग गया।

**Type:** article · **Category:** बाज़ार · **Published:** 2026-10-07 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/market/us-dollar-ki-majabuti-ke-bicha-australian-dollar-men-giravata-fomc-minutes-para-tiki-nigahen-44485 · **Language:** Hindi
**Tags:** ऑस्ट्रेलियाई डॉलर, अमेरिकी डॉलर, फॉरेक्स बाजार, फेडरल रिजर्व, एफओएमसी मिनट्स, भारतीय रिजर्व बैंक, मुद्रा बाजार, वित्त

अंतरराष्ट्रीय मुद्रा बाजार में बुधवार को ऑस्ट्रेलियाई डॉलर की हालिया तेजी थम गई और इसमें कमजोरी दर्ज की गई। पिछले तीन कारोबारी सत्रों की लगातार बढ़त के बाद ऑस्ट्रेलियाई डॉलर एक सप्ताह के उच्चतम स्तर से फिसलकर दबाव में आ गया। अमेरिकी डॉलर की व्यापक मजबूती और अमेरिकी बॉन्ड यील्ड में आए नए उछाल ने प्रमुख करेंसी जोड़ियों पर दबाव बनाया है, जिसमें AUD/USD प्रमुख रूप से शामिल है। इसके अलावा कारोबारी अब अमेरिकी फेडरल रिजर्व की मौद्रिक नीति बैठक के विवरण यानी एफओएमसी मिनट्स के आधिकारिक प्रकाशन का इंतजार कर रहे हैं, जिससे भविष्य के ब्याज दर परिदृश्य को लेकर दिशा तय होगी।

बुधवार के कारोबारी सत्र के दौरान AUD/USD जोड़ी में बिकवाली का दबाव देखा गया। पिछले सप्ताह यह जोड़ी 0.6900 के स्तर के करीब पहुंची थी, जो इसका तीन महीने का निचला स्तर था। वहां से शुरू हुई तीन दिवसीय रिकवरी अब कमजोर पड़ती दिख रही है। यूरोपीय कारोबारी सत्र की शुरुआत में यह स्पॉट भाव 0.6970 से 0.6965 के दायरे में घूमता नजर आया, जबकि एशियाई सत्र में भी यह 0.7000 के मनोवैज्ञानिक स्तर से नीचे नकारात्मक रुख के साथ कारोबार कर रहा था। लाइव मार्केट डेटा के अनुसार, AUD/USD 0.6969 के आसपास बना हुआ है, जबकि इसका पिछला बंद भाव 0.6967 रहा था। तकनीकी रूप से इसका 14-दिवसीय आरएसआई 34 के स्तर पर है, जो मंदी के दबाव को दर्शाता है, जबकि 20-दिवसीय ईएमए 0.7035 और 50-दिवसीय ईएमए 0.7065 पर बना हुआ है।

## फेडरल रिजर्व की नीतियां और बॉन्ड यील्ड का असर
अमेरिकी डॉलर की ताजा मांग के पीछे कई वैश्विक और घरेलू आर्थिक कारक काम कर रहे हैं। वैश्विक स्तर पर लगातार बने हुए भू-राजनीतिक जोखिमों ने निवेशकों को सुरक्षित निवेश की तलाश में ग्रीनबैक की ओर आकर्षित किया है। इसके साथ ही कच्चे तेल की कीमतें अपने एक महीने के निचले स्तर से ऊपर टिकी हुई हैं, जिससे ऊर्जा चालित महंगाई का डर फिर से गहराने लगा है। इस स्थिति ने अमेरिकी ट्रेजरी बॉन्ड यील्ड को कई वर्षों के उच्चतम स्तरों के करीब बनाए रखा है। बॉन्ड बाजार में बढ़ती प्रतिफल दर सीधे तौर पर डॉलर को मजबूती प्रदान करती है, जिससे ऑस्ट्रेलियाई डॉलर जैसी जोखिम से जुड़ी मुद्राओं पर बिकवाली हावी हो जाती है।

सीएमई ग्रुप के फेडवॉच टूल के आंकड़े बताते हैं कि बाजार अभी भी लगभग 85 प्रतिशत संभावना मानकर चल रहा है कि अमेरिकी केंद्रीय बैंक इस साल के अंत तक उधारी लागत में और बढ़ोतरी कर सकता है। हालांकि, मुद्रास्फीति के दबाव में नरमी और श्रम बाजार के ठंडा पड़ने के हालिया संकेतों ने अक्टूबर महीने में ब्याज दर बढ़ने की उम्मीदों को थोड़ा कमजोर किया था। निवेशक अब आगामी एफओएमसी मिनट्स में यह तलाशने की कोशिश करेंगे कि नीति निर्माता आने वाले महीनों को लेकर क्या रुख अपनाते हैं। मौद्रिक नीति का यह दृष्टिकोण डॉलर की निकट अवधि की दिशा को निर्धारित करने में निर्णायक भूमिका निभाएगा।

## रिजर्व बैंक ऑफ ऑस्ट्रेलिया और वैश्विक केंद्रीय बैंकों का रुख
ऑस्ट्रेलियाई डॉलर पर दबाव का एक अन्य पहलू रिजर्व बैंक ऑफ ऑस्ट्रेलिया यानी आरबीए से जुड़ी ब्याज दर अपेक्षाएं हैं। हालांकि बाजार में कुछ समय तक आरबीए के सख्त रुख की उम्मीदें थीं, लेकिन ब्याज दर में वृद्धि की घटती संभावनाओं ने मंदी के पक्षधरों को हावी होने का मौका दिया है। दूसरी ओर, अमेरिकी केंद्रीय बैंक अपने दो प्रमुख लक्ष्यों को पूरा करने के लिए नीतियों का संचालन करता है, जिनमें मूल्य स्थिरता हासिल करना और अधिकतम रोजगार को बढ़ावा देना शामिल है। इन लक्ष्यों को पूरा करने के लिए फेडरल रिजर्व ब्याज दरों में बदलाव को मुख्य हथियार के रूप में उपयोग में लाता है।

जब मुद्रास्फीति फेड के 2 प्रतिशत के लक्ष्य से अधिक हो जाती है, तो वह ब्याज दरों में वृद्धि करता है, जिससे अर्थव्यवस्था में उधारी महंगी हो जाती है। इससे अमेरिकी डॉलर मजबूत होता है क्योंकि अंतरराष्ट्रीय निवेशक अधिक रिटर्न पाने के लिए अमेरिका में पूंजी निवेश करना पसंद करते हैं। इसके विपरीत, जब महंगाई 2 प्रतिशत से नीचे गिरती है या बेरोजगारी दर बहुत बढ़ जाती है, तो फेड उधारी को बढ़ावा देने के लिए ब्याज दरों में कटौती करता है, जिससे डॉलर कमजोर पड़ता है। फेडरल रिजर्व साल में आठ बार नीतिगत बैठकें आयोजित करता है, जिसमें बारह अधिकारी शामिल होते हैं। इनमें बोर्ड ऑफ गवर्नर्स के सात सदस्य, न्यूयॉर्क के फेडरल रिजर्व बैंक के अध्यक्ष और शेष ग्यारह क्षेत्रीय रिजर्व बैंकों में से चार अध्यक्ष शामिल होते हैं जो रोटेशन के आधार पर एक वर्ष का कार्यकाल पूरा करते हैं। संकट की स्थिति में फेड क्वांटिटेटिव ईजिंग यानी क्यूई का सहारा लेता है, जिसमें नए डॉलर छापकर वित्तीय संस्थानों से उच्च श्रेणी के बॉन्ड खरीदे जाते हैं, जिससे डॉलर कमजोर होता है। वहीं क्वांटिटेटिव टाइटनिंग यानी क्यूटी के तहत बॉन्ड खरीद बंद की जाती है, जो डॉलर को मजबूती देता है।

## वैश्विक फॉरेक्स और कमोडिटी बाजारों की स्थिति
अमेरिकी डॉलर के मजबूत होने का असर केवल ऑस्ट्रेलियाई डॉलर तक सीमित नहीं है, बल्कि अन्य प्रमुख मुद्राओं और संपत्तियों में भी स्पष्ट दिखाई दे रहा है। जापानी येन के मुकाबले अमेरिकी डॉलर यानी USD/JPY जोड़ी बुधवार को एशियाई सत्र में 158.50 के स्तर के पास कारोबार करती रही, जो इसका लगभग डेढ़ सप्ताह का उच्च स्तर है। बैंक ऑफ जापान की नरम टिप्पणियों और अमेरिकी बॉन्ड यील्ड में उछाल ने डॉलर को येन के मुकाबले समर्थन दिया है, जहां कारोबारी अब 200-दिवसीय एसएमए के स्तर को पार करने की प्रतीक्षा कर रहे हैं।

कमोडिटी बाजार में सोने की कीमतों पर भी दबाव बना हुआ है। यूरोपीय सत्र में सोना नकारात्मक रुख के साथ कारोबार करता दिखा और यह पिछले दिन छुए गए 4,100 डॉलर के दो महीने के निचले स्तर के करीब नजर आया। डॉलर की ताजा खरीद ने सोने की कीमतों पर वजन डाला है। दूसरी तरफ, क्रिप्टोकरेंसी बाजार में डॉगकॉइन में गिरावट जारी रही और यह 0.090 डॉलर के आसपास ट्रेड कर रहा था, जिसमें सप्ताह के दौरान 5 प्रतिशत से अधिक की कमजोरी आई है। शॉर्ट पोजीशन एक महीने के उच्च स्तर पर पहुंचने से डॉगकॉइन पर मंदी का दबाव बढ़ गया है।

## भारतीय रिजर्व बैंक का फैसला और रुपये पर प्रभाव
मुद्रा बाजार के अन्य प्रमुख घटनाक्रमों में भारतीय रुपये में अमेरिकी डॉलर के मुकाबले भारी कमजोरी देखने को मिली। भारतीय रिजर्व बैंक की मौद्रिक नीति बैठक के बाद रुपये की प्रतिक्रिया कमजोर रही और USD/INR जोड़ी उछलकर लगभग 96.72 के स्तर तक पहुंच गई, जो पिछले चार महीनों का उच्चतम स्तर है। नीतिगत बैठक में रिजर्व बैंक ने अपनी रेपो दर को 25 आधार अंक बढ़ाकर 5.5 प्रतिशत करने का निर्णय लिया, जो फरवरी 2023 के बाद से पहली दर वृद्धि है। इसके बावजूद डॉलर के मजबूत वैश्विक प्रवाह के कारण रुपये को दबाव का सामना करना पड़ा।

यूरोपीय मोर्चे पर भी चुनौतियां कम नहीं हैं। यूरोपीय सेंट्रल बैंक आमतौर पर लक्ष्य से लगभग दोगुनी चल रही मुद्रास्फीति से निपटने के लिए ब्याज दरों में बढ़ोतरी का रास्ता अपनाता है। लेकिन वर्तमान परिस्थितियां सामान्य नहीं हैं, क्योंकि बॉन्ड बाजार पहले ही आंशिक रूप से वित्तीय सख्ती कर रहा है। इसके चलते यूरोपीय सेंट्रल बैंक के सामने नीतिगत स्तर पर एक गंभीर दुविधा की स्थिति पैदा हो गई है। आगामी कारोबारी सत्रों में वैश्विक करेंसी जोड़ियों की चाल पूरी तरह से इस बात पर निर्भर करेगी कि अमेरिकी फेडरल रिजर्व के मिनट्स से क्या संकेत बाहर आते हैं।

## इसका आप पर असर
अमेरिकी डॉलर में मजबूती और प्रमुख केंद्रीय बैंकों के फैसलों से अंतरराष्ट्रीय व्यापार और विदेशी मुद्रा पर सीधा असर पड़ता है।

- **भारत में:** अमेरिकी डॉलर के मुकाबले रुपया 96.72 के चार महीने के निचले स्तर पर चला गया है। इसका मतलब है कि कच्चा तेल और विदेशी आयात महंगे हो सकते हैं, जिससे घरेलू स्तर पर महंगाई बढ़ सकती है।
- **ब्याज दर और उधारी:** भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा रेपो रेट को बढ़ाकर 5.5 प्रतिशत करने से बैंकों की ऋण लागत बढ़ेगी। आने वाले दिनों में आम नागरिकों के लिए होम लोन और कार लोन की ईएमआई महंगी हो सकती है।
- **विदेशी यात्रियों और छात्रों के लिए:** डॉलर की मजबूती से अमेरिका में पढ़ाई कर रहे भारतीय छात्रों के खर्च और ट्यूशन फीस में बढ़ोतरी हो सकती है। विदेश यात्रा की योजना बना रहे लोगों को भी अधिक बजट का प्रावधान करना होगा।
- **फॉरेक्स और कमोडिटी निवेशकों के लिए:** डॉलर में तेजी से सोने के भाव 4,100 डॉलर प्रति औंस के दो महीने के निचले स्तर के पास पहुंच गए हैं। सुरक्षित परिसंपत्तियों में निवेश करने वालों को फेडरल रिजर्व के आगामी संकेतों पर नजर रखनी चाहिए।

## ऐसा क्यों हुआ
अमेरिकी डॉलर की तेजी और ऑस्ट्रेलियाई डॉलर में गिरावट मुख्य रूप से बॉन्ड यील्ड में उछाल, तेल की बढ़ती कीमतों और फेडरल रिजर्व की ब्याज दर नीतियों के कारण हुई है।

- **अमेरिकी बॉन्ड यील्ड में उछाल:** अमेरिकी ट्रेजरी यील्ड कई वर्षों के उच्चतम स्तर के करीब पहुंचने से डॉलर की मांग अचानक बढ़ गई। उच्च यील्ड अंतरराष्ट्रीय निवेशकों को अमेरिकी प्रतिभूतियों में पूंजी लगाने के लिए प्रेरित करती है।
- **कच्चे तेल और महंगाई का दबाव:** भू-राजनीतिक अनिश्चितताओं के कारण कच्चा तेल एक महीने के निचले स्तर से ऊपर बना हुआ है। इससे ऊर्जा चालित मुद्रास्फीति का खतरा बढ़ा है, जिसने दरों में और वृद्धि की संभावनाओं को हवा दी है।
- **ब्याज दरों पर अनिश्चितता:** सीएमई फेडवॉच टूल के अनुसार 85 प्रतिशत कारोबारी साल के अंत तक फेड द्वारा दर बढ़ाने का अनुमान लगा रहे हैं। दूसरी ओर ऑस्ट्रेलिया के केंद्रीय बैंक द्वारा ब्याज दर बढ़ाने की उम्मीदें कम होने से ऑस्ट्रेलियाई डॉलर कमजोर हुआ है।
- **सुरक्षित निवेश की मांग:** वैश्विक तनावों के बीच निवेशकों ने जोखिम वाली मुद्राओं से पूंजी निकालकर सुरक्षित माने जाने वाले अमेरिकी डॉलर में लगाई है। आगामी नीतिगत दिशा तय करने के लिए अब बाजार एफओएमसी मिनट्स के ब्योरे की प्रतीक्षा कर रहा है।

## सवाल-जवाब

### 1. बुधवार को ऑस्ट्रेलियाई डॉलर में गिरावट क्यों आई?
अमेरिकी बॉन्ड यील्ड में तेजी और भू-राजनीतिक तनाव के चलते अमेरिकी डॉलर मजबूत हुआ, जिससे ऑस्ट्रेलियाई डॉलर की तीन दिन की बढ़त रुक गई।

### 2. वर्तमान में AUD/USD का कारोबारी स्तर क्या है?
यह जोड़ी 0.6970 से 0.6965 के दायरे में रही है, जबकि लाइव मार्केट डेटा के अनुसार यह 0.6969 के स्तर पर कारोबार कर रही है।

### 3. बाजार के लिए एफओएमसी मिनट्स क्यों महत्वपूर्ण हैं?
एफओएमसी मिनट्स से अमेरिकी फेडरल रिजर्व के ब्याज दर परिदृश्य और भविष्य की मौद्रिक नीति दिशा के महत्वपूर्ण संकेत मिलेंगे।

### 4. भारतीय रिजर्व बैंक ने अपनी हालिया नीति में क्या कदम उठाया?
आरबीआई ने रेपो रेट में 25 आधार अंकों की बढ़ोतरी कर इसे 5.5 प्रतिशत कर दिया, जो फरवरी 2023 के बाद पहली वृद्धि है।

### 5. डॉलर की मजबूती के बीच सोने की क्या स्थिति रही?
सोने की कीमतों में गिरावट देखी गई और यह 4,100 डॉलर प्रति औंस के दो महीने के निचले स्तर के करीब आ गया।

### 6. डॉगकॉइन में इस सप्ताह कितनी गिरावट दर्ज की गई?
डॉगकॉइन में इस सप्ताह 5 प्रतिशत से अधिक की गिरावट आई है और यह 0.090 डॉलर के आसपास कारोबार कर रहा है।

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