अमेरिकी फेडरल रिजर्व के ब्याज दरें बढ़ाने के संकेत से वैश्विक मुद्राओं और कमोडिटीज में हलचल फेडरल रिजर्व की अधिकारी कॉलिन्स ने ऊर्जा क्षेत्र के दबाव और सुस्त महंगाई गिरावट के बीच ब्याज दरें बढ़ाने की संभावना जताई है, जिससे डॉलर मजबूत हुआ और सोने समेत प्रमुख मुद्राओं पर दबाव बना। अंतरराष्ट्रीय वित्तीय बाजारों में केंद्रीय बैंकों की नीतियों को लेकर अनिश्चितता एक बार फिर बढ़ गई है। अमेरिकी केंद्रीय बैंक फेडरल रिजर्व की अधिकारी कॉलिन्स ने ऊर्जा कीमतों से जुड़े जोखिमों और महंगाई की धीमी गिरावट पर चिंता व्यक्त की है। कॉलिन्स का कहना है कि वैश्विक भू-राजनीतिक घटनाक्रमों से यह संकेत मिलता है कि ऊर्जा के मोर्चे पर अतिरिक्त दबाव लगातार देखने को मिल सकता है। इसके साथ ही उन्होंने स्पष्ट किया कि महंगाई दर में जिस सुधार की उम्मीद की जा रही थी, फिलहाल उस तरह की प्रगति सामने नहीं आ रही है। इस रुख ने यह संभावना पैदा कर दी है कि नीति निर्माता आने वाले दिनों में उधारी लागत में एक और बढ़ोतरी करने पर विचार कर सकते हैं, जिससे अंतरराष्ट्रीय मुद्रा बाजार और कमोडिटी एक्सचेंजों पर व्यापक असर देखा जा रहा है। फेडरल रिजर्व की मौद्रिक नीति और उसके मुख्य उद्देश्य संयुक्त राज्य अमेरिका में मौद्रिक नीति तय करने की पूरी जिम्मेदारी फेडरल रिजर्व पर होती है। इस केंद्रीय बैंक के मुख्य रूप से दो प्रमुख वैधानिक उद्देश्य हैं, जिनमें पहला कीमतों में स्थिरता बनाए रखना और दूसरा देश में रोजगार के अधिकतम अवसरों को बढ़ावा देना शामिल है। इन दो महत्वपूर्ण लक्ष्यों को पूरा करने के लिए फेडरल रिजर्व ब्याज दरों के समायोजन को अपने सबसे प्राथमिक और प्रभावी हथियार के तौर पर इस्तेमाल करता है। जब अमेरिकी अर्थव्यवस्था में वस्तुओं और सेवाओं की कीमतें असामान्य रूप से तेजी से बढ़ने लगती हैं और मुद्रास्फीति केंद्रीय बैंक के तय 2 प्रतिशत के लक्ष्य से ऊपर निकल जाती है, तो फेडरल रिजर्व अपनी प्रमुख नीतिगत ब्याज दरों में इजाफा कर देता है। दरों में इस बढ़ोतरी से पूरी अर्थव्यवस्था में कर्ज लेना महंगा हो जाता है, जिससे उपभोक्ता खर्च और व्यावसायिक विस्तार की गति धीमी पड़ती है। ब्याज दरों के उच्च स्तर पर पहुंचने से विदेशी निवेशकों के लिए अमेरिकी वित्तीय परिसंपत्तियों में पूंजी लगाना काफी आकर्षक हो जाता है, जिसका सीधा परिणाम अमेरिकी डॉलर की मजबूती के रूप में सामने आता है। इसके विपरीत, जब मुद्रास्फीति 2 प्रतिशत के लक्ष्य से नीचे गिर जाती है या बेरोजगारी दर चिंताजनक स्तर तक बढ़ जाती है, तब आर्थिक गतिविधियों और उधारी को प्रोत्साहन देने के लिए फेडरल रिजर्व ब्याज दरों में कटौती करता है, जिसका नकारात्मक असर अमेरिकी मुद्रा ग्रीनबैक के मूल्य पर पड़ता है। नीतिगत बैठकों का ढांचा और निर्णय प्रक्रिया फेडरल रिजर्व अपनी मौद्रिक नीतियों की समीक्षा और भविष्य की रूपरेखा तय करने के लिए एक वर्ष में कुल आठ नियमित नीतिगत बैठकें आयोजित करता है। इन आधिकारिक बैठकों में फेडरल ओपन मार्केट कमेटी यानी एफओएमसी पूरी अर्थव्यवस्था की मौजूदा परिस्थितियों का गहन आकलन करती है और ब्याज दरों से जुड़े निर्णायक कदम उठाती है। एफओएमसी की इस नीतिगत प्रक्रिया में कुल बारह प्रमुख अधिकारी शामिल होते हैं। इनमें बोर्ड ऑफ गवर्नर्स के सभी सात सदस्य, फेडरल रिजर्व बैंक ऑफ न्यूयॉर्क के अध्यक्ष और शेष ग्यारह क्षेत्रीय रिजर्व बैंकों के अध्यक्षों में से चुने गए चार अध्यक्ष शामिल होते हैं। यह चार क्षेत्रीय अध्यक्ष एक-एक साल के लिए चक्रीय क्रम में एफओएमसी में मताधिकार के साथ अपनी सेवाएं देते हैं। इस पूरी व्यवस्था के जरिए देश के अलग-अलग क्षेत्रों की आर्थिक हकीकत को ध्यान में रखते हुए साझा निर्णय लिए जाते हैं। असाधारण आर्थिक उपाय: मात्रात्मक सहजता और कड़ाई गंभीर आर्थिक संकट या असाधारण मंदी की स्थिति में फेडरल रिजर्व पारंपरिक ब्याज दर समायोजन से आगे बढ़कर अपरंपरागत नीतिगत उपायों का सहारा लेता है। ऐसे ही एक महत्वपूर्ण कदम को मात्रात्मक सहजता या क्वांटिटेटिव ईजिंग कहा जाता है। क्वांटिटेटिव ईजिंग वह प्रक्रिया है जिसके माध्यम से केंद्रीय बैंक किसी ठप या गंभीर रूप से दबावग्रस्त वित्तीय प्रणाली में बड़े पैमाने पर नकदी और ऋण प्रवाह को बढ़ाने का काम करता है। यह गैर-मानक नीति आमतौर पर तब लागू की जाती है जब अर्थव्यवस्था गहरे संकट से जूझ रही हो या मुद्रास्फीति का स्तर शून्य के करीब पहुंच गया हो। वर्ष 2008 के भीषण वैश्विक वित्तीय संकट के दौरान फेडरल रिजर्व ने क्वांटिटेटिव ईजिंग को अपने सबसे बड़े बचाव साधन के रूप में इस्तेमाल किया था। इस प्रक्रिया में केंद्रीय बैंक अधिक मात्रा में डॉलर तैयार करता है और वित्तीय संस्थानों से सीधे उच्च श्रेणी के बॉन्ड खरीदता है। वित्तीय प्रणाली में नकदी की भारी आपूर्ति होने के कारण क्वांटिटेटिव ईजिंग से सामान्य तौर पर अमेरिकी डॉलर की कीमत कमजोर होती है। इसके ठीक उलट, क्वांटिटेटिव टाइटनिंग यानी मात्रात्मक कड़ाई वह प्रक्रिया है जिसमें केंद्रीय बैंक वित्तीय संस्थानों से बॉन्ड खरीदना पूरी तरह बंद कर देता है और अपने पास परिपक्व हो रहे पुराने बॉन्ड के मूलधन को नए बॉन्ड में पुनर्निवेश नहीं करता। वित्तीय व्यवस्था से तरलता वापस खींचने का यह कदम अमेरिकी डॉलर के मूल्य को मजबूती देने में मददगार साबित होता है। विदेशी मुद्रा बाजार में डॉलर का दबदबा और प्रमुख जोड़ियों की स्थिति हालिया कारोबारी सत्रों में वैश्विक मुद्रा बाजार में अमेरिकी डॉलर ने अधिकांश प्रमुख मुद्राओं के मुकाबले जबरदस्त मजबूती का प्रदर्शन किया है। इस दौरान कैनेडियन डॉलर के मुकाबले अमेरिकी डॉलर सबसे मजबूत स्थिति में दर्ज किया गया, जहां डॉलर के समर्थन में सबसे बड़ा उछाल दर्ज हुआ। ऑस्ट्रेलियन डॉलर और अमेरिकी डॉलर की जोड़ी यानी AUD/USD को कारोबारी सप्ताह की शुरुआत में दिशा तय करने के लिए कड़ा संघर्ष करना पड़ा। यह जोड़ी 0.7140 के महत्वपूर्ण स्तर का दोबारा परीक्षण करने के तुरंत बाद नए सिरे से नीचे की ओर दबाव में आ गई और एशियाई बाजार खुलने से पहले 0.7100 के निचले स्तरों पर स्थिरता तलाशने की कोशिश करती दिखी। इस जोड़ी में यह दैनिक गिरावट मुख्य रूप से डॉलर के प्रति निवेशकों के मजबूत होते भरोसे और सकारात्मक धारणा के चलते देखने को मिली है। दूसरी ओर, अमेरिकी डॉलर और जापानी येन यानी USD/JPY की जोड़ी एशियाई सत्र में 157.00 के स्तर से नीचे फिसलती नजर आई। बैंक ऑफ जापान द्वारा हाल ही में किए गए रेट चेक के बाद बाजार में संभावित सरकारी हस्तक्षेप के खतरे मंडरा रहे हैं, जिससे जापानी येन को हल्की बढ़त मिली। इसके अलावा जापान में छुट्टी के माहौल के बीच रूस-यूक्रेन संघर्ष और पश्चिम एशिया में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव ने भी कारोबारियों को बेहद सतर्क कर दिया है। इन तमाम चिंताओं के बावजूद अमेरिकी डॉलर की गिरावट थमने से USD/JPY में नीचे की ओर होने वाला नुकसान काफी हद तक सीमित रहा। बैंक ऑफ जापान का ब्याज दर फैसला और बॉन्ड बाजार एशियाई क्षेत्र में मौद्रिक नीति के मोर्चे पर बड़ा कदम उठाते हुए बैंक ऑफ जापान ने अपने अल्पकालिक ब्याज दर लक्ष्य को 1.00 प्रतिशत से बढ़ाकर 1.25 प्रतिशत कर दिया। नीति निर्माताओं ने यह ऐतिहासिक निर्णय 7-2 के बहुमत वाले मतदान से लिया। यह फैसला बैंक ऑफ जापान द्वारा अपनी अत्यधिक ढीली मौद्रिक नीति को सामान्य बनाने की दिशा में एक और महत्वपूर्ण कदम है, जिसकी उम्मीद बाजार विशेषज्ञ और निवेशक कई हफ्तों से पहले ही जता रहे थे। तीसरी तिमाही के अंतिम सप्ताहों में प्रवेश करते समय वित्तीय बाजार एक बेहद असामान्य स्थिति का सामना कर रहे हैं। चारों तरफ अनिश्चितता और भारी उतार-चढ़ाव बना हुआ है, लेकिन कच्चे तेल की कीमतों में गिरावट का रुख दर्ज हो रहा है। इसके विपरीत, यूरोप और अमेरिका के शेयर बाजार मजबूती के साथ खुलने की तैयारी में हैं। वित्तीय बाजारों का सबसे बड़ा तनाव इस समय सरकारी बॉन्ड में देखने को मिल रहा है, जहां अमेरिकी और यूरोपीय यील्ड में आई तेजी ने बॉन्ड निवेशकों की चिंताएं बढ़ा दी हैं। कीमती धातुओं में सुधार और सोने का स्तर कमोडिटी बाजार में सोने ने नए कारोबारी सत्र की शुरुआत दबाव के साथ की। अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोने का भाव फिसलकर लगभग 4,350 डॉलर प्रति ट्रॉय औंस के आसपास कारोबार करता नजर आया। पीली धातु में यह गिरावट ऐसे समय में देखने को मिली है जब अमेरिकी ट्रेजरी यील्ड में सभी अवधियों के दौरान नरमी दर्ज की गई थी। आमतौर पर बॉन्ड यील्ड में गिरावट से सोने को सहारा मिलता है, लेकिन अमेरिकी डॉलर की व्यापक मजबूती के कारण सोने पर बिकवाली का दबाव हावी रहा और सुरक्षित निवेश मानी जाने वाली यह धातु सुस्त रुख पर कारोबार करती रही। इसका आप पर असर अमेरिकी फेडरल रिजर्व के सख्त रुख और डॉलर की मजबूती से वैश्विक बाजार में उधारी लागत और कमोडिटी की कीमतों पर सीधा असर पड़ेगा। • भारत में कर्ज और रुपया: विदेशी बाजारों में डॉलर मजबूत होने से भारतीय रुपये पर दबाव आ सकता है। इससे विदेशों से आयात होने वाला सामान महंगा हो सकता है और घरेलू ब्याज दरों में कटौती की संभावना टल सकती है। • सोने के खरीदार और निवेशक: अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोने के भाव $4,350 प्रति ट्रॉय औंस के पास दबाव में बने हुए हैं। यदि डॉलर में मजबूती जारी रहती है तो घरेलू बाजार में सोने की कीमतों में कुछ समय के लिए ठहराव या गिरावट देखने को मिल सकती है। • विदेशी यात्रा और शिक्षा: जिन छात्रों या पर्यटकों को डॉलर में भुगतान करना है, उनकी लागत में इजाफा हो सकता है। डॉलर के मुकाबले अन्य एशियाई मुद्राओं में नरमी आने से ट्यूशन फीस और यात्रा बजट प्रभावित होंगे। • शेयर और म्यूचुअल फंड निवेशक: वैश्विक बॉन्ड यील्ड में उतार-चढ़ाव और तेल की गिरती कीमतों के बीच शेयर बाजारों में अनिश्चितता रह सकती है। निवेशकों को आक्रामक दांव लगाने के बजाय केंद्रीय बैंकों के अगले ब्याज दर कदमों पर नजर रखनी चाहिए। ऐसा क्यों हुआ फेडरल रिजर्व के अधिकारियों की तरफ से ब्याज दरें बढ़ाने की संभावना इसलिए जताई गई है क्योंकि ऊर्जा के मोर्चे पर वैश्विक भू-राजनीतिक संकट लगातार बने हुए हैं और महंगाई कम होने की रफ्तार उम्मीद से काफी धीमी है। • ऊर्जा कीमतों से जुड़े जोखिम: पश्चिम एशिया और रूस-यूक्रेन के बीच बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव के कारण वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति श्रृंखला पर लगातार दबाव बना हुआ है। केंद्रीय बैंकों को आशंका है कि ऊर्जा लागत बढ़ने से विनिर्माण और परिवहन खर्चे फिर से बढ़ सकते हैं। • महंगाई में सुस्त गिरावट: नीति निर्माताओं के अनुसार महंगाई दर में वह सुधार दर्ज नहीं हो रहा है जिसकी उम्मीद की जा रही थी। उपभोक्ता मूल्य अब भी केंद्रीय बैंक के 2 प्रतिशत के वार्षिक लक्ष्य से ऊपर बने हुए हैं। • डॉलर का बढ़ता आकर्षण: ऊंची ब्याज दरों की संभावना के चलते अंतरराष्ट्रीय पूंजी अमेरिकी संपत्तियों की तरफ जा रही है। इससे विदेशी मुद्रा बाजारों में डॉलर मजबूत हो रहा है और अन्य मुद्राओं व सोने पर बिकवाली का दबाव बढ़ रहा है। सवाल-जवाब 1. फेडरल रिजर्व की अधिकारी कॉलिन्स ने ब्याज दरों पर क्या संकेत दिए हैं? कॉलिन्स ने कहा है कि ऊर्जा के मोर्चे पर दबाव बना रह सकता है और महंगाई में अपेक्षित गिरावट नहीं आ रही है, जिससे एक और दर बढ़ोतरी की संभावना बनी हुई है। 2. फेडरल रिजर्व का महंगाई का आधिकारिक लक्ष्य क्या है? फेडरल रिजर्व का दीर्घकालिक मुद्रास्फीति लक्ष्य 2 प्रतिशत है, जिसे हासिल करने के लिए वह ब्याज दरों को नियंत्रित करता है। 3. बैंक ऑफ जापान ने हाल ही में अपनी नीतिगत दर में क्या बदलाव किया है? बैंक ऑफ जापान ने 7-2 के बहुमत से अपनी अल्पकालिक नीतिगत ब्याज दर को 1.00 प्रतिशत से बढ़ाकर 1.25 प्रतिशत कर दिया है। 4. अमेरिकी डॉलर के मजबूत होने पर सोने के भाव किस स्तर पर पहुंचे हैं? मजबूत अमेरिकी डॉलर के चलते अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोना दबाव में आते हुए लगभग 4,350 डॉलर प्रति ट्रॉय औंस के आसपास कारोबार कर रहा है। 5. एफओएमसी की बैठकें एक साल में कितनी बार आयोजित की जाती हैं? फेडरल ओपन मार्केट कमेटी यानी एफओएमसी एक कैलेंडर वर्ष में कुल आठ नियमित नीतिगत बैठकें आयोजित करती है। 6. क्वांटिटेटिव ईजिंग और क्वांटिटेटिव टाइटनिंग में मुख्य अंतर क्या है? क्वांटिटेटिव ईजिंग में केंद्रीय बैंक नकदी बढ़ाने के लिए बॉन्ड खरीदता है, जबकि क्वांटिटेटिव टाइटनिंग में बॉन्ड खरीद रोककर और परिपक्व बॉन्ड का पुनर्निवेश न करके तरलता घटाई जाती है। https://trendkia.com/market/us-fed-collins-ke-byaja-daren-barhane-ke-snketa-se-vaishvika-mudraon-aura-kamoditija-men-halachala-35965 TrendKia — Har trend, sabse pehle.