अमेरिकी ट्रेजरी बॉन्ड यील्ड दशकों के रिकॉर्ड स्तर पर, वैश्विक मुद्राओं और सोने पर दबाव बढ़ा कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों और लगातार आर्थिक वृद्धि के कारण अमेरिकी सरकारी बॉन्ड में बिकवाली तेज हो गई है, जिससे डॉलर मजबूत हुआ है और वैश्विक मुद्राओं सहित सोने पर दबाव बना हुआ है। अमेरिकी ऋण बाजार में लंबी अवधि के सरकारी बॉन्ड पर मिलने वाला रिटर्न कई दशकों के उच्चतम स्तर पर पहुंच गया है, जिससे दुनिया भर के वित्तीय बाजारों में हलचल मच गई है। महंगाई से जुड़े व्यक्तिगत उपभोग व्यय यानी पर्सनल कंजम्पशन एक्सपेंडिचर सूचकांक में नरमी के संकेतों के बावजूद अमेरिकी ट्रेजरी की बिकवाली थमने का नाम नहीं ले रही है। ऊर्जा कीमतों में उछाल और मजबूत आर्थिक आंकड़ों ने निवेशकों को यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि अमेरिकी ब्याज दरें लंबे समय तक ऊंची बनी रह सकती हैं, जिसका सीधा असर मुद्राओं, कमोडिटी और जोखिम वाली संपत्तियों पर दिखाई दे रहा है। लंबी अवधि के अमेरिकी बॉन्ड में भारी बिकवाली का दौर डॉयचे बैंक के जिम रीड के अनुसार, अमेरिकी ट्रेजरी बाजार इस समय गंभीर दबाव का सामना कर रहा है। बेंचमार्क 10 वर्षीय अमेरिकी ट्रेजरी यील्ड 4.9 आधार अंक बढ़कर 5.28 प्रतिशत पर पहुंच गई है, जो 2007 के बाद का नया उच्चतम स्तर है। इसी तरह 30 वर्षीय ट्रेजरी यील्ड में और भी जोरदार उछाल देखा गया है, जहां यह 6.3 आधार अंक चढ़कर 5.63 प्रतिशत पर पहुंच गई, जो 2002 के बाद का सबसे ऊंचा स्तर दर्ज किया गया है। छोटी अवधि के बॉन्ड में भी उतार-चढ़ाव बना रहा। 2 वर्षीय ट्रेजरी यील्ड पीसीई आंकड़े आने के तुरंत बाद घटकर 4.825 प्रतिशत तक आ गई थी, लेकिन दिन के अंत में यह 1.1 आधार अंक बढ़कर 4.89 प्रतिशत पर बंद हुई। इससे साफ जाहिर होता है कि ब्याज दरों में कटौती की जो उम्मीदें अल्पकालिक आंकड़ों से जगी थीं, वे वक्र के लंबे छोर पर टिक नहीं पाईं। महीने के अंत में पोर्टफोलियो समायोजन और वास्तविक यील्ड में लगातार वृद्धि ने बॉन्ड की कीमतों पर गहरा दबाव बनाया है। यूरोप में भी इसका असर दिखा, जहां फ्रांस और जर्मनी के 10 वर्षीय बॉन्ड के बीच का स्प्रेड चौड़ा होकर 127 आधार अंक पर पहुंच गया, जो 2012 के बाद का उच्चतम स्तर है। डॉलर इंडेक्स की तेजी से प्रमुख वैश्विक मुद्राओं में गिरावट अमेरिकी बॉन्ड यील्ड में लगातार तेजी ने अमेरिकी डॉलर को जबरदस्त मजबूती दी है, जिससे दुनिया भर की प्रमुख मुद्राएं संघर्ष कर रही हैं। यूरो बनाम अमेरिकी डॉलर का विनिमय दर गिरकर 1.1312 पर आ गया है, जो मई 2025 के बाद का इसका निचला स्तर है। यह गिरावट जनवरी के 1.2082 के उच्च स्तर से काफी नीचे है। यूरो क्षेत्र में ऊर्जा लागत बढ़ने की चिंता और भू-राजनीतिक अनिश्चितता यूरो पर अतिरिक्त दबाव डाल रही है, हालांकि वहां महंगाई का नया झटका यूरो को अप्रत्याशित राहत भी दे सकता है। जापानी येन के मुकाबले अमेरिकी डॉलर 158.00 से ऊपर अपने साप्ताहिक दायरे के ऊपरी सिरे पर कारोबार कर रहा है। बैंक ऑफ जापान की संभावित सख्त मौद्रिक नीति और जापानी अधिकारियों द्वारा बाजार में हस्तक्षेप के जोखिम के बावजूद डॉलर की व्यापक मजबूती येन पर भारी पड़ रही है। इसके अलावा अमेरिका और ईरान के बीच जारी तनाव के कारण सुरक्षित निवेश के तौर पर डॉलर की मांग और बढ़ गई है। ऑस्ट्रेलियाई डॉलर भी अमेरिकी मुद्रा के दबाव से बच नहीं सका है। ऑस्ट्रेलियाई डॉलर बनाम अमेरिकी डॉलर एशियाई सत्र में 0.6900 के मध्य स्तर पर कारोबार करता हुआ दो महीने के निचले स्तर के करीब स्थिर दिखा। अगस्त के महीने में ऑस्ट्रेलिया का व्यापार अधिशेष घटकर 49.5 करोड़ ऑस्ट्रेलियाई डॉलर रह गया, हालांकि इस गिरावट का मुद्रा जोड़ी पर सीमित असर ही देखने को मिला क्योंकि बाजार की दिशा पूरी तरह अमेरिकी डॉलर के रुख से तय हो रही है। सोने की चमक सुस्त और डिजिटल परिसंपत्तियों में मुनाफावसूली पारंपरिक रूप से सुरक्षित निवेश माने जाने वाले सोने पर भी अमेरिकी यील्ड की बढ़ोतरी का सीधा नकारात्मक असर पड़ा है। यूरोपीय कारोबारी सत्र के पूर्वार्द्ध में सोना 4,200 डॉलर प्रति औंस के स्तर को छूने के बाद अपनी बढ़त को बरकरार रखने में नाकाम रहा और लगभग सपाट स्तर पर आ गया। अमेरिकी मुद्रास्फीति के आंकड़ों में नरमी के बावजूद ट्रेजरी यील्ड के बहु-वर्षीय शिखरों को छूने से बिना ब्याज वाली संपत्ति जैसे सोने की मांग कमजोर बनी हुई है, क्योंकि निवेशक सुरक्षित और अधिक ब्याज देने वाले डॉलर और बॉन्ड की ओर रुख कर रहे हैं। क्रिप्टोकरेंसी और डिजिटल परिसंपत्ति बाजार में भी सतर्कता का माहौल देखने को मिल रहा है। हाइपरलिक्विड यानी एचवाईपीई में 2 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई, जिससे पिछले सत्र की 5 प्रतिशत की बढ़त घट गई। संस्थागत निवेशकों की मांग में कमी के संकेत मिले हैं, जहां बुधवार को 50 लाख डॉलर की पूंजी निकासी दर्ज की गई। तकनीकी रूप से एचवाईपीई का मूल्य 90 डॉलर के नीचे सीमित बना हुआ है, जिससे अल्पकालिक निवेशकों की धारणा मिश्रित बनी हुई है। पूरी दुनिया के वित्तीय बाजार फिलहाल अमेरिकी बॉन्ड यील्ड की चाल और कच्चे तेल से उत्पन्न महंगाई के खतरों पर टकटकी लगाए बैठे हैं। इसका आप पर असर अमेरिकी बॉन्ड यील्ड के कई दशकों के उच्चतम स्तर पर पहुंचने और डॉलर के मजबूत होने से वैश्विक वित्तीय संपत्तियों, विदेशी मुद्रा विनिमय दरों और कमोडिटी की कीमतों में व्यापक फेरबदल हो सकता है। • भारतीय बाजार पर असर: अमेरिकी डॉलर में मजबूती से उभरते बाजारों की मुद्राओं पर दबाव बन सकता है, जिससे भारतीय आयात बिल विशेषकर कच्चे तेल की खरीद अधिक महंगी हो सकती है। आयात महंगा होने की स्थिति में घरेलू थोक और खुदरा महंगाई पर असर पड़ सकता है, जिससे ब्याज दरों में तत्काल राहत की उम्मीदें टल सकती हैं। • सोना और कमोडिटी निवेशक: अमेरिकी सरकारी प्रतिभूतियों पर मिलने वाला उच्च ब्याज सोने जैसी गैर-ब्याज वाली संपत्तियों की आकर्षण क्षमता को घटाता है। 4,200 डॉलर के स्तर के करीब सोने में आई रुकावट संकेत देती है कि निकट अवधि में कीमती धातुओं में सीमित तेजी रह सकती है। • वैश्विक मुद्रा विनिमय: यूरो, जापानी येन और ऑस्ट्रेलियाई डॉलर के कमजोर पड़ने से अंतरराष्ट्रीय यात्रा, विदेशी शिक्षा और सीमा पार लेनदेन की लागत बदल सकती है। विदेशी मुद्रा में खर्च करने वाले छात्रों और पर्यटकों को अपने बजट का नए विनिमय स्तरों के अनुसार पुनर्मूल्यांकन करना पड़ सकता है। • डिजिटल परिसंपत्ति धारक: पारंपरिक सरकारी बॉन्ड में आकर्षक रिटर्न मिलने से सट्टा आधारित और जोखिम वाली डिजिटल संपत्तियों से संस्थागत पूंजी निकल सकती है। हाइपरलिक्विड से हाल ही में हुई 50 लाख डॉलर की निकासी दर्शाती है कि निवेशक फिलहाल अधिक सुरक्षित विकल्पों को प्राथमिकता दे रहे हैं। ऐसा क्यों हुआ अमेरिकी ट्रेजरी बॉन्ड में आई यह भारी बिकवाली कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों, लचीली अमेरिकी आर्थिक वृद्धि और ब्याज दरों के लंबे समय तक ऊंचे बने रहने की आशंकाओं के संयुक्त प्रभाव से उत्पन्न हुई है। • कच्चे तेल से उपजी महंगाई का डर: ऊर्जा कीमतों में निरंतर उछाल के कारण बाजार सहभागियों को चिंता है कि महंगाई फिर से भड़क सकती है। इस आशंका ने व्यक्तिगत उपभोग व्यय के संशोधित नरम आंकड़ों से मिली राहत को पूरी तरह बेअसर कर दिया। • आर्थिक मजबूती और फेडरल रिजर्व की नीतियां: अमेरिकी अर्थव्यवस्था की मजबूत वृद्धि दर यह संकेत देती है कि केंद्रीय बैंक को दरों में कटौती करने की जल्दबाजी नहीं होगी। इसके चलते निवेशकों ने लंबी अवधि के बॉन्ड से अपनी पूंजी निकालकर यील्ड को 2002 और 2007 के रिकॉर्ड स्तरों पर पहुंचा दिया। • पोर्टफोलियो पुनर्संतुलन और भू-राजनीतिक तनाव: महीने के अंत में निवेशकों द्वारा किए जाने वाले पोजीशनिंग बदलाव और अमेरिका-ईरान के बीच बढ़ते गतिरोध ने सुरक्षित निवेश के रूप में डॉलर की मांग को और बढ़ा दिया। इससे डॉलर की व्यापक मजबूती को अतिरिक्त समर्थन मिला और अन्य बाजारों पर दबाव बढ़ा। सवाल-जवाब 1. 10 वर्षीय और 30 वर्षीय अमेरिकी ट्रेजरी यील्ड किस स्तर पर पहुंची हैं? 10 वर्षीय ट्रेजरी यील्ड बढ़कर 5.28 प्रतिशत पर पहुंच गई है जो 2007 के बाद का उच्चतम स्तर है, जबकि 30 वर्षीय यील्ड 5.63 प्रतिशत पर पहुंच गई है जो 2002 के बाद का सर्वोच्च स्तर है। 2. मुद्रास्फीति के नरम आंकड़ों के बावजूद बॉन्ड यील्ड क्यों बढ़ी? कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों से महंगाई दोबारा बढ़ने का जोखिम और अमेरिकी आर्थिक वृद्धि का मजबूत बने रहना यील्ड में बढ़ोतरी का मुख्य कारण रहा। 3. अमेरिकी डॉलर की मजबूती का यूरो और जापानी येन पर क्या प्रभाव पड़ा? यूरो गिरकर मई 2025 के बाद के निचले स्तर 1.1312 पर आ गया, जबकि अमेरिकी डॉलर जापानी येन के मुकाबले 158.00 के स्तर से ऊपर कारोबार कर रहा है। 4. सोने की कीमतों पर यील्ड वृद्धि का क्या असर देखा गया? सोना 4,200 डॉलर के स्तर के पास पहुंचने के बाद अपनी बढ़त बरकरार नहीं रख सका और मजबूत डॉलर तथा ऊंची बॉन्ड यील्ड के चलते सपाट कारोबार करने लगा। 5. हाइपरलिक्विड यानी एचवाईपीई में क्या हलचल दर्ज की गई? एचवाईपीई में 2 प्रतिशत की गिरावट आई और 50 लाख डॉलर की संस्थागत निकासी के कारण इसका मूल्य 90 डॉलर के नीचे सीमित रहा। https://trendkia.com/market/us-treasury-yields-rikorda-stara-para-vaishvika-mudraon-aura-sone-para-dabava-barha-41248 TrendKia — Har trend, sabse pehle.