डॉलर के मुकाबले 96 के स्तर पर संभला रुपया, केंद्रीय बैंक के हस्तक्षेप और कच्चे तेल के दबाव के बीच ब्याज दर बढ़ोतरी की सुगबुगाहट रिजर्व बैंक के संभावित डॉलर हस्तक्षेप के बाद घरेलू मुद्रा को 96.00 के मनोवैज्ञानिक स्तर के आसपास फौरी सहारा मिला है, हालांकि मजबूत अमेरिकी बॉन्ड यील्ड और कच्चे तेल की महंगाई से जोखिम बना हुआ है। अमेरिकी डॉलर के मुकाबले लगातार दबाव झेल रही भारतीय मुद्रा को शुक्रवार को थोड़ी राहत मिली, जब विनिमय दर 96.00 के अहम स्तर के पास टिकने में सफल रही। पिछले कई कारोबारी सत्रों से जारी गिरावट के बाद डॉलर/रुपया जोड़ी 95.96 के स्तर से ऊपर टिकने के लिए संघर्ष करती दिखी। मुद्रा बाजार में यह स्थिरता ऐसे समय आई है जब स्थानीय हाजिर बाजार खुलने से ठीक पहले अमेरिकी डॉलर की बिक्री किए जाने के संकेत मिले, जिससे रुपये को 96 प्रति डॉलर के महत्वपूर्ण मनोवैज्ञानिक स्तर से नीचे फिसलने से रोका जा सका। लाइव बाजार आंकड़ों के अनुसार, यूएसडी/आईएनआर (USD/INR) 95.85 पर कारोबार कर रहा है, जो पिछले 95.74 के बंद स्तर से 0.11 प्रतिशत की मजबूती दर्शाता है। 52 हफ्तों के दौरान इस जोड़ी का दायरा 85.86 से 97.05 के बीच रहा है। ऊंची ऊर्जा कीमतें और अमेरिकी ट्रेजरी यील्ड की तेजी रुपये को मिला यह तात्कालिक सहारा ज्यादा समय तक टिकने को लेकर बाजार विशेषज्ञ संशय में हैं। इसकी मुख्य वजह वैश्विक स्तर पर अमेरिकी ट्रेजरी यील्ड्स में जारी जबरदस्त उछाल और महंगे होते ऊर्जा उत्पाद हैं। इसके साथ ही अमेरिकी फेडरल रिजर्व की तरफ से ब्याज दरों को लंबे समय तक उच्च स्तर पर बनाए रखने का रुख भी निवेशकों को डॉलर की तरफ आकर्षित कर रहा है। शुरुआती कारोबार में 19 अक्टूबर को समाप्त होने वाला एमसीएक्स क्रूड ऑयल अनुबंध 2.3 प्रतिशत गिरकर 8,950 रुपये के करीब आ गया, हालांकि पिछले दो कारोबारी दिनों में इसमें तेज बढ़त दर्ज की गई थी। दूसरी ओर, 10-वर्षीय अमेरिकी ट्रेजरी यील्ड गुरुवार को 5.23 प्रतिशत के स्तर को छूने के बाद अपने 19 साल के उच्चतम स्तर के करीब बनी हुई है। कच्चे तेल की कीमतें एक बार फिर 100 डॉलर प्रति बैरल के पार निकलना, अमेरिकी पीएमआई आंकड़ों का कई वर्षों के उच्च स्तर पर पहुंचना और एफओएमसी सदस्यों का सख्त रुख, इन सभी कारकों ने अमेरिकी यील्ड कर्व के दोनों सिरों पर यील्ड को बढ़ा दिया है। चूंकि ट्रेजरी नोट्स कुल विपणन योग्य ट्रेजरी का लगभग 52 प्रतिशत हिस्सा हैं, इसलिए यील्ड में होने वाला यह उतार-चढ़ाव अमेरिकी वित्तीय परिदृश्य के लिए खासा संवेदनशील माना जा रहा है। फेडरल रिजर्व का सख्त रुख और उभरते बाजारों पर दबाव वैश्विक वित्तीय हालात पर नजर रखने वाले वित्तीय विश्लेषक संस्थान एमयूएफजी के अनुसार, वित्तीय बाजार अब दिसंबर 2026 तक फेडरल रिजर्व द्वारा लगभग 37 आधार अंकों की अतिरिक्त मौद्रिक सख्ती की संभावना मानकर चल रहे हैं। इसका सीधा अर्थ साल के अंत तक लगभग 1.5 बार ब्याज दरों में वृद्धि होना है। विश्लेषकों का मानना है कि अमेरिकी अर्थव्यवस्था का लचीलापन यह जोखिम पैदा कर रहा है कि मुद्रास्फीति को पूरी तरह काबू में लाने के लिए नीति निर्माताओं को लंबे समय तक सख्त कदम उठाने पड़ सकते हैं। यह स्थिति जोखिम वाली संपत्तियों और विशेष रूप से एशियाई विदेशी मुद्रा विनिमय बाजार (एशिया एफएक्स) के लिए एक कठिन माहौल तैयार करती है। भारत में महंगाई के आंकड़े और अक्टूबर नीतिगत बैठक के मायने घरेलू मोर्चे पर बात करें तो भारत की मुद्रास्फीति में भी तेजी के स्पष्ट संकेत मिले हैं। एमयूएफजी के विश्लेषकों के मुताबिक भारत की अगस्त माह की मुद्रास्फीति सालाना आधार पर 4.8 प्रतिशत दर्ज की गई, जबकि पूर्व अनुमान 4.9 प्रतिशत का था। यह पिछले महीने के संशोधित 4.5 प्रतिशत के आंकड़े से अधिक है और दिसंबर 2024 के बाद का सबसे मजबूत स्तर है। जानकारों का कहना है कि कीमतों का यह दबाव चालू वित्त वर्ष की दूसरी छमाही में हेडलाइन महंगाई को 5 प्रतिशत से ऊपर बनाए रख सकता है, जिससे नीतिगत रुख को कड़ा रखने की जरूरत महसूस होगी। कच्चे तेल की कीमतों में लगातार तेजी, वैश्विक वित्तीय परिस्थितियों में सख्ती, मजबूत घरेलू आर्थिक वृद्धि और कोर मुद्रास्फीति में व्यापक फैलाव जैसे हालिया घटनाक्रम वित्तीय वर्ष 2027 की दूसरी छमाही में 50 आधार अंकों की ब्याज दर बढ़ोतरी की जमीन तैयार कर रहे हैं। इन परिस्थितियों ने अक्टूबर में होने वाली रिजर्व बैंक की मौद्रिक नीति समीक्षा बैठक को बेहद अहम और सक्रिय बना दिया है, जिसमें नीतिगत दरें बढ़ने की संभावना काफी प्रबल नजर आ रही है। तकनीकी स्तर और मुद्रा बाजार का गणित विदेशी मुद्रा चार्ट पर तकनीकी रुझान को देखें तो शुरुआती सहारा 20-दिवसीय ईएमए के पास 95.6104 के स्तर पर केंद्रित है। यदि गिरावट आती है तो लिवाल इस मौजूदा तेजी का बचाव करने के लिए आगे आ सकते हैं। वहीं लाइव तकनीकी संकेतकों पर नजर डालें तो 14-दिवसीय आरएसआई 55 पर है, जबकि एमएसीडी 0.15 पर सिग्नल लाइन 0.09 के मुकाबले बुलिश हिस्टोग्राम 0.07 दिखा रहा है। मूविंग एवरेज में 20-दिवसीय ईएमए 95.54, 50-दिवसीय ईएमए 95.43 और 200-दिवसीय ईएमए 93.45 पर स्थित हैं। साथ ही 50-दिवसीय एसएमए 95.51 और 200-दिवसीय एसएमए 93.73 पर हैं, जहां गोल्डन क्रॉस का गठन दीर्घावधि अपट्रेंड को दर्शाता है। बोलिंजर बैंड 94.21 से 96.47 के बीच है और एडीएक्स 34 पर ट्रेंडिंग गति दिखा रहा है। ऊपर की तरफ, यदि विनिमय दर 96.00 के पार निर्णायक रूप से निकलती है, तो इसका अगला लक्ष्य 97.00 के सर्वकालिक उच्च स्तर को दोबारा छूना हो सकता है। इंट्राडे स्तरों पर पिवट 95.88, रेजिस्टेंस 95.94 व 96.03 और सपोर्ट 95.79 व 95.73 पर मौजूद हैं। रुपये की चाल को तय करने वाले व्यापक आर्थिक कारक भारतीय रुपया बाहरी वैश्विक कारकों के प्रति सबसे अधिक संवेदनशील मुद्राओं में गिना जाता है। भारत अपनी पेट्रोलियम जरूरतों के लिए बड़े पैमाने पर आयात पर निर्भर है, इसलिए कच्चे तेल के अंतरराष्ट्रीय दाम, अमेरिकी डॉलर का वैश्विक मूल्य (क्योंकि अधिकांश अंतरराष्ट्रीय व्यापार डॉलर में ही होता है), और विदेशी निवेश का प्रवाह सीधे तौर पर घरेलू मुद्रा को प्रभावित करते हैं। रिजर्व बैंक विदेशी मुद्रा विनिमय बाजार में सीधे हस्तक्षेप करके विनिमय दर को नियंत्रित रखने और व्यापार को सुगम बनाने की दिशा में काम करता है। इसके अतिरिक्त, केंद्रीय बैंक ब्याज दरों में समायोजन के जरिये मुद्रास्फीति को अपने 4 प्रतिशत के लक्ष्य पर स्थिर रखने का प्रयास करता है। सामान्य तौर पर ऊंची ब्याज दरें रुपये को सहारा देती हैं। इसके पीछे कैरी ट्रेड का महत्वपूर्ण हाथ होता है, जहां निवेशक कम ब्याज दर वाले देशों से उधार लेकर अपेक्षाकृत अधिक ब्याज देने वाले देशों में पूंजी लगाते हैं और अंतर से मुनाफा कमाते हैं। इसके अलावा आर्थिक विकास दर (जीडीपी), व्यापार संतुलन, विदेशी प्रत्यक्ष निवेश (एफडीआई) और विदेशी पोर्टफोलियो निवेश (एफआईआई) का प्रवाह रुपये के मूल्य को तय करता है। यदि महंगाई अपने प्रतिस्पर्धी देशों की तुलना में अधिक बढ़ती है, तो यह मुद्रा अवमूल्यन का कारण बनती है और निर्यात लागत बढ़ाकर व्यापार संतुलन पर नकारात्मक असर डालती है। अन्य एशियाई और वैश्विक मुद्राओं की स्थिति डॉलर की मजबूती का असर केवल भारतीय मुद्रा पर ही नहीं, बल्कि अन्य प्रमुख वैश्विक परिसंपत्तियों पर भी साफ देखा गया। एशियाई कारोबारी सत्र के दौरान ऑस्ट्रेलियाई डॉलर बनाम अमेरिकी डॉलर (AUD/USD) 200-दिवसीय एसएमए से नीचे फिसलने के बाद अगस्त की शुरुआत के बाद के सबसे निचले स्तर पर आ गया और 0.7000 के मनोवैज्ञानिक स्तर के पास कमजोर नजर आया। तेल कीमतों में तेजी और भू-राजनीतिक जोखिमों ने अमेरिकी डॉलर को दो महीने के उच्च स्तर पर पहुंचा दिया, जिसने ऑस्ट्रेलियाई केंद्रीय बैंक की दर बढ़ोतरी की उम्मीदों पर पानी फेर दिया। जापानी येन के मुकाबले अमेरिकी डॉलर (USD/JPY) 159.00 के तीन सप्ताह के उच्च स्तर पर पहुंचने के बाद थोड़ा सुस्त पड़ा, क्योंकि जापानी अधिकारियों द्वारा बाजार हस्तक्षेप की आशंका से विक्रेता सतर्क हो गए। हालांकि बैंक ऑफ जापान द्वारा अल्पकालिक ब्याज दर लक्ष्य को 7-2 के बहुमत से 1.00 प्रतिशत से बढ़ाकर 1.25 प्रतिशत करने के बावजूद येन की चाल सीमित बनी हुई है। उधर सर्राफा बाजार में सोना गुरुवार के 4,244 डॉलर के निचले स्तर से उबरने के बावजूद 4,300 डॉलर प्रति औंस के नीचे बना रहा और फेडरल रिजर्व के आक्रामक रुख तथा वैश्विक बॉन्ड बाजार की बिकवाली के बीच पिछले चार हफ्तों में अपने सबसे खराब सप्ताह की ओर अग्रसर दिखा। इसका आप पर असर अमेरिकी डॉलर के मुकाबले रुपये की कमजोरी और कच्चे तेल की ऊंची कीमतें सीधे तौर पर घरेलू आयात, ईंधन खर्च और व्यक्तिगत बजट को प्रभावित करती हैं। • भारत में आयात और ईंधन लागत: कच्चे तेल के 100 डॉलर प्रति बैरल के पार जाने से देश का तेल आयात बिल तेजी से बढ़ेगा। इसके परिणामस्वरूप आने वाले समय में पेट्रोल, डीजल और गैस आधारित परिवहन लागत में इजाफा देखने को मिल सकता है। • लोन ईएमआई और उधारी: खुदरा मुद्रास्फीति 4.8 प्रतिशत तक पहुंचने के कारण अक्टूबर में रिजर्व बैंक द्वारा नीतिगत दरें बढ़ाने की संभावना बढ़ गई है। यदि केंद्रीय बैंक दरें बढ़ाता है, तो होम लोन और ऑटो लोन की मासिक ईएमआई महंगी हो सकती है। • विदेशी शिक्षा और यात्रा: डॉलर के 96 रुपये के करीब पहुंचने से विदेश में पढ़ाई करने वाले छात्रों का ट्यूशन और रहने का खर्च बढ़ जाएगा। अंतरराष्ट्रीय यात्रा की योजना बना रहे यात्रियों को विदेशी मुद्रा खरीदते समय अधिक खर्च उठाना पड़ेगा। • इलेक्ट्रॉनिक्स और गैजेट्स के दाम: डॉलर में आयात होने वाले इलेक्ट्रॉनिक उपकरण और स्मार्टफोन घटकों की लागत बढ़ सकती है। त्योहारी सीजन के दौरान कंपनियों को आयातित उत्पादों के खुदरा मूल्य बढ़ाने के लिए मजबूर होना पड़ सकता है। • शेयर बाजार और विदेशी निवेशक: अमेरिकी बॉन्ड यील्ड 5.23 प्रतिशत के पास रहने से विदेशी संस्थागत निवेशक भारतीय बाजार से पूंजी निकाल सकते हैं। घरेलू इक्विटी निवेशकों को अल्पकालिक उतार-चढ़ाव के लिए अपनी रणनीतियों को सतर्क रखना चाहिए। ऐसा क्यों हुआ रुपये पर यह दबाव मजबूत अमेरिकी बॉन्ड यील्ड, कच्चे तेल की अंतरराष्ट्रीय कीमतों में उछाल और घरेलू मुद्रास्फीति में आई तेजी के सम्मिलित प्रभाव से उत्पन्न हुआ है। • अमेरिकी फेडरल रिजर्व का सख्त रुख: फेडरल रिजर्व द्वारा ब्याज दरों को लंबे समय तक ऊंचा रखने के संकेत से 10-वर्षीय अमेरिकी यील्ड 5.23 प्रतिशत तक चढ़ गई है। इस आकर्षण के चलते निवेशक उभरते बाजारों से पूंजी निकालकर अमेरिकी परिसंपत्तियों में लगा रहे हैं। • ऊर्जा कीमतों में भारी उछाल: अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चा तेल 100 डॉलर प्रति बैरल के ऊपर पहुंच गया है, जिससे भारत का आयात बिल काफी बढ़ गया है। तेल कंपनियों द्वारा डॉलर की भारी मांग पैदा होने से रुपये पर बिकवाली का दबाव गहराया। • घरेलू मुद्रास्फीति में बढ़ोत्तरी: भारत में अगस्त की महंगाई बढ़कर 4.8 प्रतिशत हो गई, जो पिछले महीने 4.5 प्रतिशत थी। इस वृद्धि ने रिजर्व बैंक पर मौद्रिक नीति को और अधिक सख्त करने और ब्याज दरें बढ़ाने का दबाव बना दिया है। • केंद्रीय बैंक का डॉलर हस्तक्षेप: विनिमय दर को 96.00 के मनोवैज्ञानिक स्तर से नीचे जाने से रोकने के लिए केंद्रीय बैंक ने हाजिर बाजार खुलने से पहले डॉलर की बिक्री की। हालांकि इस कदम ने गिरावट को सीमित किया, लेकिन वैश्विक दबावों के कारण दीर्घकालिक अस्थिरता बनी हुई है। सवाल-जवाब 1. रुपये को 96 के स्तर पर अस्थायी सहारा कैसे मिला? स्थानीय हाजिर बाजार खुलने से पहले केंद्रीय बैंक द्वारा अमेरिकी डॉलर की संभावित बिक्री से रुपये को 96 प्रति डॉलर के महत्वपूर्ण स्तर के पास टिकने में मदद मिली। 2. अमेरिकी बॉन्ड यील्ड का रुपये पर क्या असर पड़ रहा है? 10-वर्षीय अमेरिकी ट्रेजरी यील्ड 5.23 प्रतिशत के 19 साल के उच्चतम स्तर के करीब पहुंचने से डॉलर मजबूत हुआ है, जिससे रुपये जैसी उभरती एशियाई मुद्राओं पर दबाव बढ़ा है। 3. कच्चे तेल की कीमतें रुपये को कैसे प्रभावित करती हैं? भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए बड़े पैमाने पर आयात पर निर्भर है, इसलिए कच्चे तेल के 100 डॉलर से ऊपर जाने से आयातकों की डॉलर मांग बढ़ती है और रुपया कमजोर होता है। 4. भारत में अगस्त की मुद्रास्फीति दर कितनी दर्ज की गई? अगस्त में भारत की खुदरा मुद्रास्फीति सालाना आधार पर 4.8 प्रतिशत रही, जो जुलाई के संशोधित 4.5 प्रतिशत से अधिक और दिसंबर 2024 के बाद का उच्चतम स्तर है। 5. अक्टूबर में रिजर्व बैंक की बैठक को लेकर विश्लेषकों का क्या अनुमान है? विश्लेषकों का मानना है कि कच्चे तेल की तेजी और महंगाई के दबाव को देखते हुए रिजर्व बैंक अक्टूबर बैठक में नीतिगत दरों में बढ़ोतरी का कदम उठा सकता है। 6. जापानी केंद्रीय बैंक ने हाल ही में क्या नीतिगत निर्णय लिया? बैंक ऑफ जापान ने 7-2 के बहुमत से अपनी अल्पकालिक ब्याज दर लक्ष्य को 1.00 प्रतिशत से बढ़ाकर 1.25 प्रतिशत कर दिया है। 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