विदेशी निवेशकों की 6.3 अरब डॉलर की निकासी से दबाव में रुपया, रिजर्व बैंक ने संभाला मोर्चा वैश्विक उथल-पुथल के बीच विदेशी निवेशकों की भारी निकासी से अमेरिकी डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपया 96.00 के पार चला गया है, जिसे संभालने के लिए भारतीय रिजर्व बैंक मुद्रा बाजार और लिक्विडिटी स्तर पर सक्रिय कदम उठा रहा है। अंतरराष्ट्रीय वित्तीय बाजारों में मची हलचल का सीधा असर घरेलू अर्थव्यवस्था और विदेशी मुद्रा विनिमय दरों पर दिखाई देने लगा है। वैश्विक स्तर पर जारी अनिश्चितताओं के बीच विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPIs) ने भारतीय पूंजी बाजार से भारी पूंजी बाहर निकाली है, जिसके चलते अमेरिकी डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपये की विनिमय दर कमजोर होकर 96.00 के स्तर से ऊपर निकल गई है। सितंबर और अक्टूबर 2026 के दौरान डेट और इक्विटी बाजारों से बड़े पैमाने पर डॉलर की निकासी दर्ज की गई है। इस बदलते परिदृश्य में घरेलू वित्तीय स्थिरता बनाए रखने के लिए भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) को विदेशी मुद्रा बाजार में सीधा हस्तक्षेप करने के साथ-साथ बैंकिंग प्रणाली की अतिरिक्त नकदी सोखने के कड़े उपाय अमल में लाने पड़े हैं। विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों की निकासी और विनिमय दर पर असर डीबीएस बैंक की राधिका राव के अनुसार, घरेलू वित्तीय बाजार इस समय वैश्विक आर्थिक गतिविधियों के भारी दबाव का सामना कर रहे हैं। सितंबर और अक्टूबर 2026 की अवधि में विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों ने भारत के इक्विटी और ऋण (डेट) बाजारों से लगभग 6.3 अरब डॉलर की शुद्ध पूंजी वापस खींच ली है। विदेशी निवेशकों द्वारा बड़े पैमाने पर डॉलर खरीदे जाने और स्थानीय परिसंपत्तियों को बेचे जाने की वजह से मुद्रा विनिमय बाजार में अमेरिकी डॉलर की मांग में भारी उछाल आया है। इसके परिणामस्वरूप USD/INR की जोड़ी 96.00 के स्तर से ऊपर पहुंच चुकी है। पूंजी का यह तेज बहिर्गमन सीधे तौर पर वैश्विक ब्याज दरों, बॉन्ड प्रतिफल में तेजी और सुरक्षित निवेश विकल्पों की ओर बढ़ते रुझान से जुड़ा हुआ है। रिजर्व बैंक की मुद्रा रणनीति और विदेशी मुद्रा भंडार का प्रबंधन रुपये के गिरते स्तर को सीमित करने के उद्देश्य से केंद्रीय बैंक ने विदेशी विनिमय बाजार में सक्रिय कदम उठाए हैं। हालांकि केंद्रीय बैंक का हस्तक्षेप काफी मजबूत रहा है, लेकिन डॉलर की बिक्री के समय और परिमाण को लेकर अत्यधिक सतर्कता बरती जा रही है। इसका मुख्य उद्देश्य अपने विदेशी मुद्रा भंडार के बफर का विवेकपूर्ण और तर्कसंगत इस्तेमाल सुनिश्चित करना है। इसके साथ ही बैंक यह भी सुनिश्चित करना चाहता है कि उसके पहले से बढ़े हुए शॉर्ट एफएक्स फॉरवर्ड बुक के आकार में अनावश्यक विस्तार न हो। मुद्रा विशेषज्ञों का मानना है कि केंद्रीय बैंक अनियंत्रित गिरावट को थामने के लिए बाजार में मौजूद रहेगा, लेकिन डॉलर की असीमित आपूर्ति के बजाय वह समयबद्ध बिक्री को प्राथमिकता दे रहा है। बैंकिंग प्रणाली की अधिशेष नकदी को नियंत्रित करने के कदम विदेशी मुद्रा बाजार के साथ-साथ केंद्रीय बैंक बैंकिंग क्षेत्र में मौजूद अतिरिक्त तरलता को संतुलित करने में भी जुटा हुआ है। बैंकिंग प्रणाली में नकदी के बड़े अधिशेष को देखते हुए सोमवार को दो ओवरनाइट वेरिएबल रेट रिवर्स रेपो (VRRR) नीलामियां आयोजित की गईं। इन विशेष नीलामियों के माध्यम से रिजर्व बैंक बैंकिंग तंत्र से 2.1 लाख करोड़ रुपये की अधिशेष नकदी को अवशोषित करने में सफल रहा। वित्तीय तंत्र में तरलता प्रबंधन के लिए वीआरआरआर नीलामियों के अलावा ओपन मार्केट ऑपरेशंस (OMOs) और सेल/बाय स्वैप सौदों को भी प्रमुख साधनों के रूप में देखा जा रहा है। इन कदमों का उद्देश्य मुद्रा बाजार की अल्पावधि ब्याज दरों को नीतिगत दरों के अनुरूप बनाए रखना है। बॉन्ड यील्ड और वैश्विक बाजारों का ताजा परिदृश्य यूरो मुद्रा में जारी घबराहट के कारण अमेरिकी डॉलर सूचकांक को निरंतर मजबूती मिल रही है, जिसके चलते मौजूदा सप्ताह के दौरान भी USD/INR में बढ़त का रुख बने रहने का अनुमान है। वहीं दूसरी ओर, भारत के 10-वर्षीय सरकारी बॉन्ड का प्रतिफल 7.0% के स्तर से ऊपर टिके रहने की संभावना व्यक्त की गई है। अन्य अंतरराष्ट्रीय बाजारों में भी इसी तरह की उठापटक देखी जा रही है। मंगलवार के एशियाई कारोबारी सत्र के दौरान AUD/USD में हल्की नरमी देखी गई, जिससे पिछले सप्ताह दो महीने के निचले स्तर से शुरू हुई दो दिवसीय रिकवरी पर विराम लग गया। अमेरिकी फिक्स्ड इनकम बाजार में जारी बिकवाली ने वहां के बॉन्ड यील्ड को कई वर्षों के उच्च स्तर के करीब बनाए रखा है, जिससे फेडरल रिजर्व द्वारा अक्टूबर में दर वृद्धि की घटती संभावनाओं के बावजूद डॉलर मजबूत बना हुआ है। हालांकि रिजर्व बैंक ऑफ ऑस्ट्रेलिया (RBA) द्वारा इस महीने दरें बढ़ाने की उम्मीदें ऑस्ट्रेलियाई डॉलर को सहारा दे सकती हैं। येन, सोना और यूरोप में राजनीतिक व मौद्रिक चुनौतियां यूरोपीय कारोबारी सत्र की शुरुआत में USD/JPY की दर बढ़कर 158.00 के पार पहुंच गई। बैंक ऑफ जापान (BoJ) की सख्त मौद्रिक नीति संबंधी अपेक्षाओं और बाजार में संभावित हस्तक्षेप के जोखिमों के बावजूद जापानी येन में कोई खास उत्साह नहीं दिखा। भू-राजनीतिक तनाव और ऊंचे अमेरिकी बॉन्ड यील्ड डॉलर को साल के उच्चतम स्तर के पास बनाए हुए हैं। जिंस बाजार की बात करें तो मंगलवार को सोने (XAU/USD) में सुधार देखा गया। अमेरिकी ट्रेजरी यील्ड में आई गिरावट से डॉलर पर दबाव पड़ा, जिससे सोना एशियाई कारोबार के दौरान $4,104 के दो महीने के निचले स्तर से उबरकर 0.82% की बढ़त के साथ लगभग $4,173 प्रति औंस पर कारोबार करने लगा। यूरोप में बाजार की नजर मध्य पूर्व के भू-राजनीतिक घटनाक्रमों और फ्रांस के बजट विवाद पर टिकी है, जहां सोशलिस्ट पार्टी और मरीन ले पेन की नेशनल रैली सरकार गिराने के संकेत दे सकती हैं। वहीं यूरोपीय सेंट्रल बैंक (ECB) के सामने लक्ष्य से लगभग दोगुनी मुद्रास्फीति को नियंत्रित करने के लिए ब्याज दरें बढ़ाने की कठिन दुविधा है, क्योंकि बॉन्ड बाजार पहले ही आंशिक सख्ती लागू कर चुका है। इसका आप पर असर अमेरिकी डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपये के 96.00 के पार जाने और पूंजी निकासी का सीधा असर विदेशी शिक्षा, आयातित सामान की कीमतों और घरेलू ब्याज दरों पर पड़ेगा। • विदेश यात्रा और शिक्षा: विदेश में पढ़ाई कर रहे भारतीय छात्रों के ट्यूशन शुल्क और रहने का खर्च तुरंत बढ़ जाएगा। छात्रों और उनके अभिभावकों को डॉलर खरीदने के लिए पहले की तुलना में अधिक रुपये चुकाने होंगे। • आयातित वस्तुओं के दाम: कच्चा तेल, इलेक्ट्रॉनिक्स और औद्योगिक मशीनरी का आयात महंगा हो जाएगा। विनिर्माता और आयातक इस बढ़ी हुई लागत का बोझ आम उपभोक्ताओं पर डाल सकते हैं। • घरेलू ब्याज दरें: बैंकिंग प्रणाली से 2.1 लाख करोड़ रुपये की अधिशेष तरलता सोखे जाने से बाजार में नकदी सीमित होगी। इसके कारण अल्पकालिक उधारी दरों और फिक्स्ड डिपॉजिट दरों पर दबाव बढ़ सकता है। • निवेशक और डेट बाजार: भारत के 10-वर्षीय बॉन्ड यील्ड के 7.0% से ऊपर टिके रहने से डेट म्यूचुअल फंड और बॉन्ड निवेशकों के रिटर्न पर असर पड़ेगा। लंबी अवधि के बॉन्ड फंड्स में निवेश करने वालों को सतर्क रहने की जरूरत है। ऐसा क्यों हुआ वैश्विक स्तर पर बॉन्ड यील्ड के बहु-वर्षीय उच्च स्तर पर बने रहने, डॉलर की मजबूती और विदेशी निवेशकों द्वारा भारतीय परिसंपत्तियों को बेचे जाने के कारण रुपये में यह गिरावट आई है। • विदेशी पूंजी की भारी निकासी: विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों ने सितंबर और अक्टूबर 2026 के दौरान भारतीय डेट और इक्विटी बाजारों से करीब 6.3 अरब डॉलर निकाले हैं। डॉलर की इस अचानक बढ़ी मांग ने रुपये पर तीखा दबाव डाला। • वैश्विक बॉन्ड प्रतिफल और डॉलर की ताकत: अमेरिकी निश्चित आय बाजार में बिकवाली के कारण बॉन्ड यील्ड ऊंचे स्तर पर टिकी हुई है। इसके साथ ही अंतरराष्ट्रीय अनिश्चितताओं और यूरो की कमजोरी ने डॉलर इंडेक्स को अतिरिक्त मजबूती दी है। • अधिशेष बैंकिंग नकदी का प्रबंधन: घरेलू मुद्रा बाजार में अतिरिक्त नकदी के दबाव को थामने के लिए केंद्रीय बैंक को 2.1 लाख करोड़ रुपये सोखने पड़े हैं। मुद्रा विनिमय और तरलता के असंतुलन को पाटने के लिए नीतिगत कदम जारी हैं। सवाल-जवाब 1. विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों ने हाल ही में भारतीय बाजार से कितनी पूंजी निकाली है? विदेशी निवेशकों ने सितंबर और अक्टूबर 2026 के दौरान भारतीय इक्विटी और ऋण बाजारों से लगभग 6.3 अरब डॉलर की निकासी की है। 2. अमेरिकी डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपया किस स्तर पर पहुंच गया है? पूंजी निकासी और वैश्विक दबाव के कारण अमेरिकी डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपया 96.00 के स्तर से ऊपर निकल गया है। 3. रिजर्व बैंक ने बैंकिंग तंत्र से कितनी अतिरिक्त नकदी को सोखा है? रिजर्व बैंक ने सोमवार को दो ओवरनाइट वीआरआरआर नीलामियों के जरिए बैंकिंग प्रणाली से 2.1 लाख करोड़ रुपये की अधिशेष नकदी अवशोषित की है। 4. भारत के 10-वर्षीय बॉन्ड यील्ड को लेकर विश्लेषकों का क्या अनुमान है? बाजार विश्लेषकों का अनुमान है कि मौजूदा परिस्थितियों में भारत के 10-वर्षीय सरकारी बॉन्ड का प्रतिफल 7.0% के स्तर से ऊपर बना रहेगा। 5. मंगलवार को अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोने का भाव क्या रहा? सोने की कीमत $4,104 के दो महीने के निचले स्तर से सुधरकर 0.82% की बढ़त के साथ लगभग $4,173 प्रति औंस पर पहुंच गई। https://trendkia.com/market/videshi-niveshakon-ki-6-3-araba-dolara-ki-nikasi-se-dabava-men-rupee-rbi-ne-snbhala-morcha-44016 TrendKia — Har trend, sabse pehle.