पश्चिम एशिया संकट और घटते भंडार से कच्चे तेल की कीमतों में उछाल, जानिए वैश्विक बाजारों का हाल पश्चिम एशिया में लगातार हो रहे व्यवधानों और कम होते तेल भंडार के कारण कच्चे तेल की कीमतों में तेजी बनी हुई है। वहीं मुद्रा बाजारों में अमेरिकी डॉलर को मजबूती मिल रही है और निवेशकों की नजरें वाशिंगटन में होने वाली अहम राजनयिक बैठक पर टिकी हैं। अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा बाजार इस समय गहरे आपूर्ति संकट और भू-राजनीतिक अस्थिरता के दोहरे दबाव का सामना कर रहे हैं। पश्चिम एशिया में जारी तनाव, तेल उत्पादन और परिवहन बुनियादी ढांचे पर हुए हमलों, तथा खाली होते रणनीतिक भंडारों ने कच्चे तेल की कीमतों को लंबे समय तक ऊंचे स्तर पर बनाए रखने की जमीन तैयार कर दी है। ऊर्जा विश्लेषकों का स्पष्ट मानना है कि अगर आपूर्ति की स्थिति में कुछ सुधार होता भी है, तो भी पहले जैसे सामान्य भंडार जुटाने में कई साल लग सकते हैं। ऐसी स्थिति में ऊर्जा बाजारों में मूल्य दबाव लंबे समय तक हावी रहने की आशंका बन गई है। होर्मुज जलडमरूमध्य और आपूर्ति मार्गों की नाजुक स्थिति ऊर्जा आपूर्ति के सबसे महत्वपूर्ण रास्तों में शुमार होर्मुज जलडमरूमध्य से जहाजों की आवाजाही सामान्य स्तर से काफी नीचे बनी हुई है। जुलाई के महीने में जब इस रास्ते से समुद्री यातायात में सुधार के शुरुआती संकेत दिखे थे, तब बाजार को कुछ उम्मीद बंधी थी। लेकिन उसके बाद पारगमन मात्रा फिर से घट गई और कई जहाज औपचारिक ट्रैकिंग सिस्टम से बाहर चलने को मजबूर हो गए। वर्तमान में इस मार्ग से गुजरने वाले कच्चे तेल का प्रवाह युद्ध-पूर्व के स्तरों की तुलना में लगभग आधा रह गया है। वैकल्पिक मार्गों से भेजे जा रहे शिपमेंट भी इस भारी कमी की भरपाई करने में पूरी तरह नाकाम साबित हुए हैं। सऊदी अरब के तेल टैंकरों और बुनियादी ढांचे पर हुए हमलों ने यह साफ कर दिया है कि बचे हुए आपूर्ति मार्ग कितने नाजुक और जोखिम भरे हैं। नेशनल बैंक ऑफ कनाडा के ईथन करी ने कच्चे तेल की कीमतों का पुनर्मूल्यांकन करते हुए कहा कि आपूर्ति बहाल होने पर भी भंडारों को पूरी तरह से सामान्य होने में वर्षों लग सकते हैं। तेल वायदा बाजार में तात्कालिक अनुबंधों के सौदे भले ही भू-राजनीतिक सुर्खियों के चलते अत्यधिक उतार-चढ़ाव भरे रहे हों, लेकिन लंबी अवधि के अनुबंध लगातार मजबूती दिखा रहे हैं। यह स्थिति दर्शाती है कि आपूर्ति में आई रुकावटों का असर तेल वक्र पर लंबे समय तक बना रहेगा और नीति निर्माताओं पर इसके समाधान का दबाव लगातार बढ़ रहा है। मुद्रा बाजारों में हलचल और डॉलर का मजबूत रुख वैश्विक ऊर्जा संकट और अमेरिकी फेडरल रिजर्व के आक्रामक मौद्रिक रुख का सीधा असर अंतरराष्ट्रीय मुद्रा बाजारों पर भी साफ नजर आ रहा है। एशियाई कारोबारी सत्र में ऑस्ट्रेलियाई डॉलर अमेरिकी डॉलर के मुकाबले 0.7100 के स्तर से ऊपर खरीदारी हासिल करने में सफल रहा। इस बढ़त को रिजर्व बैंक ऑफ ऑस्ट्रेलिया की सहायक गवर्नर सारा हंटर और गवर्नर मिशेल बुलक की सख्त टिप्पणियों से समर्थन मिला। हालांकि, पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और अमेरिकी फेडरल रिजर्व द्वारा ब्याज दरों को लंबे समय तक ऊंचा रखने के दृष्टिकोण ने अमेरिकी डॉलर को मजबूती दे रखी है, जिससे ऑस्ट्रेलियाई मुद्रा की बढ़त सीमित हो सकती है। दूसरी ओर, जापानी येन के मुकाबले अमेरिकी डॉलर 157.50 के स्तर के पास मामूली बढ़त के साथ कारोबार करता दिखा। जापानी अधिकारियों द्वारा मुद्रा बाजार में संभावित हस्तक्षेप की आशंकाओं ने येन की गिरावट को कुछ हद तक सीमित जरूर किया है। बैंक ऑफ जापान ने अपनी नीति सामान्यीकरण की दिशा में कदम बढ़ाते हुए अल्पकालिक ब्याज दर लक्ष्य को 1.00% से बढ़ाकर 1.25% कर दिया है। यह फैसला 7-2 के बहुमत से लिया गया, जो 31 वर्षों का उच्चतम स्तर है। हालांकि बैंक ऑफ जापान के इस कदम को बाजार पहले से मानकर चल रहा था, इसलिए येन के खरीदारों को बहुत अधिक आक्रामक होने का मौका नहीं मिला। सोने में नरमी और वाशिंगटन शिखर सम्मेलन पर नजर ब्याज दरों के ऊंचे बने रहने के अनुमानों ने कीमती धातुओं के बाजार को भी प्रभावित किया है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोना लगातार दूसरे कारोबारी सत्र में गिरावट दर्ज करते हुए प्रति ट्रॉय औंस 4,300 डॉलर के स्तर से नीचे फिसल गया, हालांकि बाद में इसमें कुछ सुधार देखने को मिला। अमेरिकी ट्रेजरी यील्ड और मजबूत डॉलर से सोने पर दबाव बना हुआ है, क्योंकि फेडरल रिजर्व के ब्याज दरों में ढील न देने के संकेतों से गैर-उपज वाली संपत्तियों के प्रति आकर्षण घटता है। इन तमाम आर्थिक गतिविधियों के बीच वैश्विक वित्तीय जगत की निगाहें गुरुवार को वाशिंगटन में होने वाली उच्चस्तरीय बैठक पर टिक गई हैं। इस शिखर सम्मेलन में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग आमने-सामने होंगे। दुनिया की दो सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के शीर्ष नेताओं के बीच होने वाली यह बातचीत तय करेगी कि दोनों देश व्यापारिक मोर्चे पर अपनी मौजूदा सहमति को आगे बढ़ाएंगे या फिर वैश्विक अर्थव्यवस्था एक नए अनिश्चितता भरे दौर में प्रवेश करेगी। इसका आप पर असर कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों और वैश्विक मुद्रा बाजार में डॉलर की मजबूती से आम उपभोक्ताओं और निवेशकों पर सीधा असर पड़ सकता है। • भारत में: अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कच्चे तेल की कीमतें ऊंची रहने से देश में पेट्रोल, डीजल और गैस सिलेंडरों के दाम लंबे समय तक ऊंचे रह सकते हैं। इसके अलावा आयातित कच्चा तेल महंगा होने से खाद्य पदार्थों और आवश्यक सामानों की ढुलाई लागत बढ़ सकती है। • वैश्विक स्तर पर: कच्चे तेल के भंडारों को भरने में सालों का समय लगने का मतलब है कि परिवहन और विमानन क्षेत्र में ईंधन अधिभार बना रहेगा। आम यात्रियों को हवाई टिकटों और लंबी दूरी के सफर के लिए अधिक खर्च करना पड़ सकता है। • मुद्रा और निवेश: अमेरिकी डॉलर के मजबूत रहने और सोने की कीमतों में गिरावट से पारंपरिक निवेशकों को अपने पोर्टफोलियो में फेरबदल करना पड़ सकता है। उच्च ब्याज दरों के बने रहने से बैंक फिक्स्ड डिपॉजिट आकर्षक बने रहेंगे लेकिन कर्ज की ईएमआई सस्ती होने में समय लगेगा। • कारोबारी वर्ग: चीन और अमेरिका के बीच होने वाली बैठक के नतीजों से अंतरराष्ट्रीय व्यापार की दिशा तय होगी। निर्यात और आयात से जुड़े कारोबारियों को कच्चे माल की आपूर्ति और शिपिंग लागत पर करीबी नजर रखनी होगी। ऐसा क्यों हुआ पश्चिम एशिया में बुनियादी ढांचे पर हुए हमलों और महत्वपूर्ण जलमार्गों में आई रुकावटों के चलते ऊर्जा बाजारों में यह आपूर्ति संकट खड़ा हुआ है। • पारगमन में भारी गिरावट: होर्मुज जलडमरूमध्य से जहाजों की आवाजाही युद्ध-पूर्व के स्तरों से आधी रह गई है और कई पोतों को निगरानी तंत्र से दूर होकर चलना पड़ रहा है। वैकल्पिक मार्गों का इस्तेमाल करने के बावजूद तेल की वास्तविक मांग और आपूर्ति के अंतर को पाटा नहीं जा सका है। • ऊर्जा बुनियादी ढांचे को नुकसान: सऊदी अरब के तेल टैंकरों और संबंधित बुनियादी ढांचे पर हुए हमलों ने आपूर्ति श्रृंखला की संवेदनशीलता को उजागर कर दिया है। इन हमलों के कारण तेल उत्पादकों के लिए सुरक्षित तरीके से ईंधन निर्यात करना अत्यंत चुनौतीपूर्ण हो गया है। • भंडार की भारी कमी: विभिन्न देशों और वाणिज्यिक प्रतिष्ठानों के तेल भंडार निचले स्तरों पर पहुंच चुके हैं। यदि वर्तमान आपूर्ति पूरी तरह बहाल भी हो जाती है, तब भी इन रणनीतिक भंडारों को दोबारा पहले जैसी स्थिति में लाने में कई वर्षों का समय लगेगा। सवाल-जवाब 1. कच्चे तेल की कीमतें लंबे समय तक ऊंची रहने की क्या वजह है? पश्चिम एशिया में लगातार आपूर्ति व्यवधान, होर्मुज जलडमरूमध्य से आधी रह गई जहाजों की आवाजाही और खाली होते वैश्विक तेल भंडारों के कारण कीमतें ऊंची बनी हुई हैं। 2. होर्मुज जलडमरूमध्य से तेल आपूर्ति की वर्तमान स्थिति क्या है? इस मार्ग से गुजरने वाले कच्चे तेल की मात्रा युद्ध-पूर्व के स्तरों से लगभग 50 प्रतिशत तक कम हो चुकी है और वैकल्पिक रास्ते भी इस कमी की भरपाई नहीं कर पा रहे हैं। 3. बैंक ऑफ जापान ने ब्याज दरों को लेकर क्या फैसला लिया है? बैंक ऑफ जापान ने 7-2 के बहुमत से अल्पकालिक ब्याज दर लक्ष्य को 1.00% से बढ़ाकर 1.25% कर दिया है, जो 31 वर्षों का उच्चतम स्तर है। 4. सोने की कीमतों में गिरावट क्यों दर्ज की जा रही है? अमेरिकी फेडरल रिजर्व द्वारा ब्याज दरों को लंबे समय तक ऊंचा रखने के अनुमानों के चलते अमेरिकी डॉलर और ट्रेजरी यील्ड मजबूत हैं, जिससे सोने पर दबाव बना है। 5. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग की बैठक कब है? दोनों देशों के शीर्ष नेता गुरुवार को वाशिंगटन में एक महत्वपूर्ण शिखर सम्मेलन के दौरान मुलाकात करेंगे। https://trendkia.com/market/west-asia-snkata-aura-ghatate-bhndara-se-kachche-tela-ki-kimaton-men-uchhala-janie-vaishvika-bajaron-ka-hala-36573 TrendKia — Har trend, sabse pehle.