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  "type": "article",
  "title": "मेघालय के एडवोकेट जनरल पर सरकारी दर से सात गुना अधिक फीस वसूलने का आरोप",
  "summary": "मेघालय के दो प्रमुख बार संगठनों ने आरोप लगाया है कि एडवोकेट जनरल अमित कुमार ने सरकारी नियमों की अनदेखी कर एक केस में 1.5 लाख रुपये प्रति पेशी के हिसाब से 1 करोड़ रुपये से अधिक का बिल बनाया।",
  "content": "मेघालय सरकार के खजाने से ली जाने वाली कानूनी फीस को लेकर राज्य में विवाद खड़ा हो गया है। राज्य की दो शीर्ष कानूनी संस्थाओं ने एडवोकेट जनरल अमित कुमार पर एक वाणिज्यिक विवाद में निर्धारित सरकारी दरों से कई गुना अधिक राशि वसूलने का गंभीर आरोप लगाया है। कानूनी संगठनों के अनुसार, संबंधित मामले में सरकारी खजाने से कुल दावा 1 करोड़ रुपये से भी अधिक पहुंच चुका है।\n\nनिर्धारित दरों की अनदेखी और भारी भरकम बिल\nहाई कोर्ट ऑफ मेघालय बार एसोसिएशन और शिलांग बार एसोसिएशन ने शुक्रवार को दस्तावेज पेश करते हुए इस मामले को उठाया। दोनों संगठनों का कहना है कि एक अज्ञात मुखबिर के माध्यम से उनके पास बिल और चालान पहुंचे हैं। इन दस्तावेजों के अनुसार, अदालत में केवल एक बार की पेशी के लिए 1.5 लाख रुपये का शुल्क लिया गया, जो सरकार द्वारा तय की गई मानक दर से लगभग सात गुना ज्यादा है। यह विवाद वाणिज्यिक अदालत से जुड़े एक मामले से संबंधित है, जिसकी सुनवाई वर्ष 2021 से 2023 के दौरान चली थी।\n\nसरकारी नियमों के तहत तय शुल्क संरचना काफी स्पष्ट है। राज्य के निर्धारित नियमों के अनुसार, हाई कोर्ट में प्रति पेशी 20,000 रुपये, सुप्रीम कोर्ट में प्रति पेशी 40,000 रुपये और मासिक रिटेनर फीस के रूप में 50,000 रुपये देने की व्यवस्था है। अमित कुमार ने 3 सितंबर को सार्वजनिक बयान देकर कहा था कि उन्होंने कभी भी अनुमोदित दरों से अधिक बिल नहीं भेजा है। हालांकि, बार संगठनों का तर्क है कि सामने आए चालान उनके इस दावे की पूरी तरह पोल खोलते हैं।\n\nप्रशासनिक जांच और आरटीआई पर उठे सवाल\nहाई कोर्ट बार एसोसिएशन के महासचिव किशोर गौतम ने इस बात पर कड़ी आपत्ति जताई कि वित्त विभाग और संबंधित सरकारी तंत्र में बिना गहन जांच के इतनी बड़ी रकम के भुगतानों को कैसे मंजूरी मिल गई। उन्होंने वित्तीय निगरानी प्रणाली की विफलता पर स्पष्टीकरण मांगा है।\n\nवहीं शिलांग बार एसोसिएशन के सचिव ट्रेबोर जिर्वा ने आरोप लगाया कि प्रशासन एडवोकेट जनरल का बचाव कर रहा है। उन्होंने कहा कि सूचना का अधिकार यानी आरटीआई अधिनियम के तहत इन भुगतानों की जानकारी हासिल करने के लिए कई बार आवेदन दिए गए, लेकिन उन्हें बार-बार खारिज कर दिया गया। अब संबंधित विभाग ने जानकारी सार्वजनिक करने से पहले अमित कुमार की सहमति लेने के नाम पर 5 नवंबर तक का समय मांगा है।\n\nअन्य मामलों में भी अतिरिक्त शुल्क के आरोप\nट्रेबोर जिर्वा ने अमित कुमार के दिल्ली स्थित चैंबर और इंडस लॉ एसोसिएट्स द्वारा पेश किए गए अन्य बिलों का भी उल्लेख किया। इसके अलावा, मध्यस्थता से जुड़े एक अन्य मामले में भी गड़बड़ी का आरोप लगा है। इस मामले में निर्धारित 11,000 रुपये के स्थान पर एक दिन की पेशी के लिए 1.4 लाख रुपये का दावा किया गया था।\n\nदोनों बार संगठनों का कहना है कि उनके पास ऐसे और भी बिल मौजूद हैं, लेकिन वे आगे की रणनीति तय करने से पहले लंबित आरटीआई याचिकाओं के नतीजों का इंतजार करेंगे। वकीलों ने स्पष्ट किया कि उनकी यह पहल किसी व्यक्तिगत द्वेष या रंजिश का परिणाम नहीं है, बल्कि यह जनता के पैसों की रक्षा और सार्वजनिक जवाबदेही तय करने का प्रयास है।\n\nइसका आप पर असर\nयह मामला सार्वजनिक धन के उपयोग और सरकारी तंत्र में कानूनी अधिकारियों की जवाबदेही पर सीधे सवाल खड़े करता है।\n\n• भारत में: देश भर के नागरिकों के लिए यह मामला सरकारी खजाने से वकीलों को मिलने वाले मानदेय और पारदर्शी निगरानी की व्यवस्था को रेखांकित करता है। इससे यह स्पष्ट होता है कि आरटीआई जैसे माध्यमों से करदाताओं के पैसे के दुरुपयोग की जांच कितनी आवश्यक है।\n• मेघालय में: राज्य के निवासियों के लिए यह मुद्दा सीधे तौर पर स्थानीय शासन व्यवस्था और करदाताओं के धन की सुरक्षा से जुड़ा है। बार संगठनों के इस कदम से 5 नवंबर के बाद सामने आने वाले आधिकारिक ब्योरे पर जनता की नजरें टिक गई हैं।\n• कानूनी बिरादरी के लिए: वकीलों और बार संगठनों के लिए यह विवाद पेशेवर नियमों और सरकारी वकीलों की फीस के मानकों की पारदर्शिता से जुड़ा है। निर्धारित दरों और निजी बिलिंग के बीच की खाई को लेकर अदालतों में नई बहस शुरू हो सकती है।\n• जवाबदेही और नियमों पर असर: राज्य सरकार पर अब उच्च पदों पर आसीन विधि अधिकारियों के बिलों के ऑडिट और सत्यापन नियमों को सख्त बनाने का दबाव बढ़ गया है। इससे भविष्य में कानूनी नियुक्तियों और भुगतानों में पारदर्शिता सुनिश्चित करने की मांग तेज होगी।\n\nऐसा क्यों हुआ\nयह विवाद तब शुरू हुआ जब दो प्रमुख बार एसोसिएशनों को एक अज्ञात मुखबिर से बिलिंग दस्तावेज मिले, जो सरकारी दर सूची और एडवोकेट जनरल के सार्वजनिक बयानों के बिल्कुल विपरीत थे।\n\n• दस्तावेजों का खुलासा: एक अज्ञात मुखबिर ने बार एसोसिएशनों को कथित बिल और चालान सौंपे, जिनमें 1.5 लाख रुपये प्रति पेशी के बिल दिखाए गए थे। इन दस्तावेजों ने एडवोकेट जनरल के उस पुराने बयान का खंडन कर दिया जिसमें उन्होंने हमेशा तय नियमों के अनुसार बिलिंग की बात कही थी।\n• आरटीआई का लगातार खारिज होना: भुगतान के आधिकारिक आंकड़ों को जानने के लिए लगाई गई आरटीआई याचिकाओं को बार-बार नामंजूर किए जाने से वकीलों का संदेह गहरा गया। जानकारी दबाए जाने के कारण बार संगठनों ने मामले को सार्वजनिक मंच पर उठाने का फैसला किया।\n• निर्धारित दरों और दावों में भारी अंतर: हाई कोर्ट में तय 20,000 रुपये और मध्यस्थता में तय 11,000 रुपये के मुकाबले क्रमशः 1.5 लाख रुपये और 1.4 लाख रुपये के दावे पाए गए, जिसने प्रशासनिक मिलीभगत के आरोपों को हवा दी।\n\nसवाल-जवाब\n\n1. मेघालय के एडवोकेट जनरल पर क्या आरोप लगाए गए हैं?\nउन पर एक वाणिज्यिक मामले में सरकारी नियमों की अनदेखी कर 1.5 लाख रुपये प्रति पेशी के हिसाब से 1 करोड़ रुपये से अधिक का बिल बनाने का आरोप है।\n\n2. राज्य में हाई कोर्ट पेशी के लिए आधिकारिक सरकारी फीस क्या तय है?\nनियमों के अनुसार हाई कोर्ट में प्रति पेशी 20,000 रुपये, सुप्रीम कोर्ट में 40,000 रुपये और 50,000 रुपये मासिक रिटेनर फीस निर्धारित है।\n\n3. एडवोकेट जनरल अमित कुमार का इस विवाद पर क्या पक्ष रहा है?\nउन्होंने 3 सितंबर को सार्वजनिक रूप से कहा था कि उन्होंने कभी भी सरकारी स्वीकृत दरों से अधिक का बिल नहीं भेजा है।\n\n4. आरटीआई आवेदनों को लेकर क्या स्थिति है?\nभुगतान की जानकारी मांगने वाले आरटीआई आवेदनों को बार-बार खारिज किया गया, और अब विभाग ने सहमति के लिए 5 नवंबर तक का समय मांगा है।\n\n5. मध्यस्थता मामले में कितनी फीस वसूलने का आरोप है?\nमध्यस्थता से जुड़े मामले में 11,000 रुपये की तय फीस के मुकाबले 1.4 लाख रुपये प्रति दिन का बिल दावा करने का आरोप लगा है।",
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