मेघालय की मावसमाई गुफा के स्टैलेग्माइट से खुला पूर्वोत्तर भारत के 6,000 साल पुराने मानसून का रहस्य मेघालय की मावसमाई गुफा से मिले एक प्राचीन स्टैलेग्माइट के विश्लेषण से वैज्ञानिकों ने पूर्वोत्तर भारत में पिछले 6,000 वर्षों के दौरान आए मानसूनी बदलावों और वैश्विक जलवायु कड़ियों को उजागर किया है। मेघालय की पहाड़ियों में स्थित मावसमाई गुफा के भीतर सुरक्षित एक प्राचीन प्राकृतिक चट्टानी संरचना ने पूर्वोत्तर भारत के हजारों साल पुराने मानसूनी इतिहास का खुलासा किया है। लगभग 6,200 वर्षों के भूवैज्ञानिक अभिलेखों का बारीकी से अध्ययन करने के बाद शोधकर्ताओं ने पाया कि भारतीय ग्रीष्मकालीन मानसून आरंभिक होलोसीन काल के दौरान बेहद शक्तिशाली था, लेकिन मध्य होलोसीन काल तक पहुंचते-पहुंचते इसकी तीव्रता में धीमी गिरावट आने लगी थी। यह विस्तृत भूगर्भीय पड़ताल दर्शाती है कि इलाके में बारिश की मात्रा और तीव्रता का सीधा संबंध दुनिया भर में सक्रिय विशाल जलवायु प्रणालियों और सौर गतिविधि के उतार-चढ़ाव से रहा है। मावसमाई गुफा और 11 सेंटीमीटर के चट्टानी नमूने का अध्ययन इस ऐतिहासिक पड़ताल को अंजाम देने के लिए वैज्ञानिकों के दल ने शिलांग से करीब 60 किलोमीटर दक्षिण में ईस्ट खासी हिल्स जिले में स्थित प्रसिद्ध मावसमाई गुफा का रुख किया था। गुफा के प्रवेश द्वार से लगभग 300 मीटर भीतर स्थित एक गहरे कक्ष से 11 सेंटीमीटर लंबा स्टैलेग्माइट एकत्र किया गया। स्टैलेग्माइट चूना पत्थर वाली गुफाओं की सतह पर ऊपर से टपकते खनिज युक्त पानी से धीरे-धीरे विकसित होने वाली स्तंभ जैसी चट्टानी आकृतियां होती हैं, जो अपने भीतर सदियों पुरानी पर्यावरणीय स्थितियों का सटीक रासायनिक रिकॉर्ड संजोए रखती हैं। जिस कक्ष से यह नमूना उठाया गया, वहां 95 प्रतिशत से अधिक सापेक्ष आर्द्रता मौजूद थी। यह अहम शोध 'डेसिफरिंग होलोसीन मानसून डायनेमिक्स इन नॉर्थईस्टर्न इंडिया' शीर्षक के तहत अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिक शोध पत्रिका 'पैलियोगियोग्राफी, पैलियोक्लाइमेटोलॉजी, पैलियोइकोलॉजी' में प्रकाशित हुआ है। इस पूरे प्रोजेक्ट का नेतृत्व आईआईटी खड़गपुर की याचना वर्मा और अनिल के गुप्ता ने किया। इस टीम में आईआईएसईआर कोलकाता के प्रशांत सान्याल के साथ-साथ सह-शोधकर्ता प्रियंतन गुप्ता, सोम दत्त, पंकज कुमार और अभिजीत मुखर्जी भी शामिल थे। फील्ड जांच के दौरान नमूना निकालने में मेघालयन एडवेंचर एसोसिएशन के बीडी खरपन डाली, क्सांग कुपार मावलॉन्ग और क्यरमेन स्केम्भा रानी ने शोधकर्ताओं की सक्रिय मदद की। इसके बाद के विश्लेषण कार्य के लिए आईआईएसईआर कोलकाता ने आइसोटोप परीक्षण की सुविधाएं दीं, जबकि आईआईटी खड़गपुर ने नमूने की पेट्रोग्राफिक जांच पूरी की। ऑक्सीजन आइसोटोप और मानसूनी ताकत का छह हजार साल पुराना लेखा-जोखा वैज्ञानिकों ने प्राचीन वर्षा की स्थितियों को फिर से समझने के लिए स्टैलेग्माइट के खनिज और पेट्रोग्राफिक लक्षणों के साथ-साथ स्थिर ऑक्सीजन आइसोटोप की संरचना की जांच की। इस शोध में 11,807 वर्ष पूर्व से लेकर 5,622 वर्ष पूर्व के बीच दर्ज हुए मानसूनी उतार-चढ़ाव का मूल्यांकन किया गया। होलोसीन पृथ्वी का वर्तमान भूवैज्ञानिक युग है, जिसकी शुरुआत आखिरी हिमयुग के समाप्त होने के बाद लगभग 11,700 वर्ष पहले हुई थी। वैज्ञानिक विश्लेषण से सामने आया कि 11,807 साल पहले से 7,700 साल पहले तक के कालखंड में मानसून विशेष रूप से अत्यधिक सक्रिय और प्रचंड था। स्टैलेग्माइट में दर्ज ऑक्सीजन आइसोटोप के निचले मान इस बात का प्रमाण हैं कि उस दौर में भीषण और भारी बारिश हुआ करती थी। इसके बाद जलवायु के मिजाज में परिवर्तन हुआ। 7,700 वर्ष पूर्व से लेकर 5,622 वर्ष पूर्व के दौरान धीरे-धीरे कमजोर होते मानसून की स्थिति देखी गई, जिसे रासायनिक जांच में आइसोटोप के बढ़े हुए स्तरों ने साफ उजागर किया। शोधकर्ताओं ने रेखांकित किया कि पारंपरिक भू-रासायनिक तकनीकों के साथ पेट्रोग्राफिक प्रेक्षणों का यह संयोजन प्रागैतिहासिक जलवायु को समझने में बहुत मददगार साबित हुआ है। अटलांटिक महासागर और सौर चक्रों से जुड़े पूर्वोत्तर भारत के तार दीर्घकालिक परिवर्तनों के अलावा, शोधकर्ताओं ने बारिश की तीव्रता में कम समय के कई उतार-चढ़ाव भी दर्ज किए। इन नतीजों ने स्पष्ट संकेत दिया कि पूर्वोत्तर भारत का मानसून दुनिया के अन्य हिस्सों में घटित हो रही पर्यावरणीय हलचलों से गहराई से जुड़ा हुआ था। स्टैलेग्माइट के रिकॉर्ड में उत्तरी अटलांटिक महासागर में होने वाले जलवायु परिवर्तनों के स्पष्ट संकेत मिले, जिन्हें विज्ञान में बॉन्ड इवेंट्स 8, 7, 6, 5बी, 5ए और 4 के रूप में जाना जाता है। वैज्ञानिकों का मानना है कि इन कड़ियों का संबंध अटलांटिक मेरिडियनल ओवरटर्निंग सर्कुलेशन (एएमओसी) में होने वाले बदलावों से हो सकता है, जो अटलांटिक महासागर में ऊष्मा का संचार करने वाली एक प्रमुख समुद्री धारा प्रणाली है। इस अध्ययन में लगभग 118 वर्ष और 110 वर्ष के निश्चित अंतरालों पर दोहराए जाने वाले जलवायु संकेतों की उपस्थिति भी दर्ज की गई। ये चक्रीय पैटर्न सीधे तौर पर सौर गतिविधि में होने वाले दीर्घकालिक बदलावों यानी ग्लाइसबर्ग सौर चक्रों से मेल खाते हैं। शोध दल ने स्पष्ट किया कि सौर विभिन्नताओं के साथ-साथ प्रशांत महासागरीय दशकीय दोलन (पीडीओ), समुद्र और वायुमंडल के बीच की पारस्परिक क्रियाओं तथा तिब्बती पठार एवं हिंद महासागर के बीच तापमान के अंतर के सम्मिलित प्रभाव ने मिलकर इस पूरे क्षेत्र में मानसूनी बारिश के उतार-चढ़ाव को नियंत्रित किया था। पूर्वोत्तर भारत अपनी अनोखी भौगोलिक बनावट और मौसमी संवेदनशीलता के कारण मानसून के जटिल बर्ताव को समझने के लिए वैश्विक स्तर पर बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। इसका आप पर असर यह पुरा-जलवायु शोध वैज्ञानिकों और नीति निर्माताओं को यह समझने में मदद करता है कि वैश्विक पर्यावरणीय बदलाव भारतीय मानसून को किस तरह लंबे समय में प्रभावित करते हैं। • भारत में प्रभाव: ऐतिहासिक मानसूनी चक्रों की समझ भारतीय कृषि और जल प्रबंधन के लिए दीर्घकालिक जलवायु मॉडल तैयार करने में सहायक बनती है। इससे मौसम की अनिश्चितताओं से निपटने के लिए बेहतर नीतिगत योजनाएं बनाई जा सकती हैं। • पूर्वोत्तर और मेघालय में प्रभाव: अत्यधिक बारिश और भूस्खलन के प्रति संवेदनशील इस पहाड़ी क्षेत्र में भविष्य के मौसमी बदलावों का अधिक सटीक अनुमान लगाया जा सकेगा। इससे स्थानीय बुनियादी ढांचे और जल संसाधनों के संरक्षण में मदद मिलेगी। • वैज्ञानिक समुदाय के लिए: प्राचीन स्टैलेग्माइट के आइसोटोप रिकॉर्ड से मिले आंकड़े वर्तमान जलवायु संकट और भविष्य के अनुमानों को अधिक सटीक बनाएंगे। शोधकर्ताओं को आधुनिक मौसम प्रणालियों की तुलना करने के लिए एक विश्वसनीय ऐतिहासिक आधार मिलता है। • जलवायु नीति पर असर: अटलांटिक समुद्री धाराओं और सौर चक्रों का असर प्रमाणित होने से वैश्विक जलवायु वार्ता में ऐसे अध्ययनों का महत्व बढ़ जाता है। इससे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जलवायु जोखिमों की बेहतर निगरानी संभव हो सकेगी। ऐसा क्यों हुआ मेघालय की गुफा में मिले स्टैलेग्माइट के अध्ययन से यह साफ हुआ है कि मानसूनी बारिश में हजारों साल का उतार-चढ़ाव स्थानीय कारणों से नहीं, बल्कि वैश्विक समुद्री और सौर प्रणालियों के सम्मिलित प्रभाव से हुआ था। • सीधा कारण: आरंभिक होलोसीन काल में वायुमंडलीय स्थितियां और हिंद महासागर व तिब्बती पठार के बीच का उच्च तापीय अंतर भारतीय मानसून को भारी शक्ति प्रदान कर रहा था। मध्य होलोसीन काल तक पहुंचते ही यह तापीय संतुलन बदलने से मानसूनी तीव्रता स्वाभाविक रूप से कम होने लगी। • वैश्विक समुद्री धाराएं: उत्तरी अटलांटिक महासागर में होने वाले जलवायु व्यवधानों (बॉन्ड इवेंट्स) और अटलांटिक मेरिडियनल ओवरटर्निंग सर्कुलेशन (एएमओसी) की गति में आए बदलावों ने वैश्विक वायु संचार को प्रभावित किया। इसका सीधा असर दूर पूर्वोत्तर भारत में बारिश के स्तर पर पड़ा। • सौर चक्र और महासागरीय दोलन: सूर्य की चक्रीय गतिविधि में लगभग 110 और 118 वर्षों के अंतराल पर होने वाले बदलाव (ग्लाइसबर्ग चक्र) तथा प्रशांत महासागरीय दशकीय दोलन (पीडीओ) ने मिलकर वर्षा की तीव्रता में समय-समय पर छोटे उतार-चढ़ाव पैदा किए। सवाल-जवाब 1. मावसमाई गुफा कहां स्थित है और इसका क्या महत्व है? यह गुफा मेघालय के ईस्ट खासी हिल्स जिले में शिलांग से करीब 60 किलोमीटर दक्षिण में स्थित है, जहां प्राचीन जलवायु रिकॉर्ड सुरक्षित मिले हैं। 2. शोधकर्ताओं ने किस चीज का विश्लेषण किया? वैज्ञानिकों ने गुफा के भीतर से एकत्र किए गए 11 सेंटीमीटर लंबे स्टैलेग्माइट के ऑक्सीजन आइसोटोप और पेट्रोग्राफिक गुणों का अध्ययन किया। 3. यह अध्ययन किस कालखंड के मौसम की जानकारी देता है? यह अध्ययन 11,807 वर्ष पूर्व से लेकर 5,622 वर्ष पूर्व के बीच यानी लगभग 6,200 वर्षों के मानसूनी बदलावों को दर्शाता है। 4. आरंभिक होलोसीन काल में मानसून कैसा था? 11,807 से 7,700 वर्ष पूर्व के दौरान भारतीय ग्रीष्मकालीन मानसून अत्यधिक मजबूत और भारी बारिश वाला था। 5. इस शोध को किन संस्थानों के वैज्ञानिकों ने अंजाम दिया? आईआईटी खड़गपुर और आईआईएसईआर कोलकाता के शोधकर्ताओं की एक संयुक्त टीम ने इस अध्ययन को पूरा किया। 6. पूर्वोत्तर भारत की बारिश को कौन से वैश्विक कारक प्रभावित कर रहे थे? अटलांटिक महासागर की धाराएं (एएमओसी), सौर चक्र, प्रशांत महासागरीय दोलन और तिब्बती पठार के तापमान अंतर ने इसे प्रभावित किया। https://trendkia.com/meghalaya/meghalaya-ki-mawsmai-cave-ke-stailegmaita-se-khula-purvottara-india-ke-6-000-sala-purane-manasuna-ka-rahasya-56360 TrendKia — Har trend, sabse pehle.