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  "type": "article",
  "title": "मेघालय में बाहरी लोगों पर रोक लगाने वाले कानून लागू करने के लिए 30 दिन की मोहलत, जन आंदोलन की चेतावनी",
  "summary": "मेघालय में दस सामाजिक संगठनों के संयुक्त समन्वय समिति ने मुख्यमंत्री कोनराड के संगमा को पत्र लिखकर 30 दिन में सुरक्षा और प्रवासन संबंधी कानून लागू करने का अल्टीमेटम दिया है।",
  "content": "मेघालय में स्थानीय जनजातियों के अधिकारों और जनसांख्यिकीय सुरक्षा को लेकर दबाव समूहों ने राज्य सरकार के खिलाफ कड़ा रुख अख्तियार कर लिया है। दस प्रमुख सामाजिक और छात्र संगठनों के साझा मंच, संयुक्त समन्वय समिति ने प्रशासन को एक महीने का वक्त देते हुए चेतावनी दी है कि यदि बाहरी लोगों के प्रवेश को नियंत्रित करने वाले मौजूदा कानूनों को धरातल पर नहीं उतारा गया, तो वे बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन शुरू करेंगे।\n\nमुख्यमंत्री को सौंपा गया मांग पत्र\nसंगठनों के गठबंधन ने 3 नवंबर को राज्य के मुख्यमंत्री कोनराड के संगमा को एक विस्तृत पत्र भेजा। इस पत्र में आरोप लगाया गया कि राज्य की मूल आबादी के आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक हितों की रक्षा के लिए बने नियमों को लागू करने में सरकार लगातार सुस्ती बरत रही है। समिति के अनुसार, स्थानीय पहचान को सुरक्षित रखने के लिए तंत्र विकसित करने की मांग वर्ष 2013-14 से उठाई जा रही है, परंतु एक दशक बीतने के बाद भी प्रमुख मुद्दे जस के तस बने हुए हैं।\n\nप्रशासन से लंबित कानूनों पर मांगा जवाब\nसाझा मंच ने विशेष रूप से मेघालय रेजिडेंट्स सेफ्टी एंड सिक्योरिटी एक्ट 2016 के तहत प्रवेश और निकास बिंदुओं की व्यवस्था को सक्रिय न किए जाने पर जवाब मांगा है। इसके साथ ही मेघालय आइडेंटिफिकेशन रजिस्ट्रेशन (सेफ्टी एंड सिक्योरिटी) ऑफ माइग्रेंट वर्कर्स एक्ट 2020 के प्रावधानों को पूरी सख्ती से लागू करने की मांग दोहराई गई है। संगठनों का कहना है कि पड़ोसी राज्यों और सीमाओं के पार से आने वाले लोगों के नियमन के बिना स्थानीय आबादी सुरक्षित महसूस नहीं कर सकती।\n\nभूमि संरक्षण और सीमा विवाद का मुद्दा\nपत्र में मेघालय बेनामी ट्रांजैक्शन प्रोहिबिशन एंड डिटेक्शन एक्ट को अमलीजामा पहनाने में विफलता पर भी गहरी चिंता जताई गई है। इसके अतिरिक्त, अंतरराज्यीय और अंतरराष्ट्रीय सीमाओं के अनसुलझे मामलों को भी मूल निवासियों की संवेदनशीलता से जोड़ते हुए उठाया गया। सामाजिक समूहों का स्पष्ट मत है कि खासी, जयंतिया और गारो समुदायों के अस्तित्व और संसाधनों को बाहरी दबावों से बचाने के लिए इन वैधानिक प्रावधानों का क्रियान्वयन अनिवार्य है।\n\nराजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी का आरोप\nसंयुक्त समन्वय समिति ने मौजूदा प्रशासन पर ढिलाई बरतने का आरोप लगाते हुए कहा कि कानूनों को कड़ाई से लागू न करना स्थानीय लोगों के लिए गंभीर स्थिति पैदा कर रहा है। संगठन ने पत्र में दर्ज किया, \n \"The State Government's lack of political will to enforce and stringently implement these laws poses a grave threat to the indigenous people, including the Khasi, Jaiñtia, and Garo communities.\"\n\nगठबंधन में शामिल संगठन\nइस अल्टीमेटम का समर्थन करने वाले संगठनों में फेडरेशन ऑफ खासी जयंतिया एंड गारो पीपल, हिनिएवट्रेप नेशनल यूथ फ्रंट, री-भोई यूथ फेडरेशन, जयंतिया स्टूडेंट्स यूनियन और गारो स्टूडेंट्स यूनियन शामिल हैं। इसके साथ ही ए-चिक यूथ वेलफेयर ऑर्गनाइजेशन, एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेसी एंड एम्पावरमेंट, फेडरेशन फॉर ए-चिक फ्रीडम, ऑल ए-चिक यूथ वेलफेयर सोसाइटी तथा ए-चिक हॉलिस्टिक अवेकनिंग मूवमेंट ने भी इस मांग का पूर्ण समर्थन किया है। समिति ने स्पष्ट किया है कि यदि निर्धारित अवधि में ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो व्यापक जन आंदोलन छेड़ा जाएगा।\n\nइसका आप पर असर\nइस अल्टीमेटम से मेघालय में प्रवासी कामगारों, व्यापारिक गतिविधियों और सामान्य जनजीवन पर सीधा असर पड़ने की संभावना है।\n\n• मेघालय में: यदि 30 दिन की समयसीमा में सरकार ने कदम नहीं उठाए तो राज्यव्यापी आंदोलन और बंद से दैनिक आवागमन और पर्यटन प्रभावित हो सकता है। बाहर से आने वाले कामगारों और किरायेदारों के लिए पंजीकरण की प्रक्रिया तेज हो सकती है, जिससे गैर-स्थानीय लोगों को दस्तावेजी सत्यापन कराना होगा।\n• भारत में: मेघालय की यात्रा करने वाले पर्यटकों या वहां व्यापार और निर्माण कार्य करने वाली कंपनियों को प्रवेश जांच चौकियों और श्रमिक पंजीकरण नियमों के कड़े होने का सामना करना पड़ सकता है। दूसरे राज्यों के नागरिकों को राज्य में काम करने से पहले आधिकारिक रजिस्ट्रेशन औपचारिकताओं को पूरा करना आवश्यक हो जाएगा।\n\nऐसा क्यों हुआ\nमेघालय में सामाजिक और छात्र संगठनों द्वारा यह दबाव पत्र सरकार की वर्षों से चली आ रही कथित निष्क्रियता और स्थानीय पहचान पर मंडराते जोखिम के चलते भेजा गया है।\n\n• कानूनों के क्रियान्वयन में सुस्ती: मेघालय रेजिडेंट्स सेफ्टी एंड सिक्योरिटी एक्ट 2016 और प्रवासी श्रमिक कानून 2020 पारित होने के बावजूद धरातल पर प्रवेश-निकास जांच चौकियां पूरी तरह सक्रिय नहीं हो सकी हैं। प्रशासन द्वारा वैधानिक नियमों को सख्ती से लागू न करने के कारण स्थानीय समूहों में भारी असंतोष पैदा हुआ है।\n• दशक पुराना लंबित मामला: संगठनों का कहना है कि वे 2013-14 से बाहरी प्रवासन को नियंत्रित करने के लिए एक ठोस प्रशासनिक व्यवस्था की मांग कर रहे हैं, किंतु सरकारी स्तर पर सार्थक प्रगति नहीं हुई। अनसुलझी अंतरराज्यीय सीमाओं और बेनामी भूमि सौदों ने इस सुरक्षा चिंता को और गहरा कर दिया है।\n• संभावित अगला कदम: 30 दिन की मोहलत समाप्त होने के बाद छात्र संगठन और दबाव समूह राज्य स्तर पर धरने, विरोध मार्च और जन आंदोलन का मार्ग अपना सकते हैं।\n\nसवाल-जवाब\n\n1. मेघालय में संयुक्त समन्वय समिति ने सरकार को क्या समयसीमा दी है?\nसमिति ने मुख्यमंत्री कोनराड के संगमा को पत्र लिखकर मौजूदा कानूनों को लागू करने के लिए 30 दिन का अल्टीमेटम दिया है।\n\n2. संगठन किन प्रमुख कानूनों को लागू करने की मांग कर रहे हैं?\nवे मुख्य रूप से मेघालय रेजिडेंट्स सेफ्टी एंड सिक्योरिटी एक्ट 2016, प्रवासी श्रमिक कानून 2020 और बेनामी लेन-देन निषेध अधिनियम को लागू करने की मांग कर रहे हैं।\n\n3. यदि 30 दिन में मांगें पूरी नहीं हुईं तो संगठनों ने क्या चेतावनी दी है?\nसंगठनों ने स्पष्ट किया है कि यदि सरकार अपनी चुप्पी नहीं तोड़ती है, तो वे राज्यव्यापी जन आंदोलन शुरू करेंगे।\n\n4. इस संयुक्त समिति में कौन-से प्रमुख समुदाय और समूह शामिल हैं?\nइस गठबंधन में खासी, जयंतिया और गारो समुदायों का प्रतिनिधित्व करने वाले 10 प्रमुख छात्र और युवा संगठन शामिल हैं।",
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