चुनावी त्रिशंकु जनादेश ने इजरायल के भीतर गहरे सामाजिक और राजनीतिक मतभेदों को किया उजागर इजरायल में हालिया संसदीय चुनावों के बेनतीजा रहने के बाद सरकार गठन को लेकर भारी अनिश्चितता पैदा हो गई है। किसी भी राजनीतिक गुट को स्पष्ट बहुमत न मिलने से देश के भीतर धर्मनिरपेक्ष बनाम कट्टरपंथी और यहूदी बनाम अरब जैसे आंतरिक सामाजिक मतभेद सतह पर आ गए हैं। इजरायल में संपन्न हुए हालिया आम चुनावों के बाद सामने आए परिणाम ने देश की राजनीति को एक गंभीर अनपेक्षित मोड़ पर खड़ा कर दिया है। मतदान संपन्न होने के बाद जब मतपेटियों की गिनती हुई और एग्जिट पोल के आंकड़े हकीकत में तब्दील हुए, तो किसी भी बड़े राजनीतिक गठबंधन को सरकार बनाने लायक स्पष्ट संख्या बल हासिल नहीं हो सका। ऐतिहासिक रूप से भारी संख्या में मतदाताओं के घरों से निकलने, अरब और यहूदी दोनों समुदायों के उत्साहपूर्वक मतदान करने और यहां तक कि विदेश में रहने वाले नागरिकों द्वारा अपने खर्च पर आकर मत डालने के बावजूद, अंतिम फैसला देश को एक स्थिर सत्ता देने में नाकाम रहा। संसद के दोनों मुख्य ध्रुवों में से किसी के पास भी बहुमत का जादुई आंकड़ा नहीं है, जिसके चलते मिडिल ईस्ट का सबसे स्थापित लोकतांत्रिक ढांचा अब एक लंबे राजनीतिक गतिरोध के मुहाने पर पहुंच गया है। प्रणालीगत विवशता और खंडित जनादेश संसदीय इतिहास पर नजर डालें तो इजरायल में कभी भी किसी एकल राजनीतिक दल की सरकार नहीं रही है। यहां की आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली स्वाभाविक रूप से कई दलों के गठबंधन को जन्म देती है, जहां छोटे दलों की भूमिका बेहद अहम हो जाती है। लेकिन इस बार का चुनावी परिदृश्य सामान्य गठबंधन राजनीति से कहीं अधिक जटिल दिखाई दे रहा है। राष्ट्रपति इसहाक हर्ज़ोग ने उच्च मतदान को समाज के लिए एक सम्मान की बात बताते हुए लोकतंत्र के प्रति जनभावना की सराहना की थी, मगर वोटों की गिनती के बाद पैदा हुई स्थिति ने राजनीतिक विश्लेषकों की उन आशंकाओं को सच साबित कर दिया है कि यह चुनाव किसी एक मुद्दे पर एकजुट राष्ट्र का नहीं, बल्कि अंदरूनी दरारों में बंटे समाज का दर्पण बन चुका है। धार्मिक बनाम धर्मनिरपेक्ष सोच की गहरी खाई इस खंडित परिणाम की जड़ें केवल चुनावी रणनीतियों में नहीं, बल्कि सामाजिक ताने-बाने में मौजूद तनावों में छिपी हैं। देश के भीतर लंबे समय से धार्मिक कट्टरपंथियों और धर्मनिरपेक्ष तबके के बीच गहरी खींचतान चल रही है। आबादी का लगभग 15 प्रतिशत हिस्सा अब अल्ट्रा-ऑर्थोडॉक्स यहूदियों का है। इस वर्ग की जीवनशैली और मान्यताएं तेल अवीव जैसे आधुनिक और तकनीकी केंद्रों में रहने वाले नागरिकों की सोच से पूरी तरह उलट हैं। सबसे बड़ा सार्वजनिक विवाद इस बात पर है कि क्या सरकार को धार्मिक अध्ययनों के लिए विशेष सरकारी सब्सिडी जारी रखनी चाहिए। इसके साथ ही सेना में अनिवार्य भर्ती को लेकर भी आक्रोश गहरा है, जहां आम परिवार यह सवाल उठा रहे हैं कि जब उनके बेटे और बेटियां देश की रक्षा के लिए अपनी जान जोखिम में डालते हैं, तो आबादी के एक खास हिस्से को इस दायित्व से पूरी तरह छूट क्यों मिलनी चाहिए। दक्षिणपंथी उभार और अरब प्रतिनिधित्व की मजबूती राजनीतिक प्राथमिकताओं के मोर्चे पर भी मतदाताओं का ध्रुवीकरण स्पष्ट दिखाई दिया है। बेंजामिन नेतन्याहू ने एक मजबूत दक्षिणपंथी राष्ट्रीय सरकार के गठन का आह्वान किया था। लगभग 10 प्रतिशत मतदाताओं ने यहूदी वर्चस्ववादी धुर-दक्षिणपंथी राजनीति का खुलकर समर्थन किया। इसमें वित्त मंत्री बेजलेल स्मोट्रिच जैसे राजनेता शामिल हैं, जो मतों की घोषणा के समय भी गाजा पट्टी में नए यहूदी बस्तियों के निर्माण का वादा कर रहे थे। दूसरी ओर, देश की लगभग पांचवां हिस्सा आबादी का प्रतिनिधित्व करने वाले अरब दलों ने शानदार प्रदर्शन किया। अरब पार्टियों ने करीब 15 प्रतिशत वोट हासिल किए, जिससे संसद में उनकी सीटों की संख्या दहाई के उच्च आंकड़े तक पहुंचने की संभावना बन गई है। इस उभार ने देश के पारंपरिक शक्ति संतुलन को हिलाकर रख दिया है। बदलाव के वादे पर थमा विपक्षी गठबंधन गादी ईसेनकोट के नेतृत्व में खड़े विपक्षी गठबंधन में मध्यमार्गी, वामपंथी और कुछ दक्षिणपंथी ताकतें शामिल थीं, जिनका मुख्य एजेंडा देश में नेतृत्व परिवर्तन लाना था। ईसेनकोट ने दावा किया था कि जनता ने बदलाव के पक्ष में अपना मत दिया है, जिसे कई नागरिक देश के अस्तित्व के लिए अनिवार्य मान रहे थे। हालांकि, यह गठबंधन भी पूर्ण बहुमत हासिल करने से चूक गया। अब सत्ता के गलियारों में सबसे बड़ा सवाल यह है कि सरकार की चाबी किसके हाथ में होगी। क्या नेतन्याहू अपने पुराने धार्मिक सहयोगियों को छोड़कर विपक्षी खेमे के दक्षिणपंथियों से हाथ मिलाने को तैयार होंगे, और क्या वे विपक्षी नेता प्रधानमंत्री के प्रति अपनी राजनीतिक तल्खी भुलाकर उनकी कैबिनेट में शामिल होने का जोखिम उठाएंगे। सत्ता समीकरणों में अरब दलों की निर्णायक भूमिका दूसरी तरफ विपक्षी गठबंधन के सामने भी अस्तित्व की बड़ी पहेली है। क्या विपक्षी धड़ा अपने चुनावी वादों से पीछे हटकर नेतन्याहू को सत्ता से बाहर रखने के लिए अरब दलों से तालमेल करेगा। साथ ही, अरब पार्टियों के लिए भी ऐसी किसी अल्पकालिक सरकार में शामिल होना एक बड़ा राजनीतिक जोखिम है, जो कुछ ही महीनों के भीतर अंदरूनी कलह से गिर सकती है। डेमोक्रेट नेता यायर गोलान ने विपक्ष को साफ संदेश देते हुए अरब दलों के साथ औपचारिक साझेदारी का आग्रह किया है। उनका मानना है कि यहूदी वोटों और अरब वोटों के बीच बनाए गए नस्लीय विभाजन को अब स्वीकार नहीं किया जाना चाहिए। वहीं, नेतन्याहू के प्रति सहानुभूति रखने वाले टिप्पणीकार अमित सेगल ने भी रेखांकित किया कि अरब मतदाताओं की भारी भागीदारी ने दोनों पक्षों के यहूदियों को यह याद दिला दिया है कि वर्षों के अलगाव के बाद आखिरकार उन्हें एक साथ बैठना सीखना ही होगा। आंतरिक चुनौतियों के बीच अनिश्चित भविष्य दुनियाभर में जहां निरंकुश व्यवस्थाएं लोकतंत्र की आलोचना कमजोर और अस्थिर गठबंधन सरकारों के आधार पर करती रही हैं, वहीं इजरायल इस समय उसी परीक्षा से गुजर रहा है। राष्ट्रपति हर्ज़ोग ने गठबंधन वार्ताओं की शुरुआत में ही स्पष्ट किया कि किसी भी हाल में दोबारा चुनाव के दौर से बचना होगा। इजरायल लंबे समय से अपनी बाहरी सीमाओं और बाहरी दुश्मनों से बचाव पर ध्यान केंद्रित करता रहा है, लेकिन वर्तमान हालात यह संकेत दे रहे हैं कि देश को अब अपने भीतर पनप रहे आंतरिक संकटों और सामाजिक मतभेदों से भी निपटना होगा। विंस्टन चर्चिल ने 1947 में ब्रिटिश संसद में लोकतंत्र को उन सभी अन्य प्रणालियों से बेहतर बताया था जिन्हें परखा गया है, और साथ ही यह भी कहा था कि लोकतंत्र केवल बाहरी खतरों के खिलाफ ढाल नहीं है, बल्कि यह उन गंभीर आंतरिक खतरों से भी सुरक्षा देता है जो घर के भीतर लगातार बने रहते हैं। अब यह देखना शेष है कि इजरायल की संस्थाएं इस राजनीतिक संकट का हल कैसे निकालती हैं। इसका आप पर असर इजरायल के इस बेनतीजा चुनावी नतीजे से क्षेत्रीय कूटनीति, वैश्विक सुरक्षा परिदृश्य और अंतरराष्ट्रीय नीतियों पर सीधा असर पड़ेगा। • वैश्विक नीतियों पर प्रभाव: इजरायल में स्थिर सरकार न बनने से पश्चिम एशिया में शांति वार्ताएं और अंतरराष्ट्रीय संधियां अधर में लटक सकती हैं। राजनयिक स्तर पर बड़े नीतिगत फैसले अब महीनों के लिए टल सकते हैं। • आंतरिक सुरक्षा और भर्ती कानून: सेना में अनिवार्य सेवा और धार्मिक छात्रों की छूट को लेकर इजरायली समाज के भीतर विरोध और कानूनी विवाद तेज होंगे। आम परिवारों पर सैन्य जिम्मेदारियों का असंतुलन सामाजिक तनाव को और भड़का सकता है। • सार्वजनिक बजट और सब्सिडी: नई कैबिनेट के अभाव में देश का वार्षिक बजट और धार्मिक संस्थानों को मिलने वाला फंड अनिश्चितता के घेरे में आ गया है। इस वित्तीय खींचतान का सीधा असर नागरिक सुविधाओं और टैक्स नीतियों पर दिख सकता है। • नागरिकों के लिए पुनर्मतदान का जोखिम: यदि राजनीतिक दल किसी साझा समझौते पर नहीं पहुंचे, तो जनता को कुछ ही महीनों के भीतर दोबारा मतदान के लिए जाना पड़ सकता है। इससे प्रशासनिक खजाने पर भारी वित्तीय बोझ पड़ेगा और राजनीतिक अस्थिरता बनी रहेगी। ऐसा क्यों हुआ यह राजनीतिक गतिरोध इजरायल की आनुपातिक निर्वाचन प्रणाली, मतदाताओं के वैचारिक ध्रुवीकरण और प्रमुख समुदायों के बीच दशकों से चली आ रही सांस्कृतिक खाई का प्रत्यक्ष परिणाम है। • आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली का ढांचा: देश के चुनावी नियमों के तहत किसी एक पार्टी को पूर्ण बहुमत मिलना ऐतिहासिक रूप से नामुमकिन रहा है। इसके चलते छोटी और कट्टरपंथी पार्टियां सरकार बनाने के लिए अत्यधिक सौदेबाजी की ताकत हासिल कर लेती हैं। • धार्मिक और आधुनिक जीवनशैली का टकराव: अल्ट्रा-ऑर्थोडॉक्स आबादी के 15 प्रतिशत तक बढ़ने और सेना से उनकी छूट को लेकर धर्मनिरपेक्ष नागरिकों में भारी नाराजगी है। यह विवाद समाज को दो ऐसे खेमों में बांट चुका है जिनके बीच कोई साझा सहमति नहीं बन पा रही। • धुर-दक्षिणपंथी और अरब भागीदारी का उभार: लगभग 10 प्रतिशत वोट पाने वाले यहूदी वर्चस्ववादी धड़े और 15 प्रतिशत वोट हासिल करने वाली अरब पार्टियों के बीच ध्रुवीकरण इतना तीखा है कि कोई भी मुख्यधारा का दल दोनों को साथ लेकर बहुमत नहीं जुटा पा रहा। सवाल-जवाब 1. इजरायल के चुनावों में किसी भी दल को स्पष्ट बहुमत क्यों नहीं मिल सका? इजरायल की आनुपातिक चुनावी प्रणाली और मतदाताओं के वैचारिक बंटवारे के कारण किसी भी गठबंधन को आवश्यक सीटें नहीं मिल सकीं। 2. चुनाव परिणाम में अरब दलों का प्रदर्शन कैसा रहा? अरब पार्टियों ने करीब 15 प्रतिशत वोट हासिल किए, जिससे संसद में उनकी सीटों की संख्या दहाई के उच्च आंकड़े तक पहुंचने की उम्मीद है। 3. इजरायली समाज में धार्मिक और धर्मनिरपेक्ष तबके के बीच मुख्य विवाद क्या है? मुख्य विवाद धार्मिक अध्ययन के लिए सरकारी सब्सिडी और अनिवार्य सैन्य सेवा में अल्ट्रा-ऑर्थोडॉक्स समुदाय को मिलने वाली छूट को लेकर है। 4. राष्ट्रपति इसहाक हर्ज़ोग ने चुनाव परिणाम के बाद क्या चिंता जताई? राष्ट्रपति हर्ज़ोग ने सभी दलों से अपील की कि देश को बार-बार होने वाले चुनावों के नए दौर में जाने से बचाने के पूरे प्रयास किए जाने चाहिए। 5. विपक्षी गठबंधन का नेतृत्व कौन कर रहे थे और उनका क्या रुख रहा? विपक्षी गठबंधन का नेतृत्व गादी ईसेनकोट ने किया, जिन्होंने दावा किया कि जनता ने बदलाव के पक्ष में अपना फैसला सुनाया है। https://trendkia.com/middle-east/chunavi-trishnku-janadesha-ne-israel-ke-bhitara-gahare-samajika-aura-rajanitika-matabhedon-ko-kiya-ujagara-53202 TrendKia — Har trend, sabse pehle.