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  "type": "article",
  "title": "इराक से अमेरिकी और ब्रिटिश सैनिकों की पूर्ण वापसी, सुरक्षा की कमान अब पूरी तरह बगदाद के हाथों में",
  "summary": "इराक में अंतरराष्ट्रीय गठबंधन का सैन्य अभियान समाप्त होने के बाद शेष अमेरिकी और ब्रिटिश सैन्य टुकड़ियों ने देश छोड़ दिया है, जिसके साथ ही देश की संपूर्ण सुरक्षा व्यवस्था अब इराकी सुरक्षा बलों के नियंत्रण में आ गई है।",
  "content": "अंतरराष्ट्रीय सैन्य गठबंधन की एक दशक से अधिक लंबी मौजूदगी के समापन के साथ ही विदेशी सैनिकों का अंतिम दस्ता इराक से रवाना हो चुका है। उत्तरी कुर्दिस्तान क्षेत्र के इरबिल ठिकाने पर तैनात लगभग 100 ब्रिटिश सैन्यकर्मियों की रवानगी अमेरिकी बलों के साथ समन्वित तरीके से पूरी की गई। अमेरिकी टुकड़ी ने भी बुधवार को देश छोड़ दिया। इस सैन्य निकासी के संपन्न होने के साथ ही देश की संप्रभु रक्षा और आंतरिक सुरक्षा की संपूर्ण जवाबदेही अब आधिकारिक तौर पर इराकी रक्षा बलों ने अपने हाथों में ले ली है। इस ऐतिहासिक बदलाव को रेखांकित करने के लिए इराक में चार दिवसीय राष्ट्रीय संप्रभुता दिवस अवकाश घोषित किया गया है।\n\nयह सैन्य वापसी दो वर्ष पूर्व अमेरिकी प्रशासन और इराक सरकार के मध्य हुए उस द्विपक्षीय समझौते के तहत अमल में लाई गई है, जिसमें मौजूदा माह के अंत तक सभी विदेशी लड़ाकू दस्तों की वापसी की समय-सीमा तय की गई थी। चरमपंथी संगठन इस्लामिक स्टेट को उखाड़ फेंकने के मकसद से वर्ष 2014 में शुरू किए गए अंतरराष्ट्रीय गठबंधन के सैन्य अभियान, जिसे 'ऑपरेशन इनहेरेंट रिजॉल्व' नाम दिया गया था, का इस विदाई के साथ औपचारिक समापन हो गया है। इराक के प्रधानमंत्री अली अल-जैदी ने इस घटनाक्रम को एक ऐसे नए दौर का आरंभ बताया है जहाँ देश अपनी सुरक्षा और स्थिरता की पूर्ण जिम्मेदारी खुद संभाल रहा है।\n\nजिहादी नेटवर्क के खिलाफ अभियान और वर्तमान जमीनी हकीकत\nइराकी प्रशासन ने वर्ष 2017 में ही इस्लामिक स्टेट की क्षेत्रीय पराजय की घोषणा कर दी थी, किंतु संगठन के दोबारा सिर उठाने के खतरे को भांपते हुए विदेशी गठबंधन सेनाएं वहीं डटी रहीं। ब्रिटेन के रक्षा मंत्रालय ने इस लंबे मिशन की सफलता को रेखांकित करते हुए स्पष्ट किया कि एक दशक से अधिक के सघन प्रशिक्षण और क्षमता निर्माण के दम पर इराकी सुरक्षा बलों तथा कुर्द पेशमर्गा ने इस आतंकी गुट की क्षेत्रीय सत्ता को स्थायी रूप से ध्वस्त कर दिया है। मंत्रालय का मानना है कि स्थानीय बल अब राष्ट्रीय सुरक्षा की प्राथमिक जिम्मेदारी संभालने में पूरी तरह सक्षम हैं और अंतरराष्ट्रीय साझेदारों के साथ अब इराकी नेतृत्व में सुरक्षा सहयोग का नया अध्याय शुरू होगा।\n\nअमेरिकी रक्षा मुख्यालय पेंटागन के प्रवक्ता सीन पार्नेल ने भी इरबिल से गठबंधन की विदाई को इस्लामिक स्टेट को परास्त करने वाले मिशन का सफल निष्कर्ष करार दिया। संयुक्त राष्ट्र के एक हालिया आकलन से सामने आया है कि इराकी सुरक्षा एजेंसियों के निरंतर दबाव के चलते जिहादी संगठन के पास अब महज कुछ सौ लड़ाके बचे हैं, जो केवल साधारण और सीमित स्तर के हमलों को अंजाम देने की स्थिति में हैं। हालांकि, वाशिंगटन ने यह भी रेखांकित किया है कि आतंकी गुट के इन बचे-खुचे तत्वों और संप्रभुता को चुनौती देने वाले ईरान समर्थक सशस्त्र गुटों से निपटना अब सीधे तौर पर बगदाद सरकार के कार्यक्षेत्र में आता है।\n\nसशस्त्र मिलिशिया और क्षेत्रीय तनाव के बीच बदलता समीकरण\nविदेशी सैन्य बलों की विदाई के उपरांत इराक के सामने सबसे विकट चुनौती ईरान समर्थित आंतरिक मिलिशिया गुटों की शक्ति को नियंत्रित करने की है। मई में सत्ता संभालने वाले प्रधानमंत्री जैदी ने गठबंधन की रवानगी के पश्चात सभी अवैध हथियारों को जब्त कर सुरक्षा तंत्र को पूरी तरह राज्य के अधीन लाने का संकल्प दोहराया है। इसके बावजूद, देश के कई प्रभावशाली हथियारबंद गुट उनके इस निरस्त्रीकरण कार्यक्रम का कड़ा विरोध कर रहे हैं। रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि विदेशी सैन्य उपस्थिति हटने के बाद इन गुटों का राजनीतिक और सैन्य प्रभाव और अधिक मजबूत हो सकता है।\n\nइस वर्ष की शुरुआत में अमेरिका तथा इजरायल के ईरान के साथ सैन्य संघर्ष में उलझने के बाद से इरबिल हवाई अड्डे पर मौजूद पश्चिमी सैन्य ठिकानों पर लगातार ड्रोन और रॉकेट हमले किए जा रहे थे। इस साल मार्च में तनाव चरम पर पहुंचने के दौरान बगदाद में तैनात नाटो के सैकड़ों सैन्यकर्मी देश छोड़कर चले गए थे। अप्रैल में जब वाशिंगटन और तेहरान के मध्य एक नाजुक युद्धविराम लागू था, तब इरबिल के गठबंधन अड्डे के आसपास सक्रिय ड्रोन गतिविधियों के चलते परिवहन विमानों को चक्कर काटने पड़े थे। ईरान के विरुद्ध अमेरिकी बमबारी के चरम दौर में इस सैन्य अड्डे पर एक ही दिन में 28 ड्रोन और मिसाइलें तक दागी गई थीं। ब्रिटिश आरएएफ रेजिमेंट के गनर्स ने इस जंग के शुरुआती छह हफ्तों के भीतर ही 100 से ज्यादा हमलावर ड्रोनों को मार गिराया था, जिनमें से अधिकांश हमले इराक स्थित ईरान समर्थक मिलिशिया द्वारा किए गए थे।\n\nप्रशिक्षण का लेखा-जोखा और सीमा पार जारी रहने वाला मिशन\nअभियान की पूर्णता पर ब्रिटिश रक्षा मंत्रालय ने अपनी सैन्य टुकड़ियों के योगदान का ब्योरा साझा करते हुए बताया कि उन्होंने इराकी सुरक्षा बलों के 1,11,000 से अधिक जवानों को बहुमूल्य सहायता, प्रशिक्षण और युद्ध कौशल प्रदान किया। इस आंकड़े में अर्ध-स्वायत्त कुर्दिस्तान क्षेत्र के 21,000 से ज्यादा पेशमर्गा लड़ाके भी शामिल हैं। ब्रिटिश रॉयल एयर फोर्स ने इस दौरान हजारों उड़ानें भरीं और इस्लामिक स्टेट के 2,300 से अधिक ठिकानों पर सटीक हमले किए। ब्रिटेन की वायुसेना पड़ोसी देश सीरिया के हवाई क्षेत्र में अपनी निगरानी व लड़ाकू उड़ानें जारी रखेगी ताकि आतंकी संगठन के अवशेष दोबारा पैर न पसार सकें।\n\nपेंटागन ने स्पष्ट किया है कि प्रत्यक्ष सैन्य उपस्थिति समाप्त होने के बाद भी अमेरिका इराकी साझेदारों को लक्षित प्रशिक्षण और खुफिया जानकारी का आदान-प्रदान जारी रखेगा। अमेरिकी सेंट्रल कमांड के अनुसार, गठबंधन की संयुक्त टास्क फोर्स अब जॉर्डन में स्थित अपने केंद्र से परिचालन जारी रखेगी। इसके अतिरिक्त, सीरिया में इस्लामिक स्टेट के विरुद्ध अमेरिकी सैन्य अभियान पहले की तरह चलता रहेगा, जहाँ संयुक्त राष्ट्र के आंकड़ों के अनुसार इस आतंकी गुट के लगभग 3,000 लड़ाके अब भी सक्रिय हैं।\n\nइराक में तीन दशकों का विदेशी सैन्य चक्र\nइराक की धरती से ब्रिटिश और अमेरिकी सैनिकों की यह तीसरी बड़ी वापसी है। वर्ष 1991 में सद्दाम हुसैन द्वारा कुवैत पर आक्रमण किए जाने के बाद हजारों की संख्या में विदेशी सैनिक पहली बार यहाँ तैनात हुए थे। इसके पश्चात वर्ष 2003 में अमेरिकी राष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू बुश ने तानाशाह को सत्ता से बेदखल करने और सामूहिक विनाश के हथियारों को नष्ट करने के उद्देश्य से 'ऑपरेशन इराकी फ्रीडम' का आदेश दिया, हालांकि वे हथियार कभी नहीं मिले।\n\nउस आक्रमण के बाद भड़की भीषण सांप्रदायिक हिंसा और उग्रवाद के दौर में हजारों नागरिकों की जान गई, जबकि लगभग 4,500 अमेरिकी सैन्यकर्मियों और 179 ब्रिटिश सैनिकों को अपने प्राण गंवाने पड़े थे। वर्ष 2011 में विदेशी सेनाएं इराक से पूरी तरह हट गई थीं, किंतु महज तीन साल बाद 2014 में जब इस्लामिक स्टेट ने पूरे देश को बंधक बनाने का गंभीर संकट खड़ा किया, तो उन्हें वापस लौटना पड़ा। अब एक दशक बाद, यह अध्याय औपचारिक रूप से समाप्त हो गया है और इराक का भविष्य पूरी तरह से उसके अपने सैन्य व राजनीतिक नेतृत्व की दक्षता पर निर्भर हो चुका है।\n\nइसका आप पर असर\nइराक से पश्चिमी सेनाओं की पूर्ण रवानगी का सीधा प्रभाव क्षेत्रीय स्थिरता, वैश्विक तेल आपूर्ति और कूटनीतिक संतुलन पर पड़ेगा।\n\n• वैश्विक ऊर्जा बाजार: विदेशी सैनिकों की अनुपस्थिति में यदि इराक में आंतरिक अस्थिरता या ईरान समर्थित गुटों का उपद्रव बढ़ता है, तो अंतरराष्ट्रीय कच्चे तेल की कीमतों में उछाल आ सकता है। ऊर्जा बाजारों में अनिश्चितता बढ़ने से आयात पर निर्भर अर्थव्यवस्थाओं में ईंधन की लागत प्रभावित हो सकती है।\n• पश्चिम एशिया में सुरक्षा संतुलन: अमेरिकी और ब्रिटिश लड़ाकू दस्तों की विदाई से इराक में स्थानीय हथियारबंद गुटों का प्रभाव बढ़ सकता है। क्षेत्रीय शक्ति संतुलन बदलने से पड़ोसी अरब राष्ट्रों और अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा गठबंधनों को अपनी रणनीति नए सिरे से तय करनी होगी।\n• प्रवासी व व्यापारिक समुदाय: इराक और खाड़ी क्षेत्र में कार्यरत अंतरराष्ट्रीय कामगारों तथा भारतीय प्रवासियों के लिए सुरक्षा स्थिति पर नजर रखना अनिवार्य होगा। आंतरिक सुरक्षा की जिम्मेदारी केवल स्थानीय बलों पर होने से बुनियादी ढांचे और वाणिज्यिक परियोजनाओं की सुरक्षा नीति बदल सकती है।\n• आतंकवाद के खिलाफ अभियान: इस्लामिक स्टेट के खिलाफ प्रत्यक्ष जमीनी कमान अब पूरी तरह बगदाद के अधीन होने से वैश्विक सुरक्षा एजेंसियां सतर्क रहेंगी। सीरिया सीमा से सटे इलाकों में निगरानी कमजोर पड़ने पर चरमपंथी तत्वों के फिर से संगठित होने का जोखिम बना रह सकता है।\n\nऐसा क्यों हुआ\nयह सैन्य वापसी दो वर्ष पूर्व बगदाद और वाशिंगटन के बीच हुए द्विपक्षीय समझौते, आतंकी संगठन की क्षेत्रीय पराजय और इराक में संप्रभु नियंत्रण की मांग के कारण संभव हुई है।\n\n• द्विपक्षीय वापसी समझौता: वर्ष 2024 में हस्ताक्षरित समझौते के तहत निर्धारित समय-सीमा इस महीने समाप्त हो रही थी, जिसके तहत सभी विदेशी लड़ाकू सैनिकों की रवानगी अनिवार्य थी। इराकी सरकार ने संप्रभुता बहाली और राष्ट्रीय सुरक्षा तंत्र को आत्मनिर्भर बनाने के लिए यह समझौता किया था।\n• इस्लामिक स्टेट की क्षेत्रीय पराजय: वर्ष 2017 में आतंकी गुट के भौगोलिक खात्मे और हाल के वर्षों में उसके लड़ाकों की संख्या घटकर कुछ सौ रह जाने से विदेशी गठबंधन का मुख्य सैन्य मिशन पूरा हो चुका था। संयुक्त राष्ट्र के आकलनों ने भी पुष्टि की है कि संगठन अब केवल साधारण हमलों तक ही सीमित रह गया है।\n• बढ़ता क्षेत्रीय तनाव और हमले: इस वर्ष अमेरिका, इजरायल और ईरान के बीच भड़के सैन्य संघर्ष के कारण इरबिल स्थित पश्चिमी ठिकानों पर निरंतर ड्रोन व मिसाइल हमले हो रहे थे। सुरक्षा बलों के लिए बढ़ते खतरे और नाटो बलों के पहले ही हट जाने से लड़ाकू अभियानों को समाप्त करने की प्रक्रिया तेज हुई।\n\nसवाल-जवाब\n\n1. इराक से किन देशों के सैनिकों ने अपनी सैन्य वापसी पूरी की है?\nअमेरिका और ब्रिटेन के अंतिम बचे हुए सैन्य दस्तों ने इराक के इरबिल ठिकाने से अपनी पूरी वापसी संपन्न कर ली है।\n\n2. इराक में पश्चिमी गठबंधन की सेनाएं कब से तैनात थीं?\nचरमपंथी संगठन इस्लामिक स्टेट के खिलाफ 'ऑपरेशन इनहेरेंट रिजॉल्व' के तहत अमेरिकी और ब्रिटिश सेनाएं वर्ष 2014 से इराक में मौजूद थीं।\n\n3. सैन्य वापसी के बाद इराक की सुरक्षा की कमान किसके पास होगी?\nअब देश की संप्रभु रक्षा और आंतरिक सुरक्षा की संपूर्ण जिम्मेदारी इराकी सुरक्षा बलों और कुर्द पेशमर्गा के हाथों में आ गई है।\n\n4. इस ऐतिहासिक अवसर पर इराक में क्या घोषणा की गई है?\nइराकी सरकार ने विदेशी सैन्य वापसी के उपलक्ष्य में चार दिवसीय 'संप्रभुता दिवस' राष्ट्रीय अवकाश की घोषणा की है।\n\n5. क्या अमेरिका और ब्रिटेन का इराक के साथ सहयोग पूरी तरह खत्म हो गया है?\nप्रत्यक्ष लड़ाकू मौजूदगी समाप्त होने के बाद भी अमेरिका इराकी बलों को खुफिया सहयोग और लक्षित प्रशिक्षण देना जारी रखेगा, जबकि गठबंधन का टास्क फोर्स जॉर्डन में रहेगा।",
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  "publishedAt": "2026-09-30",
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