# ईरान के खिलाफ डोनाल्ड ट्रंप के तीखे तेवर के बीच जारी है बैकचैनल बातचीत का नाजुक दौर

> ईरान को गंभीर सैन्य कार्रवाई की चेतावनी देने और वहां के नेताओं को बेहद आक्रामक शब्द कहने के बावजूद, डोनाल्ड ट्रंप ने बैकचैनल वार्ताओं का रास्ता खुला रखा है, जो यह दिखाता है कि स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज पर नियंत्रण और परमाणु मुद्दों को सुलझाने के लिए बातचीत के अलावा कोई बेहतर विकल्प नहीं है।

**Type:** article · **Category:** मध्य पूर्व · **Published:** 2026-07-08 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/middle-east/iran-ke-khilapha-donald-trump-ke-tikhe-tevara-ke-bicha-jari-hai-baikachainala-batachita-ka-najuka-daura-5875 · **Language:** Hindi
**Tags:** डोनाल्ड ट्रंप, अमेरिका ईरान संबंध, स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज, वैश्विक अर्थव्यवस्था, परमाणु समझौता, स्टीव विटकॉफ, जेरेड कुशनर

तुर्की में आयोजित NATO शिखर सम्मेलन के दौरान डोनाल्ड ट्रंप के बयानों ने वैश्विक स्तर पर भारी हलचल पैदा कर दी है। इन बयानों में जहां एक तरफ ईरान के खिलाफ बेहद आक्रामक और तीखे तेवर देखने को मिले, वहीं दूसरी तरफ परदे के पीछे चल रही कूटनीतिक वार्ताओं का एक ऐसा सिरा भी नजर आया जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। अमेरिका के राष्ट्रपति होने के नाते डोनाल्ड ट्रंप के हर बयान का गहरा कूटनीतिक महत्व होता है, भले ही उनके शब्द कितने ही विरोधाभासी क्यों न लगें। तुर्की में हुए इस शिखर सम्मेलन में उन्होंने ईरान के साथ किसी भी तरह के समझौते की उम्मीदों पर पानी फेरते हुए बेहद तीखी भाषा का इस्तेमाल किया, जिसने दोनों देशों के बीच पहले से ही जारी सैन्य तनाव को और बढ़ा दिया है।

डोनाल्ड ट्रंप ने अपने भाषण में ईरानी नेतृत्व पर कड़ा प्रहार किया। उन्होंने कहा कि वह अब उनके साथ किसी भी तरह का व्यवहार या समझौता नहीं करना चाहते हैं। ट्रंप ने ईरानी नेताओं को बेहद आपत्तिजनक और बीमार मानसिकता वाले लोग करार दिया, जो उनके अनुसार बेहद हिंसक और क्रूर हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति ने यह आशंका भी जताई कि यदि ईरान के पास परमाणु हथियार होते, तो वह बिना सोचे-समझे उनका इस्तेमाल कर लेता। उन्होंने अपने रुख को साफ करते हुए स्पष्ट शब्दों में कहा कि उनके दृष्टिकोण से अब बातचीत और समझदारी का यह अध्याय पूरी तरह से समाप्त हो चुका है।

## सैन्य हमलों की धमकियां और ज़मीनी हकीकत
लेकिन क्या ये कठोर शब्द ईरान संकट पर डोनाल्ड ट्रंप का अंतिम फैसला हैं। निश्चित रूप से ऐसा नहीं कहा जा सकता। डोनाल्ड ट्रंप लगातार इस सैन्य संघर्ष और कूटनीतिक वार्ताओं के मसौदे पर अपनी प्रतिक्रियाएं देते रहे हैं, जिसमें उनका रुख अक्सर बदलता रहा है। एक तरफ जहां वे अपनी जीत के बड़े-बड़े दावे करते हैं और ईरानी सभ्यता को पूरी तरह से तबाह करने की धमकी देते हैं, वहीं दूसरी तरफ वे बातचीत और समझौते का समर्थन करने से भी पीछे नहीं हटते। अपनी शुरुआती टिप्पणियों के कुछ ही समय बाद उन्होंने अपनी धमकियों को और दोहराया और कहा कि US शायद आज रात फिर से उन पर बहुत तगड़ा हमला करेगा। उन्होंने संकेत दिया कि वह पहले ही ईरान को थोड़ी चेतावनी दे चुके हैं और आज रात फिर से भारी हवाई हमले किए जा सकते हैं।

इसमें कोई दोराय नहीं है कि अमेरिका के पास ईरान को भारी नुकसान पहुंचाने और उसकी बुनियादी संरचनाओं को तबाह करने की अपार सैन्य क्षमता मौजूद है। लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या केवल सैन्य हमलों के दम पर ईरान की हुकूमत को झुकाया जा सकता है। अब तक की कार्रवाई यह स्पष्ट करती है कि अमेरिकी सेना ईरान के हौसले को तोड़ने और उसे अपनी बुनियादी मांगों से पीछे हटने पर मजबूर करने में पूरी तरह नाकाम रही है। ईरान की इन मांगों में सबसे महत्वपूर्ण मांग स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज पर उसका संप्रभु नियंत्रण बनाए रखना है, जो पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था के लिए बेहद संवेदनशील जलमार्ग है।

## स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज पर नियंत्रण और वैश्विक अर्थव्यवस्था का संकट
इस पूरे सैन्य और कूटनीतिक विवाद के केंद्र में स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज का मुद्दा सबसे ऊपर है। तेहरान की सरकार किसी भी हाल में उन परिस्थितियों में वापस नहीं जाना चाहती जो 28 फरवरी को US और इस्राइल के हमलों से पहले मौजूद थीं। ईरान का मानना है कि स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज पर उसका नियंत्रण ही उसका सबसे बड़ा रणनीतिक हथियार है। यह कोई साधारण जलमार्ग नहीं है, बल्कि दुनिया भर में इस्तेमाल होने वाले कुल तेल और गैस का लगभग पांचवां हिस्सा यानी 20 प्रतिशत इसी संकरे रास्ते से होकर गुजरता है। इस वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति श्रृंखला पर नियंत्रण होने के कारण ईरान के पास दुनिया की अर्थव्यवस्था को प्रभावित करने की एक ऐसी चाबी है, जो किसी भी परमाणु हथियार से कहीं अधिक व्यावहारिक और असरदार है।

यही कारण है कि ईरान स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज पर अपने नियंत्रण को छोड़ने के लिए किसी भी कीमत पर तैयार नहीं है। वह इस रणनीतिक अधिकार की रक्षा के लिए प्रस्तावित MOU को भी दांव पर लगाने के लिए तैयार है, भले ही उस समझौते में ईरान को आर्थिक रूप से राहत देने वाले कई बड़े प्रस्ताव शामिल क्यों न हों। तेहरान की सत्ता इस बात पर अड़ी है कि वह अपने रणनीतिक हितों की रक्षा के लिए लंबे समय तक युद्ध झेलने का जोखिम उठाने को तैयार है, लेकिन अपने जलमार्ग के अधिकारों से पीछे नहीं हटेगी।

## कूटनीतिक वार्ताओं का नाजुक और पेचीदा दौर
डोनाल्ड ट्रंप के गुस्से और आक्रामक बयानों के बीच एक कड़वा सच यह भी छिपा है कि उनके पास बातचीत के अलावा कोई बेहतर विकल्प मौजूद नहीं है। जब ट्रंप से यह पूछा गया कि क्या US और ईरान के बीच हाल ही में हुए हमलों और सैन्य झड़पों के बाद बातचीत के दरवाजे पूरी तरह से बंद हो चुके हैं, तो उनका जवाब बेहद दिलचस्प था। उन्होंने अपने मुख्य वार्ताकारों स्टीव विटकॉफ और जेरेड कुशनर का हवाला देते हुए कहा कि उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता, वे चाहें तो बातचीत जारी रख सकते हैं। हालांकि, उन्होंने यह भी जोड़ा कि उनके अनुसार वार्ताकार केवल अपना समय बर्बाद कर रहे हैं क्योंकि ईरानी हुकूमत पूरी तरह से झूठे लोगों का एक गिरोह है।

ट्रंप के इस बयान को इस बात की स्वीकारोक्ति के रूप में देखा जा रहा है कि तमाम दबावों और धमकियों के बावजूद अमेरिकी प्रशासन कूटनीति के रास्ते को पूरी तरह से बंद नहीं कर सकता। इस्राइल के साथ मिलकर अमेरिका ने ईरान के शासन को सैन्य बल के जरिए उखाड़ फेंकने की पुरजोर कोशिश की, लेकिन वे इसमें असफल रहे। यही वजह है कि अंततः उन्हें बातचीत की मेज पर ही लौटना पड़ रहा है। हालांकि, यह बातचीत का रास्ता बेहद कमजोर और अनिश्चितताओं से भरा हुआ है। मध्यस्थता करा रहे देशों के सूत्रों का कहना है कि हालिया सैन्य टकरावों के बाद बातचीत को गहरा धक्का लगा है और दोनों पक्षों के बीच अविश्वास की खाई इतनी गहरी हो चुकी है कि माहौल बेहद तनावपूर्ण बना हुआ है। किसी भी पक्ष को यह भरोसा नहीं है कि समझौता होने के बाद दूसरा देश अपनी बात पर कायम रहेगा।

## खामेनेई की मौत और ईरान का आंतरिक जनसमर्थन
यह कूटनीतिक प्रक्रिया पिछले कुछ दिनों से रुकी हुई थी क्योंकि ईरान अपने पूर्व सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई के निधन के बाद राष्ट्रीय शोक और अंतिम संस्कार की रस्मों में व्यस्त था। अयातुल्ला अली खामेनेई की मौत 28 फरवरी को युद्ध के पहले ही दिन इस्राइल और US द्वारा किए गए एक बड़े हवाई हमले में हुई थी। इस बेहद संवेदनशील और बड़े नुकसान के बाद भी ईरान की इस्लामिक हुकूमत कमजोर होने के बजाय और अधिक मजबूत होती दिख रही है। खामेनेई के अंतिम संस्कार के दौरान उमड़ी भारी भीड़ ने यह साबित कर दिया है कि तमाम तरह के प्रतिबंधों और सैन्य हमलों के बावजूद सरकार के पास समर्थकों का एक बेहद मजबूत और वफादार आधार मौजूद है।

हालांकि ईरान के भीतर हुकूमत के खिलाफ घरेलू विरोध पूरी तरह से समाप्त नहीं हुआ है, लेकिन सरकार ने बल प्रयोग के जरिए इसे काफी हद तक दबा दिया है। इस साल जनवरी में जब हजारों की संख्या में लोग अपनी ही सरकार के खिलाफ सड़कों पर उतरे थे, तब ईरान के सुरक्षा बलों ने बेहद क्रूरता के साथ उन विरोध प्रदर्शनों को कुचल दिया था। उस कार्रवाई में हजारों प्रदर्शनकारियों की मौत हुई थी, जिसके बाद से घरेलू स्तर पर विरोध करने वाले पूरी तरह से शांत हैं और हुकूमत की पकड़ सत्ता पर बेहद मजबूत बनी हुई है।

## संभावित समझौते की शर्तें और चुनौतियां
अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थों का मानना है कि यदि किसी तरह दोनों देशों के बीच जारी इस सैन्य तनाव को रोका जा सके, तो ईरान के साथ एक बड़ा और व्यापक समझौता किया जा सकता है। इस संभावित समझौते के तहत स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज से अंतरराष्ट्रीय जहाजों की सुरक्षित आवाजाही को सुनिश्चित किया जाएगा। इसके बदले में ईरान की कुछ प्रमुख मांगों को मानना होगा, जिसमें विदेशों में जमी हुई उसकी अरबों डॉलर की वित्तीय संपत्ति को बहाल करना, उसे अंतरराष्ट्रीय बाजार में अपना तेल बेचने की छूट देना और सबसे महत्वपूर्ण रूप से स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज पर उसके प्रशासनिक अधिकारों को मान्यता देना शामिल है।

इसके विपरीत, ईरान को भी अंतरराष्ट्रीय समुदाय की कुछ बेहद सख्त शर्तों को स्वीकार करना होगा। ईरान को अपने यूरेनियम संवर्धन कार्यक्रम पर कड़ी सीमाएं लगानी होंगी, UN के परमाणु निरीक्षकों को अपने देश में वापस आने और जांच करने की अनुमति देनी होगी, और अपने पास मौजूद उस संवर्धित यूरेनियम का पूरा ब्योरा देना होगा जिसे डोनाल्ड ट्रंप ने 'परमाणु धूल' कहा था। यह वह यूरेनियम है जिसे ईरान पहले ही हथियार बनाने के बेहद करीब की सीमा तक संवर्धित कर चुका है। लेकिन पिछले 24 घंटों में हुई सैन्य झड़पों और बयानों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि इस तरह के किसी भी समझौते पर पहुंचना बेहद चुनौतीपूर्ण और लगभग असंभव सा नजर आ रहा है।

## इसका आप पर असर
**उपभोक्ताओं और निवेशकों के लिए:**

- **ईंधन और ऊर्जा की कीमतें:** स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज में किसी भी तरह की बाधा, जो वैश्विक तेल और गैस के 20 प्रतिशत हिस्से को नियंत्रित करती है, दुनिया भर में पेट्रोल और डीजल की कीमतों में भारी उछाल ला सकती है, जिससे परिवहन और दैनिक जीवन की लागत सीधे प्रभावित होगी।
- **बाजार में उतार-चढ़ाव:** US और ईरान के बीच जारी भू-राजनीतिक तनाव वैश्विक वित्तीय बाजारों में अस्थिरता पैदा करता है, जिससे शेयर पोर्टफोलियो और म्यूचुअल फंड निवेश प्रभावित होते हैं।

## सवाल-जवाब

### 1. स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज इस पूरे विवाद में इतना महत्वपूर्ण क्यों है?
स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज एक अत्यंत महत्वपूर्ण जलमार्ग है जहां से दुनिया भर के कुल तेल और गैस की आपूर्ति का पांचवां हिस्सा (20 प्रतिशत) गुजरता है, जो ईरान को वैश्विक अर्थव्यवस्था पर मजबूत पकड़ देता है।

### 2. डोनाल्ड ट्रंप ने नाटो शिखर सम्मेलन में ईरानी नेतृत्व को क्या कहा?
ट्रंप ने ईरानी नेतृत्व को बेहद आक्रामक शब्द कहते हुए 'scum' (दुष्ट) और 'बीमार लोग' कहा, और चेतावनी दी कि वे परमाणु हथियार मिलने पर उसका इस्तेमाल करेंगे।

### 3. अमेरिका की ओर से ईरान के साथ बैकचैनल कूटनीति कौन संभाल रहा है?
इस संवेदनशील बातचीत को अमेरिका की तरफ से मुख्य वार्ताकार स्टीव विटकॉफ और जेरेड कुशनर संभाल रहे हैं।

### 4. US और ईरान के बीच बातचीत को अस्थाई रूप से क्यों रोका गया था?
बातचीत को ईरान के पूर्व सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई के राष्ट्रीय शोक और अंतिम संस्कार की रस्मों के कारण रोका गया था, जो 28 फरवरी को एक हवाई हमले में मारे गए थे।

### 5. एक संभावित कूटनीतिक समझौते (MOU) की मुख्य शर्तें क्या हैं?
इस समझौते के तहत ईरान को विदेशों में जमी संपत्ति की बहाली और तेल बेचने की छूट मिलेगी, जिसके बदले में उसे यूरेनियम संवर्धन की सीमा तय करनी होगी और UN निरीक्षकों को वापस बुलाना होगा।

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