# लाल सागर और बाब अल-मंदेब में हूती विद्रोहियों के बढ़ते कदम, यमन में फिर भड़क सकता है विनाशकारी संघर्ष

> बाब अल-मंदेब और लाल सागर के अहम हिस्सों में हूती लड़ाकों की नई सैन्य गतिविधियों ने यमन में 2022 से चले आ रहे नाजुक युद्धविराम को गंभीर खतरे में डाल दिया है, जिससे बड़े मानवीय संकट की आशंका बढ़ गई है।

**Type:** article · **Category:** मध्य पूर्व · **Published:** 2026-09-12 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/middle-east/lala-sagara-aura-bab-al-mandeb-men-houthi-vidrohiyon-ke-barhate-kadama-yemen-men-phira-bharaka-sakata-hai-vinashakari-sngharsha-31437 · **Language:** Hindi
**Tags:** यमन गृहयुद्ध, हूती विद्रोही, बाब अल-मंदेब, लाल सागर, सऊदी अरब, ईरान, कच्चा तेल संकट, मध्य पूर्व तनाव

अरब प्रायद्वीप के मुहाने पर बसा यमन एक बार फिर व्यापक सैन्य टकराव के मुहाने पर आकर खड़ा हो गया है। लाल सागर के तटीय इलाकों से आगे बढ़ते हुए हूती विद्रोहियों ने बाब अल-मंदेब स्ट्रेट की दिशा में अपनी स्थिति मजबूत करना शुरू कर दिया है। रणनीतिक रूप से संवेदनशील इस समुद्री मार्ग पर विद्रोही गुट के बढ़ते दबाव को देखते हुए सऊदी अरब समर्थित यमन की मान्यता प्राप्त सरकार ने वैश्विक शक्तियों से तुरंत दखल देने की अपील की है। बीते कुछ दिनों में बदले जमीनी हालात ने उस नाजुक युद्धविराम के वजूद पर सवाल खड़े कर दिए हैं, जिसके चलते वर्ष 2022 के बाद से जमीनी मोर्चों पर व्यापक रक्तपात काफी हद तक रुका हुआ था।

## समुद्री सुरक्षा पर मंडराता खतरा और सरकार का रुख
यमन सरकार की नेशनल डिफेंस काउंसिल ने एक उच्चस्तरीय बैठक के बाद अपने रुख को स्पष्ट किया। परिषद ने साफ कहा कि वह अंतरराष्ट्रीय समुद्री व्यापार और जहाजों की बेरोकटोक आवाजाही की रक्षा करने के अपने संकल्प पर पूरी तरह अडिग है। इसके साथ ही सरकार ने सऊदी अरब की बुनियादी सुविधाओं को निशाना बनाकर किए गए हालिया हमलों की कड़े शब्दों में भर्त्सना की। मौजूदा हालात को देखते हुए यह आशंका गहराने लगी है कि अगर नए सिरे से टकराव शुरू हुआ, तो देश उसी भयावह दौर में लौट जाएगा जिसने वर्षों तक लाखों जिंदगियों को तबाह कर दिया था।

यमन में साल 2014 के दौरान शुरू हुए गृहयुद्ध की खौफनाक यादें आज भी ताजा हैं। उस खूनी संघर्ष में 2014 से 2021 के बीच करीब डेढ़ लाख लोगों ने अपनी जान गंवाई थी। अरब जगत के सबसे कमजोर आर्थिक ढांचे वाले इस देश में करीब 4 करोड़ लोग बसते हैं, जिनमें से एक बड़ा हिस्सा वर्षों तक भुखमरी, बीमारियों और आर्थिक तंगहाली की मार झेलता रहा है। यदि जमीनी लड़ाई दोबारा उसी पुराने रूप में भड़की, तो यह पूरी आबादी एक बार फिर गंभीर जीवन संकट में घिर सकती है।

## हजारों परिवारों का नया पलायन और मानवीय संकट
मैदान में दोबारा गोलियों की गूंज सुनाई देने का सीधा असर आम नागरिकों पर पड़ा है। संयुक्त राष्ट्र संघ से जुड़ी अंतरराष्ट्रीय प्रवासन एजेंसी के आंकड़ों के अनुसार, पिछले एक सप्ताह के भीतर लड़ाई तेज होने के कारण 46 हजार से ज्यादा स्थानीय नागरिकों को अपना घर-बार छोड़कर सुरक्षित ठिकानों की ओर भागना पड़ा है। अंतरराष्ट्रीय प्रवासन संगठन के यमन मिशन प्रमुख अब्दुसत्तार एसोएव ने जमीनी हालात की गंभीरता को बयां किया। उन्होंने जानकारी दी कि लोग जान बचाने की अफरा-तफरी में केवल वही सामान साथ ले जा पा रहे हैं, जिसे वे अपने हाथों में उठा सकें।

अब्दुसत्तार एसोएव के मुताबिक, विस्थापित होने वाले बेबस परिवारों की संख्या सिर्फ एक हफ्ते में दोगुनी से अधिक हो गई है और आने वाले समय में इसके और तेजी से बढ़ने का अंदेशा है। उन्होंने कहा कि भागते हुए लोगों के चेहरों पर साफ तौर से मौत का खौफ देखा जा सकता है। संकट की गंभीरता का अंदाजा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि हिंसा प्रभावित क्षेत्रों से पलायन करने वालों में अस्पतालों के डॉक्टर और अन्य स्वास्थ्य कर्मी भी शामिल हैं। हालांकि, इन विकट परिस्थितियों के बीच राहत संगठन 'डॉक्टर्स विदाउट बॉर्डर्स' के यमन समन्वयक लू कॉर्मैक ने स्पष्ट किया है कि ज्यादातर स्टाफ के चले जाने के बावजूद उनका समूह मोखा शहर के मुख्य अस्पताल को हर हाल में संचालित रखने की पूरी कोशिश कर रहा है ताकि घायलों को इलाज मिल सके।

## 2014 के गृहयुद्ध का इतिहास और सऊदी दखल
यमन का मौजूदा संकट करीब 12 साल पुरानी कड़ियों से सीधे तौर पर जुड़ा हुआ है। वर्ष 2014 में हूती विद्रोहियों ने उत्तरी और मध्य यमन के एक बड़े भूभाग के साथ-साथ देश की राजधानी सना पर पूरी तरह कब्जा जमा लिया था। इसके बाद यमन की सत्ताधारी सरकार कमजोर पड़ने लगी, जिसके चलते अगले ही साल यानी 2015 में सऊदी अरब के नेतृत्व में एक सैन्य गठबंधन ने सरकारी सेना के समर्थन में युद्ध में सीधी एंट्री की। तब से लेकर अब तक यह इलाका विभिन्न शक्तियों के बीच शक्ति प्रदर्शन का अखाड़ा बना हुआ है।

## मयून द्वीप पर नियंत्रण और वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति पर असर
हालिया घटनाक्रम ने इस क्षेत्रीय रस्साकशी को एक नए और खतरनाक मोड़ पर पहुंचा दिया है। ईरान समर्थित हूती लड़ाकों ने लाल सागर के दक्षिणी छोर पर स्थित बेहद रणनीतिक मयून द्वीप पर अपनी पकड़ बना ली है। बाब अल-मंदेब जलडमरूमध्य के मुहाने पर स्थित इस बड़े हिस्से पर विद्रोहियों की मौजूदगी ने वैश्विक समुद्री व्यापार को सीधे खतरे में डाल दिया है। जानकारों का मानना है कि इस जलमार्ग पर अपना दबदबा बढ़ाकर वैश्विक स्तर पर तेल और गैस की कीमतों में अस्थिरता पैदा करने की कोशिश की जा रही है, जिसका सीधा असर अमेरिका और पश्चिमी देशों पर दबाव बनाने के रूप में देखा जा रहा है।

दूसरी ओर, खाड़ी क्षेत्र में ऊर्जा ढांचे पर मंडराते खतरे भी सामने आने लगे हैं। सऊदी अरब के दो वरिष्ठ अधिकारियों के अनुसार, उनके देश ने अपनी प्रमुख ईस्ट-वेस्ट पाइपलाइन को अस्थायी रूप से बंद कर दिया है। इस बुनियादी ढांचे पर एक दिन पहले ही ड्रोन के जरिए हमला किया गया था। सऊदी ऊर्जा मंत्रालय ने इस महत्वपूर्ण पाइपलाइन के संचालन को बंद करने के फैसले को एक एहतियाती कदम करार दिया है। वहीं, सऊदी अरब के विदेश मंत्रालय ने आरोप लगाया कि पाइपलाइन पर यह हमला इराक की सीमा के भीतर से भेजे गए ड्रोनों की मदद से अंजाम दिया गया था।

## इराक में प्रशासनिक कदम और क्षेत्रीय तनाव
ड्रोन हमले के बाद तनाव बढ़ने के बावजूद सऊदी अरब ने तत्काल कोई जवाबी सैन्य कार्रवाई न करने का संयमित रुख अपनाया है। सऊदी प्रेस एजेंसी के आधिकारिक बयान में कहा गया कि वे इराक सरकार को मामले की आंतरिक जांच करने और जरूरी कदम उठाने का पूरा मौका देना चाहते हैं। इसी कड़ी में सऊदी अरब के सरकारी प्रवक्ता सबाह अल-नुमान ने बताया कि इराक के प्रधानमंत्री अली अल-जैदी, जो देश की सेना के कमांडर-इन-चीफ भी हैं, ने मयसान प्रांत के ऑपरेशन कमांड की गहन जांच के आदेश जारी किए हैं।

प्राथमिक जांच में यह संकेत मिलने के बाद कि सऊदी ठिकानों को निशाना बनाने वाले ड्रोन मयसान प्रांत से ही संचालित किए गए थे, इराकी प्रधानमंत्री ने वहां के सैन्य कमांडर को पद से बर्खास्त कर दिया है। इससे पहले बीते जुलाई महीने में भी ऐसी ही घटनाएं देखने को मिली थीं, जब सऊदी अरब के तेल ठिकानों पर हुए हमलों के जवाब में अमेरिका और सऊदी सेनाओं ने इराक में सक्रिय ईरान समर्थित मिलिशिया पर हवाई कार्रवाई की थी। उस समय सऊदी तेल इकाइयों पर हुए हमलों की औपचारिक जिम्मेदारी हूती विद्रोहियों ने ली थी, जबकि क्षेत्रीय सुरक्षा अधिकारियों का आकलन था कि हूती लड़ाकों ने इन अभियानों की रूपरेखा तैयार करने और उन्हें अमलीजामा पहनाने में इराकी मिलिशिया गुटों को तकनीकी सहायता उपलब्ध कराई थी। नए घटनाक्रम से स्पष्ट है कि यमन की सरजमीं पर शुरू हुई चिंगारी पूरे मध्य पूर्व के सुरक्षा संतुलन को फिर से बिगाड़ सकती है।

## इसका आप पर असर
लाल सागर और बाब अल-मंदेब जलमार्ग पर बढ़ते सैन्य तनाव से वैश्विक समुद्री व्यापार और ऊर्जा आपूर्ति पर सीधा असर पड़ सकता है, जिससे ईंधन और आयातित वस्तुओं की कीमतें प्रभावित हो सकती हैं।

- **कच्चे तेल और ईंधन की कीमतें:** सऊदी अरब की ईस्ट-वेस्ट पाइपलाइन पर हमले और बाब अल-मंदेब में अस्थिरता से अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल के दाम बढ़ सकते हैं। भारत जैसे तेल आयातक देशों में ईंधन की लागत और परिवहन खर्च बढ़ने का जोखिम पैदा होता है।
- **वैश्विक माल ढुलाई और लॉजिस्टिक्स:** लाल सागर मार्ग से दुनिया का बड़ा व्यापारिक माल गुजरता है। जहाजों का रास्ता बदलने या जहाजरानी कंपनियों द्वारा युद्ध जोखिम बीमा प्रीमियम बढ़ाने से उपभोक्ता वस्तुओं के आयात-निर्यात में देरी और महंगाई बढ़ सकती है।
- **मध्य पूर्व में कार्यरत प्रवासी भारतीय:** खाड़ी क्षेत्र में लाखों भारतीय काम करते हैं। क्षेत्रीय टकराव गहराने से सीमावर्ती तेल प्रतिष्ठानों और बुनियादी ढांचे की सुरक्षा को लेकर वहां रहने वाले कामगारों और उनके परिवारों की चिंताएं बढ़ सकती हैं।
- **मानवीय सहायता और दवा आपूर्ति:** यमन में संघर्ष तेज होने से राहत सामग्री और बुनियादी चिकित्सा आपूर्ति ठप होने का खतरा है। स्थानीय आबादी के साथ-साथ वहां राहत कार्यों में जुटे अंतरराष्ट्रीय कर्मियों की सुरक्षा भी दांव पर है।

## ऐसा क्यों हुआ
हूती विद्रोहियों द्वारा रणनीतिक द्वीपों और समुद्री मार्गों पर नियंत्रण बढ़ाने तथा सऊदी तेल पाइपलाइन पर ड्रोन हमलों की घटनाओं ने इस नए संकट को जन्म दिया है। 2022 के युद्धविराम के बावजूद स्थायी राजनीतिक समाधान न निकलने और क्षेत्रीय शक्तियों की आपसी खींचतान ने टकराव को दोबारा भड़काया है।

- **सामरिक ठिकानों पर कब्जा:** हूती लड़ाकों ने बाब अल-मंदेब के मुहाने पर स्थित मयून द्वीप पर नियंत्रण स्थापित कर लिया है। इस जलडमरूमध्य पर अपनी स्थिति मजबूत करके विद्रोही गुट वैश्विक ऊर्जा व्यापार पर दबाव बनाने की स्थिति में आ गया है।
- **सऊदी बुनियादी ढांचे पर हमले:** इराक के मयसान प्रांत से संचालित ड्रोनों द्वारा सऊदी अरब की प्रमुख ईस्ट-वेस्ट पाइपलाइन को निशाना बनाया गया। इस सुरक्षा सेंध ने खाड़ी देशों में सैन्य सतर्कता को चरम पर पहुंचा दिया है।
- **2022 युद्धविराम की कमजोरी:** यमन में 2022 में लागू हुआ सीजफायर केवल अग्रिम मोर्चों पर भारी गोलाबारी रोकने तक सीमित रहा। राजनीतिक समाधान और सत्ता के बंटवारे पर सहमति न बनने से दोनों पक्षों के बीच तनाव कभी पूरी तरह खत्म नहीं हुआ।
- **ईरान और अमेरिका की क्षेत्रीय होड़:** हूती विद्रोहियों की हालिया बढ़त को अमेरिका और उसके सहयोगियों पर दबाव बनाने की रणनीति के तौर पर देखा जा रहा है। वैश्विक ऊर्जा गलियारों को अस्थिर करने की यह कोशिश व्यापक क्षेत्रीय संघर्ष का हिस्सा है।

## सवाल-जवाब

### 1. यमन में मौजूदा तनाव का मुख्य कारण क्या है?
हूती विद्रोहियों ने लाल सागर के मुहाने और बाब अल-मंदेब के पास मयून द्वीप पर नियंत्रण कर लिया है, जिससे 2022 का युद्धविराम टूटने का खतरा पैदा हो गया है।

### 2. सऊदी अरब ने अपनी ईस्ट-वेस्ट पाइपलाइन क्यों बंद की?
सऊदी अरब ने ड्रोन हमले के बाद एहतियाती कदम के रूप में ईस्ट-वेस्ट पाइपलाइन का संचालन अस्थायी रूप से रोक दिया है।

### 3. ताजा संघर्ष में कितने लोग बेघर हुए हैं?
संयुक्त राष्ट्र प्रवासन एजेंसी के अनुसार, पिछले एक हफ्ते में लड़ाई तेज होने से 46 हजार से अधिक लोग अपने घरों से विस्थापित हुए हैं।

### 4. सऊदी पाइपलाइन पर हमले के बाद इराक में क्या कार्रवाई हुई?
इराकी प्रधानमंत्री अली अल-जैदी ने जांच के आदेश दिए और हमले में इस्तेमाल हुए मयसान प्रांत के ऑपरेशनल कमांडर को बर्खास्त कर दिया।

### 5. यमन के पूर्व गृहयुद्ध में कितना नुकसान हुआ था?
2014 से 2021 तक चले गृहयुद्ध में लगभग 1.5 लाख लोगों की मौत हुई थी और देश की 4 करोड़ की आबादी गंभीर मानवीय संकट में घिर गई थी।

### 6. मयून द्वीप की भौगोलिक स्थिति इतनी महत्वपूर्ण क्यों है?
मयून द्वीप बाब अल-मंदेब जलडमरूमध्य के प्रवेश द्वार पर स्थित है, जहां से दुनिया का प्रमुख तेल और वाणिज्यिक जहाजरानी व्यापार गुजरता है।

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