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  "type": "article",
  "title": "छह मिलियन लोग हुए बेघर, तालिबान के साये में लौटने को मजबूर हुए शरणार्थी",
  "summary": "पाकिस्तान और ईरान से बड़े पैमाने पर हो रहे निष्कासन के चलते लगभग छह मिलियन अफगान नागरिक अपने मूल वतन लौटने को मजबूर हो गए हैं, जहां वे बुनियादी सुविधाओं के बिना जीवन जीने को लाचार हैं।",
  "content": "बुजुर्ग लोग दर्द से कराहते हुए बैसाखियों के सहारे आगे बढ़ रहे हैं और आंखें फाड़े बच्चे अपने साथ लाई मुर्गियों को सीने से चिपकाए हुए हैं, जिन्हें वे अपने छोड़े गए घरों से जबरन लाने पर मजबूर हुए थे। पाकिस्तान की सीमा पार कर अफगानिस्तान में प्रवेश करने के कुछ ही मिनटों बाद पैंतीस वर्षीय नाजिया कहती हैं कि अपने देश में आकर उन्हें अच्छा महसूस हो रहा है, हालांकि उनका यह सुकून बहुत सीमित है।\n\nतोरखम बॉर्डर जिसे शून्य बिंदु के नाम से जाना जाता है, एक ऐसा स्थान है जहां शरणार्थियों की पुरानी संघर्षपूर्ण जिंदगी का अंत होता है और एक नए अनिश्चित दौर की शुरुआत होती है। नाजिया अपने दो बच्चों को साथ लेकर उन पंजीकरण काउंटरों की तरफ बढ़ रही हैं जिन पर तालिबान के काले और सफेद झंडे फहरा रहे हैं, और वह गहरी सांस लेते हुए बताती हैं कि उन्होंने इससे पहले कभी अफगानिस्तान नहीं देखा था और यहां बहुत से लोगों के पास खाने के लिए दो वक्त की रोटी भी नहीं है।\n\nनासिया का लगभग पूरा परिवार, जिसमें उनकी आठ बहनें और उनके बच्चे शामिल हैं, इस साल पाकिस्तान या ईरान से अफगानिस्तान वापस खदेड़ दिया गया है। दुनिया भर में बड़े पैमाने पर लोगों के सीमा पार करने की यह सबसे विशाल मानवीय आवाजाही है, जिसके तहत लाखों लोग दशकों से पाकिस्तान और ईरान में शरण लिए हुए थे या रोजगार की तलाश में रह रहे थे।\n\nअगस्त 2021 में तालिबान के सत्ता संभालने के बाद से अफगानिस्तान छोड़ने वाले लोगों की संख्या में लगातार इजाफा होता रहा है, लेकिन अब इन दोनों पड़ोसी देशों द्वारा अवैध प्रवासियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई के चलते उन्हें वापस लौटने के लिए मजबूर किया जा रहा है। हालांकि संयुक्त राष्ट्र और मानवाधिकार संगठनों का कहना है कि यह सुरक्षा अभियान केवल अवैध लोगों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें पंजीकृत अफगान नागरिकों को भी निशाना बनाया जा रहा है, और यहां तक कि पाकिस्तान भी अब सार्वजनिक रूप से कह चुका है कि पंजीकरण प्रमाण पत्र धारक अफगान भी इस दायरे से बाहर नहीं हैं।\n\nशरणार्थियों का अब तक का सबसे बड़ा विस्थापन\nसीमा के पास राजमार्ग के किनारे वापसी करने वाले लोगों से भरे ट्रक कतारों में खड़े हैं, और संयुक्त राष्ट्र शरणार्थी एजेंसी यानी यूएनएचसीआर के आंकड़ों के अनुसार इस साल पाकिस्तान और ईरान से जबरन लौटने वाले लोगों का आंकड़ा एक मिलियन तक पहुंच चुका है।\n\nअफगानिस्तान में यूएनएचसीआर के प्रवक्ता चार्ली गुडलेक ने इस स्थिति पर बात करते हुए बताया कि लगभग तीन साल के थोड़े से समय में हमने छह मिलियन लोगों को वापस अफगानिस्तान आते देखा है, जो कि एक छोटे देश की कुल आबादी के बराबर है। उन्होंने सीमा के पास तंबुओं की बस्ती में चिलचिलाती धूप में खड़े होकर कहा कि आधुनिक इतिहास में इस पैमाने पर लोगों की वापसी का ऐसा जनसैलाब पहले कभी नहीं देखा गया।\n\nयह इलाका तिरपाल और प्लास्टिक के तंबुओं से बनी बस्तियों का एक वीरान परिदृश्य है, जिनमें से कई तंबू अब फटे हुए हैं और इन्हें संयुक्त राष्ट्र तथा अन्य सहायता संगठनों द्वारा उन लोगों को कुछ रातों के लिए आश्रय देने के लिए खड़ा किया गया था जो यहां पूरी तरह खाली हाथ पहुंचे हैं।\n\nइनमें से कई वापसी करने वालों ने दशकों से अफगानिस्तान की धरती पर कदम नहीं रखा था, और नाजिया की तरह बहुत से लोग तो ऐसे हैं जो अपने पूरे जीवन में कभी यहां आए ही नहीं थे।\n\nसोरवर ने, जो कुछ दिन पहले ही अपने सात भाइयों और उनके परिवारों के साथ चालीस लोगों के काफिले और अपने तमाम घरेलू सामान से लदे एक भारी-भरकम पाकिस्तानी ट्रक में सवार होकर पहुंचे हैं, बताया कि उन्होंने सोवियत आक्रमण के दौरान पैंतालीस साल पहले अफगानिस्तान छोड़ा था और उनके अधिकांश भाई पाकिस्तान में ही पैदा हुए थे।\n\nउन्होंने कहा कि वे वहां लंबे समय तक रहे थे, इसलिए जब उन्हें उनके घर से बाहर निकाला गया तो उनका दिल टूट गया था, लेकिन इस तमाम दर्द के बावजूद वह इस बात से खुश हैं कि आखिरकार उन्हें पाकिस्तान की पुलिस के उत्पीड़न से हमेशा के लिए मुक्ति मिल गई है।\n\nअधिकारियों द्वारा उत्पीड़न और क्षेत्रीय कार्रवाई\nसीमा पर शरणार्थियों के संपर्क में आने वाले हर परिवार ने बताया कि उन्हें पाकिस्तान के अधिकारियों द्वारा पक्षपात और उत्पीड़न का सामना करना पड़ा है।\n\nहालांकि पाकिस्तान सरकार ने इन सवालों का कोई सीधा जवाब नहीं दिया है, लेकिन इस्लामाबाद में रविवार को एक प्रेस ब्रीफिंग के दौरान विदेश मंत्रालय के एक प्रवक्ता ने दावा किया कि पाकिस्तानी सरकार अफगान नागरिकों के किसी भी उत्पीड़न या दुर्व्यवहार को रोकने के लिए आवश्यक कदम उठाती है, और यदि ऐसी कोई घटना सामने आती है तो वे छिटपुट होती हैं तथा कानून के अनुसार पूरी तरह से निपटाई जाती हैं।\n\nपाकिस्तान और ईरान दोनों का कहना है कि अब अफगानों के अपने वतन लौटने का समय आ गया है, जिसमें से कुछ पर सुरक्षा खतरा पैदा करने का आरोप लगाया जा रहा है तो कुछ को वित्तीय बोझ बताया जा रहा है।\n\nपाकिस्तान से होने वाले इन निष्कासन और कथित दुर्व्यवहार में पिछले साल अक्टूबर के दौरान अफगानिस्तान और पाकिस्तान के बीच भड़की भारी झड़पों के बाद तेजी आई थी, और फरवरी में ह्यूमन राइट्स वॉच ने घर-घर जाकर छापे मारने, देर रात तक घरों की तलाशी लेने तथा वारंट के बिना गिरफ्तारियां करने की घटनाओं को उजागर किया था।\n\nदूसरी ओर ईरान, जिसने पिछले साल चार मिलियन से अधिक undocumented अफगानों को शरण देने का दावा किया था, ने जून 2025 में इजराइल और अमेरिका के साथ हुए अपने बारह दिवसीय युद्ध के बाद बड़े पैमाने पर deportations की प्रक्रिया को तेज कर दिया था।\n\nन्यूयार्क स्थित सेंटर फॉर ह्यूमन राइट्स इन ईरान ने वहां के अधिकारियों पर आरोप लगाया था कि उन्होंने युद्ध के बाद के माहौल का फायदा उठाकर अफगान प्रवासियों पर शक की सुई घुमाई है और उन पर जासूसी के आरोप लगाते हुए उन्हें इजराइल के संभावित जासूस के रूप में चित्रित किया है।\n\nसंयुक्त राष्ट्र की शरणार्थी एजेंसी इस मानवीय सिद्धांत पर लगातार जोर दे रही है कि किसी भी नागरिक की वापसी स्वेच्छा से, सुरक्षित माहौल में और गरिमापूर्ण तरीके से होनी चाहिए।\n\nअनिश्चित भविष्य और महिलाओं के अधिकार\nतोरखम में, सोरवर की भाभी जरीना अपने भविष्य को लेकर पैदा हुई अनिश्चितता पर दुख जताते हुए कहती हैं कि उनके पास कोई व्यवसाय शुरू करने या अपनी आजीविका कमाने के लिए कोई संसाधन नहीं है और उनके पास रहने के लिए एक तंबू तक नहीं है।\n\nचालीस वर्षीय जरीना चिलचिलाती इकतालीस डिग्री सेल्सियस गर्मी से राहत देने में असमर्थ एक बंजर ट्रांजिट तंबू के भीतर चिंतित महिलाओं और बच्चों के साथ बैठी हुई हैं।\n\nजब उनसे यह सवाल किया जाता है कि क्या वे उस देश में महिलाओं और लड़कियों के भविष्य को लेकर चिंतित हैं जहां तालिबान ने महिलाओं को माध्यमिक विद्यालय और विश्वविद्यालय समेत सार्वजनिक जीवन के अधिकांश हिस्सों से प्रतिबंधित कर दिया है, तो चालीस वर्षीय जरीना अपनी बांह फैलाते हुए कहती हैं कि इन लड़कियों को देख लीजिए, ये सभी बालिकाएं हैं और ऐसी स्थिति में उन्हें चिंता होना स्वाभाविक है।\n\nकुछ लोग भविष्य की अनिश्चितता से केवल चिंतित ही नहीं हैं, बल्कि पूरी तरह भयभीत हैं।\n\nसीमा से बहुत दूर एक सुरक्षित घर में शरण लिए हुए ईरान और फिर पाकिस्तान से निकाले गए एक पूर्व अफगान सुरक्षा गार्ड ने बताया कि वह उस घर से बाहर कदम नहीं रखते हैं, और उनके परिवार के सदस्य भी बाहर जाने से डरते हैं।\n\nवह सत्ता में लौटने के कुछ ही दिनों बाद तालिबान सरकार द्वारा घोषित उस आम माफी को सिरे से खारिज करते हुए कहते हैं कि उन्हें इस माफी पर कोई भरोसा नहीं है क्योंकि उनके कई साथियों को मौत के घाट उतार दिया जा चुका है, जबकि उनका अपना मामला संयुक्त राष्ट्र के पास पंजीकृत था लेकिन उन्हें सुरक्षित देश में स्थानांतरित किए जाने से पहले ही निर्वासित कर दिया गया था।\n\nवित्तीय संकट इस पूरी पीड़ा को और अधिक बढ़ा देता है, क्योंकि दुनिया भर में विदेशी सहायता में भारी कटौती की गई है और इसका सबसे गंभीर असर अफगानिस्तान पर पड़ा है जहां तालिबान अभी भी आतंकवाद और मानवाधिकारों से जुड़े प्रतिबंधों के दायरे में जकड़े हुए हैं।\n\nपाकिस्तान ने रविवार को इस बात की पुष्टि की कि मानवीय आधार पर सोलह हजार कमजोर अफगानों को निर्वासन से अस्थायी छूट दे दी गई है, जिसका संयुक्त राष्ट्र ने स्वागत किया है, लेकिन जानकारों का अनुमान है कि पाकिस्तान में गंभीर नुकसान के जोखिम का सामना कर रहे अफगानों की संख्या ढाई लाख तक हो सकती है, जिसमें वे महिलाएं और लड़कियां भी शामिल हैं जिन्हें शिक्षा से वंचित किया जा रहा है।\n\nतालिबान की प्रतिक्रिया और कूटनीतिक स्थिति\nकाबुल में स्थित विदेश मंत्रालय के सुंदर परिसर में तालिबान के विदेश मंत्री अमीर खान मुत्ताकी ने इस परिस्थिति पर बात करते हुए स्वीकार किया कि उन्हें निश्चित रूप से कुछ मदद की आवश्यकता है और इन लोगों की वापसी से शुरुआती दबाव जरूर बढ़ा है, लेकिन लंबे समय में यह स्थिति उनके और अफगानिस्तान दोनों के लिए फायदेमंद साबित होगी।\n\nतालिबान के सत्ता में आने के शुरुआती वर्षों में उनके कुछ मंत्रियों ने मानवीय मुद्दों को यह कहकर टाल दिया था कि भगवान खुद व्यवस्था करेंगे, लेकिन अब संयुक्त राष्ट्र का अनुमान है कि इस साल देश की लगभग आधी आबादी यानी इक्कीस दशमलव नौ मिलियन लोगों को जीवित रहने के लिए सहायता की आवश्यकता है।\n\nसंयुक्त राष्ट्र की बाल एजेंसी यूनिसेफ ने हाल ही में चेतावनी दी थी कि देश के एक मिलियन बच्चे जीवन के लिए खतरनाक कुपोषण का सामना कर रहे हैं।\n\nयूएनएचसीआर के प्रवक्ता गुडलेक ने इस संकट पर टिप्पणी करते हुए कहा कि दुनिया का कोई भी देश इस तरह के संकट से अकेले नहीं निपट सकता, हालांकि उन्होंने शरणार्थियों के आगमन के वक्त तालिबान सरकार द्वारा की जा रही सहायता के प्रयासों की सराहना भी की।\n\nइसके साथ ही उन्होंने यह भी जोड़ा कि वे इस बात से अच्छी तरह वाकिफ हैं कि तालिबान द्वारा विशेष रूप से महिलाओं और लड़कियों पर लागू किए गए प्रतिबंध और आदेश अंतरराष्ट्रीय समर्थन जुटाने में मदद नहीं करते हैं।\n\nदूसरी ओर मुत्ताकी ने अपनी सरकार के रुख को दोहराते हुए कहा कि लड़कियों की शिक्षा जैसे मामले अफगानों के अपने आंतरिक मुद्दे हैं जिन्हें उन्हें खुद ही हल करना है।\n\nमहिलाओं और बालिकाओं के जीवन पर लगाए गए इन कड़े प्रतिबंधों के कारण तालिबान के अंतरराष्ट्रीय संबंध बुरी तरह प्रभावित हुए हैं और सत्ता में पांच साल बीत जाने के बाद भी केवल एक देश रूस ने औपचारिक रूप से उनके शासन को मान्यता दी है।\n\nजब इस अलगाव के बारे में सवाल किया गया तो मुत्ताकी ने चीन, भारत और मध्य एशियाई देशों जैसे पड़ोसियों के साथ मजबूत होते कूटनीतिक और आर्थिक संबंधों का हवाला दिया।\n\nपश्चिमी देशों से काबुल की अपेक्षाकृत दूरी के बारे में पूछे जाने पर उन्होंने सवाल किया कि जिन लोगों ने पिछले पांच वर्षों में उनके साथ कोई संबंध नहीं रखा, उन्होंने आखिर क्या हासिल किया है, और खुद ही उसका जवाब देते हुए कहा कि उन्होंने कुछ भी हासिल नहीं किया है।\n\nशून्य बिंदु पर मुलाकात करने वाले हर परिवार से यही एक शब्द सुनने को मिला कि उनके पास कुछ भी नहीं बचा है, लेकिन वे सभी इस कठिन वापसी की यात्रा पर निकल पड़े हैं और लगभग शून्य से अपनी जिंदगी की फिर से शुरुआत कर रहे हैं।\n\nइसका आप पर असर\nशरणार्थियों के इस बड़े पैमाने पर विस्थापन और वापसी से सीमावर्ती क्षेत्रों और पूरे देश में मानवीय सहायता तथा बुनियादी संसाधनों पर भारी दबाव बढ़ रहा है।\n\n• भारत में: इस अंतरराष्ट्रीय शरणार्थी संकट का सीधा प्रभाव भारत के घरेलू बाजारों या नागरिकों की दैनिक आजीविका पर नहीं पड़ता है, हालांकि क्षेत्रीय कूटनीति और सुरक्षा नीतियों पर इसका सूक्ष्म असर देखा जा सकता है।\n• अफगानिस्तान में: लौटने वाले छह मिलियन लोगों के कारण देश में खाद्यान्न, रोजगार और स्वास्थ्य सेवाओं की भारी कमी हो गई है, जिससे स्थानीय नागरिकों और नए शरणार्थियों दोनों के लिए जीवनयापन बेहद कठिन हो गया है।\n• आर्थिक दबाव: अंतरराष्ट्रीय सहायता में कटौती और प्रतिबंधों के बीच देश की आधी आबादी को जीवित रहने के लिए मानवीय मदद की आवश्यकता है, जिससे स्थानीय अर्थव्यवस्था पूरी तरह चरमरा गई है।\n• शिक्षा और अधिकार: महिलाओं और लड़कियों पर लगे प्रतिबंधों के कारण अगली पीढ़ी की शिक्षा और विकास पर गंभीर संकट मंडरा रहा है, जिससे भविष्य की कार्यबल क्षमता प्रभावित हो रही है।\n• सुरक्षा जोखिम: वापसी करने वाले पूर्व सरकारी कर्मचारियों और सुरक्षाकर्मियों को मिल रही धमकियों के कारण आंतरिक सुरक्षा और स्थिरता को लेकर अनिश्चितता बनी हुई है।\n\nसवाल-जवाब\n\n1. कितने अफगान नागरिक वापस अफगानिस्तान लौटे हैं?\nसंयुक्त राष्ट्र शरणार्थी एजेंसी के अनुसार, पिछले तीन वर्षों में लगभग छह मिलियन अफगान नागरिक वापस अफगानिस्तान लौटे हैं।\n\n2. तोरखम क्रॉसिंग को क्या कहा जाता है?\nतोरखम क्रॉसिंग को शून्य बिंदु के रूप में जाना जाता है जहां पाकिस्तान और अफगानिस्तान की सीमाएं मिलती हैं।\n\n3. ईरान में सामूहिक निर्वासन क्यों तेज हुआ?\nजून 2025 में इजराइल और अमेरिका के साथ हुए युद्ध के बाद ईरान ने अफगान प्रवासियों के खिलाफ निर्वासन प्रक्रिया तेज कर दी थी।\n\n4. कितने लोगों को मानवीय आधार पर छूट मिली है?\nपाकिस्तान ने मानवीय आधार पर सोलह हजार कमजोर अफगानों को निर्वासन से अस्थायी छूट प्रदान की है।\n\n5. तालिबान सरकार को कितनी अंतरराष्ट्रीय मान्यता मिली है?\nसत्ता में पांच साल बीत जाने के बाद केवल रूस ने औपचारिक रूप से तालिबान शासन को मान्यता दी है।\n\n6. वर्तमान में कितने लोगों को सहायता की आवश्यकता है?\nसंयुक्त राष्ट्र के अनुमान के अनुसार, इस साल लगभग इक्कीस दशमलव नौ मिलियन लोगों को जीवित रहने के लिए सहायता की आवश्यकता है।",
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  "category": "मध्य पूर्व",
  "publishedAt": "2026-09-01",
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