मिजोरम में नशे के खिलाफ नागरिक समाज का महाअभियान, बॉर्डर से लेकर काउंसलिंग तक लड़ी जा रही निर्णायक जंग मिजोरम में मादक पदार्थों की घुसपैठ और लत पर रोक लगाने के लिए यंग मिजो एसोसिएशन और कानून प्रवर्तन एजेंसियां मिलकर बड़ा अभियान चला रही हैं, जिसमें जब्ती के साथ पुनर्वास पर जोर दिया जा रहा है। आइजोल शहर में यंग मिजो एसोसिएशन के केंद्रीय मुख्यालय के भीतर एक सादा कमरा इस समय राज्य में चल रहे सबसे गंभीर संघर्ष का केंद्र बना हुआ है। वहाँ केवल एक टेबल और आमने-सामने रखी दो प्लास्टिक की कुर्सियाँ हैं, जहाँ लगातार सामाजिक परामर्श का कार्य चल रहा है। समाज सेविका और काउंसलर एलिन लालावनिपुई के सामने एक युवक बैठा है, जिसकी नजरें लगातार नीचे झुकी हुई हैं और वह आँखें मिलाने से झिझक रहा है। एलिन बिना किसी जल्दबाजी के उसकी बातें सुनती हैं, सवाल पूछती हैं और अपनी डायरी में जरूरी बातें दर्ज करती हैं। लगभग बीस मिनट या उससे कुछ अधिक समय तक चलने वाली यह बातचीत समाप्त होते ही कतार में खड़ा अगला युवक कमरे में प्रवेश करता है। सुबह से लेकर देर शाम तक यह सिलसिला लगातार चलता रहता है। पिछले कई महीनों से एलिन इसी रूटीन के साथ नशे के भंवर में फंसे लोगों को संबल देने और उनके पुनर्वास के प्रयास में जुटी हुई हैं। एलिन के पास मौजूद रिकॉर्ड पुस्तिका इस छोटे पूर्वोत्तर राज्य में नशीले पदार्थों के फैलाव की भयावह तस्वीर सामने रखती है। आंकड़ों के अनुसार, इस वर्ष 10 अप्रैल से 28 मई के बीच राजधानी आइजोल में नशा पीड़ितों के 239 मामले दर्ज किए गए। एलिन हर रोज लगभग 13 से 14 पीड़ितों से आमने-सामने बैठकर बात करती हैं और कई बार यह संख्या इससे भी अधिक हो जाती है। इतने कम अंतराल में 239 पीड़ितों का पंजीकरण होना समस्या की गंभीरता को दर्शाता है। इनमें से अधिकांश लोगों ने शुरुआत में शराब और गांजे का सेवन किया और बाद में हेरोइन तथा मेथामफेटामाइन जैसे घातक नशीले पदार्थों की चपेट में आ गए। नशा करने के कारणों की पड़ताल करने पर पता चलता है कि बेरोजगारी और सामाजिक उलझनें, जैसे तलाक या पारिवारिक अलगाव, युवाओं को इस दलदल की ओर धकेल रहे हैं। पंजीकृत मामलों में 75 प्रतिशत से अधिक घातक ड्रग्स की गिरफ्त में आइजोल में दर्ज किए गए मामलों का विश्लेषण करते हुए एलिन ने स्पष्ट किया कि पंजीकृत 239 व्यक्तियों में से 75 प्रतिशत से अधिक, यानी 151 लोग, सीधे तौर पर घातक सिंथेटिक और ओपिओइड दवाओं के व्यसनी हैं, जबकि बाकी गांजा और शराब जैसी लतों से जूझ रहे हैं। सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि चर्च से जुड़े संगठनों और सामाजिक संस्थाओं के लगातार प्रयासों के बावजूद मरीजों के पूरी तरह ठीक होने की दर काफी कम बनी हुई है। समाज में नशीले पदार्थों की आसान और सस्ती उपलब्धता के कारण लोग उपचार के बाद दोबारा नशे की गिरफ्त में आ जाते हैं। परामर्श और चिकित्सा देखभाल के बाद लत छोड़ने वाले कई लोग थोड़े अंतराल के बाद फिर से उसी लत का शिकार हो जाते हैं। इस संकट की व्यापकता का अंदाजा सरकारी जब्ती के रिकॉर्ड से भी लगाया जा सकता है। मिजोरम के आबकारी और नारकोटिक्स विभाग के आयुक्त पु जेड ललहमंगाईहा के अनुसार, राज्य में सिंथेटिक ड्रग्स, विशेष रूप से मेथामफेटामाइन की जब्ती सबसे ऊपर है, जबकि हेरोइन, गांजा और अफीम जैसे पारंपरिक मादक पदार्थ भी कानून व्यवस्था के लिए निरंतर सिरदर्द बने हुए हैं। पिछले तीन वर्षों के दौरान आबकारी और नारकोटिक्स विभाग ने कुल 390.378 किलोग्राम हेरोइन, 1453.737 किलोग्राम गांजा, 2364.075 किलोग्राम मेथ, 86.862 किलोग्राम क्रिस्टल मेथ, 10.687 किलोग्राम अफीम, 11.457 किलोग्राम नशीली गोलियां और 1457.243 किलोग्राम कोडीन आधारित कफ सिरप जब्त किया है। म्यांमार सीमा और तस्करी का इंटरनेशनल ट्रांजिट कॉरिडोर मिजोरम में नशीली दवाओं की भारी आवक का सीधा संबंध पड़ोसी देश म्यांमार के साथ साझा होने वाली 500 किलोमीटर से अधिक लंबी खुली अंतरराष्ट्रीय सीमा से है। म्यांमार दुनिया में मेथामफेटामाइन का सबसे बड़ा उत्पादक देश है और वहां भारी मात्रा में हेरोइन का उत्पादन भी होता है। पड़ोसी देश में हाल के आंतरिक संघर्षों और आर्थिक गिरावट के चलते कई लोगों के लिए अवैध दवाओं का निर्माण आजीविका का जरिया बन गया है, जिसमें म्यांमार के कई सशस्त्र जातीय समूहों की भी इस अवैध कारोबार में बड़ी हिस्सेदारी बताई जाती है। मिजोरम के आबकारी और नारकोटिक्स विभाग के संयुक्त आयुक्त पु पीटर जोहमिंगथांगा ने बताया कि राज्य में नशीले पदार्थों की आपूर्ति यहां की स्थानीय मांग से कहीं अधिक है। मिजोरम अब भारत के मुख्य भूमि के राज्यों और विदेशों में अवैध खेप भेजने का एक प्रमुख ट्रांजिट केंद्र बन चुका है। सुरक्षा बलों ने मिजोरम में ऐसी खेपें भी पकड़ी हैं जिन्हें बांग्लादेश और कुछ अरब देशों में भेजा जाना था। ये प्रतिबंधित पदार्थ भारत-म्यांमार की खुली सीमा से भारत में प्रवेश करते हैं और फिर अंतरराष्ट्रीय गंतव्यों तक पहुंचाए जाते हैं। अदृश्य तस्करों और सोशल मीडिया का तकनीकी जाल तस्करों द्वारा आधुनिक तकनीक का व्यापक इस्तेमाल किए जाने से मिजोरम में कानून लागू करने वाली एजेंसियों के सामने नई और जटिल चुनौतियां खड़ी हो गई हैं। पु पीटर जोहमिंगथांगा के अनुसार, पहले नशा तस्करों और पैडलर्स के चेहरे और पहचान स्पष्ट होते थे, लेकिन अब वे पूरी तरह से अदृश्य हो चुके हैं। दवाओं की खरीद-फरोख्त के लिए आइस और कैंडी जैसे गुप्त कोड शब्दों का प्रयोग किया जा रहा है। डिलीवरी और लेन-देन के लिए सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स का सहारा लिया जा रहा है, जिससे तस्करों को ट्रेस करना बेहद कठिन हो गया है। तस्कर फर्जी पहचान पत्रों का उपयोग करके सिम कार्ड हासिल करते हैं और व्हाट्सएप ग्रुप संचालित करते हैं। इसके अलावा फेसबुक और टेलीग्राम जैसे प्लेटफॉर्म्स पर फर्जी प्रोफाइल बनाकर खरीदार और विक्रेता दोनों नशीले पदार्थों की मांग दर्ज करते हैं। कुछ मामलों में तो नशीले पदार्थों की सीधे घर तक डिलीवरी कराई जा रही है। तकनीक पर आधारित इस सिंडिकेट ने नशीले पदार्थों के नेटवर्क को पकड़ना बेहद पेचीदा बना दिया है। ऑपरेशन जेरिको और सामुदायिक पहरेदारी की शुरुआत नशे के बढ़ते खतरे को जड़ से समाप्त करने के लिए यंग मिजो एसोसिएशन ने पिछले वर्ष सितंबर में राज्य पुलिस तथा आबकारी एवं नारकोटिक्स विभाग के साथ मिलकर एक संयुक्त अभियान शुरू किया। यंग मिजो एसोसिएशन की केंद्रीय समिति के महासचिव प्रोफेसर मालसावमलियाना के अनुसार, वर्ष 2025 में मिजोरम के चंफई जिले में ऐसे 13 गांवों की पहचान की गई थी जिनके जरिए नशीले पदार्थ राज्य में प्रवेश करते थे। इसके बाद उन संवेदनशील रास्तों पर कड़ी निगरानी रखने के लिए पुलिस और नारकोटिक्स अधिकारियों के साथ यंग मिजो एसोसिएशन के स्वयंसेवकों को तैनात किया गया। यह पूरा तंत्र यंग मिजो एसोसिएशन के सूचना नेटवर्क पर काफी हद तक निर्भर है। जैसे ही राज्य में नशीले पदार्थों की खेप आने की सूचना मिलती है, स्वयंसेवक तुरंत पुलिस और नारकोटिक्स अधिकारियों को सूचित करते हैं और उसके बाद संयुक्त छापेमारी की जाती है। चूंकि यंग मिजो एसोसिएशन के पास नशीले पदार्थों को जब्त करने का कानूनी अधिकार नहीं है, इसलिए जब्ती की आधिकारिक कार्रवाई पुलिस और नारकोटिक्स विभाग करता है। संगठन का मुख्य काम सूचना साझा करना और जब्ती के बाद पीड़ितों को बचाकर उनका पुनर्वास कराना है। संगठन पुनर्वास केंद्रों को आवश्यक राशन और ढांचागत मदद भी उपलब्ध कराता है। पूरे राज्य में 5 लाख से अधिक स्वयंसेवक निष्काम भाव से समाज को नशामुक्त करने के दायित्व में जुटे हुए हैं। मणिपुर का नया रूट और 317.30 करोड़ रुपये की जब्ती केंद्रीय यंग मिजो एसोसिएशन के अध्यक्ष पु आर ललघेता ने बताया कि ऑपरेशन जेरिको के उत्साहजनक परिणाम सामने आए हैं। सख्त पहरेदारी के कारण तस्कर अब चंफई के पारंपरिक रास्तों का उपयोग नहीं कर पा रहे हैं। हालांकि संकट अभी पूरी तरह टला नहीं है क्योंकि तस्करों ने अब भारतीय क्षेत्र में नशीले पदार्थों को प्रवेश कराने के लिए मणिपुर के रास्ते का रुख किया है, जहाँ से खेप मिजोरम और अन्य राज्यों में भेजी जा रही है। राज्य पुलिस और आबकारी विभाग के साथ मिलकर सेंट्रल एंटी ड्रग्स स्क्वॉड और जोनल एंटी ड्रग्स स्क्वॉड बनाए गए हैं जो गुप्त सूचनाओं के आधार पर छापे मार रहे हैं। मिजोरम के गृह मंत्री पु के सपडांगा ने हाल ही में राज्य विधानसभा को सूचित किया कि 1 सितंबर 2025 को शुरू किए गए ऑपरेशन जेरिको के तहत अब तक लगभग 317.30 करोड़ रुपये मूल्य के मादक पदार्थ जब्त किए जा चुके हैं। एक प्रश्न का उत्तर देते हुए गृह मंत्री ने सदन को बताया कि इस संयुक्त अभियान के माध्यम से कई प्रमुख तस्करी मार्गों को बंद करने में सफलता मिली है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2025 में मिजोरम में नशीली दवाओं के सेवन से 118 लोगों की जान गई थी, जबकि इस वर्ष अप्रैल तक मौतों का आंकड़ा 21 तक पहुंच चुका है। कठिन परिस्थितियों के बावजूद, मिजो समाज के निस्वार्थ सेवा भाव 'त्लॉम्ंगाईहना' की प्रेरणा से लड़ी जा रही यह सामुदायिक लड़ाई नशामुक्त भविष्य की दिशा में मजबूती से कदम बढ़ा रही है। इसका आप पर असर मिजोरम में मादक पदार्थों की तस्करी और दुरुपयोग के खिलाफ चलाए जा रहे इस बड़े संयुक्त अभियान से स्थानीय परिवारों और सुरक्षा व्यवस्था पर सीधा असर पड़ रहा है। • मिजोरम में: सीमावर्ती चंफई और आइजोल में युवाओं को नशे की लत से बचाने के लिए सख्त निगरानी और मुफ्त परामर्श सहायता बढ़ाई गई है। इससे अभिभावकों को नशे की चपेट में आए बच्चों के त्वरित पुनर्वास और इलाज के लिए सामाजिक संस्थाओं की सीधी मदद मिल रही है। • भारत में: म्यांमार से लगने वाली सीमा पर नाकाबंदी से देश के अन्य राज्यों में जाने वाली सैकड़ों करोड़ रुपये की सिंथेटिक ड्रग्स की सप्लाई चेन बाधित हो रही है। इससे महानगरों और दूसरे राज्यों में अवैध ड्रग्स की आमद पर अंकुश लगाने में मदद मिल रही है। • कानूनी और सुरक्षा प्रभाव: सोशल मीडिया और फर्जी सिम कार्ड के जरिए नशा बेचने वाले गिरोहों पर संयुक्त निगरानी तेज कर दी गई है। अवैध गतिविधियों में संदिग्ध डिजिटल प्रोफाइलों की पहचान कर पुलिस सख्त कार्रवाई कर रही है। • पुनर्वास सुविधाएं: स्वयंसेवी संगठनों द्वारा पुनर्वास केंद्रों को राशन और बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध कराई जा रही हैं। इससे आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के पीड़ितों को लंबे समय तक नशामुक्ति केंद्रों में रहने का सहारा मिल रहा है। ऐसा क्यों हुआ मिजोरम में नशीले पदार्थों के गंभीर संकट और कानून प्रवर्तन एजेंसियों के बड़े अभियान के पीछे भौगोलिक, सामाजिक और राजनीतिक कारण जिम्मेदार हैं। • म्यांमार की भौगोलिक निकटता: मिजोरम म्यांमार के साथ 500 किलोमीटर से अधिक लंबी खुली सीमा साझा करता है, जहां से तस्करी आसान हो जाती है। म्यांमार दुनिया में मेथामफेटामाइन का सबसे बड़ा उत्पादक है और वहां की अस्थिरता ने इसे आजीविका का जरिया बना दिया है। • आंतरिक संघर्ष और सशस्त्र समूह: म्यांमार में जारी गृहयुद्ध और आर्थिक तंगी के कारण कई हथियारबंद जातीय समूह भारी मात्रा में ड्रग्स तैयार कर भारत के रास्ते अंतरराष्ट्रीय बाजारों में भेज रहे हैं। भारत के मुख्य राज्यों, बांग्लादेश और अरब देशों के लिए मिजोरम एक ट्रांजिट कॉरिडोर बन गया है। • बेरोजगारी और पारिवारिक तनाव: राज्य के भीतर युवाओं में बेरोजगारी और तलाक जैसे सामाजिक कारणों ने निराशा बढ़ाई है। इस मानसिक दबाव के चलते युवा शुरुआत में शराब या गांजे और बाद में हेरोइन व मेथ जैसी जानलेवा दवाओं की लत में फंस जाते हैं। • तकनीक का दुरुपयोग: तस्करों ने पहचान छिपाने के लिए फर्जी पहचान पत्रों पर सिम कार्ड लेकर टेलीग्राम, व्हाट्सएप और फेसबुक का इस्तेमाल शुरू कर दिया है। कोडवर्ड्स के जरिए ऑनलाइन ऑर्डर लेने से पारंपरिक पुलिस तंत्र के लिए इन्हें पकड़ना बेहद पेचीदा हो गया। सवाल-जवाब 1. ऑपरेशन जेरिको क्या है और इसे किसने शुरू किया? ऑपरेशन जेरिको 1 सितंबर 2025 को शुरू किया गया एक संयुक्त अभियान है, जिसे यंग मिजो एसोसिएशन, राज्य पुलिस और आबकारी एवं नारकोटिक्स विभाग मिलकर चला रहे हैं। 2. ऑपरेशन जेरिको के तहत अब तक कितनी कीमत के मादक पदार्थ जब्त किए गए हैं? मिजोरम विधानसभा में दी गई जानकारी के अनुसार ऑपरेशन जेरिको के तहत अब तक लगभग 317.30 करोड़ रुपये मूल्य के नशीले पदार्थ जब्त किए जा चुके हैं। 3. मिजोरम में पिछले तीन वर्षों में कितनी मात्रा में हेरोइन और मेथामफेटामाइन जब्त की गई? आबकारी विभाग के अनुसार पिछले तीन वर्षों में 390.378 किलोग्राम हेरोइन, 2364.075 किलोग्राम मेथ और 86.862 किलोग्राम क्रिस्टल मेथ जब्त की गई है। 4. मिजोरम में नशीली दवाओं की आसान उपलब्धता का मुख्य कारण क्या है? मिजोरम की म्यांमार के साथ 500 किलोमीटर से अधिक लंबी खुली सीमा लगती है, जो मेथामफेटामाइन और हेरोइन का बड़ा उत्पादक देश है। 5. मिजोरम में नशीली दवाओं के सेवन से कितने लोगों की मौत हुई है? सरकारी आंकड़ों के मुताबिक वर्ष 2025 में 118 लोगों की जान गई थी, जबकि इस वर्ष अप्रैल तक मौतों की संख्या 21 दर्ज की गई है। 6. चंफई में सख्ती के बाद तस्कर अब किस नए रास्ते का इस्तेमाल कर रहे हैं? चंफई के 13 गांवों में कड़ी निगरानी के बाद तस्करों ने भारतीय क्षेत्र में नशीले पदार्थ लाने के लिए मणिपुर के रास्ते का रुख किया है। https://trendkia.com/mizoram/mizoram-men-nashe-ke-khilapha-nagarika-samaja-ka-mahaabhiyana-bordara-se-lekara-kaunsalinga-taka-lari-ja-rahi-nirnayaka-jnga-45344 TrendKia — Har trend, sabse pehle.