7.8 प्रतिशत GDP वृद्धि दर की चमक के बीच क्यों सुलग रहे हैं महंगाई और बेरोजगारी जैसे बुनियादी सवाल 7.8 प्रतिशत की मजबूत जीडीपी वृद्धि दर के बावजूद बढ़ती महंगाई, शेयर बाजार की मंदी, और रोजगार के कमजोर आंकड़ों ने भारत की आर्थिक प्रगति पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। भारत की 7.8 प्रतिशत की जीडीपी (GDP) वृद्धि दर कागजों पर बेहद आकर्षक और प्रभावशाली नजर आती है। विशेष रूप से ऐसे समय में जब पूरी दुनिया भू-राजनीतिक तनावों, व्यापार युद्ध, ऊर्जा संकट और आर्थिक अनिश्चितताओं से जूझ रही है, तब भारत का दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्था बने रहना एक बड़ी उपलब्धि है। हालांकि, इस 7.8 प्रतिशत की विकास दर के बीच जमीनी हकीकत कुछ और ही बयां करती है। देश के आम नागरिकों के मन में आज भी कई गंभीर सवाल उठ रहे हैं। अगर हमारी अर्थव्यवस्था इतनी तेजी से आगे बढ़ रही है, तो रोजमर्रा की चीजों के दाम क्यों बढ़ रहे हैं, महंगाई क्यों आसमान छू रही है, लोगों की प्रति व्यक्ति आय इतनी कम क्यों है और रोजगार के नए अवसरों का सृजन क्यों नहीं हो पा रहा है? जीडीपी के आंकड़ों और विकास की हकीकत पर छिड़ी बहस जब से यह 7.8 प्रतिशत के विकास दर के आंकड़े जारी हुए हैं, तब से अर्थशास्त्रियों और विशेषज्ञों के बीच इसे लेकर बहस छिड़ी हुई है। पूर्व वित्त सचिव सुभाष चंद्र गर्ग ने इस आंकड़े पर गंभीर तकनीकी सवाल उठाए हैं। गर्ग का दावा है कि भारत की वास्तविक आर्थिक वृद्धि केवल 2.6 प्रतिशत रही है। उन्होंने इस 7.8 प्रतिशत के आंकड़े को "सांख्यिकीय रूप से पूरी तरह से अर्थहीन" करार दिया। एक तरफ जहां गर्ग ने तकनीकी स्तर पर इन आंकड़ों की आलोचना की, वहीं भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन ने इसे एक बुनियादी दृष्टिकोण से परखा। राजन ने सवाल उठाया कि जब देश में कॉरपोरेट निवेश और विदेशी पूंजी का प्रवाह लगातार निराशाजनक बना हुआ है, तो देश की विकास दर 7 प्रतिशत से ऊपर कैसे बनी हुई है? उन्होंने अपनी चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि "कुछ तो गड़बड़ है।" यह विरोधाभास सरकार और इसके आलोचकों के बीच जारी तीखी बहस को और गहरा कर देता है। वैश्विक स्तर पर तुलना और प्रति व्यक्ति आय की हकीकत अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) के अनुमानों के मुताबिक, भारत की प्रति व्यक्ति आय लगभग 2,813 डॉलर (लगभग 2,69,520.60 रुपये सालाना) है। इसका मतलब है कि एक औसत भारतीय की दैनिक आय करीब 738.41 रुपये है। दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्था के लिए यह आय स्तर अन्य देशों की तुलना में बेहद कम है। उदाहरण के लिए, सिंगापुर की जीडीपी (GDP) वृद्धि दर 5.9 प्रतिशत है, लेकिन वहां की प्रति व्यक्ति आय 107,758 डॉलर है। इसी तरह, इंडोनेशिया की आर्थिक विकास दर 5.29 प्रतिशत है और वहां की प्रति व्यक्ति आय 5,362 डॉलर है। हमारे पड़ोसी देश बांग्लादेश को ही देख लें, जो 4.7 प्रतिशत की दर से बढ़ रहा है, लेकिन वहां की प्रति व्यक्ति आय 2,911 डॉलर है, जो भारत से अधिक है। यह आंकड़े स्पष्ट करते हैं कि राष्ट्रीय स्तर पर बड़ी विकास दर का मतलब यह नहीं है कि व्यक्तिगत स्तर पर भी समृद्धि आ रही है। रसोई का बिगड़ता बजट और आसमान छूती खाद्य महंगाई आम आदमी पर आर्थिक दबाव का सबसे बड़ा असर उनकी रसोई पर पड़ रहा है। अगस्त के महीने में त्योहारी सीजन से ठीक पहले सब्जियों की कीमतों में 40 से 50 प्रतिशत तक का भारी उछाल देखा गया। आलू और प्याज जैसी बुनियादी चीजों के दाम थोक बाजार से खुदरा बाजार तक पहुंचते-पहुंचते लगभग दोगुने हो गए हैं। थोक मंडियों में आलू की कीमत जहां 12 रुपये प्रति किलोग्राम है, वहीं खुदरा बाजार में यह उपभोक्ताओं को 20 रुपये प्रति किलोग्राम मिल रहा है। प्याज की खुदरा कीमतें 75 से 80 रुपये प्रति किलोग्राम तक पहुंच चुकी हैं, जबकि थोक मंडियों में इसकी कीमत केवल 36 से 45 रुपये प्रति किलोग्राम है। टमाटर की खुदरा कीमत 40 से 60 रुपये प्रति किलोग्राम के बीच है, जबकि मंडियों में यह केवल 23 से 25 रुपये प्रति किलोग्राम में बिक रहा है। अन्य सब्जियों की बात करें तो खुदरा बाजार में बीन्स 50 से 60 रुपये प्रति किलोग्राम, बैंगन 40 से 60 रुपये प्रति किलोग्राम, और पत्तागोभी थोक मंडी में 15 रुपये की तुलना में खुदरा में 40 रुपये प्रति किलोग्राम तक बिक रही है। फूलगोभी की थोक कीमत 30 रुपये है, जो खुदरा बाजार में 60 से 80 रुपये प्रति किलोग्राम पर पहुंच चुकी है। चीनी की कीमतों में भी भारी तेजी आई है। पिछले महीने चीनी की खुदरा कीमत 70 रुपये प्रति किलोग्राम तक पहुंच गई, जो 30 से 40 प्रतिशत की बढ़ोतरी है। वहीं, आपूर्ति में कमी के कारण थोक स्तर (क्विंटल स्तर) पर चीनी की कीमतों में दो महीने से भी कम समय में 80 प्रतिशत से अधिक का उछाल दर्ज किया गया। घरेलू मांग और आपूर्ति के अंतर को पाटने के लिए भारत को चीनी का निर्यात बंद करके विदेशों से इसका आयात शुरू करना पड़ा। इस चौतरफा दबाव के कारण अगस्त 2026 में खाद्य और पेय पदार्थों की कुल मुद्रास्फीति बढ़कर 5.95 प्रतिशत पर पहुंच गई। सेवा क्षेत्र की बढ़ती कीमतें और जीवन यापन का खर्च महंगाई की मार सिर्फ खाने-पीने की चीजों तक सीमित नहीं है। सेवा क्षेत्र की कीमतों में भी उल्लेखनीय बढ़ोतरी दर्ज की गई है, जिससे आम जनता पर अतिरिक्त वित्तीय बोझ पड़ा है। रेस्तरां और होटल जैसी आवास सेवाओं के दामों में 8.38 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। इसके अलावा, पर्सनल केयर, सामाजिक सुरक्षा और अन्य विविध वस्तुओं तथा सेवाओं की कीमतों में 15.17 प्रतिशत का भारी उछाल आया है। परिवहन क्षेत्र की महंगाई भी बढ़कर 4.6 प्रतिशत हो गई है। इसका मतलब है कि लोगों के लिए न केवल भोजन महंगा हुआ है, बल्कि यात्रा करना, बाहर खाना और अपनी बुनियादी जरूरतों को पूरा करना भी पहले से कहीं अधिक खर्चीला हो गया है। फिक्स्ड डिपॉजिट पर कम रिटर्न और शेयर बाजार की मंदी अपनी बचत को सुरक्षित रखने की कोशिश कर रहे लोगों को भी निराशा हाथ लग रही है। वर्तमान में सरकारी (PSU) और निजी बैंक एक साल की फिक्स्ड डिपॉजिट (FD) पर 6.10 प्रतिशत से 6.50 प्रतिशत तक की ब्याज दरें दे रहे हैं। लेकिन इस बचत का वास्तविक लाभ महंगाई की दर पर निर्भर करता है। यदि हम अगस्त की 4.82 प्रतिशत की मुद्रास्फीति दर को 6.50 प्रतिशत की अधिकतम FD दर से घटाएं, तो बचत पर वास्तविक रिटर्न (रियल रिटर्न) केवल 1.68 प्रतिशत रह जाता है। इस ब्याज आय पर लागू होने वाले टीडीएस (TDS) के बाद लोगों की क्रय शक्ति में और भी अधिक गिरावट आ जाती है। दूसरी ओर, शेयर बाजार भी निवेशकों को राहत देने में विफल रहा है। सेन्सेक्स इस साल अब तक 13.3 प्रतिशत और सालाना आधार पर लगभग 9 प्रतिशत गिर चुका है। दिसंबर 2025 में दर्ज किए गए अपने सर्वकालिक उच्च स्तर 86,159.02 से इसमें 14.23 प्रतिशत की बड़ी गिरावट आ चुकी है। निफ्टी की कहानी भी अलग नहीं है। 50 शेयरों वाला यह सूचकांक इस साल अब तक 11.50 प्रतिशत, सालाना आधार पर 7 प्रतिशत और अपने 26,373.20 के शिखर से 12.3 प्रतिशत टूट चुका है। बाजार में इस मंदी के कारण वैश्विक रैंकिंग में भारतीय शेयर बाजार चौथे स्थान से फिसलकर सातवें स्थान पर पहुंच गया है, और ताइवान (पांचवें) तथा दक्षिण कोरिया (छठे) स्थान पर आ गए हैं। इस गिरावट की एक बड़ी वजह विदेशी संस्थागत निवेशकों (FII) द्वारा लगातार की जा रही बिकवाली है। FII ने 2024 और 2025 दोनों वर्षों में 3 लाख करोड़ रुपये से अधिक की शुद्ध बिकवाली की, और 2026 के शुरुआती नौ महीनों में ही यह निकासी रिकॉर्ड 373,891 करोड़ रुपये पर पहुंच गई। सस्ते आवास का संकट और बढ़ता ईएमआई का बोझ मध्यम और निम्न आय वर्ग के लोगों के लिए अपने घर का सपना देखना भी अब आसान नहीं रह गया है। मुंबई और दिल्ली-एनसीआर (Delhi-NCR) जैसे प्रमुख शहरों में किफायती घर अब पहुंच से बाहर होते जा रहे हैं। नाइट फ्रैंक के एफोर्डेबिलिटी इंडेक्स (Affordability Index) के अनुसार, 2026 की पहली छमाही में देश के आठ प्रमुख शहरों में से केवल छह ही घर खरीदने की सुलभ सीमा (EMI-to-income ratio 50 प्रतिशत से कम) में रहे। मुंबई में यह अनुपात 69 प्रतिशत और दिल्ली-एनसीआर में 67 प्रतिशत दर्ज किया गया, जो वहनीयता की सीमा से बहुत ऊपर है। आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों (EWS) के लिए यह संकट और भी गहरा है। नाइट फ्रैंक के 2025 के आंकड़ों के अनुसार, EWS श्रेणी के परिवारों के लिए ईएमआई-टू-इनकम (EMI-to-income) अनुपात साल 2020 के 43 प्रतिशत से बढ़कर 2025 में 60 प्रतिशत हो गया। मध्यम आय वाले परिवारों के लिए भी यह अनुपात 28 प्रतिशत से बढ़कर 40 प्रतिशत पर पहुंच गया। इसके अतिरिक्त, सस्ते घरों की आपूर्ति भी तेजी से घट रही है। देश के शीर्ष आठ शहरों में नए लॉन्च होने वाले घरों में किफायती आवास की हिस्सेदारी 2018 के 52.4 प्रतिशत से गिरकर 2025 में सिर्फ 17 प्रतिशत रह गई है। इससे साफ है कि गरीब परिवारों की आय का एक बड़ा हिस्सा होम लोन चुकाने में जा रहा है। रोजगार की धीमी रफ्तार और आईटी क्षेत्र में छंटनी का दौर रोजगार के मोर्चे पर भी चुनौतियां बनी हुई हैं। यद्यपि देश की बेरोजगारी दर अगस्त में मामूली रूप से गिरकर 5 प्रतिशत पर आ गई (जो जुलाई में 5.1 प्रतिशत थी), लेकिन यह गिरावट मुख्य रूप से ग्रामीण इलाकों तक सीमित थी, जहां बेरोजगारी दर 4.5 प्रतिशत से घटकर 4.1 प्रतिशत (दिसंबर के बाद का न्यूनतम स्तर) रह गई। इसके विपरीत, शहरी बेरोजगारी दर 6.7 प्रतिशत से बढ़कर 6.8 प्रतिशत हो गई। रोजगार दर में भी मामूली सुधार हुआ है, जो पिछले साल अगस्त के 52.2 प्रतिशत से बढ़कर इस साल 52.8 प्रतिशत हो गई है। वहीं, श्रम बल भागीदारी दर भी 55.4 प्रतिशत से बढ़कर केवल 55.6 प्रतिशत तक ही पहुंच सकी है। अगस्त 2026 में निजी क्षेत्र की भर्तियों में 5 प्रतिशत की वृद्धि जरूर हुई, जिसने पिछले पांच महीनों की गिरावट के सिलसिले को तोड़ा, लेकिन यह अभी भी फरवरी के अपने उच्चतम स्तर से काफी नीचे है। सूचना प्रौद्योगिकी (IT) क्षेत्र में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के बढ़ते उपयोग और कंपनियों के खर्चों में कटौती के कारण नए युवाओं के लिए नौकरियां काफी कम हुई हैं। ट्रूअप (TrueUp) ट्रैकर के अनुसार, साल 2026 में अब तक 622 तकनीकी कंपनियों ने 190,058 लोगों को नौकरी से निकाला है, जो रोजाना औसतन 709 लोगों की छंटनी के बराबर है। इसके ऊपर, भारत में व्यक्तिगत आयकर की अधिकतम दर 39 प्रतिशत है। यह दर सिंगापुर की 24 प्रतिशत, इंडोनेशिया की 35 प्रतिशत, बांग्लादेश की 30 प्रतिशत और यहां तक कि अमेरिका की संघीय दर 37 प्रतिशत से भी अधिक है। यह उच्च कर ढांचा नौकरीपेशा वर्ग के हाथों में खर्च करने योग्य आय को और कम कर देता है। इसका आप पर असर बढ़ती महंगाई और आवास की कमी के कारण देश के आम मध्यमवर्गीय परिवारों को तत्काल अपनी वित्तीय प्राथमिकताओं को फिर से व्यवस्थित करना होगा। • रसोई का बजट: सब्जियों और बुनियादी खाद्य वस्तुओं की खुदरा कीमतों में भारी वृद्धि होने से आपके मासिक रसोई खर्च में सीधे तौर पर बढ़ोतरी होगी। उपभोक्ताओं को अपनी दैनिक आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए पहले से अधिक पैसे खर्च करने पड़ेंगे। • बचत में कमी: बैंक फिक्स्ड डिपॉजिट (FD) पर मिलने वाला वास्तविक रिटर्न केवल 1.68 प्रतिशत है, जो टीडीएस (TDS) कटौती के बाद और कम हो जाएगा। बचतकर्ताओं को अपनी पूंजी सुरक्षित रखने और महंगाई से निपटने के लिए पारंपरिक साधनों से आगे सोचना होगा। • महंगा आशियाना: मुंबई और दिल्ली-एनसीआर जैसे बड़े शहरों में होम लोन की ईएमआई (EMI) आपकी आय का 67% से 69% हिस्सा खा सकती है। इसका मतलब है कि घर खरीदने वाले परिवारों के पास अन्य घरेलू खर्चों और बच्चों की शिक्षा के लिए बहुत कम बजट बचेगा। • तकनीकी रोजगार: आईटी क्षेत्र में हो रही छंटनी और एआई (AI) के बढ़ते असर के कारण नई नौकरियों की तलाश कर रहे युवाओं को चुनौतियों का सामना करना पड़ेगा। युवाओं को बाजार में टिकने के लिए लगातार अपने तकनीकी कौशल को बेहतर करते रहना होगा। ऐसा क्यों हुआ यह आर्थिक संकट मजबूत आधिकारिक विकास दरों और वास्तविक आर्थिक गतिविधियों के बीच बढ़ते संरचनात्मक असंतुलन की वजह से उत्पन्न हुआ है। • आंकड़ों का विरोधाभास: देश की 7.8 प्रतिशत की आर्थिक विकास दर निजी निवेश और विदेशी पूंजी प्रवाह में देखी जा रही मंदी से मेल नहीं खा रही है। इसके कारण नीति विश्लेषकों का मानना है कि बुनियादी आर्थिक गतिविधियों में असंतुलन बना हुआ है। • आपूर्ति श्रृंखला में बाधा: घरेलू स्तर पर चीनी और आवश्यक सब्जियों की कमी के कारण थोक और खुदरा मूल्य दरों में भारी अंतर आया है। सरकार को मांग पूरी करने के लिए निर्यात बंद कर विदेश से आयात का सहारा लेना पड़ रहा है। • पूंजी की निकासी: अंतरराष्ट्रीय बाजार में उतार-चढ़ाव और घरेलू परिसंपत्तियों के महंगे मूल्यांकन के चलते विदेशी संस्थागत निवेशकों (FII) ने भारी बिकवाली की है। इसकी वजह से भारतीय शेयर बाजार की वैश्विक स्थिति को नुकसान पहुंचा है। • सस्ते घरों की घटती हिस्सेदारी: रियल्टी डेवलपर्स द्वारा बड़े और महंगे प्रोजेक्ट्स को प्राथमिकता देने के कारण बाजार में सस्ते आवास की हिस्सेदारी 52.4% से गिरकर 17% रह गई है। इसके परिणामस्वरूप निम्न-आय वर्ग के लोग कर्ज के जाल में फंस रहे हैं। सवाल-जवाब 1. भारत की जीडीपी विकास दर कितनी है और इसे लेकर क्या विवाद है? आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार भारत की जीडीपी वृद्धि दर 7.8 प्रतिशत है। हालांकि, पूर्व वित्त सचिव सुभाष चंद्र गर्ग इसे सांख्यिकीय रूप से अर्थहीन बताते हुए 2.6 प्रतिशत मानते हैं, वहीं रघुराम राजन भी कमजोर कॉरपोरेट निवेश के बीच इतनी उच्च विकास दर पर सवाल उठा चुके हैं। 2. भारत की प्रति व्यक्ति आय की तुलना अन्य विकासशील देशों से कैसी है? भारत की प्रति व्यक्ति आय लगभग 2,813 डॉलर (738.41 रुपये प्रतिदिन) है। यह सिंगापुर ($107,758) और इंडोनेशिया ($5,362) से काफी कम है। यहां तक कि कम जीडीपी विकास दर वाले बांग्लादेश की प्रति व्यक्ति आय भी 2,911 डॉलर है, जो भारत से अधिक है। 3. चीनी की कीमतों में भारी उछाल का क्या कारण था? कम आपूर्ति और उत्पादन में कमी के कारण थोक स्तर पर चीनी के दामों में 80 प्रतिशत से अधिक की वृद्धि दर्ज की गई। खुदरा बाजारों में इसके दाम 70 रुपये प्रति किलोग्राम तक पहुंच गए, जिसके बाद सरकार को चीनी निर्यात बंद कर विदेश से आयात शुरू करना पड़ा। 4. फिक्स्ड डिपॉजिट पर वास्तविक रिटर्न नकारात्मक स्तर के करीब क्यों पहुंच गया है? बैंकों द्वारा एक साल की एफडी (FD) पर अधिकतम 6.50 प्रतिशत ब्याज दिया जा रहा है। जब इसमें से अगस्त की 4.82 प्रतिशत महंगाई दर को घटाया जाता है, तो वास्तविक रिटर्न केवल 1.68 प्रतिशत बचता है। टीडीएस (TDS) कटौती के बाद यह और भी कम हो जाता है। 5. किफायती आवास क्षेत्र में क्या बड़े बदलाव देखे गए हैं? शीर्ष 8 शहरों में सस्ते घरों की हिस्सेदारी साल 2018 के 52.4 प्रतिशत से गिरकर 2025 में केवल 17 प्रतिशत रह गई है। इसके चलते मुंबई और दिल्ली-एनसीआर जैसे बड़े शहरों में होम लोन की ईएमआई-टू-इनकम अनुपात बढ़कर 67-69 प्रतिशत तक पहुंच गया है। 6. भारतीय आईटी (IT) क्षेत्र में नौकरियों पर क्या प्रभाव पड़ा है? आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के बढ़ते उपयोग और खर्चों में कटौती के कारण तकनीकी क्षेत्र में भारी दबाव है। साल 2026 में अब तक 622 तकनीकी कंपनियों ने कुल 190,058 कर्मचारियों की छंटनी की है, जो प्रतिदिन औसतन 709 लोगों के बराबर है। 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