बेगूसराय की सुधा देवी ने खाली सीमेंट बोरियों से खड़ा किया झोला कारोबार, यूट्यूब देखकर बदली किस्मत बिहार के बेगूसराय की रहने वाली सुधा देवी ने सोशल मीडिया से प्रेरणा लेकर खाली सीमेंट की बोरियों से टिकाऊ झोले बनाने का काम शुरू किया और आज वह हर दिन 2,000 रुपये तक कमा रही हैं। डिजिटल तकनीक और सस्ते इंटरनेट की पहुंच ने ग्रामीण भारत में स्वरोजगार के नए रास्ते खोल दिए हैं। स्मार्टफोन पर सामान्य वीडियो देखने के दौरान मिले एक साधारण विचार को वास्तविक कारोबार में बदलकर बिहार के बेगूसराय की एक महिला ने आत्मनिर्भरता की मिसाल पेश की है। घर की चारदीवारी से शुरू हुआ यह छोटा सा काम आज न केवल उनके परिवार को आर्थिक सुरक्षा दे रहा है, बल्कि आसपास की अन्य महिलाओं के लिए भी आमदनी का जरिया बन चुका है। यूट्यूब से मिला व्यवसाय शुरू करने का विचार गंगा किनारे बसे तेघरा प्रखंड की फुलवरिया पंचायत-02, वार्ड 20 नगर परिषद बरौनी की निवासी सुधा देवी सामान्य दिनों की तरह अपने मोबाइल फोन पर यूट्यूब वीडियो देख रही थीं। उसी दौरान उनकी नजर कम लागत में झोला बनाने के एक लघु उद्योग पर पड़ी। उस वीडियो में बताया गया था कि महज 20,000 से 30,000 रुपये की शुरुआती पूंजी लगाकर रोजाना हजारों रुपये कमाए जा सकते हैं। इस विचार ने उन्हें बेहद प्रभावित किया और उन्होंने इसे जमीन पर उतारने का फैसला कर लिया। स्वयं सहायता समूह से कर्ज और काम का विस्तार पूंजी जुटाने के लिए सुधा देवी ने नीतिश्री समूह का रुख किया और वहां से 30,000 रुपये का ऋण प्राप्त किया। इस राशि से उन्होंने सबसे पहले एक सिलाई मशीन खरीदी और उत्पादन शुरू किया। जब काम की रफ्तार बढ़ी और मांग आने लगी, तब उन्होंने एक और सिलाई मशीन अपने सेटअप में जोड़ ली। काम का बोझ साझा करने और गांव की दूसरी महिला की मदद करने के उद्देश्य से उन्होंने पड़ोस की एक महिला को 150 रुपये दैनिक मजदूरी पर अपने साथ काम पर रख लिया। इस पूरे सफर में कम्युनिटी मैनेजर ममता कुमारी और बीपीएम बिरजू कुमार ने भी समय-समय पर उनका मार्गदर्शन और सहयोग किया। कच्चे माल की आपूर्ति और उत्पादन लागत का गणित झोले तैयार करने के लिए सुधा देवी झारखंड के टाटा शहर से खाली सीमेंट की बोरियां मंगवाती हैं। वह हर महीने लगभग 50,000 रुपये की खाली बोरियां खरीदती हैं। एक खाली बोरी की लागत उन्हें करीब 4 रुपये पड़ती है। इसके बाद सिलाई और धागे आदि पर 1 से 2 रुपये का अतिरिक्त खर्च आता है। इस तरह एक मजबूत झोला तैयार करने में कुल लागत लगभग 5 रुपये बैठती है। बाजार में इन झोलों की मांग काफी अच्छी है, जहां खुदरा बाजार में एक झोला 10 से 15 रुपये में बिकता है। बिजली की उपलब्धता पर टिकी है दैनिक कमाई सुधा देवी का दैनिक उत्पादन काफी हद तक बिजली की नियमित आपूर्ति पर निर्भर करता है। दिनभर बिजली सुचारू रहने की स्थिति में वह घर बैठे प्रतिदिन करीब 400 झोले तैयार कर लेती हैं, जिससे उनकी दैनिक कमाई 2,000 रुपये तक पहुंच जाती है। बिजली कटौती की स्थिति में भी वह रोजाना 1,000 से 1,500 रुपये आसानी से कमा लेती हैं। माल बेचने के लिए उन्हें बाजार के चक्कर नहीं काटने पड़ते, बल्कि थोक व्यापारी सीधे उनके घर आकर तैयार झोले थोक भाव में खरीद ले जाते हैं। इसका आप पर असर यह समाचार दिखाता है कि मामूली पूंजी और डिजिटल जानकारी की मदद से ग्रामीण क्षेत्रों में घर बैठे सम्मानजनक रोजगार शुरू किया जा सकता है। • भारत में: डिजिटल साक्षरता और स्वयं सहायता समूहों के आसान ऋण से छोटे शहरों और गांवों में गृहिणियां स्वतंत्र व्यवसाय शुरू कर सकती हैं। यह मॉडल दिखाता है कि कचरा प्रबंधन और पुनर्चक्रण आधारित उत्पाद ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती दे सकते हैं। • बिहार में: बेगूसराय और आसपास के क्षेत्रों में खाली सीमेंट बोरियों जैसे औद्योगिक कचरे का सदुपयोग कर स्थानीय स्तर पर रोजगार सृजित हो रहे हैं। इससे महिलाओं को पलायन किए बिना अपने ही घर में 30,000 से 60,000 रुपये मासिक आमदनी का अवसर मिलता है। • कारीगरों और कामगारों के लिए: पड़ोस की महिलाओं को दैनिक आधार पर 150 रुपये का काम मिलना अतिरिक्त पारिवारिक आय का जरिया बनता है। सिलाई जैसे बुनियादी हुनर के बल पर स्थानीय स्तर पर दिहाड़ी कामगार नियमित रोजगार पा रहे हैं। • खुदरा व्यापारियों के लिए: थोक व्यापारियों को टिकाऊ और सस्ते बोरों के झोले स्थानीय स्तर पर मिल जाते हैं, जिससे प्लास्टिक बैन के दौर में सस्ता विकल्प उपलब्ध होता है। 5 रुपये की लागत वाले बैग 10 से 15 रुपये में बिकने से पूरी आपूर्ति श्रृंखला में अच्छा मार्जिन मिलता है। ऐसा क्यों हुआ इंटरनेट की सुलभता, स्वयं सहायता समूहों के जरिए वित्तीय सहायता और औद्योगिक उप-उत्पादों के पुनर्चक्रण ने इस लघु उद्यम को संभव बनाया। • डिजिटल ज्ञान की पहुंच: सस्ते 4जी और 5जी डेटा के विस्तार से ग्रामीण नागरिकों तक विभिन्न व्यापारिक मॉडल और निर्माण प्रक्रियाओं की व्यावहारिक जानकारी यूट्यूब जैसे मंचों के जरिए आसानी से पहुंच रही है। इसी डिजिटल माध्यम से सुधा देवी को बेहद कम पूंजी में झोला बनाने का सटीक आइडिया मिला। • माइक्रोफाइनेंस का सहयोग: नीतिश्री स्वयं सहायता समूह से 30,000 रुपये का आसान ऋण मिलने के कारण सुधा देवी मशीनरी और आरंभिक सामग्री जुटा सकीं। इस वित्तीय व्यवस्था के बिना ग्रामीण महिलाओं के लिए तुरंत पूंजी की व्यवस्था करना कठिन होता है। • कच्चे माल की उपलब्धता: झारखंड के टाटा जैसे औद्योगिक क्षेत्रों से सीमेंट की खाली बोरियां नाममात्र कीमत (4 रुपये) पर मिल जाती हैं। इस मजबूत सामग्री का पुनर्चक्रण करके उपयोगी झोले तैयार करना लागत के लिहाज से बेहद किफायती साबित हुआ। • स्थानीय थोक नेटवर्क की मांग: प्लास्टिक की थैलियों पर पाबंदी और टिकाऊ विकल्पों की आवश्यकता के चलते थोक विक्रेताओं को ऐसे बोरों के झोलों की निरंतर जरूरत रहती है। थोक व्यापारियों द्वारा सीधे घर आकर खरीदारी करने से विपणन और परिवहन का खर्च भी समाप्त हो गया। सवाल-जवाब 1. सुधा देवी कहां की रहने वाली हैं? सुधा देवी बिहार के बेगूसराय जिले के तेघरा प्रखंड अंतर्गत फुलवरिया पंचायत-02, वार्ड 20 नगर परिषद बरौनी की निवासी हैं। 2. उन्हें झोला बनाने का विचार कहां से मिला? उन्हें अपने मोबाइल पर यूट्यूब वीडियो स्क्रोल करते समय कम लागत में झोला निर्माण के काम का आइडिया मिला था। 3. कारोबार शुरू करने के लिए उन्होंने कितना कर्ज लिया था? उन्होंने नीतिश्री स्वयं सहायता समूह से 30,000 रुपये का ऋण लेकर पहली सिलाई मशीन खरीदी थी। 4. झोले बनाने के लिए कच्चा माल कहां से आता है और उसकी लागत क्या है? वह झारखंड के टाटा शहर से खाली सीमेंट की बोरियां लाती हैं, जिसकी एक बोरी की कीमत लगभग 4 रुपये पड़ती है। 5. एक झोला तैयार करने में कुल कितना खर्च आता है? बोरी की कीमत और 1 से 2 रुपये सिलाई खर्च मिलाकर एक झोला तैयार करने में करीब 5 रुपये का खर्च आता है। 6. सुधा देवी प्रतिदिन कितने झोले बना लेती हैं और उनकी दैनिक कमाई कितनी है? पूरी बिजली रहने पर वह प्रतिदिन लगभग 400 झोले तैयार कर 2,000 रुपये तक कमा लेती हैं, जबकि बिजली बाधित होने पर 1,000 से 1,500 रुपये की कमाई होती है। 7. बाजार में इन झोलों की खुदरा कीमत क्या है? बाजार में एक झोले की खुदरा कीमत 10 से 15 रुपये के बीच है और थोक व्यापारी सीधे उनके घर आकर माल खरीदते हैं। प्रेरणा और सबक सुधा देवी का सफर यह साबित करता है कि सीमित संसाधनों और घरेलू जिम्मेदारियों के बीच भी दृढ़ संकल्प और नई सोच से बड़ी कामयाबी हासिल की जा सकती है। • डिजिटल समय का उत्पादक उपयोग: सोशल मीडिया का इस्तेमाल सिर्फ मनोरंजन के लिए करने के बजाय उससे नई व्यावसायिक संभावनाएं और हुनर सीखे जा सकते हैं। सुधा देवी ने सामान्य वीडियो को वास्तविक आमदनी के माध्यम में बदल दिया। • छोटे से शुरुआत करना: बड़े बजट का इंतजार करने के बजाय उपलब्ध संसाधनों और 30,000 रुपये जैसे छोटे कर्ज से काम शुरू करना बुद्धिमानी है। काम जमने पर ही नए निवेश और विस्तार की योजना बनानी चाहिए। • वेस्ट को वेल्थ में बदलना: खाली पड़ी सीमेंट की बोरियों को नए और उपयोगी उत्पाद में बदलकर पर्यावरण और व्यवसाय दोनों का लाभ लिया जा सकता है। उपयोग की जा चुकी वस्तुओं से नया मूल्य तैयार करना हमेशा एक टिकाऊ बिजनेस मॉडल होता है। • दूसरों को साथ लेकर आगे बढ़ना: जैसे ही काम बढ़ा, उन्होंने अपने आसपास की जरूरतमंद महिला को रोजगार दिया। अपनी तरक्की के साथ समाज के अन्य लोगों को जोड़ना ही सच्चे उद्यमी की पहचान है। https://trendkia.com/money/begusarai-ki-sudha-devi-ne-khali-simenta-boriyon-se-khara-kiya-jhola-karobara-youtube-dekhakara-badali-kismata-49606 TrendKia — Har trend, sabse pehle.