# बेगूसराय के गोविंद कुमार ने छत पर 2 हजार रुपये से शुरू किया पोल्ट्री फार्म, अब हर 5 महीने में लाखों की कमाई

> क्रिकेट और नौकरी की तलाश छोड़कर बेगूसराय के गोविंद कुमार ने कड़कनाथ और सोनाली नस्ल के मुर्गों का पालन शुरू किया, जिससे अब वे हर लॉट में लाखों रुपये का मुनाफा कमा रहे हैं।

**Type:** article · **Category:** मनी · **Published:** 2026-10-29 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/money/begusarai-men-govind-kumar-ne-chhata-para-2-hajara-rupaye-se-shuru-kiya-poltri-pharma-aba-hara-5-mahine-men-lakhon-ki-kamai-52833 · **Language:** Hindi
**Tags:** गोविंद कुमार, बेगूसराय, कड़कनाथ मुर्गा, सोनाली मुर्गा, पोल्ट्री फार्मिंग, बिहार स्वरोजगार, जीविका

बिहार में स्वरोजगार को लेकर युवाओं की सोच तेजी से बदल रही है। तकनीकी शिक्षा हासिल करने के बाद पारंपरिक नौकरियों के पीछे भागने के बजाय युवा अब कृषि और पशुपालन से जुड़े व्यवसायों को प्राथमिकता देने लगे हैं। बेगूसराय जिले के गढ़हारा रेल यार्ड इलाके के रहने वाले गोविंद कुमार ने इस बदलाव को जमीन पर उतारा है। निजी संस्थान से आईटीआई की पढ़ाई पूरी करने के बाद जब उन्हें नौकरी नहीं मिली, तो उन्होंने अपने पैतृक गांव लौटकर मुर्गा पालन की नींव रखी और आज वे क्षेत्र में एक सफल उद्यमी के तौर पर पहचान बना चुके हैं।

## क्रिकेट के मैदान से तकनीकी शिक्षा तक का सफर
गोविंद कुमार की शुरुआती रुचि खेलों में थी और वे पेशेवर क्रिकेटर बनना चाहते थे। खेल के हुनर को निखारने के लिए वे कोलकाता गए और वहां रहकर कड़ा अभ्यास किया। जिला स्तर पर क्रिकेट खेलने के उपरांत उन्होंने खेल जगत से दूरी बना ली। इसके बाद उन्होंने अपनी औपचारिक शिक्षा पर ध्यान केंद्रित किया और बेगूसराय के ही एक निजी संस्थान से आईटीआई का पाठ्यक्रम पूरा किया। तकनीकी डिग्री हासिल करने के बाद वे आजीविका की तलाश में पश्चिम बंगाल के सिलीगुड़ी पहुंचे।

## छत से शुरू हुआ कड़कनाथ और सोनाली का कारोबार
सिलीगुड़ी में गोविंद को मनमाफिक काम तो नहीं मिला, लेकिन वहीं रहते हुए उन्हें पोल्ट्री फार्मिंग के व्यावसायिक अवसरों की जानकारी मिली। इस विचार को अमल में लाने के लिए वे अपने गांव लौट आए। साल 2020 में उन्होंने महज 2 हजार रुपये की पूंजी लगाकर 20 कड़कनाथ और 20 सोनाली नस्ल के चूजे खरीदे। शुरुआत में किसी बड़े बुनियादी ढांचे के बिना उन्होंने अपने घर की छत पर ही इन मुर्गों को पालना शुरू कर दिया।

## पोषण रणनीति और लॉट चक्र से मुनाफा
मुर्गा पालन को सफल बनाने में गोविंद की मां उनका पूरा साथ देती हैं और दोनों दिनभर फार्म के कार्यों की देखभाल करते हैं। मुर्गों के स्वास्थ्य और वजन को बनाए रखने के लिए वे मक्के के दाने के साथ-साथ हरे चारे का विशेष रूप से उपयोग करते हैं। हरे चारे के नियमित सेवन से मुर्गों की रोग प्रतिरोधक क्षमता बेहतर रहती है, जिससे बाजार में उनकी गुणवत्ता और बिक्री दर दोनों अच्छी मिलती है।

गोविंद का व्यावसायिक चक्र 5 महीने का एक लॉट होता है। प्रत्येक लॉट में वे 3 हजार से 5 हजार सोनाली और कड़कनाथ मुर्गों को तैयार करते हैं। एक लॉट को तैयार करने में लगभग डेढ़ लाख रुपये का खर्च आता है, जबकि बाजार में इसकी कुल बिक्री करीब 4 लाख रुपये तक हो जाती है। जब भी कारोबार के विस्तार या आकस्मिक खर्चों के लिए पूंजी की आवश्यकता होती है, तो उनकी मां जीविका समूह से वित्तीय सहायता प्राप्त कर व्यवसाय को सहारा देती हैं।

## इसका आप पर असर
तकनीकी डिग्री के बाद छोटे स्तर पर पोल्ट्री व्यवसाय शुरू कर ग्रामीण क्षेत्रों में स्थिर आय अर्जित की जा सकती है।

- **भारत में:** स्वरोजगार की तलाश कर रहे युवा कम पूंजी में कड़कनाथ और सोनाली जैसी मांग वाली नस्लों से घरेलू स्तर पर फार्मिंग शुरू कर सकते हैं। स्थानीय मांग और उचित पोषण से पशुपालन में स्थिर आय प्राप्त की जा सकती है।
- **बिहार में:** राज्य के ग्रामीण युवा जीविका जैसे स्वयं सहायता समूहों की वित्तीय मदद लेकर अपने सूक्ष्म उद्यमों की पूंजी जरूरतें पूरी कर सकते हैं। इससे बड़े शहरों की ओर पलायन कम करने और स्थानीय स्तर पर काम खड़े करने में मदद मिलती है।
- **किसानों और पशुपालकों के लिए:** चारे में मक्के के साथ हरा चारा जोड़ने से मुर्गों की रोग प्रतिरोधक क्षमता मजबूत होती है। बेहतर स्वास्थ्य और वजन के चलते बाजार में तैयार मुर्गों का उचित और अधिक भाव मिलता है।
- **पूंजी प्रबंधन पर:** 5 महीने के चक्र में डेढ़ लाख रुपये की लागत पर 4 लाख रुपये तक का बाजार मूल्य प्राप्त किया जा सकता है। यह योजनाबद्ध निवेश छोटे निवेशकों को जोखिम घटाकर मुनाफा कमाने का मौका देती है।

## ऐसा क्यों हुआ
पारंपरिक नौकरी की कमी और छोटे स्तर पर कृषि आधारित उद्यमों की संभावनाओं के कारण यह व्यवसाय अस्तित्व में आया।

- **रोजगार के अवसरों का अभाव:** आईटीआई की पढ़ाई पूरी करने के बाद सिलीगुड़ी में काम नहीं मिलने से गांव लौटकर स्वरोजगार शुरू करने की जमीन तैयार हुई। तकनीकी डिग्री के बावजूद उपयुक्त नौकरी न मिलना एक मुख्य वजह बना।
- **मांग वाली नस्लों का चयन:** बाजार में कड़कनाथ और सोनाली नस्लों की विशिष्ट मांग और बेहतर मूल्य मिलने के कारण 2 हजार रुपये से परीक्षण शुरू किया गया। शुरुआत में छत का उपयोग कर बुनियादी ढांचे का खर्च न्यूनतम रखा गया।
- **पारिवारिक और संस्थागत समर्थन:** व्यवसाय संचालन में मां की निरंतर भागीदारी और जीविका के माध्यम से कार्यशील पूंजी का मिलना इस मॉडल को आगे बढ़ाने में सहायक रहा। इससे नकदी की कमी के चलते काम रुकने की समस्या दूर हुई।

## सवाल-जवाब

### 1. गोविंद कुमार ने मुर्गा पालन की शुरुआत किस साल और कितनी पूंजी से की थी?
गोविंद कुमार ने साल 2020 में 2 हजार रुपये की पूंजी से अपने घर की छत पर मुर्गा पालन की शुरुआत की थी।

### 2. शुरुआत में उन्होंने कौन सी नस्ल के कितने चूजे खरीदे थे?
उन्होंने शुरुआत में 20 कड़कनाथ और 20 सोनाली नस्ल के चूजे खरीदे थे।

### 3. एक लॉट तैयार होने में कितना समय लगता है और उसमें कितने मुर्गे होते हैं?
एक लॉट तैयार होने में 5 महीने का समय लगता है, जिसमें 3 हजार से 5 हजार कड़कनाथ और सोनाली मुर्गे पाले जाते हैं।

### 4. एक लॉट पर कुल लागत और बाजार से मिलने वाला मूल्य कितना है?
एक लॉट पर लगभग डेढ़ लाख रुपये का खर्च आता है, जबकि बाजार मूल्य करीब 4 लाख रुपये तक मिल जाता है।

### 5. मुर्गों के पोषण के लिए वे किस प्रकार के चारे का उपयोग करते हैं?
वे मुर्गों को मक्के का दाना और हरा चारा देते हैं, जिससे मुर्गों की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है।

### 6. कारोबार के लिए अतिरिक्त पूंजी की जरूरत पड़ने पर सहायता कहां से मिलती है?
पूंजी की आवश्यकता पड़ने पर उनकी मां जीविका समूह से वित्तीय मदद लेती हैं।

## प्रेरणा और सबक
गोविंद कुमार का सफर दिखाता है कि सीमित पूंजी और शून्य अनुभव के बावजूद लगन से बड़ा काम खड़ा किया जा सकता है।

- **कम पूंजी से शुरुआत:** बड़े सेटअप का इंतजार करने के बजाय 2 हजार रुपये और घर की छत से काम शुरू कर धीरे-धीरे विस्तार किया जा सकता है। संसाधन सीमित होने पर भी पहला कदम उठाना सबसे महत्वपूर्ण होता है।
- **असफलता को मोड़ बनाना:** खेल और नौकरी में मनचाही राह न मिलने पर निराश होने के बजाय नए विचार को स्वीकार करना चाहिए। सिलीगुड़ी के अनुभव से प्रेरणा लेकर उन्होंने अपने गांव में नया रास्ता चुना।
- **गुणवत्ता और पोषण पर जोर:** चारे में हरा चारा शामिल करने जैसी छोटी रणनीतियों से मुर्गों की सेहत सुधरती है और उत्पाद का मूल्य बढ़ता है। गुणवत्ता पर ध्यान देने से ही बाजार में लगातार अच्छी कीमत मिलती है।
- **सामूहिक सहयोग का महत्व:** परिवार का साझा श्रम और जीविका जैसे स्थानीय नेटवर्क की वित्तीय मदद किसी भी छोटे उद्यम को सुरक्षित रखती है। कठिनाई के समय सही तंत्र का सहारा लेना मजबूती देता है।

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