भारत में बच्चों के खिलाफ अपराधों में उछाल, एक वर्ष में दर्ज हुए 1.87 लाख से अधिक मामले राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के 2024 के आंकड़ों के अनुसार भारत में बच्चों के खिलाफ अपराध 5.9 प्रतिशत बढ़कर 1,87,702 तक पहुंच गए हैं, जिनमें अपहरण और यौन अपराध सबसे आगे हैं। भारत में नाबालिगों की सुरक्षा को लेकर आधिकारिक आंकड़े एक बेहद चिंताजनक स्थिति सामने रख रहे हैं। देश भर में वर्ष 2024 के दौरान बच्चों के खिलाफ कुल 1,87,702 आपराधिक मामले दर्ज किए गए। यह आंकड़ा वर्ष 2023 के 1,77,335 मामलों के मुकाबले 5.9 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्शाता है। अपराध दर के पैमाने पर देखें तो प्रति एक लाख बच्चों पर दर्ज अपराधों की संख्या 39.9 से बढ़कर 42.3 मामलों तक पहुंच चुकी है। ये आंकड़े स्पष्ट संकेत देते हैं कि सुरक्षा तंत्र के तमाम दावों के बावजूद नाबालिगों के प्रति हिंसा और शोषण के मामलों का दायरा लगातार फैल रहा है। अपहरण और पोक्सो अधिनियम के तहत सर्वाधिक मामले कुल दर्ज शिकायतों के विश्लेषण से यह तथ्य उभरता है कि बच्चों के खिलाफ होने वाले अपराधों का तीन चौथाई से भी बड़ा हिस्सा केवल दो श्रेणियों से जुड़ा हुआ है। वर्ष 2024 में अपहरण और व्यपहरण के कुल 75,108 मामले दर्ज किए गए, जो बच्चों के खिलाफ हुए समस्त अपराधों का 40 प्रतिशत हिस्सा है। इसके ठीक बाद यौन अपराधों से बच्चों के संरक्षण यानी पोक्सो अधिनियम के अंतर्गत 69,191 मामले दर्ज हुए, जो कुल अपराधों की 36.9 प्रतिशत हिस्सेदारी रखते हैं। इन दोनों अपराध श्रेणियों को मिला दिया जाए तो यह साफ हो जाता है कि शारीरिक हिंसा, जबरन ले जाए जाने और गंभीर यौन शोषण का खतरा बच्चों के दैनिक जीवन में सबसे बड़ा बना हुआ है। लापता और अगवा बच्चों का जटिल चक्र अपहरण के आंकड़ों में एक और अत्यंत संवेदनशील पहलू शामिल है, जो पुलिस के रिकॉर्ड में दर्ज गुमशुदगी से जुड़ा है। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो की व्यवस्था में उन लापता बच्चों को भी व्यापक अपहरण श्रेणी के भीतर दर्ज माना जाता है जिन्हें अगवा किया गया मान लिया जाता है। पुलिस निपटान तालिकाओं के अनुसार इस विशिष्ट श्रेणी के तहत 43,743 मामले दर्ज किए गए। बच्चों का अचानक गायब हो जाना और फिर औपचारिक अपहरण के मामलों में तब्दील होना इस बात को रेखांकित करता है कि जमीनी स्तर पर खोजबीन और रोकथाम की व्यवस्था कितनी भारी चुनौतियों से जूझ रही है। डिजिटल दुनिया और अन्य कानूनों के तहत दर्ज अपराध अपराध की यह श्रृंखला केवल बाहरी दुनिया तक सीमित नहीं है, बल्कि इंटरनेट और डिजिटल स्पेस में भी तेजी से पैर पसार रही है। साइबर अपराध और सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम के तहत बच्चों से संबंधित यौन रूप से स्पष्ट सामग्री के प्रसारण या प्रकाशन के 881 मामले दर्ज किए गए। इसके अतिरिक्त बच्चों के खिलाफ 60 अन्य साइबर अपराध के मामले भी अलग से दर्ज किए गए। इसके साथ ही अन्य बाल संरक्षण कानूनों के आंकड़े भी जमीनी हकीकत बयां करते हैं। बाल श्रम निषेध एवं नियमन कानून के तहत वर्ष 2024 में 1,235 मामले सामने आए, जबकि बाल विवाह निषेध कानून के तहत 1,499 मामले आधिकारिक रूप से दर्ज हुए। जांच, अदालत और आंकड़ों की वास्तविक सीमाएं मामला दर्ज होना न्याय की लंबी प्रक्रिया की केवल पहली सीढ़ी होता है। पुलिस स्तर पर जांच, आरोप पत्र दाखिल होने और अदालतों में मुकदमों के अंतिम निपटारे की रफ्तार यह तय करती है कि पीड़ित बच्चों को वास्तविक न्याय कब मिलेगा। अदालतों में लंबित मामलों और पुलिस निपटान का भारी दबाव यह बताता है कि केवल सालाना पंजीकरण देख लेने से समस्या की पूरी गंभीरता उजागर नहीं होती। इसके अलावा यह ध्यान रखना भी जरूरी है कि ये आंकड़े केवल उन मामलों के हैं जो थानों तक पहुंचे और पुलिस ने जिन्हें विधिवत दर्ज किया। भारत में कड़े कानून मौजूद होने के बावजूद यह प्रश्न बना हुआ है कि कितने मामले पुलिस तक पहुंचे ही नहीं और बाल सुरक्षा के प्रभावी उपाय इन आंकड़ों को कब नीचे लाएंगे। इसका आप पर असर यह रिपोर्ट माता-पिता, अभिभावकों और नीति निर्माताओं के लिए बाल सुरक्षा और निगरानी व्यवस्था को तत्काल मजबूत करने की आवश्यकता को रेखांकित करती है। • अभिभावकों के लिए: बच्चों की सुरक्षा को लेकर परिवारों को उनके दैनिक आवागमन और डिजिटल गतिविधियों पर अतिरिक्त सावधानी बरतनी होगी। किसी भी अप्रिय घटना या लापता होने की स्थिति में बिना किसी देरी के तुरंत नजदीकी पुलिस थाने में शिकायत दर्ज करानी चाहिए। • नागरिक सुरक्षा: रिहायशी क्षेत्रों और स्कूलों के आसपास सुरक्षा निगरानी और पहचान तंत्र को चुस्त करने की जरूरत है। स्थानीय निगरानी समितियों और बाल कल्याण हेल्पलाइन 1098 का नियमित उपयोग नाबालिगों के खिलाफ होने वाले अपराधों की रोकथाम में मदद कर सकता है। • डिजिटल सतर्कता: बच्चों के इंटरनेट उपयोग और सोशल मीडिया गतिविधियों पर परिवार के सदस्यों को सख्त निजता नियम लागू करने चाहिए। आपत्तिजनक डिजिटल सामग्री या ऑनलाइन शोषण की सूचना तुरंत साइबर क्राइम पोर्टल पर दर्ज कराई जानी चाहिए। • प्रशासनिक जवाबदेही: पुलिस और न्याय व्यवस्था में बाल अपराधों की त्वरित जांच और त्वरित सुनवाई की मांग तेज हो सकती है। अदालतों में लंबित मुकदमों के जल्द निपटारे से ही दोषियों में कानून का डर पैदा किया जा सकता है। ऐसा क्यों हुआ यह बढ़ोतरी मुख्यतः पुलिस में दर्ज औपचारिक शिकायतों, डिजिटल अपराधों के विस्तार और लापता बच्चों को अनिवार्य रूप से अपहरण की श्रेणी में दर्ज करने की प्रशासनिक प्रक्रिया से जुड़ी है। • लापता मामलों का वर्गीकरण: पुलिस तालिकाओं में 43,743 मामलों में गुमशुदा बच्चों को अपहरण मानकर दर्ज किया गया। इस प्रशासनिक नियम के कारण अपहरण श्रेणी के कुल आंकड़ों में व्यापक उछाल दर्ज हुआ है। • यौन शोषण और कड़े कानूनों का प्रभाव: पोक्सो अधिनियम के अंतर्गत 69,191 मामले दर्ज किए गए। हालांकि बाल सुरक्षा कानूनों के तहत मामले दर्ज करने में तत्परता बढ़ी है, लेकिन सामाजिक रोकथाम और सुरक्षा तंत्र में कमी के कारण घटनाएं जारी हैं। • डिजिटल माध्यमों का प्रसार: इंटरनेट की सुलभता ने बाल शोषण से जुड़ी आपत्तिजनक सामग्री के प्रसार को आसान बना दिया है। साइबर अपराध और आईटी एक्ट के तहत 881 मामले सामने आए, जो तकनीक के अनियंत्रित उपयोग से उत्पन्न नए खतरे को दिखाते हैं। सवाल-जवाब 1. वर्ष 2024 में बच्चों के खिलाफ कुल कितने आपराधिक मामले दर्ज किए गए? वर्ष 2024 के दौरान भारत में बच्चों के खिलाफ कुल 1,87,702 मामले दर्ज किए गए, जो 2023 की तुलना में 5.9 प्रतिशत अधिक हैं। 2. बच्चों के प्रति अपराध दर में क्या बदलाव देखा गया? प्रति एक लाख बच्चों पर अपराध की दर वर्ष 2023 के 39.9 से बढ़कर वर्ष 2024 में 42.3 मामलों तक पहुंच गई। 3. बच्चों के खिलाफ सबसे ज्यादा मामले किन अपराध श्रेणियों में दर्ज हुए? अपहरण और व्यपहरण के 75,108 मामले (40%) और पोक्सो अधिनियम के तहत 69,191 मामले (36.9%) दर्ज किए गए। 4. लापता बच्चों से संबंधित कितने मामले अपहरण की श्रेणी में आए? पुलिस निपटान तालिकाओं के अनुसार 43,743 ऐसे मामले थे जहां लापता बच्चों को कानूनी तौर पर अपहरण श्रेणी में दर्ज माना गया। 5. डिजिटल और साइबर माध्यमों में बच्चों से जुड़े कितने अपराध दर्ज हुए? आईटी एक्ट के तहत बच्चों की आपत्तिजनक सामग्री के प्रसारण के 881 मामले और 60 अन्य साइबर अपराध दर्ज हुए। 6. बाल श्रम और बाल विवाह से संबंधित कितने मामले दर्ज किए गए? बाल श्रम कानून के तहत 1,235 मामले और बाल विवाह निषेध कानून के तहत 1,499 मामले दर्ज किए गए। https://trendkia.com/money/bharata-men-bachchon-ke-khilapha-aparadhon-men-uchhala-eka-varsha-men-darja-hue-1-87-lakha-se-adhika-mamale-40113 TrendKia — Har trend, sabse pehle.