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  "type": "article",
  "title": "चीन को हटाकर देखें तो ब्रिक्स की आर्थिक ताकत का सच बिल्कुल उल्टा नजर आता है",
  "summary": "सुरजीत भल्ला के आर्थिक विश्लेषण के अनुसार ब्रिक्स की वैश्विक आय और निर्यात में हुई बढ़त का अधिकांश हिस्सा सिर्फ चीन की बदौलत है, जबकि बाकी सदस्य काफी पीछे छूट रहे हैं।",
  "content": "दिल्ली के भारत मंडपम में हाल ही में 11 ब्रिक्स देशों के लगभग 28 नेताओं की दो दिवसीय बैठक संपन्न हुई, जिसमें द्विपक्षीय व्यापार बढ़ाने, व्यापारिक बाधाओं को दूर करने और आर्थिक संबंधों को सुदृढ़ करने पर गहन विचार-विमर्श हुआ। इस आर्थिक समूह के वैश्विक मंच पर विस्तार को अक्सर इस तथ्य के साथ सराहा जाता है कि ब्रिक्स देश विश्व की 40% जीडीपी और 50% आबादी का प्रतिनिधित्व करते हैं। वैश्विक सम्मेलनों के संयुक्त घोषणापत्रों में इस समूह को विश्व अर्थव्यवस्था के एक उभरते हुए शक्ति केंद्र के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। फिर भी, यदि इस पूरे आर्थिक समीकरण में से चीन के आंकड़ों को अलग कर दिया जाए, तो यह भव्य तस्वीर पूरी तरह से बदल जाती है और विकास की जमीनी हकीकत बिल्कुल उलट दिखाई देने लगती है।\n\nवैश्विक आय में ब्रिक्स की हिस्सेदारी और चीन का वर्चस्व\nअंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष में भारत, बांग्लादेश, भूटान और श्रीलंका के पूर्व कार्यकारी निदेशक रहे अर्थशास्त्री सुरजीत भल्ला द्वारा जुटाए गए आंकड़ों से पता चलता है कि वैश्विक आय में ब्रिक्स की हिस्सेदारी 2011 में 21.9% थी, जो 2025 तक बढ़कर 28.9% पहुंच गई। यह वही प्रामाणिक आंकड़ा है जिसे ब्रिक्स के प्रत्येक आधिकारिक बयान में प्रमुखता से शामिल किया जाता है। हालांकि, जब इस सूची से चीन को बाहर निकाला जाता है, तो विकास की यह यात्रा ऊपर चढ़ने के बजाय ढलान की ओर जाती दिखती है।\n\nचीन के बिना बाकी दस ब्रिक्स देशों की वैश्विक आय में हिस्सेदारी 2011 में 11.9% थी, जो 2025 में घटकर 11.5% रह गई, यानी इसमें 0.4% की वास्तविक गिरावट दर्ज हुई। इसके विपरीत, अकेले चीन की हिस्सेदारी इसी समयावधि के दौरान 10% से बढ़कर 17.4% पर पहुंच गई। इसका सीधा अर्थ यह है कि पिछले 12 वर्षों में पूरे ब्रिक्स समूह की आय में जो भी कुल वृद्धि हुई, उसका 72% हिस्सा अकेले चीन के खाते से आया। सुरजीत भल्ला ने इस बात पर जोर दिया कि ब्रिक्स समूह का उत्थान हुआ है, लेकिन केवल एक देश को हटाते ही यह पूरी बढ़त गायब हो जाती है।\n\nजनसंख्या का अनुपात और समूह के भीतर बढ़ता असंतुलन\nयदि जनसंख्या की दृष्टि से इस समूह का विश्लेषण किया जाए, तो ब्रिक्स देशों के पास 2011 में दुनिया की कुल आबादी का 50.9% हिस्सा था, जो 2025 में लगभग स्थिर रहकर 50.5% पर बना हुआ है। सुरजीत भल्ला का कहना है कि दुनिया की आधी आबादी के पास वैश्विक आय का तीन-दसवां हिस्सा भी नहीं है, और केवल एक देश को छोड़कर किसी भी अन्य सदस्य में वास्तविक आर्थिक अभिसरण देखने को नहीं मिला। उन्होंने यह भी रेखांकित किया कि यह हिस्सेदारी 2023 में अपने उच्चतम स्तर 29.8% पर पहुंची थी, जिसके बाद के दोनों वर्षों में इसमें लगातार गिरावट आई है।\n\nइस आर्थिक संगठन के आंतरिक ढांचे में भी भारी असमानता पनप चुकी है। चीन, जिसके पास 2011 में ब्रिक्स की कुल आय का 45.6% हिस्सा था, अब 60.2% आय पर नियंत्रण करके समूह पर पूरी तरह हावी हो चुका है। वहीं दूसरी ओर, पांच पुराने संस्थापक सदस्यों के बीच आय का संकेंद्रण 2011 के 54.1% से उछलकर 68.9% हो गया है। इसके विपरीत, पिछले 15 वर्षों के दौरान ब्रिक्स की कुल आबादी में चीन का हिस्सा 38.4% से घटकर 35.7% रह गया है।\n\nवैश्विक माल निर्यात में व्यापारिक ठहराव की स्थिति\nव्यापार के मोर्चे पर भी चीन को अलग करने के बाद बाकी दस देशों की विकास दर पिछले 12 वर्षों में गिरी है। यदि चीन और चार तेल उत्पादक देशों को बाहर कर दिया जाए, तो शेष समूह का निर्यात पूरी तरह सपाट बना हुआ है। आंकड़ों के अनुसार, विश्व के माल निर्यात में ब्रिक्स का हिस्सा 2011 के 23% से बढ़कर 2023 में 25% हुआ। लेकिन चीन को अलग करते ही यह आंकड़ा 12.4% से गिरकर 10.1% पर आ गया। पिछले बारह वर्षों के दौरान ब्रिक्स के माल निर्यात में जो शुद्ध वृद्धि दर्ज की गई, उसमें अकेले चीन की हिस्सेदारी 94% रही।\n\nब्रिक्स के भीतर रूस, संयुक्त अरब अमीरात, सऊदी अरब और ईरान जैसे चार प्रमुख कच्चे तेल निर्यातक देश शामिल हैं। इन तेल निर्यातकों का डॉलर निर्यात अनुपात काफी हद तक कच्चे तेल की अंतरराष्ट्रीय कीमतों पर निर्भर करता है, जिनमें भारी गिरावट देखी गई है। 2011 में विश्व निर्यात में इनकी हिस्सेदारी 7.3% थी, जो 2015 में गिरकर 5% रह गई और 2023 तक सुस्त बनी रही।\n\nसुरजीत भल्ला के अनुसार यदि चीन और चारों तेल निर्यातकों को एक तरफ रख दिया जाए, तो शेष छह देश, ब्राजील, भारत, इंडोनेशिया, दक्षिण अफ्रीका, मिस्र और इथियोपिया, 2011 में विश्व माल निर्यात में 5.1% हिस्सेदारी रखते थे और 2023 में भी ठीक 5.1% पर ही बने रहे। बारह वर्षों के अंतराल में कोई बदलाव नहीं हुआ। यह इस पूरे विश्लेषण का सबसे स्पष्ट और अचूक आंकड़ा है, क्योंकि यह न तो तेल की कीमतों का प्रभाव है और न ही चीन की कोई कहानी, बल्कि यह दर्शाता है कि इन देशों में व्यापारिक स्तर पर कुछ भी नया नहीं घटा।\n\nप्रति व्यक्ति आय की स्थिति और विभिन्न सदस्यों का प्रदर्शन\nविभिन्न सदस्य देशों की घरेलू आर्थिक स्थिति का मूल्यांकन करने पर भारी विषमताएं सामने आती हैं। इथियोपिया और चीन ने अपनी डॉलर आय को लगभग तिगुना कर लिया है, भारत ने अपनी आय दोगुनी की है, और इंडोनेशिया का प्रदर्शन भी संतोषजनक रहा है। इसके विपरीत ब्राजील, दक्षिण अफ्रीका और ईरान जैसे देश 2025 में 2011 की तुलना में डॉलर के लिहाज से अधिक गरीब हो चुके हैं।\n\nप्रति नागरिक आय के मामले में ब्राजील की वैश्विक रैंक 112वीं है, जिसके बाद दक्षिण अफ्रीका 118वें और ईरान 123वें स्थान पर आता है। ये तीनों देश 2011 से 2025 की अवधि में नकारात्मक प्रति व्यक्ति आय वृद्धि से जूझ रहे हैं, जहां ब्राजील में -0.4%, दक्षिण अफ्रीका में -1.4% और ईरान में -2.6% की गिरावट दर्ज की गई। संयुक्त अरब अमीरात 101वें स्थान पर है, लेकिन उसकी प्रति व्यक्ति आय वृद्धि महज 0.9% रही।\n\nकई विश्लेषक इसका कारण 2014 से 2016 के बीच तेल की कीमतों में आई गिरावट या महामारी को मान सकते हैं। लेकिन सुरजीत भल्ला बताते हैं कि यदि इस समय सीमा को 2019 पर विभाजित किया जाए, तो ब्राजील और ईरान ने दूसरे हिस्से में मामूली सुधार किया, जबकि रूस ने ऊर्जा कीमतों और युद्ध अर्थव्यवस्था के बल पर 2019 से पहले की 0.1% वार्षिक दर को बाद में 6.1% तक पहुंचा दिया। इसके बावजूद दक्षिण अफ्रीका दोनों ही चरणों में क्रमशः -1.8% और -0.8% के साथ नकारात्मक रहा, जिससे हारने और जीतने वालों की समग्र स्थिति में कोई विशेष बदलाव नहीं आया।\n\nब्रिक्स से बाहर के देशों से तुलना और भारत की स्थिति\nइस समूह के वास्तविक प्रदर्शन को समझने के लिए ब्रिक्स से बाहर के 125 देशों के साथ तुलना की गई, जिनकी आबादी 30 लाख से अधिक है और दोनों वर्षों का डेटा उपलब्ध है। इस तुलना में ब्रिक्स का औसत सदस्य 66वें स्थान पर आता है। ब्रिक्स सदस्यों की औसत विकास दर प्रति वर्ष 2.7% रही, जो दुनिया के अन्य देशों की औसत विकास दर के बिल्कुल बराबर है। यह दर्शाता है कि यह समूह वैश्विक औसत के ठीक समान है, और इसके ग्यारह सदस्यों में से केवल पांच ही विश्व के औसत विकास को पार कर सके।\n\nदुनिया के सबसे तेजी से बढ़ते देशों में बांग्लादेश 8.8% वार्षिक विकास दर के साथ शीर्ष पर है, वियतनाम तीसरे और कंबोडिया पांचवें स्थान पर काबिज है। इसके बाद आर्मेनिया, नेपाल, जॉर्जिया, बुल्गारिया, रोमानिया, कोस्टा रिका और केन्या का स्थान आता है। पिछले पंद्रह वर्षों में दुनिया के 25 सबसे तेजी से बढ़ते देशों में से 23 देश ब्रिक्स के सदस्य नहीं हैं। सुरजीत भल्ला का कहना है कि इन शीर्ष देशों में जो बात समान है, वह कोई अंतरराष्ट्रीय शिखर सम्मेलन नहीं, बल्कि व्यापार पहुंच, प्रत्यक्ष निवेश और घरेलू आर्थिक सुधार हैं, यानी उन्होंने ठोस काम पर ध्यान दिया।\n\nसंस्थापक सदस्यों में भारत चीन के बाद ब्रिक्स में दूसरा सबसे अच्छा प्रदर्शन करने वाला देश रहा, जो 5.2% वार्षिक वृद्धि के साथ दुनिया में 26वें स्थान पर रहा। भारत की प्रति व्यक्ति आय 2.5% से बढ़कर 3.5% हो गई, जबकि विश्व औसत में इसकी स्थिति 13.4% से सुधरकर 18.7% पर पहुंची।\n\nइसके बावजूद सुरजीत भल्ला ने स्पष्ट किया कि यह प्रगति पर्याप्त नहीं है, और निर्यात के आंकड़े इसका कारण उजागर करते हैं। 2011 में वैश्विक माल निर्यात में भारत की हिस्सेदारी 1.71% थी, जो 2023 में मामूली बढ़कर 1.88% हुई, यानी बारह वर्षों में महज 0.17 प्रतिशत अंक का सुधार हुआ। उसी समयावधि में वियतनाम की हिस्सेदारी 0.52% से बढ़कर 1.50% हो गई। वियतनाम का माल निर्यात 93 अरब डॉलर से छलांग लगाकर 345 अरब डॉलर तक पहुंच गया, जबकि इसी दौरान भारत का निर्यात 307 अरब डॉलर से बढ़कर 432 अरब डॉलर हुआ। सुरजीत भल्ला ने रेखांकित किया कि भारत की आबादी के पंद्रहवें हिस्से वाला देश लगभग बराबरी पर पहुंच चुका है, और उसने यह उपलब्धि उस समय हासिल की जब बाकी देश अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था में सुधार के लिए शिखर सम्मेलनों में भाग ले रहे थे।\n\nइसका आप पर असर\nयह आर्थिक विश्लेषण स्पष्ट करता है कि ब्रिक्स की सामूहिक शक्ति का दावा जमीनी व्यापार और घरेलू आय के स्तर पर व्यापक रूप से असरदार साबित नहीं हो रहा है।\n\n• भारत में: विनिर्माण और वैश्विक निर्यात में अपेक्षित तेजी न आने से रोजगार के नए अवसरों और विदेशी मुद्रा की आवक पर सीधा असर पड़ता है। देश को वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में बड़ी हिस्सेदारी पाने के लिए वियतनाम जैसे प्रतिस्पर्धी देशों से सीख लेकर घरेलू सुधारों को और तेज करना होगा।\n• वैश्विक स्तर पर: चीन के अलावा अधिकांश सदस्य देशों में प्रति व्यक्ति आय की धीमी या नकारात्मक वृद्धि से अंतरराष्ट्रीय व्यापार साझेदारी प्रभावित हो रही है। विकासशील देशों के निवेशकों और व्यापारिक संस्थानों को केवल राजनयिक मंचों के बजाय द्विपक्षीय व्यापार सुगमता और वास्तविक उत्पादन क्षमता पर ध्यान देना होगा।\n• सामान्य नागरिकों के लिए: प्रति व्यक्ति आय में धीमी बढ़त का अर्थ है कि मुद्रास्फीति के सामने आम लोगों की वास्तविक क्रय शक्ति में तेज बढ़ोतरी नहीं हो पा रही है। यदि देश अपने निर्यात और उत्पादकता में बड़ी छलांग नहीं लगाते हैं, तो जीवन स्तर में सुधार की रफ्तार धीमी बनी रहेगी।\n• नीति निर्माताओं के लिए: वैश्विक सम्मेलनों के वादों के बजाय आयात-निर्यात नियमों को सरल बनाने और विनिर्माण को बढ़ावा देने की सख्त जरूरत है। जब तक जमीनी व्यापार नीतियां दुरुस्त नहीं होंगी, तब तक अंतरराष्ट्रीय गठबंधनों से घरेलू अर्थव्यवस्था को बड़ा फायदा नहीं मिल सकेगा।\n\nऐसा क्यों हुआ\nब्रिक्स के आर्थिक आंकड़ों में यह भारी असंतुलन इसलिए पैदा हुआ क्योंकि चीन ने पिछले डेढ़ दशक में विनिर्माण और निर्यात में आक्रामक विस्तार किया, जबकि बाकी सदस्य देश अपनी अर्थव्यवस्थाओं में जरूरी ढांचागत सुधार लागू करने में पीछे रह गए।\n\n• चीन का विनिर्माण एकाधिकार: चीन ने पिछले बारह वर्षों में ब्रिक्स की कुल आय वृद्धि का 72% और माल निर्यात वृद्धि का 94% हिस्सा अकेले हासिल किया। इससे समूह के समग्र आंकड़े काफी मजबूत दिखे, लेकिन बाकी दस सदस्य देशों की वास्तविक स्थिति छिप गई।\n• कमोडिटी और तेल निर्भरता: रूस, संयुक्त अरब अमीरात, सऊदी अरब और ईरान की आय वैश्विक ऊर्जा कीमतों में आई नरमी की वजह से सुस्त रही। 2011 में 7.3% रहने वाला इन देशों का निर्यात हिस्सा गिरकर 5% पर सिमट गया, जिससे समूह की गैर-चीनी विकास दर कमजोर पड़ गई।\n• घरेलू सुधारों और व्यापार पहुंच का अभाव: ब्राजील, दक्षिण अफ्रीका और ईरान जैसे देशों में नकारात्मक प्रति व्यक्ति आय वृद्धि दर्ज हुई क्योंकि वे जरूरी आर्थिक सुधार लागू नहीं कर सके। इसके विपरीत वियतनाम और बांग्लादेश जैसे गैर-सदस्य देशों ने व्यापार पहुंच और विदेशी निवेश पर ध्यान केंद्रित करके शानदार आर्थिक छलांग लगाई।\n\nसवाल-जवाब\n\n1. सुरजीत भल्ला के विश्लेषण के अनुसार ब्रिक्स की आय में चीन का कितना योगदान है?\nपिछले 12 वर्षों में ब्रिक्स की कुल आय में हुई वृद्धि का 72% हिस्सा अकेले चीन के खाते से आया है।\n\n2. चीन को हटाने के बाद बाकी दस ब्रिक्स देशों की वैश्विक आय में क्या बदलाव आया?\nअन्य दस देशों की वैश्विक आय में हिस्सेदारी 2011 में 11.9% से घटकर 2025 में 11.5% रह गई, जिसमें 0.4% की गिरावट दर्ज की गई।\n\n3. ब्रिक्स के किन सदस्य देशों में प्रति व्यक्ति आय नकारात्मक दर्ज की गई?\nब्राजील में -0.4%, दक्षिण अफ्रीका में -1.4% और ईरान में -2.6% की नकारात्मक प्रति व्यक्ति आय वृद्धि दर्ज की गई।\n\n4. भारत और वियतनाम के वैश्विक निर्यात प्रदर्शन में क्या अंतर देखा गया?\n12 वर्षों में भारत का माल निर्यात 307 अरब डॉलर से बढ़कर 432 अरब डॉलर हुआ, जबकि वियतनाम का निर्यात 93 अरब डॉलर से उछलकर 345 अरब डॉलर पहुंच गया।",
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  "publishedAt": "2026-09-19",
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