{
  "type": "article",
  "title": "भारत और अमेरिका के बीच व्यापार समझौते के पहले चरण का कानूनी मसौदा तैयार, पीयूष गोयल ने दी जानकारी",
  "summary": "केंद्रीय वाणिज्य और उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने स्पष्ट किया है कि भारत और अमेरिका के बीच व्यापार समझौते का पहला चरण तय हो चुका है और इस समय कानूनी मसौदे पर काम चल रहा है।",
  "content": "नई दिल्ली और वॉशिंगटन के बीच प्रस्तावित द्विपक्षीय व्यापार समझौते के पहले चरण की रूपरेखा को अंतिम रूप दे दिया गया है। केंद्रीय वाणिज्य और उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने जानकारी दी है कि समझौते की पहली किस्त पूरी तरह तय हो चुकी है और इस समय उसके कानूनी मसौदे को अंतिम रूप देने की प्रक्रिया चल रही है। नई दिल्ली में आयोजित एसआरसीसी शताब्दी सम्मेलन के दौरान उन्होंने स्पष्ट किया कि इस ऐतिहासिक समझौते को लागू करने की समयसीमा इस बात पर निर्भर करेगी कि भारतीय निर्यातकों को अपने प्रतिस्पर्धी देशों के मुकाबले अमेरिकी बाजार में कितना शुल्क लाभ या टैरिफ बढ़त मिलती है।\n\nकानूनी समीक्षा के अंतिम दौर में द्विपक्षीय व्यापार ढांचा\nव्यापार समझौते की प्रगति पर बात करते हुए केंद्रीय वाणिज्य और उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने कहा कि इस प्रस्तावित समझौते को लेकर सरकार का रुख पहले जैसा ही स्थिर बना हुआ है। उन्होंने बताया कि दोनों देशों के बीच महीनों से चल रही वार्ताओं का परिणाम अब सकारात्मक दिशा में पहुंच चुका है। पीयूष गोयल ने कहा, \n \"US bilateral trade agreements first tranche has been finalised, and it is going through final contours, the legal drafting, and we hope to be able to finalise that soon and operationalise that once we get the comparable advantage or competitive advantage over our peer countries,\"\n उन्होंने जोर देकर कहा कि भारत की प्राथमिकता अपने घरेलू उद्योगों और निर्यातकों के हितों की रक्षा करना है, जिससे वैश्विक पटल पर प्रतिस्पर्धी देशों के सामने भारतीय उत्पादों को तरजीही स्थान मिल सके।\n\nवाणिज्य सचिव ने बातचीत को बहुत सकारात्मक दायरे में बताया\nइस बीच, वाणिज्य सचिव राजेश अग्रवाल ने भी पत्रकारों से चर्चा करते हुए पुष्टि की कि दोनों पक्षों के बीच बातचीत बेहद अनुकूल माहौल में आगे बढ़ रही है। राजेश अग्रवाल ने कहा, \n \"Probably we are in a very good zone. We anticipate closing the deal and signing the deal at the earliest possible time,\"\n उन्होंने विस्तार से समझाया कि समझौते पर हस्ताक्षर करने और उसे लागू करने का सटीक समय इस बात से भी तय होगा कि अमेरिका अपनी संपूर्ण आंतरिक टैरिफ संरचना को किस प्रकार औपचारिक स्वरूप देता है। अमेरिकी प्रशासन अपनी शुल्क नीतियों को नए सिरे से व्यवस्थित करने पर काम कर रहा है, और उसी के समानांतर यह वार्ता भी अंतिम चरण की ओर अग्रसर है।\n\nधारा 301 और अमेरिकी टैरिफ व्यवस्था से जुड़े अहम पहलू\nराजेश अग्रवाल ने आगे बताया कि अमेरिका में टैरिफ ढांचे को पुनर्स्थापित करने के लिए समानांतर प्रक्रिया चल रही है, जिसके परिणाम समझौते के अगले कदमों को तय करेंगे। वाणिज्य सचिव ने कहा, \n \"So, there is parallel work being done in the US also to get back the tariff structure and based on some of the outcomes under Section 301, we will progress towards signing the deal at a mutually agreed time,\"\n उन्होंने स्पष्ट किया कि किसी भी बड़े व्यापार समझौते का सबसे महत्वपूर्ण स्तंभ यह होता है कि दोनों देश एक-दूसरे के बाजारों में न केवल सामान्य पहुंच सुनिश्चित करें, बल्कि प्रतिस्पर्धियों की तुलना में बेहतर और तरजीही बाजार पहुंच भी प्रदान करें।\n\nवाणिज्य सचिव ने जोर दिया कि जब तक भारत को अपने प्रमुख प्रतिद्वंद्वियों की तुलना में अमेरिकी बाजार में रियायती शर्तें नहीं मिल जातीं, तब तक समझौते का पूर्ण लाभ प्राप्त नहीं हो सकेगा। राजेश अग्रवाल ने कहा, \n \"So in that context, India has to get preferential market access with their competitors. And that is something which will come as a part of the new tariff framework that the US is working on,\"\n भारत का मुख्य उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि वस्त्र, इंजीनियरिंग और अन्य प्रमुख श्रेणियों में भारतीय सामान को अन्य देशों के मुकाबले कम सीमा शुल्क का लाभ मिले।\n\nगैर-बाजार हस्तक्षेप और अतिरिक्त उत्पादन क्षमता पर भारत का कड़ा रुख\nउद्योगों में अतिरिक्त क्षमता को लेकर अमेरिकी धारा 301 जांच के संबंध में पूछे गए सवाल पर राजेश अग्रवाल ने भरोसा जताया कि सभी तकनीकी जटिलताओं का समाधान इस समझौते के तहत कर लिया जाएगा। उन्होंने कहा, \n \"I think all other issues will get settled as part of the deal,\"\n उल्लेखनीय है कि इसी महीने भारत और 14 अन्य देशों ने वैश्विक स्तर पर अत्यधिक औद्योगिक उत्पादन और गैर-बाजार हस्तक्षेप से निपटने के लिए साझा अंतरराष्ट्रीय कदमों का आह्वान किया था।\n\nइस विषय पर भारत की नीति को दोहराते हुए वाणिज्य सचिव ने कहा, \n \"Excess capacity due to non-market forces or non-market interventions has been something which India has also been opposing in a big way,\"\n उन्होंने चेतावनी दी कि कृत्रिम सब्सिडी और गैर-बाजार हस्तक्षेप के माध्यम से तैयार की गई अतिरिक्त विनिर्माण क्षमता अंतरराष्ट्रीय व्यापार के संतुलन को बिगाड़ती है, आपूर्ति और मांग के सामान्य तंत्र को नुकसान पहुंचाती है और दुनिया भर के स्वतंत्र उत्पादकों के लिए अनुचित प्रतिस्पर्धा पैदा करती है।\n\nरूस और ईरान प्रतिबंध कानून 2026 तथा ऊर्जा व्यापार पर संभावित प्रभाव\nप्रेस वार्ता के दौरान राजेश अग्रवाल से अमेरिकी कानून लिंडसे ओ ग्राहम सैंक्शनिंग रूस एंड ईरान एक्ट ऑफ 2026 के प्रभाव के बारे में भी पूछा गया। यह अमेरिकी कानून वहां के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को रूसी तेल और गैस के सबसे बड़े खरीदारों पर 100 प्रतिशत तक का भारी टैरिफ लगाने का अधिकार देता है। इस पर टिप्पणी करते हुए वाणिज्य सचिव ने कहा, \n \"Hopefully when it pact is signed, hopefully we will have more clarification on that.\"\n हालांकि उन्होंने यह पुष्टि नहीं की कि क्या यह कानून अमेरिकी टैरिफ ढांचे का सीधा हिस्सा बनेगा या नहीं, लेकिन उन्होंने स्पष्ट किया कि भारत इस व्यापार समझौते के जरिए लंबी अवधि की शुल्क स्थिरता और निर्बाध व्यापारिक प्रवाह की तलाश कर रहा है।\n\nअमेरिकी अधिकारियों के बयान और उच्चस्तरीय कूटनीतिक दौरे\nसमझौते की गति को लेकर दोनों देशों के रुख में कूटनीतिक बारीकियां भी देखने को मिली हैं। इसी महीने की शुरुआत में अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि जेमिसन ग्रीर ने कहा था कि समझौता बिल्कुल निकट नहीं है। जेमिसन ग्रीर ने कहा, \n \"At the same time...I dont think theres something imminent, but we truly have identified the universe of items that are sticking points. Were working diligently towards them,\"\n हालांकि, भारतीय अधिकारियों का मानना है कि विवादित मुद्दों का दायरा समय के साथ काफी सिमट चुका है और दोनों पक्ष समाधान के करीब पहुंच रहे हैं।\n\nकूटनीतिक सरगर्मियों के तहत अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो अगले सप्ताह भारत की यात्रा पर आ रहे हैं। इस समझौते के पहले चरण की मूल रूपरेखा फरवरी में घोषित की गई थी, लेकिन बाद में अमेरिकी टैरिफ परिदृश्य में आए बदलावों के कारण अतिरिक्त वार्ताओं का दौर शुरू हुआ। इससे पहले 5 अक्टूबर को वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने भी रेखांकित किया था कि दोनों देशों के बीच वार्ता जारी है, लेकिन बातचीत एक ठहराव की स्थिति में पहुंची थी जिसे अब आगे बढ़ाया जा रहा है।\n\nदूसरी ओर, भारत में अमेरिकी राजदूत सर्जियो गोर ने हाल ही में कहा कि बातचीत तेजी से प्रगति कर रही है और अधिकांश प्रमुख मसलों को सुलझा लिया गया है। सर्जियो गोर ने कहा, \n \"I wont like to get into too many details at this stage, and let the ministers announce that. But in the grand scheme of things, big items are done.\"\n अधिकारियों का मानना है कि जैसे ही वाशिंगटन का नया टैरिफ फ्रेमवर्क स्पष्ट हो जाएगा, यह समझौता औपचारिक हस्ताक्षर और क्रियान्वयन की दिशा में तेजी से आगे बढ़ जाएगा।\n\nद्विपक्षीय व्यापार आंकड़े और आर्थिक संतुलन\nउच्च टैरिफ और वैश्विक अनिश्चितताओं के बावजूद भारत और अमेरिका के बीच द्विपक्षीय व्यापार के हालिया आंकड़ों में लचीलापन देखने को मिला है। पिछले वित्तीय वर्ष में अमेरिका को होने वाले भारत के कुल निर्यात में 0.92 प्रतिशत की मामूली वृद्धि दर्ज की गई, जिससे यह बढ़कर 87.3 अरब डॉलर पर पहुंच गया। वहीं दूसरी ओर, अमेरिका से भारत का आयात 15.95 प्रतिशत की तेज बढ़त के साथ 52.9 अरब डॉलर दर्ज किया गया।\n\nअमेरिकी आयात में हुई इस तेज वृद्धि के परिणामस्वरूप दोनों देशों के बीच भारत का व्यापार अधिशेष वर्ष 2025-26 में घटकर 34.4 अरब डॉलर रह गया, जो इससे पहले के वर्ष में 40.89 अरब डॉलर के स्तर पर था। विशेषज्ञों का मानना है कि इस द्विपक्षीय समझौते के लागू होने से दोनों देशों के बीच आयात और निर्यात में अधिक संतुलन आएगा और दोनों अर्थव्यवस्थाओं को पारस्परिक लाभ प्राप्त होगा।\n\nइसका आप पर असर\nभारत और अमेरिका के बीच व्यापार समझौते का पहला चरण पूरा होने से भारतीय निर्यातकों को अमेरिकी बाजार में प्रतिस्पर्धी बढ़त और स्थिर शुल्क दरों का सीधा फायदा मिलेगा।\n\n• भारतीय निर्यातकों के लिए: यह समझौता लागू होने के बाद भारतीय इंजीनियरिंग, कपड़ा और विनिर्मित उत्पादों को अमेरिकी बाजार में अन्य देशों से कम शुल्क पर प्रवेश मिल सकेगा। इससे भारतीय कंपनियों के ऑर्डर बढ़ेंगे और वैश्विक प्रतिस्पर्धा में घरेलू उद्योगों की स्थिति मजबूत होगी।\n• आयात और उद्योग जगत: अमेरिका से उच्च तकनीक, औद्योगिक मशीनरी और ऊर्जा उत्पादों का आयात अधिक सुगम और अनुमानित दरों पर संभव होगा। इससे स्थानीय विनिर्माण इकाइयों को आवश्यक कच्चे माल और उपकरणों की आपूर्ति सुचारू रूप से मिल सकेगी।\n• रोजगार और आर्थिक विकास: अमेरिकी बाजार में भारतीय निर्यात बढ़ने से विनिर्माण और सेवा क्षेत्रों में नए रोजगार के अवसर पैदा होंगे। विशेष रूप से निर्यात-उन्मुख उद्योगों में उत्पादन क्षमता का विस्तार देखने को मिलेगा।\n• व्यापार संतुलन और स्थिरता: दोनों देशों के बीच स्पष्ट टैरिफ व्यवस्था बनने से अचानक शुल्क वृद्धि या नीतिगत अनिश्चितता का खतरा दूर होगा। कारोबारी लंबी अवधि के निवेश और निर्यात अनुबंध बिना किसी हिचकिचाहट के तय कर सकेंगे।\n\nऐसा क्यों हुआ\nभारत और अमेरिका लंबे समय से बढ़ते द्विपक्षीय व्यापार असंतुलन, जटिल सीमा शुल्क नीतियों और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में आ रहे व्यवधानों को दूर करने के लिए इस समझौते की रूपरेखा तैयार कर रहे थे।\n\n• प्रतिस्पर्धी टैरिफ की आवश्यकता: भारतीय निर्यातक अमेरिकी बाजार में अन्य एशियाई देशों के मुकाबले समान या बेहतर शुल्क रियायतों की मांग कर रहे थे। इस समझौते के जरिए भारत का मुख्य उद्देश्य अपने सामान के लिए तरजीही बाजार पहुंच हासिल करना रहा है।\n• अमेरिकी टैरिफ ढांचे में बदलाव: वाशिंगटन अपने व्यापार नियमों और धारा 301 के तहत शुल्क संरचना को नए सिरे से परिभाषित कर रहा था। इसके समानांतर दोनों देशों ने एक साझा और व्यवस्थित द्विपक्षीय व्यापार समझौते पर सहमति बनाने की दिशा में काम किया।\n• अत्यधिक औद्योगिक क्षमता का दबाव: गैर-बाजार हस्तक्षेप और अनुचित सब्सिडी के जरिए वैश्विक बाजारों में डंप किए जाने वाले अतिरिक्त विनिर्माण से निपटने के लिए दोनों देशों का रुख एक समान रहा है। इस साझा चिंता ने दोनों पक्षों को व्यापारिक नियम कड़े और पारदर्शी बनाने के लिए प्रेरित किया।\n\nसवाल-जवाब\n\n1. भारत-अमेरिका व्यापार समझौते के पहले चरण की वर्तमान स्थिति क्या है?\nवाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल के अनुसार समझौते के पहले चरण को अंतिम रूप दिया जा चुका है और इस समय इसका कानूनी मसौदा तैयार किया जा रहा है।\n\n2. इस समझौते को लागू करने के लिए भारत की प्रमुख शर्त क्या है?\nभारत का कहना है कि समझौते को तभी प्रभावी बनाया जाएगा जब भारतीय उत्पादों को अमेरिकी बाजार में प्रतिस्पर्धी देशों के मुकाबले तरजीही टैरिफ लाभ मिलेगा।\n\n3. अमेरिका का लिंडसे ओ ग्राहम कानून क्या प्रावधान करता है?\nयह कानून अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को रूसी तेल और गैस के प्रमुख खरीदारों पर 100 प्रतिशत तक का सीमा शुल्क लगाने का अधिकार देता है।\n\n4. पिछले वित्तीय वर्ष में भारत और अमेरिका के बीच व्यापार की स्थिति क्या रही?\nभारत का अमेरिका को निर्यात 0.92 प्रतिशत बढ़कर 87.3 अरब डॉलर रहा, जबकि आयात 15.95 प्रतिशत बढ़कर 52.9 अरब डॉलर पर पहुंच गया।\n\n5. अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो की भारत यात्रा का क्या महत्व है?\nमार्को रुबियो अगले सप्ताह भारत यात्रा पर आ रहे हैं, जिससे द्विपक्षीय व्यापार समझौते के मुद्दों पर उच्चस्तरीय चर्चा को गति मिलने की उम्मीद है।",
  "url": "https://trendkia.com/money/india-aura-us-ke-bicha-vyapara-samajhaute-ke-pahale-charana-ka-kanuni-masauda-taiyara-piyush-goyal-ne-di-janakari-47973",
  "category": "मनी",
  "publishedAt": "2026-10-15",
  "tags": [
    "भारत अमेरिका व्यापार",
    "पीयूष गोयल",
    "राजेश अग्रवाल",
    "व्यापार समझौता",
    "अमेरिकी टैरिफ",
    "निर्मला सीतारमण",
    "द्विपक्षीय व्यापार"
  ],
  "language": "hi",
  "site": "TrendKia"
}